जली थी अग्निशिखा - महाश्वेता देवी Jali Thi Agnishikha - Hindi book by - Mahashweta Devi " />
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जली थी अग्निशिखा

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :107
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3237
आईएसबीएन :81-7119-789-2

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रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित उपन्यास.....

jali thi agnishikha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ऐतिहासिक उपन्यास लेखन पर कोई स्पष्ट राय अब तक नहीं बन सकी है। रोमांस और त्रासदी का अंकन कर उपन्यासकार अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है। लेकिन प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी ‘इतिहास-सृजन’ को अतिरिक्त जिम्मेदारी से निभाती हैं। ऐसे लेखन के लिए खास प्रवणता, कथा की बजाय देश काल, पात्र और आचार-व्यवहार की प्रामाणिक जानकारी का होना बेहद जरूरी है। इसके अलावा मौजूदा समय की पकड़ भी। महाश्वेताजी में ये सभी विशेषताएँ मौजूद हैं।

पहले उपन्यास ‘झाँसी की रानी’ के बाद जली थी अग्निशिखा में पुनः रानी लक्ष्मीबाई केन्द्र में है। महाश्वेता जी का लेखन अपने मिजाज और तेवर में नितान्त भिन्न है। बिल्कुल नई सूचनाएँ, नया अनुभव और नई भाषा। लोक मुहावरे और ठेठ देशज शब्दों के इस्तेमाल से उन्हें परहेज नहीं है, दरअसल उनका आग्रह सामाजिकता के प्रति अधिक रहता है। प्रस्तुत उपन्यास में अंग्रेजों और उनके सेनापति ह्यूरोज़ के लिए झाँसी और रानी दोनों पहेली हैं। रानी के ताकत के सम्मुख अंग्रेज सैनिक हताश हैं। ह्यूरोज़ जानना चाहता है कि झाँसी की रानी आख़िर क्या बला है ? ग्वालियर शहर (जहाँ उनका डेरा है) से पूरब कि तरफ़ धू-धू जल रही अग्नि किन लोगों ने जलाई होगी ? सारे द्वन्द्व उनके अन्दर चलते रहते हैं। जब उसे पता चलता है कि रानी अदम्य इच्छाशक्ति, साहस और संघर्ष से लैस शान्त, सभ्य और बुद्धिमान महिला है तो वह अवाक् रह जाता है। उसकी यह धारणा खत्म हो जाती है कि भारतीय महिलाएँ अनपढ़ गवार और फूहड़ होती हैं। रानी के संघर्ष के बहाने उपन्यास उस समय के जीवन स्थितियों, विडम्बनाओं, विद्रूपताओं तथा अंग्रेजों की क्रूरताओं को भी सामने लाता है। इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए एक ज़रुरी किताब।


दो शब्द

 


इस पुस्तक की विषयवस्तु को लेकर कुछ कहने की आवश्यकता महसूस नहीं करती हूँ। 1857-58 के महासंग्राम ने मध्य प्रदेश में जन-विद्रोह का रूप धारण कर लिया था। केनिंग ने नानासाहेब और लक्ष्मीबाई को एक सा महत्त्व दिया था। ह्यूरोज़ जिस समय आगे बढ़ता है, उस समय उसे अपने अभिमान के मार्ग में ‘जली धरती नीति’ और ‘स्कोर्च अर्थ नीति’ के अनुसार जल-घास अन्न की फसलें नहीं मिलती हैं। रानी की अपनी महिला सेना को किले की प्राचीर की मरम्मत और युद्ध करते ह्यूरोज़ ने देखा था, इन सबके प्रमाण छपी पुस्तकों में विद्मामान हैं। शेष मेरा है। उद्देश्य, अंततः मध्य भारत में जो अग्नि प्रज्वलित हुई थी, वह अग्नि विद्रोह की आग थी। रानी अपने सामंत वर्ग की सीमाबद्धता और स्वार्थभावना से अन्य लोगों की तुलना में ऊपर उठ गई थी।

यह तो हुई इस पुस्तक की बात।
पुस्तक समर्पित किसे की है परमानंद सिंह पश्चिम बंग मुंडा समाज के दायित्वपूर्ण पद पर थे। आज भी उन्हें समाज की चिंता औरों से अधिक है। अपने समाज के प्रति उनके मुद्रित आवेदन पत्र को यहाँ उस दिन ही तो भेजा है। समझ रहे हैं कि मुंडा समाज भी अपनी निजता खोता जा रहा है। इसीलिए कहते हैं, मुंडा बच्चों के ‘लुतुर तुकुईः’ अथवा कर्णभेद उत्सव (पहले माघ को) के समय सामाजिक प्रथा के अनुसार मुहल्ला और पड़ोस का प्रत्येक व्यक्ति शिशु के नाम पर धान अथवा रुपया देगा। यह रुपया शिशु के लिए जमा रहेगा। उस लड़की अथवा लड़के के विवाह के समय वही होगा समाज-प्रदत्त नए संसार की यात्रा का पाथेय। परमानंद कहता है। कर्णभेद उत्सव के समय भोजन आदि मत कराइए। रुपया खर्च मत कीजिए। यह रीति तो समाज के प्रति दायित्वबोध उत्पन्न करने और बच्चे के पालन-पोषण के लिए बनाई गई है। उस रीति को तो जारी रखो।
कहता है, ‘मुंडा समाज में कितने लोग साक्षर हैं, यह मैं नहीं जानता। किंतु नए निरक्षर तो मत बनने दो। हर लड़के-लड़की को स्कूल भेजो।’

कहता है, ‘हमारे समाज के कई शत्रुओं में कुछ के नाम जान लो-
1.    दरिद्रता, 2. हँडिया-शराब, 3. बाबू समाज से आई जुए की प्रथा, 4. निरक्षरता आदि।
परमानन्द को मैं इतना चाहती हूँ, इतनी श्रद्धा करती हूँ कि उसके और मेरे संबंध को लेकर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। ‘जंगल का अधिकार’ को अकादमी पुरस्कार मिलने पर वह पहला आदिवासी है जिसने मुझे पत्र लिखा।
वह साहित्य बोध संपन्न एक अच्छा पाठक है। सबसे बड़ी बात यह है कि सामाजिक दायित्व की प्रेरणा से वह निरंतर काम करता रहता है मैं अब बातों के लोगों को नहीं कर्मशील लोगों को खोजती हूँ। परमानंद आदिवासी है अथवा अन-आदिवासी है, इसका विचार नहीं करती। अजस्र मानवीय गुणों से संपन्न यह अवकाशप्राप्त शिक्षक किसी भी समाज का एक आदर्श व्यक्ति हो सकता है। अपने एक प्रिय व्यक्ति के जीवन पर आधारित देशप्रेम से भरपूर इस उपन्यास को मैंने ग्रामः कुचला दाँडी/डाक कुकड़ा खूपी/जिला: मेदिनीपुर के परमानंद सिंह मुंडा को समर्पित किया है। वह मेरे लिए एक ऐसा व्यक्ति है जिससे परिचित होकर मैं अपने को धन्य समझती हूँ।

 

-महाश्वेता देवी


एक

 

 

17.6.1858

 


1858 ईस्वी की सत्रह जून। ग्वालियर शहर की पूर्व दिशा में दिखाई दिया कि रात में एक स्थान पर धू-धू कर अग्नि जल रही है। सारे दिन युद्ध होता रहा है। सेनापति ह्यूरोज़ के लिए सिंधिया का फूलबाग वाला प्रसाद खोल दिया गया था। किंतु, ह्यूरोज़ वहाँ नहीं गया। वह अपने तंबू में ही बना रहा। दिन-भर युद्ध चलता रहा-कोटा की सराय से लश्कर, लश्कर से कंपू और कंपू से मुरार जाने के रास्ते पर। हर पहाड़ और पूरी जमीन युद्ध की हलचल से आंदोलित है। जंगल, ग्वालियर फोर्ट-सर्वत्र युद्ध चलता रहा है। ह्यूरोज़ जानता है कि भारतीय हार गए हैं, किंतु उसे यह पता नहीं चला है कि बाई साहिबा कहाँ हैं।
रात में कैसे खबर मिलेगी जब आषाढ़ की पहली वर्षा झड़ी लगाकर बरस रही है, जब घायल मनुष्यों और घोड़ों का आर्तनाद सुनाई दे रहा है, अब भी, गैस की लालटेन जलाकर सोल्जर लोग घायल और निहत लोगों की खोज कर रहे हैं, उसे कैसे खबर मिलेगी रानी की ?

झाँसी की रानी, बाई साहिबा का क्या हुआ ? कहाँ है तात्या टोपे ? उड़ती हुई खबरों पर क्या विश्वास किया जा सकता है ? पर, यह भी तो सत्य है कि अपराह्न के ढलते ही भारतीय सैनिकों का मनोबल गिर गया था, वे मानो हताश होकर युद्ध कर रहे थे, कहीं जैसे कोई अप्रत्याशित घटना घट गई थी, कहीं कुछ हो गया था क्या ?
ह्यूरोज तंबू के दरवाजे पर खड़ा था।
तंबू के आलोक में बाहर का थोड़ा ही भाग देखा जा सकता था। दिखाई दे रहे थे बड़े-बड़े पत्थर। कँटीली झाँड़ी और जंगली फूलों के झकूटे। इस समय लग रहा है पेड़, पत्थर जंगल सभी मानो उसके शत्रु हैं। भयंकर विद्वेष के साथ उसे देख रहे हैं। उसके प्रति इतना विद्वेष क्यों है ?
और वह अग्नि !
यह अग्नि किसकी है ? किन लोगों ने जलाई है ! क्यों जलाई है ! सेकेंड लेफ्टीनेंट फ्लेंमिंग बोला-झाड़-झंखाड़ जलाकर शायद वे लोग चले जा रहे हैं।

-पूरब की ओर ?
-नहीं, दक्षिण की तरफ जाएँगे रानी तो यही चाहती है। उसके पश्चात् वर्षा होने लगेगी। नदियाँ पार नहीं की जा सकेंगी। रानी दक्षिण में विद्रोह फैला देगी।
हाँ, दक्षिण में, दाक्षिणात्य में। और कोलिन कैंपवेल, जो सेनाओं का कमांडर-इन-चीफ है, उसे तो यही भय था। लिखा था, विद्रोही अगर ग्वालियर जीत लेते हैं, तो हम लोगों को राजकाज छोड़कर विलायत भाग जाना पड़ेगा।
अग्नि उन्होंने कैसे जलाई है, एकदम सीधी, आकाश की तरफ हू-हू करती हुई बढ़ती जा रही है ?
पहाड़ों पर, जंगल में कई तरह की आग देखी है मेजर जनरल ह्यूरोज़ ने 1858 ईस्वी से। 1820 ईस्वी में से उसने सैन्य जीवन में प्रवेश किया है। सैंतीस वर्ष बीत गए हैं उसके रणक्षेत्र में। कई बार आयरलैंड में सीरिया, क्रीमिया, सिवास्तोपोल, कितने देशों में, कितने तरह के रणक्षेत्रों में उसने युद्ध किया है। कोलिन कैंपवेल ने उसे बुला लिया है, साम्राज्ञी विक्टोरिया के सबसे महत्त्वपूर्ण उपनिवेश भारतवर्ष में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया है, उनके दमन के लिए उसकी जरूरत आ पड़ी है।
जहाज में आते आते ह्यूरोज़ ने मन-ही-मन कितनी बातें नहीं सोची हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी में तो अच्छे-अच्छे ब्रिटिश अफसर हैं सेना में। यह विद्रोह कितना विस्तृत है ? वे क्या नेविट सिपाहियों को वश में नहीं कर पा रहे हैं ?
सोच रहा है, चिंता को अलग हटाकर। मेजर जनरल होने से आज क्या होता है, वह एक सोल्जर भी तो है। सोल्जर कभी प्रश्न नहीं करते हैं, वे तो आदेश का पालन करते हैं, लड़ते हैं और मरते हैं।
आग देखो अभी भी जल रही है। रिमझिम-रिमझिम होने पर भी वर्षा तो ही हो रही है। वर्षा की उपेक्षा करके भी यह क्या विद्रोह की अग्नि जल रही है ?

नहीं, विद्रोह’ शब्द के संबंध में नहीं सोचेगा ? विद्रोह तो बहुत घृणित वस्तु है। विद्रोह होता है तो उसके दमन की जरूरत बढ़ जाती है, विशेष कर भारत में। बर्बर, सुस्त, मध्ययुगीन, खनिज-वन, कृषि संपदा से समृद्ध भारत अगर न होता तो महारानी विक्टोरिया का इंग्लैंड कैसे समृद्ध हो पाता, महारानी का साम्राज्य कैसे विस्तृत हो पाता ?
विद्रोह ! ह्यूरोज़ ने भारत को जितना देखा है, उतना ही उसे एक बर्बर, आदिम और अंधकार पूर्ण देश लगा है। विद्रोह, वह भी एक आदिम बर्बर जैसा ही है। ह्यूरोज़ ने सुना है, इस म्यूटिनी के पहले भी बंगाल प्रेसीडेंसी में, बर्बर काले मनुष्यों ने, जिन्हें संभवतः संथाल कहा जाता है, आदिम युग के धनुष-बाण लेकर एक विद्रोह किया था।
आश्चर्य ! दुर्बोध्य ! तीर-धनुष ! इंग्लैंड में रोबिनहुड ने तीर-धनुष लेकर जरूर लड़ाई की है किंतु, कई शताब्दियों से तीर-धनुष का चलन खत्म हो गया है।
इसका भी नाम क्या विद्रोह है !

उनका हथियार क्या है ?
और क्या होगा ? बंदूक बनाम तीर ? वे संथाल लोग आदिम जमाने के मनुष्य ही तो हैं। नगाड़ा बजाकर युद्ध की घोषणा करते थे और नगाड़ा बजाकर ही युद्ध बंद करते थे। बंदूक की गोलियों से आगे की पंक्ति के लोग मर जाते थे तो पीछे की पंक्ति के लोग आगे आ जाते थे।
यह नहीं समझ पाते कि बंदूक की गोली के सामने तीर कुछ भी नहीं है।
तीर छोड़ते छोड़ते ही आगे बढ़ते जाते और मर जाते थे, हाँ, वे लोग अब विलीन होकर अतीत की वस्तु हो चुके हैं। उन्हें चूँकि बर्बर कहा जाता था, जमींदार, महाजन और पुलिस उन पर खूब अत्याचार करती थी। उनकी फसल ले लेते और गाँवों में आग लगा देते...

इस कारण क्या वे विद्रोह करेंगे, विद्रोह ?
पकड़ जाने पर भी इन बर्बरों को किसी प्रकार का भय नहीं लगता है। फाँसी पर भी वे हँसते-हँसते चढ़ जाते हैं।
नहीं, क्रिश्चियन शहीद हँसते-हँसते मर सकते हैं, मरते हैं, हाँ। किंतु ये बर्बर तो क्रिश्चियन नहीं हैं ?
ब्रिटिश आर्मी के बारे में ही ह्यूरोज़ क्या कहेंगे ? उनके जमाने के सोल्जर अन्य किस्म के होते थे। उनमें एक नैतिकता थी। अत्यंत दुख का विषय है कि भारत में कंपनी की फौज में अंग्रेज अफसरों की नैतिकता का स्तर बहुत गिर गया है।
संथाल-विद्रोह के बाद किसी तरुण ब्रिटिश अफसर ने नहीं कहा था कि हम लोग युद्ध नहीं करते हैं, कसाई की तरह हत्या करते हैं। अस्त्रहीन ग्रामवासियों को मारते हैं, हम लोग उनकी हत्या करते हैं। हम लोग कसाई हैं।
ऐसे अफसरों का कोर्टमार्शल किया जाना चाहिए।
ह्यूरोज़ अगर कोलिन कैंपवेल के स्थान पर होता तो वह आर्मी को अपनी तरह से ढाल लेता।
कोलिन कैंपवेल के स्थान पर ! कमांडर इन चीफ ? सी.इन-सी. ? सोचते हुए ही उसका रक्त नाच उठता है, उम्र कम हो जाती है, मेजर जनरल के बाद सीधे भारत में कंपनी की फौज में सबसे ऊपर ?
अग्नि जैसे अब उतनी प्रचंडता से नहीं जल रही है। नहीं, वर्षा अब थम रही है, अग्नि उतनी उन्मत्तता से अब ऊपर नहीं उठ रही है।

क्यों, क्यों क्यों ?
अग्नि देखते-देखते ही तो कटे हैं 1858 ईस्वी के जनवरी से लेकर 1858 ईस्वी के जनवरी से लेकर 1858 ईस्वी के जून मास तक के दिन।
झाँसी की तरफ वह जितना ही बढ़ता गया है सेंट्रेल इंडिया फील्ड फोर्स की ब्रिगेड को लेकर, प्रति संध्या और रात में अपनी यात्रा-मार्ग के दोनों तरफ, सुदूर जंगल और पहाड़ों पर देखता आया है अग्नि।
कौन लोग जलती हुई मशाल लेकर जैसे संकेतों से कुछ सूचना दे रहे हैं ? कौन लोग सूचना दे रहे हैं, किसे सूचना दे रहे हैं ?
‘देट रिवेलियस रानी ऑफ झाँसी’-उस विद्रोहिणी झाँसी की रानी को। रानी ? एक नेटिव बर्बर, असभ्य राज्य की झूठ-झूठ की रानी ? एक नेटिव स्त्री के विरुद्ध युद्ध करने के लिए दुनिया-भर में फैले ब्रिटिश साम्राज्य से चुन-चुनकर सैन्य अधिकारियों को इसीलिए लाया जा रहा है न ? ह्यूरोज़ को लग रहा था कि भारत की जलवायु में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासकों के मन में जंग लग गई है। मन में ही लग रहा था, किंतु उसने कहा कुछ नहीं।
हाँ, भारत की भूमि पर कदम रखते ही उसने सुना, बात असल में वह नहीं है, किंतु उसे तो उस विद्रोही रानी के विरुद्ध ही जाना पड़ेगा। उसे जीवित पकड़ने पर फाँसी दी जाएगी। युद्ध में मार डालने पर झंझट खत्म।
रानी ! सचमुच में रानी ?
-हाँ ! एक छोटे स्टेट की रानी।

-उम्र कितनी है ?
-बीस ? बाईस ? इतनी ही कुछ होगी।
सब कोलिन कैंपवेल के एड्जूटेंट ने ह्यूरोज़ से कहा, मामला गंभीर है।
-किंतु क्यों ?
-क्यों नहीं ? 1857 ईस्वी के अगस्त मास में कैंपवेल आया सी.इन.सी. होकर।
-म्यूटिनी तो उसके तीन मास पहले ही शुरु हो जाती है।
हाँ, गवर्नर जनरल भी अत्यंत परेशान हैं।
बड़े लाट केनिंग सचमुच में कलकत्ते में वायसराय भवन में निद्राहीन रात चहल-कदमी करते हुए हुए बिता रहे थे। सिपाही विद्रोह जो घटित होगा, पैदल ही लड़ाई करते हैं जो भारतीय सिपाही, जिन्हें केवल सात रुपया महीना मिलता है, वे लोग विद्रोह करेंगे, विद्रोह कर सकते हैं, इस बात को केनिंग क्यों नहीं जानते हैं ?
क्यों नहीं जान पाए हैं सी.एन.सी.?
जानना तो चाहिए ही था। नहीं तो सिर्फ एनफील्ड प्रिचेट राइफल और उनके नए कारतूसों को लेकर ऐसा कांड हो सकता था ?

अब तो लग रहा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में भारत शासन की बागडोर रह पाती है अथवा नहीं ? यही प्रश्न है।
प्रश्न तो आज ब्रिटेन में भी है।
वहाँ पर एक शक्तिशाली लॉवी चाहती है कि महारानी विक्टोरिया को भारत का शासन अपने हाथों में ले लेना चाहिए। क्योंकि, एक सौ वर्षों में ईस्ट इंडिया कंपनी के डायरेक्टरों ने विलायत में रहकर अकूत संपत्ति अर्जित कर ली है।
भारतवर्ष अगर कुबेर का धन-भांडार है तो उस भांडार का लाभ मिलना चाहिए ब्रिटेन को। लाभ का मुख्य अंश उसी को मिले।
केनिंग क्या करेंगे ? वे तो बड़े लाट मात्र हैं। उन्होंने तो बाद में इसी 1857 ईस्वी के फरवरी मास में विलायत में पार्लियामेंट को बता दिया है कि भारत पर शासन करने में कंपनी कितनी बेकार है, उसके रोम-रोम में कितनी दुर्नीति व्याप्त है। भारतीयों की उन्नति तो हुई ही नहीं है, वरन् कंपनी के शासन के संबंध में भारतवासियों का विश्वास उठता जा रहा है-यह सब बातें कही हैं क्लेरिनकेयार्ड ने।

कहा है कि रेलवे, पोस्ट ऑफिस, स्कूल, अस्पताल-इन सबको लेकर चाहे जितना प्रचार किया जाए, भारतीय उपनिवेश की कोई खास उन्नति नहीं हुई है।
कितने अभियोग ब्रिटिश पार्लियामेंट के एक विशेष सदस्य की वाणी पर हैं।
विलायत में लाखों, करोड़ों भारतीय रुपया खर्च कर ईस्ट इंडिया कंपनी का एक ऑफिस रखने की कोई जरूरत नहीं है।
कंपनी के जिस अफसर की मासिक आमदनी वर्ष में एक हजार पौंड है, वह वर्ष में बीस हजार पौंड का व्यापार कर सकता है स्वतंत्र रूप से। उसे तो कोई इस दुर्नीति के लिए कठघरे में खड़ा करेगा नहीं।

भारत में अंग्रेज लोग स्वेच्छाचार करते रहते हैं, निलहों पर निर्मम अत्याचार करते रहते हैं-चाय और कॉफी बागानों के मालिक तथा अन्य व्यापारी लोग। खरीदे हुए गुलामों की तरह मजदूरों को रखते हैं, कुलियों का चालान करवा देते हैं और हत्याएँ-पर-हत्याएँ करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट कलकत्ता में है ! कंपनी कानून के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के अलावा और किसी न्यायालय में कहीं भी अंग्रेजों पर मुकदमा नहीं चल सकता है। पंजाब अथवा मद्रास, नागपुर अथवा आसाम से कलकत्ता बहुत दूर है। वहाँ पर एक भारतीय किस तरह जाकर अंग्रजों के विरूद्ध मुकदमा दायर कर सकेगा। और यह भी देखने आया है कि अंग्रेज चाहे जितना बड़ा अपराध करें, उन्हें किसी-न-किसी तरह कानून का सहारा मिल ही जाएगा।

अंग्रेज शासक क्या किसी भी दिन किसी शासित भारतीय का विश्वास करते हैं ?
सिविल सर्विस परीक्षा में पास होने पर ही प्रशासनिक विभाग में नौकरी मिलती है। फलस्वरूप बीस-बाईस वर्ष के अंग्रेज युवक को शासक की नौकरी मिल जाती है। यह स्पष्ट है कि यह दशा अत्यंत शोचनीय है। कंपनी द्वारा शासित भारत में चौदह करोड़ भारतीय रहते हैं। उनमें से अब तक क्या एक व्यक्ति भी शासक होने योग्य नहीं हो पाया है ?
इससे प्रमाणित होता है कि अंग्रेज लोग भारतीयों का विश्वास ही नहीं कर सके। मुस्लिम शासक क्या हिंदुओं को शासन व्यवस्था में नहीं रखते थे ? अंग्रेज लोग भारतीयों को एक सौ हाथ दूर रखते हैं।
अन्याय सर्वत्र फैला हुआ है। सैन्य विभाग में तो यह चरम शिखर पर है। कोई भारतीय अफसर सूबेदार पद से ऊपर कभी पहुँच भी सका है ? नहीं। अंग्रेज कप्तान और भारतीय सूबेदार पद के स्तर की दृष्टि में समान हैं। किंतु कप्तान का मासिक वेतन सूबेदार की अपेक्षा दूना है।

सूबेदार ही जब अन्याय के शिकार हैं तो सबसे नीचे के सिपाहियों की हालत तो वैसे ही समझने योग्य है।
कई गवर्नर जनरलों ने सिफारिश की है कि भारतीयों को उत्तरदायित्व पूर्ण पदों पर नौकरी दीजिए। पर हुआ क्या ? इस पर ऐंग्लों-इंडियन प्रेस और अंग्रेज कर्मचारियों ने भारी विरोध किया था।
स्वयं केनिंग ने भी यह बात नहीं सोची थी और पार्लियामेंट ने क्लेरिनकेयार्ड को कोई महत्त्व ही नहीं दिया।
क्लेरिनकेयार्ड ने यह बात फरवरी में कही है।

अरे हाँ ! फरवरी में ही तो बांग्ला प्रेसीडेंसी में मुर्शिदाबाद के पास बहरामपुर छावनी में 1 नं. रेजीमेंट यह कहकर बैठ गई थी कि दमदम में जो नई तरह की बंदूकें दी गई हैं उनकी कारतूसों के मुँह पर गाय और सूअर की चर्बी लगी हुई है इसलिए उनके खोल को दाँतों से काटकर हम लोग कारतूसों को नहीं निकालेंगे !
केनिंग ने सोचा कि इस समय सब गड़बड़ लग रही है। हाँ, उसी का यह निर्देश था कि विद्रोहियों को ऐसी सजा दो जो एक उदाहरण बन जाए। अगर ऐसा नहीं होता है तो सेना में सुव्यवस्था नहीं रह पाएगी।
केनिंग ने मन ही मन सोचा कि इसके लिए वह कितना उत्तरदायी है ? उसने आदेश दिया था कि 11 नं. की रेजीमेंट को बैराकपुर ले जाओ। दोषियों के नाम सेना से काट दो उनकी वर्दी उतरवा लो और बंदूकें छीन लो।
कहा था रंगून से चुंचुड़ा में पहुँच रही है यूरोपीय सैनिकों की रेजीमेंट ! बैराकपुर से लिए आओ 1. नं. की पल्टन को चंचुड़ा ! यूरोपीय सोल्जर भारतीय सिपाहियों की वर्दी और बंदूक छीन लेंगे।
किसको कैसे पता लगता कि इससे कितनी भयंकर प्रतिक्रिया होगी नेटिव सिपाहियों के मन में ? बैराकपुर में 34 नं. नेटिव सिपाहियों की रेजीमेंट का मंगल पांडे सार्जेंट मेजर की तरफ बंदूक तान देगा 29 मार्च को ?
और मई मास में क्रांति की आग भड़क उठेगी कंटूनमेंट के नेटिव सिपाहियों और रेजीमेंट में ?
उसके बाद ही से तो सिपाहियों का विद्रोह हुआ और फैलता ही चला जाता है।
इसके लिए लोर्ड केंनिग कितना उत्तरदायी है ?

राज्य के बाद राज्यों को तो उन्होंने ब्रिटिश राज्य में शामिल किया नहीं है, यह काम तो डलहौजी कर गया है।
हाँ, इतना जरूर है कि सिपाही सात रुपए में नौकरी का जीवन शुरू करते हैं और अंत करते हैं नौ रुपए मासिक वेतन पर।
वह वेतन भी उन्होंने निर्धारित नहीं किया है।
फिर, क्यों, क्यों क्यों उन्हीं के शासन काल में यह विद्रोह घटित हुआ-इसे वे नहीं जानते हैं।
वे बड़े लाट हैं। उन्हें सारे आँकड़े मालूम हैं।
भारतीय फौज में कुल मिलाकर तीन लाख पंद्रह हजार पाँच सौ बीस लोग हैं। इक्यावन हजार तीन सौ सोलह व्यक्ति यूरोपीय हैं। शेष सभी भारतीय हैं।
फौज पर वार्षिक खर्च होता है अट्ठानवे लाख दो हजार दो सौ पैंतीस पाउंड।
इक्यावन हजार तीन सौ सौलह गोरे लोगों पर खर्च होता है-छप्पन लाख अड़सठ हजार एक सौ दस पाउंड।


 





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