फूल इमारतें और बन्दर - गोविन्द मिश्र Phool Imartain Aur Bandar - Hindi book by - Govind Mishra
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फूल इमारतें और बन्दर

गोविन्द मिश्र

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :302
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3248
आईएसबीएन :9788171196104

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सरकारी प्रशासन पर आधारित उपन्यास...

Phool Imartain Aur Bandar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हमारे समय के सबसे बड़े साहित्यकार सोल्ज़ेनित्सिन ने नोबेल पुरस्कार लेते समय अपने भाषण में कहा था-‘‘अगर लेखक नहीं तो दूसरा कौन अपने यहाँ की असफल सरकारों को अपराधी ठहराएँगे और लेखकों के अलावा कौन अपने समाज को उसके भीरुताजन्य अपमान अथवा आत्मतुष्ट नपुंसकता के लिए दोषी ठहराएगा ?’’

अपने देश में क्या हुआ कि सरकारें तो बदलीं पर कुछ नहीं बदला ? अपने आठवें उपन्यास फूल...इमारतें और बन्दर में गोविन्द मिश्र इस प्रश्न से टकराते हुए सरकार के भीतरी ढाँचे में हमें ले जाते हैं, जिसमें फँसा एक संवेदनशील अधिकारी लगातार होते हुए अपने नौतिक पतन को स्वयं देख रहा है। उस व्यक्ति के माध्यम से उपन्यासकार हमें प्रशासन के ऊपरी तन्त्र के तिलिस्म के सामने ला खड़ा करता है जो बाहर से रहस्यमय, अबूझ, अभेद्य और साफ-सुथरा लगता है, पर जो भीतर से उतना ही पिछला, गिजगिजा और भ्रष्ट है। और जो दरअसल उपन्यास का मुख्य पात्र है। उस तिलिस्म के भीतर के चतुर खिलाड़ी कौन हैं, अपने ‘पावर गेम्स’ कैसे खेलते हैं, ‘ग्रीन रुम’ में क्या-क्या और कैसे चलता है...तन्त्र को अपने स्वार्थ के लिए नेता और बड़े अफसर कैसे और भ्रष्ट करते हैं... इस यथार्थ के कितने आयाम उपन्यास में खुलते चले जाते हैं।

उन्हें जीवन के वृहत्तर सवालों से छोड़कर,. नियित-न्याय में परिप्रेक्ष्य में रखकर उपन्यासकार जैसे एक समान्य यथार्थवादी राजनैतिक उपन्यास की सीमाओं को लाँघ एक बड़ी रचना की सृष्टि अनायास ही कर गया है। पाठकों को सोल्ज़ेनित्सिन का एक ओर कहना याद आएगा -‘‘वह साहित्य जो अपने समय के नैतिक और सामाजिक खतरों को व्यक्त नहीं करता, साहित्य कहलाने लायक नहीं है।’’
हिन्दी में अपने किस्म का पहला उपन्यास जिसे गोविन्द मिश्र ही लिख सकते थे और जो उनका ‘देय’ था, एक तरह से।

 

नासूर

 

 

यों तो हमारी जनता के लिए देश की सरकार के मायने हैं जहाँ भी तीन शेरों और ‘सत्यमेव जयते’ का ठप्पा लगा हो...लेकिन प्रशासन के स्तर पर एक बारीक फर्क रखा गया है-सरकार मायने है सिर्फ मन्त्रालय और सचिवालय, सरकार मायने-जो कुछ भी कर सकती है। (यह फर्क राज्य के स्तर पर भी है। राज्य में वित्तीय संकट हो, राज्य के अधिकारियों/कर्मचारियों के लिए, टेलीफोनों, सरकारी वाहनों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई हो, कुछ हो....मुख्यमन्त्री हेलीकॉप्टर पर ही चलेगा-यह सरकार है। प्रदेश के स्थायी कर्मचारियों के वेतन तक देने में मुश्किल आ रही हो, सड़के न बन पा रही हों....लेकिन वे फातलू कार्यालय या विभाग जिनमें मुख्यमन्त्री के लोग या उनके लोगों के लोग अस्थायी रूप से तैनात हैं जिन्हें मोटी तनख्वाह दी जाती-...वे विभाग बन्द नहीं होंगे, मन्त्रिमंडल का विस्तार बन्द नहीं होगा-यह सरकार है !) सरकार के नीचे काम करनेवाला सरकार का ही विभाग, चाहे वह जितना बड़ा हो, चाहे जनता की जितनी बड़ी संख्या को प्रभावित करता हो, चाहे सचिवालय-मन्त्रालय की इमारत में ही क्यों न बैठता हो-वह सरकार नहीं है। वह जो चाहे सो नहीं कर सकता। उसे सरकार के दिए हुए काम को, उसकी नीति के चौखटे में, उसके बनाए गए नियमों/विधानों के अन्तर्गत करना है। अंग्रेजों के भारत में ऐसी प्रशासनिक पद्धति रही होगी कि सत्ता अंग्रेज में केन्द्रीकृत हो, वह जहाँ भी पदस्थ हो लेकिन स्वतन्त्र भारत, जिसने जनतन्त्र अपनाया....वहाँ यह प्रशासनिक तरीका ठीक पाया गया था कि सरकार नीति तय कर दे, कानून-विधान-नियम बना दे...उसके बाद हर विभाग अपना प्रशासन स्वयं चलाने को स्वतन्त्र है, उसके लोग ही अपना प्रशासन अच्छा चला सकते हैं क्योंकि वे अपने विभाग को अच्छी तरह जानते हैं।

एक सामान्य-सा प्रशासनिक ढाँचा भी उभरकर आ गया-ज्यादातर सलाह करके काम करते हुए, सत्ता एक व्यक्ति में नहीं बोर्ड में निहित उसके नीचे फील्ड के अफसर-कमिश्नर, चीफ कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर आदि जो भी नाम उन्हें दिया जाए-जो अपने नीचे के अफसरों/कर्मचारियों के विचार ऊपर बोर्ड को पहुँचाएँ जिनके आधार पर बोर्ड आदेश निकाले, जिन आदेशों का पालन फिर नीचेवाले करें। स्वशासन..अच्छी परिकल्पना और उसका क्रियान्वयन भी कितना आसान। ऊपर बोर्ड के सदस्य अध्यक्ष, या नीचे चीफ कमिश्नर, कमिश्नर रिटायर होते जाते हैं, उनके नीचेवाले वरीयता क्रम से उनकी जगह लेते हैं, जो भ्रष्ट या अयोग्य हैं सिर्फ उन्हें छोड़ दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया एक धुरी में आराम से घूमती हुई, अपने फैलाव में भी एकदम तनावरहित।

कागज पर यह आज भी है..लेकिन दिखाने भर को। उसे चलने नहीं दिया जाता। मजाक यह कि सरकार ही उसे चलने नहीं देती स्वतन्त्रता संग्रामवाले नेताओं की पीढ़ी जैसे ही विदा हुई, देश-प्रेम और दूसरे आदर्श धुँधलाने लगे, वैसे ही मुगलों और अंग्रेजों की फतह करनेवाली हवस हमारे नेताओं और प्रशासकों के खून में भलभलाने लगी...और तब एक नासूर पैदा हुआ...‘पावर’। सेवा की जगह, जिसके तहत नेहरू भी खुद को जनता का पहला सेवक कहते थे। जो कुछ हो, हमारे इख्तियार में होना चाहिए, सबकुछ सम्भव नहीं तो ज्यादा से ज्यादा। हम कहाँ के प्रशासक हुए अगर विभाग, काम, लोग...सब हमारे ‘अंडर’ न हुए। हमारे पद की महत्ता इसी में है कि हमारे एरिया में क्या-क्या और कितना ज्यादा आता है। मन्त्री/सचिव सोचने लगे-कुछ भी सरकार के प्रशासन के बाहर कैसे हो सकता है। किसी विभाग में प्रशासन चाहे जितना अच्छा चलता हो, उसे सरकार की देखरेख में ही चलना चाहिए क्योंकि बिना सरकार के देखे वह अच्छा चल ही नहीं सकता। देखरेख उतनी ही अच्छी होगी, जितना कम विभाग को स्वतन्त्र रहने दिया जाएगा, उसके ज्यादा-से-ज्यादा कामों में सरकार (माने-मन्त्री सचिव) का दखल होगा। कहाँ विचार यह था कि सरकार नीति और नियम तय करेगी, उनके क्रियान्वयन और अपने प्रशासन में विभाग स्वतन्त्र होगा...उसकी जगह व्यवहार में यह हो गया कि सरकार क्रियान्वयन और प्रशासन में घुस गई।

चलते-चलते आज ऐसा हो गया है कि सरकार के ज्यादा लोगों की दिलचस्पी नीति-निर्धारण के काम में कम अपने नीचे के विभागों के प्रशासन में, वहाँ दखलन्दाजी में ज्यादा बढ़ती चली जा रही है...क्योंकि उसमें ‘पावर’ है। नीति निर्धारण का काम क्या है-‘एकेडेमिक’, इसलिए, सूखा.....हालाँकि यह जो काम है वह देश को दिशा देता है, आगे ले जाता है, इसके लिए काबिलियत दूरदर्शिता....और सोचने के लिए समय चाहिए....समय खासतौर से....और वही हमारे आकाओं के पास होता नहीं, ‘प्रशासन’ में जो चला जाता है।

किसी विभाग में एकदम से दखल करने में ज्यादा विरोध हो सकता है तो सरकार के नुमाइन्दे आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ते हैं...जैसे अंग्रेज अपने पोलिटिकल एजेंटों के मार्फत धीरे-धीरे बढ़ते थे। दिखाने के लिए एजेंट एक किनारे बाहर पड़ा रहता था पर उसकी निगाह हर छोटी बड़ी चीज पर होती थी। वह धीरे-धीरे अपने अधिकार-क्षेत्र को बढ़ाता चला जाता था। शुरू कुछ इस तरह से होगा-‘अध्यक्ष और बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति वरीयता-क्रम से बिल्कुल होती रहे लेकिन भाई ! फाइल पर मन्त्रीजी के दस्तखत तो होना चाहिए, क्योंकि आखिर वे मन्त्री हैं ! विभाग मन्त्रालय के अधीन तो दिखाया ही जाता है न।’ बाहर से एक निहायत औपचारिक, निर्दोष-सा दिखता पैंतरा वह जिसे मानने में किसी को क्या उज्र हो सकती है। आगे कहा जाएगा-‘मन्त्रीजी तो नीचे के प्रस्ताव की ही पुष्टि करेंगे। वे अगर कुछ बदलनेवाले नहीं हैं तो पुष्टि सिर्फ औपचारिकता ही तो है। मन्त्रीजी के दस्तखत से नियुक्तियों पर सरकारी मोहर लग जाएगी, आदेश में वजन, आ जाएगा....’ पर हमारे देश के चालबाज अफसर बखूबी जानते हैं कि किसी भी संस्था को अपने अधीन लाना हो तो पहले नियुक्तियों और तबादलों को अपनी तरफ घसीटो (आजकल वही पेशकश हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को लेकर है...ताकि उन्हीं जजों की नियुक्ति हो जो अनुकूल फैसला लिखनेवाले हों, जो ऐसा न करें उनका तबादला किया जा सके।) मन्त्री के दस्तखत के लिए फाइल आने लगी तो थोड़े दिनों में चुपचाप भाषावली बदल दी जाएगी-‘सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति तब तक घोषित नहीं की जा सकती जब तक मन्त्री से पुष्टि न हो जाए।’

यह क्रम पहले बोर्ड में अध्यक्षों/सदस्यों की नियुक्तियों के लिए, फिर नीचेवाले अफसरों के लिए, फिर उससे नीचे..और इस तरह सरकार विभाग में धँसती चली जाती है। होना यह चाहिए कि बहुत ऊपर के पदों को वरिष्ठ अधिकारियों में से यू.पी.एस.सी. जैसी संस्थाओं के माध्यम से भरा जाए, नीचे के पदों को फिर कायदे-कानून के अनुसार ये ऊपरवाले भरें...सरकार दूर रहे। नहीं, मंत्री के पास सभी नियुक्तियों/तबादलों की फाइलें आना चाहिए, वर्ना वह मन्त्री काहे का हुआ। अब कोई फाइल मन्त्री के पास आना है तो पहले उसके चारों ओर जाल बिछाए बैठे अफसरों के पास आएगी ही आएगी। फाइल आई तो उसे अपने तकिए के नीचे रख कर सो जाओ, सिर्फ सो जाओ...लोग दौड़ने लगेंगे तुम्हारे पास...मन्त्री से ज्यादा उसके पास जिसकी तकिए के नीचे फाइल रखी है। लोगों को दौड़ते रहने दो। वे दौड़ें, रुपए-पैसे लेकर दौड़ें, तुम्हारे लिए यह करें वह करें..यह है ‘पावर’। इस बीच विभाग में जगहें खाली पड़ी हैं, काम ठप्प पड़ा है, प्रशासन का कबाड़ा हो रहा है। होने दो। मजाक यह, कि इसी कबाड़ा करने को हमारे नेता और आला अफसर कहते हैं कि वे प्रशासन कर रहे हैं।
मोहन्ती का विभाग, सरकार का एक सामान्य-सा विभाग है पर बड़ा है, ऐसा भी जो लोगों को तकलीफ पहुँचा सकता है....तो वह ‘सरकार’ की नजरों से कहाँ बचा रह सकता था। उससे सम्बन्धित फाइलें जब मन्त्री के यहाँ पहुँचने लगीं तो मन्त्री के नीचे बैठे सचिव की चकाचक थी। इत्तफाक से एक रोज उसके यहाँ गृह मन्त्रालय का सचिव बैठा चाय पी रहा था, चाय पीते-पीते उसकी नजर में बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तिवाली फाइल आ गई...अरे !

यह क्या, गृह मन्त्रालय को ‘बायपास’ किया जा रहा है। वह गृह मन्त्रालय है, देश की सभी ऊपर के पदों की नियुक्तियाँ सम्बन्धित मन्त्रालय के साथ-साथ उसे भी देखना चाहिए क्योंकि वह ‘गृह’ है जिसके नीचे ‘विदेश’ को छोड़कर सबकुछ आना चाहिए....सभी नियुक्तियाँ ! उसने अपने कमरे में पहुँचकर फौरन एक नियम बना डाला-सभी विभागों में जहाँ बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्य अतिरिक्त सचिव के स्तर के हैं, उनकी नियुक्तियों की पुष्टि तीन बड़े मन्त्रियों की समिति करेगी—सम्बन्धित विभागीय मन्त्री, गृहमन्त्री और प्रधानमन्त्री। जैसे कभी मोहन्ती के विभाग के सचिव ने पावर अपनी तरफ घसीटने के लिए बन्दूक मन्त्री के नाम पर चलाई होगी, इन्होंने प्रधानमन्त्री के नाम पर दाग दी। नियम बन गया...फाइल की यात्रा और लम्बी हो गई। अब पहले विभाग के मन्त्री के दस्तखत, फिर गृहमन्त्री के दस्तखत, अन्त में प्रधानमन्त्री के दस्तखत...और तीनों जगह बैठे तीन सचिव बड़े अफसर, जिनकी जाति कौओं की जाति। प्रस्तावों पर आपत्तियाँ उठाना, लटकाना उनका स्वभाव था, जैसे काँव-काँव करना कौओं का। लटकने लगी फाइल, पर मजा नहीं आ रहा था क्योंकि बाहर तो लोगों में मन्त्रियों की ही धाक थी, बोलबाला तो उन्हीं का था तो तीनों सचिवों की सलाह से गृहमन्त्री के सचिव ने अपने मन्त्री को समझाया कि हुजूर !

आप लोग कहाँ इन ब्यौरों और विस्तार में जाएँगे, आपको तो देश देखना है तो हमारी एक समिति छननी का काम करके देगी, कूड़ा-करकट से आपके लिए छाँटकर रख देगी, उचित नामों की सिफारिश आप तीनों मन्त्रियों के सामने स्वीकृति के लिए रख देगी। चुनाँचे नियमों में हल्की-सी तब्दीली कर दी गई-नामों पर सबसे पहले विचार सचिवों की एक समिति करेगी जिसमें प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री, सम्बन्धित विभाग के तीन सचिव रहेंगे, कैबिनेट सचिव उस बैठक की अध्यक्षता करेंगे। चयन की उस सिफारिश को दस्तखत के लिए विभागीय मन्त्री गृहमन्त्री और प्रधानमन्त्री के पास भेजा जाएगा। बड़े शातिर ढंग से अफसरों ने विभागों के बड़े पदों की नियुक्तियों की ‘पावर’ मन्त्रियों से भी हटाकर अपनी तरफ खिसका ली थी।

मोहन्ती के विभाग में मामला अध्यक्षों, सदस्यों की नियुक्ति तक ही नहीं थमा। धीरे-धीरे और चीजें भी सरकार की तरफ घसीट ली गईं। नीचे फील्ड में जो चीफ कमिश्नर, उनके भी नीचे कमिश्नर लोग थे...उनके तबादलों का मामला भी पुष्टि के लिए मन्त्रीजी तक आए, जो प्रस्ताव किसी कर्मचारी/अधिकारी को कोई खास फायदा देने के लिए हो, जैसे किसी का विदेश जाना या किसी को रिवार्ड या पुरस्कार मिलना या किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार के लिए कोई कार्यवाही करना ये सब मन्त्री तक आएँ ताकि लोगों को पता चला जाए कि असली ‘दाता’ कौन है ! धीरे-धीरे करके सरकार ने अपना एक प्रतिनिधि थोड़ा छोटे स्तर का एक अधिकारी विभाग के भीतर एकपद बनाकर तैनातकर दिया...कहा गया कि वह विभाग के प्रशासन में मदद के लिए है, पर दरअसल वह अधिकारी यह देखने और सचिव को यह बताने के लिए था कि बोर्ड या उनके अन्य विभागीय अधिकारी मनमानी तो नहीं कर रहे, नीचे-नीचे कोई गुल तो नहीं खिला रहे, सचिव और मन्त्री की अवहेलना तो नहीं कर रहे, हर महत्त्वपूर्ण चीज मन्त्रालय से पूछकर ही तो की जा रही है...मतलब माल अकेले ही तो नहीं खाए जा रहे। इस आदमी को सचिव का विश्वासपात्र होना जरूरी था।

इतना तक भी पच सकता था...बशर्ते, सीधे-सीधे चलता...सिर्फ सचिव और मन्त्री फैसला लिया करते लेकिन वह कहाँ होता है। मन्त्री और सचिव को निर्णय लेना है तो उनकी मदद के लिए बैठी सचिवालय की पूरी फौज सीढ़ी-दर-सीढ़ी क्लर्क, सेक्शन ऑफीसर, अवर सचिव, उपसचिव, संयुक्त सचिव, अतिरिक्त सचिव। फाइल पर सबकी सिफारिशें चाहिए। अब सब एक ही मसले पर पिले पड़े हैं। वे हैं सिफारिश और संस्तुति के लिए, पर उस काम को कैसे न किया जाए इसके लिए प्रस्ताव में छिद्रान्वेषण कर रहे हैं, अपनी टिप्पणियों से फाइल की काया को बढ़ाए जा रहे हैं। फाइल महत्त्वपूर्ण हो गई थी-अगर वह नहीं तो कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता, कोई काम नहीं हो सकता। वह निकले, उस पर आदरणीय अवर सचिव, उप सचिव आदि अपनी टिप्पणियाँ लिखें, फाइल आगे को भेजें...तब काम चले।

हर स्तर महत्त्वपूर्ण हो गया। जितने स्तर, उतने लोग, तरह तरह के लोग, उनकी किसिम-किसिम की दिलचस्पियाँ फूटती फुनगियों की तरह फैलती हुईं...उन दिलचस्पियों के पीछे भ्रष्टाचार की लपलपाती जीभ, भ्रष्टाचार के नए-नए रूप, उन्हें जायज दिखाने के लिए बनाए जाते नियम, रोज नए-नए नियम। हर व्यक्ति के ‘पावर’ को अपनी अपनी तरफ खींचने की क्रमशः और लगातार कोशिश में एक से एक जटिल प्रक्रियाएँ बन गईं जो सुरसा के मुँह की तरह खुलती चली जातीं। ‘प्रोसीजर’ ही जानलेवा हो गया था। कोई काम करवा पाना अब आसान नहीं रह गया था। बाहरी व्यक्ति के किसी काम को तो छोड़िए, विभाग या सरकार के अपने किसी आदमी का काम भी आसानी से नहीं हो सकता था वहाँ, क्योंकि एक ही काम करने के लिए दस-दस लोग तैनात थे और सबको अपना महत्त्व दिखाना था।
जिस तन्त्र को लोगों की मदद करने के लिए होना था वह एक क्रूर दैत्य की तरह सामने खड़ा दिखता...हर बार ही जब कोई अपना छोटा-सा काम चाहे जितना जायज—करवाने के लिए निकलता था।

 

बिछी बाजी

 

 

जिन दिनों सरकारी तन्त्र मोहन्ती के विभाग में धँसता हुआ कमिश्नर के स्तर तक हस्तक्षेप पर पहुँच गया था, उन्हीं दिनों हमारे श्री गोपीकृष्ण मोहन्ती अपने विभाग के बोर्ड में सबसे सीनियर हुए और जाहिर है अध्यक्ष के लिए उनका प्रस्ताव चलना था, सो चला। प्रस्ताव के स्तर पर तो सबकुछ ठीक-ठाक ही चलता है क्योंकि दिखाया जाना होता है कि सब व्यक्तियों, पहलुओं पर विचार किया गया, कोई चुनौती न दे सके....और बाद की धाँधलेबाजियाँ अच्छी तरह से ढँप सकें।
श्री गोपीकृष्ण मोहन्ती की जाति या वे किस प्रदेश के हैं-इनमें जाने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि किसी जाति या प्रदेश के कोई गुण उनमें नहीं हैं। उनका नाम भी आम हिन्दुस्तानी जैसा-गोपीकृष्ण...पहले ऐसे ही नाम रख दिए जाते थे। मोहन्ती के माँ-बाप जूनियर हाई स्कूल में अध्यापक थे। बचपन में मोहन्ती को जो जरूरत की चीजें थीं, वे भी मुश्किल से मिलीं क्योंकि उनके माँ-बाप को और भी मुश्किल से मिली थीं। खला यों नहीं कि वे जिनके साथ खेलते थे, वे बच्चे उनसे भी गरीब परिवार के थे। पिता-माता में हालाँकि पति-पत्नीवाली खींचातानी चलती रहती थी लेकिन दोनों व्यक्तियों में अध्यापनवाली शालीनता, भोग की चीजों के लिए उदासीनता और संसारी चीजों के लिए मध्य वर्गवाला सन्तोष था...वे संस्कार मोहन्ती को मिले। उनकी पहली नौकरी भी कॉलेज में अध्यापकवाली हुई। दूसरी इस विभाग में।

इस नौकरी के दौरान जरूर उनका उठना-बैठना रईसों के यहाँ होने लगा क्योंकि विभाग का काम ही रईसों से ताल्लुक रखता था...लेकिन मोहन्ती के भीतर जैसे हमेशा अध्यापक ही बैठा रहा....बड़ा अच्छा जीवन लगता था यूनिवर्सिटी के अपने जमाने के अध्यापकों का-सांसारिक चीजों का एक औसत स्तर, उसके बाद बस पढ़ने-लिखने में रमा रहना, सोचना। मोहन्ती नियमित तो नहीं, जब संशय या उलझन में पड़ जाते तो अपनी डायरी लिखते हैं। उन्होंने जीवन में जो पाया वह उन्हें अपनी काबिलियित और अपने परिश्रम से मिला। इसलिए नौकरी जो लोगों को अमूमन आरामतलब और भोगी बना देती है, वह वे नहीं हुए। बगैर यह चिन्ता किए हुए कि कोई उनके किए श्रम या काम को देख रहा है या नहीं, प्रशंसा मिल रही है या नहीं। वे चुपचाप सामने का काम पूरी निष्ठा से करते चले जाते हैं...इस विश्वास से कि काम कोई दिखाने के लिए थोड़े किया जाता है, वह तो करना है क्योंकि आपका काम है। तड़क-भड़क उन्हें छू नहीं गई है। कहीं जाएँगे तो जो पहनेंगे वह इस नजरिए से कि वे किसी की नजर में न चढ़े साधारण में खोए, बिलाए रहें।

मोहन्ती भाई इतने साधारण भले न हों कि साधारण की मिसाल कहे जा सकें, पर साधारण हैं-रंग न बहुत उजला न दबा, शरीर न मोटा न बहुत दुबला, साधारण नाक-नक्श...एम.ए.पास किया जो कोई भी कर लेता है, काम जो सामने आ गया उसे ही करते रहे-अध्यापकी सामने आई वह की, फिर इस विभाग के अधिकारी पद के लिए इम्तहान और इंटरव्यू हुए तो उसमें बैठे और चुन लिये गए। तब से इसी नौकरी में चलते रहे, बीच-बीच में खराब जगहों पर काम करने को कहा गया तो वह भी निस्पृह भाव से किया। इधर-उधर हाथ-पैर फटकारना उन्हें नहीं आता। महत्त्वाकांक्षी एकदम नहीं हैं। जब कभी उनके दोस्त उन्हें कोई लाभ पकड़ने के लिए ललकारते-तो वे मुस्कुरा देते। वे महत्त्वाकांक्षी नहीं हुए तो मैदान छोड़ भागनेवाले भी नहीं हैं-जो सामने आ जाए उसे दत्त-चित्त होकर करेंगे। उनका मानना है कि यह नैतिकता का तकाजा होता है कि जो काम उन्हें दिया जाए उसे वे पूरे उत्साह और निष्ठा से करें।

जीवन में सादगी रही तो मन में भी आ गई। कुछ उल्टा सीधा नहीं करेंगे। लोगों की मदद करेंगे, लेकिन अगर मदद करने में उल्टा-सीधा करना पड़े, कायदा-कानून तोड़ना पड़े तो फिर मदद भी नहीं करेंगे। महत्त्वाकांक्षा नहीं रही तो सम्पर्क-अम्पर्क बनाने में भी कभी नहीं रहे। किसी से मिलना इसलिए नहीं कि उससे ये काम साधना है बल्कि मिलने के लिए मिलना। अपना हक भी नहीं छोड़ते। अब जैसे अध्यक्ष बनने की ही बात है-कोई कहे कि आपकी जो बारी आई है उसे छोड़ दीजिए, किसी और के पक्ष में हट जाइए तो नहीं, डटे रहेंगे। यही नहीं कुछ वर्ष पूर्व बोर्ड के एक सीनियर सदस्य का हक दरकिनार कर सरकार ने नीचे से किसी अन्य को चुनकर अध्यक्ष बना दिया था, तो अपनी बारी आने पर मोहन्ती चिन्तित हो गए हैं कि कहीं कोई नीचेवाला उन्हें टँगड़ी मारकर ऊपर न निकल जाए, उनके हक को मार न दे।

मौजूद अध्यक्ष अपनी कार्यावधि बढ़वाने के चक्कर में है। वह कर्मकांडी धार्मिक है। बाहर का खाना नहीं खाता। खाना ही पड़े तो किसी मन्दिर में जाकर खाता है, भले ही उसके लिए उसे मीलों दूर जाना पड़े। एक घंटा सवेरे और एक घंटा शाम नियमित पूजा करता है। लम्बा तिलक लगाता है, जो नाक की जड़ से उठकर माथे से होता हुआ खोपड़ी पर वहाँ तक जाता है जहाँ थोड़े-बहुत जो बाल बचे हैं, वे शुरू होते हैं। जैसे पूजा-पाठ उसके जीवन के एक हिस्से में है, वैसे ही दयाभाव भी। दयाभाव जागृत होगा तो द्रवीभूत होते हुए किसी की आखिरी हद तक मदद करता चला जाएगा, कायदा-कानून एक तरफ। नहीं तो क्रूरता में भी उसका कोई सानी नहीं। तब वह भीतर-भीतर चालें चलता रहेगा, एक से एक तिकड़में बैठाएगा और गुफा से जब बाहर निकलेगा तो किसी की तबाही का आदेश हाथ में लिये हुए ही। कुछ लोग इस क्रूरता को उसकी पहली पत्नी से जो सम्बन्ध थे, उससे जोड़ते हैं।

पहली पत्नी को इसका पूजा-पाठ पोंगा-पन्थी लगते थे। वह खूबसूरत और जानदार महिला थी, अपना जीवन पूजापाठी के साथ बिताने का सोच नहीं सकी। जब उसने उसे बदलने की कोशिश की तो इसने लड़ना, यहाँ तक कि हाथ चलाना शुरू कर दिया। वह इसे मारकर निकल भागी और तलाक की दरख्वास्त लगा दी। पत्नी ने जो इसके साथ किया उसका बदला यह निकालता है उनसे, जिनके प्रति भी इसकी क्रूरता जागृत हो जाए। ईमानदार अधिकारी होने की छवि है, लेकिन उसके कमरे में उसके प्रान्त के वकीलों का जमावड़ा लगा रहता है। जो काम अध्यक्ष की हैसियत से करना चाहिए, उन्हें एक तरफ रख वह उन लोगों के काम करवाने में लग जाता है, मदद करने का स्वभाव जो है उसका उसके आलोचक कहते हैं कि वह भीतर से प्रैक्टिस कर रहा है, सरकारी नौकरी में होते हुए भी वकालत कर रहा है, दूसरों के पक्ष में और सरकार के खिलाफ। बहुत लोग मोहन्ती से कहते हैं-‘आप उसे समझते नहीं, वह पीछे से क्या-क्या चालें चलता है, बाहर से तिलकधारी है पर भीतर से धूर्त है।’ मोहन्ती यह सब नहीं मानते। उनके साथ मौजूदा अध्यक्ष ने कभी कोई ऐसी-वैसी बात नहीं की।

आज के जमाने में क्या कहें, जिसके साथ आपके हाथों जरा कुछ उल्टा हो गया, वही आपके खिलाफ अनाप-शनाप बोलने लगता है। अब यदि तिलकधारी थोड़े दिन और अध्यक्ष-पद पर बना रहना चाहता है तो इसमें गलत क्या है, आज के जमाने में कौन ‘पावर’ छोड़ता है, हालाँकि मोहन्ती से वह कई बार कह चुका है कि वह एक्स्टेंशन का बिल्कुल इच्छुक नहीं, उसने ऊपर के लोगों से मना कर दिया है..जैसे कि सचमुच उससे पूछा गया हो। शुरू के अपने कार्यकाल में भी वह मोहन्ती से कहा करता था-‘‘मेरा वश चले तो छः माह अध्यक्षी कर शेष छः माह के लिए अपने बैचमेट (जो दूसरे सदस्य थे, हाल ही में रिटायर हो गए) को अध्यक्षी करने के लिए दे दूँ।’’ बिचौलिए कहते हैं-यह तिलकधारी की वैसी ही चाल है जैसे पाकिस्तान का लाहौर बस-यात्रा के लिए पाँवड़े बिछाना और उसी समय पीछे से घुसपैठिए कारगिल में भेज देना। मोहन्ती गोबर हैं, मौजूद अध्यक्ष पीछे से खेल रहा है, मोहन्ती को खिला रहा है। एकाएक पटकनी देगा।

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