दादा कॉमरेड - यशपाल Dada Kamrade - Hindi book by - Yashpal
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दादा कॉमरेड

यशपाल

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3260
आईएसबीएन :000000

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क्रान्तिकारियों के जीवन और आदर्श के संबंध में उत्पन्न हुई भ्रामक धारणाओं पर आधारित उपन्यास.....

Dada Comred

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

...यह उपन्यास लेखक की पहली रचना थी जिसने हिन्दी में रोमान्स और राजनीति के मिश्रण का आरम्भ किया। यह उपन्यास बंगला उपन्यास सम्राट शरत बाबू के प्रमुख राजनैतिक उपन्यास ‘पथेरदावी’ के द्वारा क्रान्तिकारियों के जीवन और आदर्श के सम्बन्ध में उत्पन्न हुई भ्रामक धारणाओं का निराकरण करने के लिए लिखा गया था परन्तु इतना ही नहीं यह श्री जैनेन्द्र की आदर्श नारी पुरुष की खिलौना ‘सुनीता’ का भी उत्तर है।

यशपाल के इस उपन्यास से चुटिया कर रूढ़िवाद के अन्ध अनुयायियों ने लेखक को कत्ल की धमकी दी थी परन्तु देश की प्रगतिशील जनता की रुचि के कारण दादा कॉमरेड के न केवल हिन्दी के कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं बल्कि गुजराती, मराठी, सिन्धी और मलयालम में भी यह उपन्यास अनुवादित हो चुका है।

दो शब्द

‘दादा कामरेड’ उपन्यास के रूप में प्रस्तुत है। उपन्यास का रूप होने से यह रचना भी साहित्य के क्षेत्र में आ जाती है। इससे पूर्व ‘पिंजड़े की उड़ान’ और ‘न्याय का संघर्ष’ पेश कर साहित्य के किसी कोने में स्थान पाने की आशा की थी। आशा से बहुत अधिक सफलता मिली, उसके लिए पाठकों को धन्यवाद।
मेरी पुस्तक ‘मार्क्सवाद’ विप्लवी-ट्रैक्ट के रूप में अपनाये हुए कार्य का अंग था, परन्तु ‘दादा कामरेड’ में उस ‘कार्य से कुछ अधिक भी है। वह है, अपनी रचना की प्रवृत्ति को अवसर देने की इच्छा या कला के मार्ग पर प्रयत्न।
कला की भावना से जो प्रयत्न मैंने ‘पिजड़े की उड़ान’ के रूप में किया था, उसकी कद्र उत्साहवर्धक जरूर हुई, परन्तु साहित्य और कला के प्रेमियों को मेरे प्रति एक शिकायत है कि कला को गौण और प्रचार को प्रमुख स्थान देता हूँ। मेरे प्रति दिये गये इस फैसले के विरुद्ध मुझे अपील नहीं करनी है। संतोष है, अपना अभिप्राय स्पष्ट कर पाता हूँ।

कला को कला के निर्लिप्त क्षेत्र में ही सीमित न रखकर मैं उसे भावों या विचारों का वाहक बनाने की चेष्टा क्यों करता हूँ ?...क्योंकि जीवन में मेरी साध केवल व्यक्तिगत जीवनयापन ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन की पूर्णता है इसलिए कला से सम्बन्ध जोड़कर भी मैं कला को केवल व्यक्तिगत संतोष के लिये नहीं समझ सकता। मेरे विचार में कला का उद्देश्य जीवन में पूर्णता की प्राप्ति है। बजाय इसके कि कला का यत्न बहक कर हवा में पैंतरे बदल कर श्रान्त हो जाये, क्या यह अधिक अच्छा नहीं कि यह यत्न समाज के लिये विकास और नवीन कला के लिये आधार प्रस्तुत करे ?
पुस्तक प्रकाशित होने से पूर्व ही ‘दादा कामरेड’ के कुछ अंश पढ़कर मित्रों ने परामर्श दिया—‘तुम्हारा यह प्रथम उपन्यास है और वास्तव में इस योग्य है कि इसकी भूमिका किसी प्रमुख साहित्यिक द्वारा लिखाई जाये !’ इस सद्इच्छा और परामर्श के लिए साहित्यिक मित्रों का आभारी हूँ। यह भी जानता हूँ कि जैसी विवेचना साहित्यिक मित्र कर सकेंगे और जो लाभ उनकी लेखनी द्वारा परिचय पाने से हो सकता है, वह स्वयं मेरे अपने शब्दों से न होगा, परन्तु अपने भाव स्वयं मेरे शब्दों में ही ठीक से प्रकट हो सकेंगे।

इस पुस्तक के बारे में अपने साधारण अभ्यास के विरुद्ध मुझे सफाई देनी है। साहित्यिक सृष्टि से ‘दादा कामरेड’ को क्या कुछ सफलता मिलेगी यह बात मेरे कहने की नहीं। यह आलोचक और पाठक बतायेंगे। साहित्य के आवरण में जिन विचारों को ‘दादा कामरेड’ के रूप में पेश कर रहा हूँ। उसी के विषय में यह सफाई है।
हमारे समाज में वर्तमान आचार-सम्बन्धी साधारण धारणा से यह विचार भयानक और विद्रोही जान पड़ेंगे। ठीक उसी प्रकार, जैसे गैलीलियो की बात ‘पृथ्वी गोल है और वह घूमती है’ तत्कालीन भौगोलिक ज्ञान और धारणाओं के लिये भयंकर थी। ‘दाद कामरेड’ में राबर्ट के विचार और शैल का आचरण, समाज में मौजूद संकट और अन्तर्द्वन्द्व के लिये ‘उपचार’ के नुस्खे का दावा नहीं कर सकते, वे तो ‘निदान’ का प्रयत्न मात्र हैं। उद्देश्य है—समाज की मौजूदा परिस्थिति में और क्रमागत आचार और नैतिक धारणा में वैषम्य और विरोध की ओर संकेत करना।

मौजूदा परिस्थितियों और प्राचीन नैतिक और आचार सम्बन्धी धारणाओं में कदम-कदम पर विरोध खटकता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। प्रश्न यह है कि अनुभव होने वाले विरोधों और उनके कारणों की उपेक्षा कर इस प्रवृत्ति का दमन कर दिया जाये या पुरातन धारणा को सुरक्षित रखने के लिये परिस्थितियों में आ गये परिवर्तनों को मिटाकर, हम फिर से प्राचीन युग में लौट जायें; या फिर समाज के आचार और नैतिक धारणा में नई परिस्थितियों के अनुकूल समन्वय करें !

संसार में आज अनेक वादों-पूँजीवाद, नाजीवाद, गाँधीवाद, समाजवाद का संघर्ष चल रहा है। इस विचार संघर्ष की नींव में परिस्थितियों, व्यवस्था और धारणाओं में सामंजस्य बैठाने का प्रयत्न है। इन वादों के संघर्षों से उत्पन्न समन्वय ही मनुष्य की नयी सभ्यता का आधार होगा। मनुष्य होने के नाते हम इस संघर्ष की उपेक्षा नहीं कर सकते। इस संघर्ष के परिणाम के सम्बन्ध में हमारी चिन्ता की भावना नहीं, स्वयं अपने और समाज के जीवन की चिन्ता है।
हमें यह सोचना ही पड़ेगा कि मनुष्य-समाज की आयु बढ़ने के परिणामस्वरूप जब समाज के बचपन के युग की झँगुलिया उसके बदन को दबाने लगे तब उसके लिये नये विचारों का विस्तृत कपड़ा बना लेना बेहतर होगा या शरीर को दबाकर पुरानी सीमाओं में ही रखना है ?’’ ’दादा कामरेड’ में इसी प्रश्न पर विचार करने का अनुरोध है।

आचरण के कुछ प्रेमियों को शैल के व्यवहार में नग्नता दिखाई देगी। इस प्रकार का चरित्र पेश करना वे आदर्श की दृष्टि से घृणित समझेंगे। हो सकता है, शैल उनकी सहानुभूति न पा सके, परन्तु यह शैल है कौन ? ‘दादा कामरेड’ की शैल स्वयं कुछ न होकर घृणा से नाक-भौं सिकोड़ने वालों की अतृप्त, परन्तु जागरुक, सक्रिय प्रवृत्ति ही है। समाज में मनुष्य की यह प्रवृत्ति अपना काम किये जा रही है। इस देश और संसार की बढ़ती हुई जनसंख्या इस बात का अकाट्य प्रमाण है। उस प्रवृत्ति को घृणित समझ कर उसे तृप्त करने की चेष्टा करके भी, उसकी निन्दा करते जाना ही क्या आज की परम्परागत आचार और नैतिकता नहीं है ?

आचार और नैतिकता का प्रयोजन यदि मनुष्य को बेहतर व्यवस्था और विकास की ओर ले जाना है तो मानना पड़ेगा कि यह उद्देश्य हमारी वर्तमान नैतिक और आचार सम्बन्धी धारणा से पूरा नहीं हो रहा। मनुष्य की यह प्रवृत्ति उसे वासना के अंगारों पर सेंक-सेंक कर झुलसाये, उसे सदा अपराधी होने की भावना से क्लेशित करती रहे, इसका क्या कोई उपाय मनुष्य नहीं कर सकता ?
प्रकृति की दूसरी शक्तियों की भाँति मनुष्य की सृजन-शक्ति भी एक शक्ति है। प्रकृति की दुर्दमनीय शक्तियों—जल-वायु और बिजली को मनुष्य ने अपने उपयोग के लिए वश में कर लिया है तो क्या वह अपनी सृजन-शक्ति को स्वाभाविक मार्ग देकर अपने जीवन के आनन्द के स्रोत को संकट का कारण बनने से नहीं बचा सकता ? प्रश्न है, केवल परिस्थितियों के अनुसार नैतिक धारणा को बदलने का।

औरों की बात क्या, स्वयं पुराने क्रांतिकारियों की भावना को भी ‘दादा कामरेड’ से कुछ चोट पहुँचने की आशंका है। शायद वे समझें कि क्रांतिकारियों की महत्ता को कम करने का यत्न किया है, परन्तु मेरा अभिप्राय ऐसा नहीं है। इस प्रसंग में तुर्गनेव के उपन्यास ‘ओत्से-सिनी’ (पिता-पुत्र) की याद आ जाती है। ‘ओत्से-सिनी’ के प्रकाशित होने पर तुर्गनेव को सबसे अधिक गालियाँ क्रांतिकारियों से ही मिलीं, परन्तु दस वर्ष बाद यही पुस्तक क्रांतिकारी भावना की प्रतिनिधि समझी जाने लगी। क्रांति का साधन व्यक्ति नहीं भावना होती है और क्रांतिकारी भावना नहीं व्यक्ति हैं। क्रांति का ध्येय व्यक्ति के प्रति अनुरक्ति से नहीं भावना के प्रति निष्ठा से पूर्ण हो सकता है।

किसी ने किसी को धन्यवाद भी देना ही चाहिए। सबसे पहले डाक्टर प्रकाश पाल को ही धन्यवाद देता हूँ। रात-दिन लगातार काम में लगे रहने के कारण पिछले सितम्बर में मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया था। उन्होंने ‘विप्लवी-ट्रेक्ट’ के प्रबन्ध का पूरा बोझ अपने सिर पर लेकर मुझे चार मास के लिये मसूरी जाने का अवसर दिया। मसूरी की शान्ति और सुविधा ने ‘दादा कामरेड’ और ‘वो दुनिया’ लिखने का अवसर दिया। शीघ्र ही ‘वो दुनिया’ भी पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करने का विचार है।

कृतज्ञता के नाते मैं अपने मसूरी के मेजबान का भी ऋणी हूँ, जहाँ बैठकर पुस्तक लिखी और उस पर अनेक घण्टे वाद-विवाद भी किया। पुस्तक के विचारों से पूर्णतः सहमत न होकर भी पुस्तक प्रकाशित करने की ही राय उन्होंने दी ताकि विचारों का संघर्ष सामने आये !

मई दिवस, 1941

यशपाल

दुविधा की रात


यशोदा के पति अमरनाथ बिस्तर पर लेटे अखबार देखते हुए नींद की प्रतीक्षा कर रहे थे। नौकर भी सोने चला गया था। नीचे रसोई घर से कुछ खटकने की आवाज आयी। झुँझलाकर यशोदा ने सोचा—नालायक बिशन जरूर कुछ नंगा-उघाड़ा छोड़ गया होगा। अनिच्छा और आलस्य होने पर भी उठना पड़ा। वह जीना उतर रसोई में गई। चाटने के प्रयत्न में जिस बर्तन को बिल्ली खटका रही थी, उसमें पानी डाला। लेटने के लिए फिर ऊपर जाने से पहले बैठक की साँकल को भी एक बार फिर देख लेना उचित समझा। नौकर का क्या भरोसा ! बिजली का बटन दबा, उजाला कर उसने देखा कि बैठक के किवाड़ों की साँकल और चिटखनी दोनों लगी हैं।

बिजली बुझा देने के लिए यशोदा ने बटन पर दुबारा हाथ रखा ही था कि बाहर से मकान की कुर्सी की सीढ़ी पर चुस्त कदमों की आहट और साथ ही किवाड़ पर थाप सुनाई दी। आगन्तुक को दरवाजे और खिड़की के काँच से रोशनी दिखाई दे गयी थी। खोले बिना चारा न था। अलसाये से खिन्न स्वर में यशोदा ने पूछा, ‘‘कौन है ?’’
उत्तर में फिर थाप सुनाई दी, कुछ अधिकारपूर्ण सी।
यशोदा ने चिटखनी और साँकल खोली ही थी कि किवाड़ धक्के से खुल गये और एक आदमी ने शीघृता से भीतर घुस किवाड़ बन्द कर कहा—‘‘मुआफ कीजिये....’’
अपरिचित व्यक्ति को यों बलपूर्वक भीतर आते देख यशोदा के मुख, से भय और विस्मय से ‘कौन ? निकला ही चाहता था कि उस व्यक्ति ने अपने कोट के दायें जेब से पिस्तौल निकाल यशोधा के मुख के सामने कर दिया और दबे स्वर में धमकाया. ‘‘चुप ! नहीं तो गोली मार दूँगा !’’

यशोदा के गले से उठती भय की पुकार रुक गयी और शरीर काँप गया। वह अवाक खड़ी थी। आगन्तुक ने बायें हाथ से किवाड़ की साँकल लगी दी, परन्तु दायें हाथ से पिस्तौल वह यशोदा के मुख के सामने थामे रहा। उसकी सतर्क आँखें भी उसी ओर थीं।
भीतर के दरवाजे की ओर संकेत कर आगन्तुक बोला...‘‘चलिये...बिजली बुझा दीजिये !’’
यशोदा काँपती हुई भीतर के कमरे की ओर चली। कमरे में पहुँच आगन्तुक ने कहा, ‘‘रोशनी कर लीजिये।’’ यशोदा ने काँपते हाथों से, अभ्यस्त स्थान टटोलकर बिजली जला दी।।
आगन्तुक अब भी पिस्तौल यशोदा की ओर किये था, परन्तु उसके मुख के भाव और स्वर में कुछ कोमलता और दीनता आ गई।

आगन्तुक बोला, ‘‘मैं आपका कुछ बिगाड़ने नहीं आया हूँ। मैं आपको कष्ट न देता, परन्तु कोई चारा न था। केवल कुछ घण्टे आप मुझे यहाँ बैठे रहने दीजिये। एक हिन्दुस्तानी के नाते आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ।’’
उस व्यक्ति के व्यवहार से यशोदा का भय कुछ कम हुआ। उसने देखा कि आगन्तुक की साँस अब भी तेज चल रही थ। वह भागकर आया जान पड़ता था। उसके माथे पर पसीने की महीन, घनी बूँदें झलक रही थीं। उसकी आयु अधिक नहीं थी। वह भयानक मनुष्य भी न जान पड़ रहा था। उसके सिर पर पगड़ी थी, मुख पर कम उम्र की हल्की-हल्की मूँछ फूट रही थी। दोनों हाथों की उँगलियों को आपस में दबाते हुए भयभीत और धीमे स्वर में यशोदा ने पूछा, आप कौन हैं ?’’

आगन्तुक ने यशोदा के मुख पर तीव्र दृष्टि डालते हुए उत्तर दिया—‘‘क्रांतिकारी पार्टी का नाम आपने सुना होगा ? हम लोग जेल में थे। आज हमें दूसरे मुकदमे के लिये अमृतसर ले जाया जा रहा था। हमारे साथियों ने पुलिस पर आक्रमण कर हमें छुड़ा लिया है। कोई जगह न होने से रोशनी देख मैं यहाँ आ गया हूँ। यदि मैं यों ही भटकता फिरूँ तो जरूर पकड़ लिया जाऊँगा। यदि मुझे पकड़ा गया तो मुझे जन्म भर जेल में रखा जायेगा ! सुबह सूरज निकलने से पहले ही मैं चला जाऊँगा। हम लोग चोर-डाकू नहीं हैं, हम लोग देश की स्वतंत्रता के लिये लड़ रहे हैं।

यशोदा कुछ कह न सकी। उसकी घबराहट अभी दूर न हो पायी थी। उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य वह कुछ न समझ सकी। उसे केवल समझ आया—मौत के मुँह से भागता हुआ एक व्यक्ति जान बचाने के लिये उसके पैरों के पास आ पड़ा है। भय के अचानक धक्के से जो मूढ़ता उसके मस्तिष्क पर छा गई थी, उसका धुन्ध शनैःशनैः साफ होने लगा। हाथों की उँगलियाँ उसी तरह दबाये वह उस नवयुवक की ओर देख रही थी। जिस व्यक्ति से वह इतना डर गयी थी, वही गिड़गिड़ाकर उससे प्राणों की भिक्षा माँग रहा था। कल्पना में उसे दिखायी दिया—बहुत से लोग तलवार-बन्दूक लिये उस नवयुवक को मार डालने के लिये चले आ रहे थे। वह उसके पैरों में, उसके आँचल में दुबक कर जान बचाना चाहता है। वह कुछ न बोल सकी। मूक उस शरणागत की ओर देखती रही। वह पिस्तौल, जो कुछ देर पहले उसके माथे की ओर तना हुआ था, अब युवक के हाथ में नीचे लटक रहा था। यशोदा को चुप देख नवयुवक एक कदम समीप आकर धीमे स्वर से बोला, ‘‘मैं यहीं बैठा रहूँगा।’’

यशोदा ने लम्बी साँस लेकर परेशानी में युवक की ओर ध्यान से देखा। युवक ने यशोदा को विश्वास दिलाने के लिये फिर कहा, ‘‘मैं यहीं बैठा रहूँगा, आपका कुछ नुकसान न होगा। आप आराम कीजिये !’’
काँपते हुए स्वर में यशोदा बोली, ‘‘इनसे पूछ लूँ ?’’
युवक ने आर्द्र स्वर में स्वीकार किया, ‘‘अच्छा !’’ परन्तु फिर रुककर बोला, ‘‘अब मैं आ ही गया हूँ। वे शायद घबरायें। चुपचाप रहने दीजिये। खटका न होना ही अच्छा है। जरा-सी बात से कुछ का कुछ हो सकता है। मैं सुबह तक चला जाऊँगा। उस समय आप उन्हें सब कुछ समझा सकेंगी। इसमें कुछ भी हर्ज न होगा। आप आराम कीजिये।’’

यशोदा कुछ पल सोचती रही...ठीक ही कह रहा है, यह आ तो गया ही है। अब इसे निकाला कैसे जाये ? चुप के सिवा और कोई राह नहीं थी। कुछ पल वह अपनी धोती में सिमटी, आँखें झुकाये खड़ी रही, फिर लाचारी और स्वीकृति के भाव से सिर हिला जीने की ओर चल दी। जीने पर उसके पैर रखते ही नीचे कमरे में बिजली बुझ गई। अँधेरे में जीना चढ़ते समय उसके पैर काँप रहे थे और दिल धड़क रहा था, परन्तु उस सब पर निश्चय का एक भाव था—अब यह सहना ही होगा।
अमरनाथ अब भी अखबार देख रहे थे। कमरे में आहट पाकर उन्होंने अखबार से दृष्टि उठाये बिना पूछा, ‘‘आ गयीं ?’’ एक क्षीण सी ‘हूँ’ कर यशोदा अपने पलंग पर लेट गई। हृदय की उत्तेजना के कारण उसे गरमी अनुभव हो रही थी। उसके मुँदे हुए नेत्रों के सामने वही दृश्य फिर दिखाई देने लगा, अनेक लोग भाला-तलवार और बन्दूकें लिए उस नवयुवक को मार डालने के लिए झपट रहे हैं। वह हाँफता हुआ आकर यशोदा के पैरों में गिरकर उसके आँचल में छिप गया है। उसके हृदय में एक प्रबल आवेग-सा उठ रहा था, जिसके बाहर निकलने की कोई राह न थी। वह उसके मस्तिष्क और शरीर को क्षुब्ध किये दे रहा था।

बिजली के टेबल लैम्प के नीचे लगी घड़ी की ओर देख अमरनाथ बोले, ‘‘साढ़े दास !’’
अपनी बेचैनी छिपाने के लिए यशोदा ने करवट बदल ली। पति ने कुछ शंकित से स्वर में पूछा, ‘‘क्यों क्या है ?’’
‘‘नहीं, कुछ नहीं....ऐसे ही सीढ़ियाँ चढ़ने से किसी समय हो जाता है।’’ यशोदा ने उत्तर देकर चेहरे पर हाथ रख लिया। यशोदा को कभी-कभी दिल डूबने का दौरा आ जाता था। इसी ख्याल से पति ने फिर एक बार पूछा, ‘‘कुछ घबराहट तो नहीं मालूम होती ?’’
‘‘नहीं, ऐसे ही रोशनी आँखों में लग रही है।’’

अमरनाथ टेबल लैम्प बुझाकर लेट गये। कुछ ही मिनट में उनका सम और गम्भीर श्वास शांत निद्रा का परिचय देने लगा। यशोदा ने बेचैनी से फिर करवट बदली। वह अँधेरे में आँखें खोले पड़ी थी। निद्रागत पति के समश्वास के साथ घड़ी की टिक-टिक और अपने हृदय की धड़कन भी उसे सुनाई दे रही थी। कल्पना में सशस्त्र लोगों के उस नवयुवक पर झपटने, सहसा घर के किवाड़ों के खुलने और पिस्तौल के सामने आ जाने का दृश्य, उसकी आँखों के सामने आ जाता और फिर पति के श्वास घड़ी की टिक-टिक और उसके हृदय की गति के शब्द को दबाकर, नीचे बैठे युवक की वे बातें सुनाई देने लगतीं। आरम्भ में उसका पिस्तौल दिखाना ! उसका भयानक रूप और फिर उसकी त्राण माँगती वह कातर आँखें ! वह सोचने लगी; नीचे कमरे के अँधेरे में बैठा वह भय से काँप रहा होगा।
उसे अनुभव हुआ कि बहुत देर से प्यास लगी है, परन्तु जल पीने का ध्यान नहीं आया। धीमे से उठकर उसने लोटे से गिलास में पानी लिया। गिलास होंठों तक ले जाने से पहले ही ख्याल आया—वह प्यासा होगा; भागकर कैसे हाँफता हुआ आया था...जरूर प्यासा होगा !

गिलास भरकर अँधेरे में ही बिना आहट किये, बहुत धीमे-धीमे वह जीने से नीचे उतरी। कमरे में पहुँच उसने बिजली का बटन दबाया। उसने देखा, नवयुवक बड़ी सतर्कता से उस दरवाजे की ओर पिस्तौल लिये घूर रहा था जिस ओर से यशोदा के आने की आहट मिली थी। प्रकाश हो जाने पर उसने पिस्तौल नीचे कर लिया। बिना कुछ कहे यशोदा ने जल का गिलास उसकी ओर बढ़ा दिया। कृतज्ञता से यशोदा की ओर देखकर वह जल को एक ही साँस में पी गया।
वह दबे स्वर में धन्यवाद दे, गिलास समीप पड़ी छोटी तिपाई पर रखने जा रहा था। यशोदा को हाथ बढ़ाते देख युवक ने संकोच से गिलास उसके हाथ में दे दिया। गिलास ले यशोदा कमरे से बाहर गई। कुछ ही पल में और जल लाकर उसने गिलास फिर उसके सामने कर दिया। इस बार युवक की आँखों में कृतज्ञता का भाव और भी गहरा था। आधा जल पीकर उसने गिलास तिपाई पर रख दिया।

यशोदा को ख्याल आया कि इसे भूख भी लगी होगी, रात में ठंड तो लगेगी ही और क्या सारी रात कुर्सी पर बैठकर बिताई जा सकती है ? परन्तु वह क्या करे ? छिप-छिप कर चोरी से सब इन्तजाम वह कैसे कर सकती है.....? जीने का कोना पकड़े खड़ी वह कुछ देर सोचती रही। फिर ख्याल आया कि यदि उनकी नींद खुल जाये या माँ जी चौंक पड़ें ! बेबसी की गहरी साँस को दबाकर वह फिर शनैःशनै जीना चढ़ लेटने के लिये चली गई। लौटने के कुछ मिनट बाद उसे याद आया कि जल तो पिया ही नहीं। जल पीते ही अनुभव होने वाली ठंड की सिहरन से नीचे कुर्सी पर भूखे बैठे, सर्दी में काँपते हुए युवक के ख्याल ने उसे बेचैन कर दिया। उससे रहा न गया। फिर दुबारा अँधेरे में बिना आहट के कदम रखती हुई वह असबाब रखने के कमरे में गई। नीचे बिछाने के लिये कुछ मोटा कपड़ा, एक कम्बल, और तकिये के बोझ को उठाये वह बहुत सँभल-सँभल कर जीना उतरने लगी।

कमरे की बिजली इस बीच में फिर बुझ चुकी थी। यशोदा के दोनों हाथ बोझ सँभाले थे। कुछ एक क्षण वह निरुपाय खड़ी थी, युवक ने टटोलकर बिजली जला दी। उसे इतना बोझ उठाये देख युवक संकोच और अति कृतज्ञता से स्वर में बोला—‘‘इसकी तो कोई जरूरत नहीं थी, आपने यों ही कष्ट किया।’’
बिस्तर के कपड़े एक कुर्सी पर रख वह फिर लौट गई। चार-पाँच मिनट बाद एक तश्तरी में खाने के लिये कुछ लेकर लौटी तो युवक दीवार के सहारे लगे सोफे के सहारे छोटा-सा बिस्तर लगा चुका था। यशोदा ने तश्तरी तिपाई पर रखकर लौटते हुए घूमकर धीमे स्वर में पूछा, ‘‘किसी और चीज की जरूरत होगी ?’’
यशोदा के व्यवहार से युवक का साहस बढ़ चुका था। समीप आ, अपने कपड़ों की ओर संकेत कर उसने कहा, ‘‘इन्हीं कपड़ों में मेरा कल बाहर जाना ठीक न होगा; पहचान लिया जाऊँगा। आप मुझे एक धोती या कोई पुराना कपड़ा ओढ़ने के लिए और चार-पाँच रुपये सुबह बाहर जाने से पहले दे सकें तो बड़ी सहायता होगी। हो सका तो आपकी चीजें लौटा देने की भी कोशिश करूँगा।
कुछ सोचकर यशोदा बोली, ‘‘ये सुबह छः बजे के करीब उठ जाते हैं। नौकर भी सफाई करने नीचे आयेगा। माँ जी तो और भी पहले उठ जाती हैं। वे भी नहाने नीचे आयेंगी।’’

अपनी दोनों बाँहें सीने पर समेटते हुए युवक ने चिन्ता से कहा, ‘‘छः बजे से पहले तो सड़कें बिलकुल सूनसान होंगी, भीड़ में जरा अच्छा रहता है....हाँ आपके नौकर के कपड़े मिल जायें तो ज्यादा अच्छा रहे।’’
यशोदा फिर अँधेरे जीने से चढ़ अपने बिस्तर पर पहुँची। घड़ी में अभी बारह भी नहीं बजे थे। उसकी घबराहट अब पहले से कम हो गई थी। घबराहट की जगह ले ली थी आशंका ने। प्राणों पर आक्रमण के भय का स्थान अब ले लिया था परिणाम के भय ने जो हृदय की गति की अपेक्षा मस्तिष्क की क्रिया पर अधिक बोझ डालता रहेगा। नींद कहीं कोसों पास न थी ! विचार उठता था कि एक नौजवान, कितना भला लड़का, घर-बार से बिछड़ा हुआ, उसके प्राण संकट में ! लोग उसे पकड़कर उम्र भर कैद कर देना चाहते हैं, उसे मार डालना चाहते हैं....वह प्राण बचाकर भाग रहा है। उसका हौसला भी कितना है ! देश के लिए वह घर-बार छोड़कर जान खतरे में डाल रहा है।

उसकी आँखों के सामने कांग्रेस के जुलूसों के दृश्य दिखाई देने लगे। सैकड़ों, हजारों लोग नारे लगाते हुए, झण्डे उठाये चलते हुए दिखाई देने लगे। शहर में महात्मा गाँधी के आने पर छत से उसने जुलूस को देखा था। और भी कई जुलूस उसने देखे थे। भारत माता की जय ! हिन्दोस्तान जिन्दाबाद ! वन्दे मातरम् ! के नारे सुन उसके शरीर में रोमांच हो जाता था।
उसके पति अमरनाथ क्रांग्रेस को सहयोग देते थे। अपने मोहल्ले की कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी थे। चुनाव में खूब दिलचस्पी लेते थे। उनके घर में स्वामी दयानन्द, तिलक और गाँधी जी की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी थीं। यशोदा को गाँधीजी के प्रति बहुत श्रद्धा और भक्ति थी। जानती थी, कांग्रेस और गाँधीजी देश में हिन्दुस्तानियों का राज चाहते हैं। बड़े-बड़े जुलूस और सभाएँ देखकर उसके मन में एक उत्साह-सा भर आता था। वह यह भी जानती थी कि सरकार और पुलिस इन बातों से नाराज होती है। स्वराज्य माँगने के लिये जुलूस और सभा करने पर लाठियाँ और गोलियाँ चलती हैं, लोगों को जेल में बन्द कर दिया जाता है। ऐसी खबरों से उसे भय और दुःख होता था।



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