तुलसीदास - माताप्रसाद गुप्त Tulsidas - Hindi book by - Mataprasad Gupta
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तुलसीदास

माताप्रसाद गुप्त

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :515
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3263
आईएसबीएन :000000

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तुलसीदास के जीवन पर आधारित पुस्तक...

Tulsidas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

डॉ. माता प्रसाद गुप्त का यह अध्ययन गोस्वामी तुलसीदास की जीवनी, कृतियों एवं वस्तु-विषय की प्रामाणिकता को निर्धारित करने वाला ग्रन्थ है। हिन्दी साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास विषयक विभिन्न समस्याओं को अन्तर्साक्ष्यों एवं बहिर्साक्ष्यों के आधार पर पहली बार डॉ. गुप्त द्वारा प्रामाणिकता का जो भी प्रयास किया गया है, वह आज तक अकाट्य बना हुआ है। इसीलिए उनकी इस गवेषणात्मक कृति का महत्व हिन्दी साहित्य के विद्वतजनों के बीच पूर्ववत् स्वीकार्य है।
तुलसीदास के आध्यात्मिक विचारों के अध्ययन में सम्यक् उपयोग अभी तक केवल, ‘रामचरितमानस’ का किया गया है, और कवि के शेष ग्रंथों की उपेक्षा की गई है। यद्यपि यह सत्य है कि इस विषय में ‘मानस’ जितना सम्पन्न है, उतना उसकी अन्य कृतियाँ नहीं हैं, फिर भी कदाचित उसकी एक त्रुटि को सर्वथाविस्मृत कर देना ठीक न होगाः कभी-कभी यह हो सकता है कि ‘मानस’ में महाकवि ने कोई बात स्वतः या अपने पात्रों के द्वारा केवल इस कारण यह कह या कहला दी हो कि वह एक ‘श्रुतिसम्मत’ या ‘नानापुराण-निगमागम सम्मत’ कथा कह रहा था। कम से कम यह नितांत असंभव नहीं कहा जा सकता कि इस संबंध में उसकी अन्य कृतियों की उपेक्षा से केवल अर्धसत्यों को लाभ हुआ हो। फलतः हमें ‘मानस’ के अतिरिक्त कवि की ऐसी कृतियों का भी इस सम्बन्ध में अध्ययन करना चाहिए जिसमें कवि अपेक्षाकृत अधिक अभिव्यक्ति-स्वतंत्र था।

प्रस्तावना
प्रथम संस्करण

ग्यारह वर्ष से अधिक हुए, फरवरी सन् 1931 में जब मैंने तुलसीदास की रचनाओं के काल-क्रम का प्रारंभिक अनुसंधान प्रयाग विश्वविद्यालय की एम.ए. की परीक्षा के लिए कवि का अध्ययन करते हुए किया था, तभी मुझे यह प्रतीत हुआ था कि तुलसीदास का अध्ययन कदाचित् मैं डॉक्टर की उपाधि के लिए विशेष रूप में ले सकता हूँ। अवकाश मिलने पर काल-क्रम संबंधी अपना यह अध्ययन मैंने पूर्ण किया और तदनंतर उसको एक निबंध के रूप में लिखकर श्री डॉक्टर धीरेन्द्र वर्मा को दिखाया, जिन्होंने उसे प्रकाशन के योग्य समझकर ‘हिन्दुस्तानी’ में भेज दिया। निबंध उक्त पत्रिका की जनवरी तथा अप्रैल सन् 1932 की संख्याओं में प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष श्रद्धेय डॉक्टर साहब की प्रेरणा से मैंने हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में होने वाली प्रथम कांफ्रेंस के सामने ‘‘मूल गोसाईं चरित की ऐतिहासिकता पर कुछ विचार’’ शीर्षक एक निबंध पढ़ा जो ‘हिन्दुस्तानी’ की जुलाई सन् 1932 की संख्या में प्रकाशित हुआ। अपने इन दोनों ही निबंधों की कुछ प्रतियाँ सम्मति के लिए मैंने देश-विदेश के लब्ध प्रतिष्ठ विद्वानों को भेजीं, और उत्तर में प्राप्त सम्मतियों से ऐसा प्रोत्साहित हुआ कि उसी के परिणामस्वरूप अनेक बाधाओं के निरंतर उपस्थित होने पर भी मैं अपने संकल्प से विचलित नहीं हुआ और ईश्वर की कृपा से अंत में कृतकार्य भी हुआ। इस बीच सन् 1936-37 में प्रयाग विश्वविद्यालय से जो सहायता मुझे रिसर्च स्कॉलर-शिप के रूप में मिली, कृतज्ञतापूर्वक उसका स्मरण करना आवश्यक होगा।

ग्यारह वर्षों के इस दीर्घ काल में मेरे तुलसीदास के अध्ययन के चार विभिन्न प्रयास हो चुके। प्रथम प्रयास कतिपय स्फुट लेखों के रूप में विभिन्न पत्रिकाओं में मिलता है, जिनका एक संग्रह ‘तुलसी-संदर्भ’ नाम से सन् 1935 में स्थानीय विवेक कार्यालय से प्रकाशित हुआ था। दूसरा प्रयाग विश्वविद्यालय की डी.लिट्. की उपाधि के लिए ‘थीसिस’ के रूप में सन् 1937 में तैयार हुआ था। तीसरा वही संशोधित और परिवर्धित रूप में सन् 1940 में तैयार हुआ था, जब मुझे दोबारा उसे उपस्थित करना पड़ा था, और जो डी.लिट्. की उपाधि के लिए स्वीकृत हुआ था। और चौथा, प्रयास प्रस्तुत ग्रंथ के रूप में है। निरंतर एक के बाद दूसरा प्रयास अधिक पूर्ण और अधिक व्यवस्थित हुआ है, और मुझे संतोष है कि जिस रूप में वह पाठकों के हाथों में रखा जा रहा है और बहुत-कुछ उसका अंतिम रूप है, जिसमें जल्दी परिवर्तन होने की मुझे आशा नहीं है। इस अंतिम रूप को तैयार करने में मुझे उपाधि-प्राप्ति के बाद भी कितना परिश्रम करना पड़ा है, इसका अनुमान इस बात से हो सकेगा कि इसका तिहाई भाग आमूल नवीन है। ‘कृतियों का पाठ’ तथा ‘आध्यात्मिक विचार’ शीर्षक दो अध्याय यद्यपि पिछले प्रयास में भी थे, किन्तु प्रस्तुत प्रयास के लिए उन्हें पुनः लिखना पड़ा है, और ‘कृतियों का कालक्रम’ शीर्षक अध्याय भी अधिकांश में नए सिरे से लिखना पड़ा है। शेष अध्यायों में भी पर्याप्त नवीन सामग्री तथा नवीन उद्भावनाएँ हैं। प्रस्तुत प्रयास में पिछले की तुलना में एक की कमी अवश्य ज्ञात होगी, वह है ‘मानस-रहस्य’ शीर्षक एक अध्याय की। मेरा अनुमान है कि ‘रामचरितमानस’ की कथा एक रहस्य-पूर्ण ‘आध्यात्मिक’ अर्थ भी है; जो उसके ‘आधिभौतिक’ और ‘आधिदैविक’ अर्थों का पूरक है। अपने इस अनुमान को एक रूप देने का प्रयत्न मैंने पिछले प्रयास में किया था, किन्तु इधर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि कुछ और कार्य उस दिशा में करने के उपरांत ही यह अंश वास्तव में पूर्ण हो सकेगा, इसलिए प्रस्तुत प्रयास में मैंने उसे रोक लिया है। यदि अवकाश और साधन प्राप्त हुए, तो शीघ्र ही उसको भी देने का यत्न करूँगा।
दो एक बातें मुझे अपनी विवेचन-प्रणाली के संबंध में भी कहनी हैं। इस समस्त प्रयास में सबसे पहले मैंने इस बात का ध्यान रखा है कि मैं सत्य का अनुसंधान करूँ, और इस अनुसंधान में मैंने यथासंभव वैज्ञानिक विधियों का अनुसरण किया है। मुझे संतोष है कि इस प्रयोग से कदाचित् मैं निरंतर वास्तविकता के अधिकाधिक निकट पहुँचता रहा हूँ, क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि मेरे इस दीर्घकालीन अध्ययन में जो नई सामग्री प्रकाश में आती गई है, उसने प्रायः मेरे पूर्वकल्पित निष्कर्षों का समर्थन किया है। दूसरी बात जिस पर मैंने बराबर ध्यान रखा है, यह है कि मैं अपने कवि का स्वतन्त्र अध्ययन करूँ, और उसके संबंध में किसी प्रकार के तुलनात्मक या ऐतिहासिक विस्तार में न जाऊँ : केवल उसके व्यक्तित्व, उसकी कृतियों, उसकी कला और उसके विचारों को ठीक-ठीक समझने का प्रयत्न करूँ। इस सीमित परिधि में जो कुछ मैं कर सका हूँ, वह इस ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत है। महाकवि की कृतियों के साधारण पाठ के लिए ‘मानस’ का गीता प्रेस का संस्करण, ‘सतसई’ का एशियाटिक सोसाइटी आव् बंगाल का संस्करण, तथा शेष के लिए नागरी प्रचारिणी सभा-काशी का संस्करण मैंने ग्रहण किए हैं।

‘थीसिस’ के लिखने तथा उसके प्रस्तुत रूपांतर के प्रकाशन के संबंध में जिनसे मुझे सहायता मिली है, उनके प्रति आभार-प्रदर्शन करना शेष है। ‘थीसिस’ के लिखने के संबंध में सबसे पहले मैं डॉक्टर धीरेन्द्र वर्मा, स्वर्गीय श्री सर जार्ज ए. ग्रियर्सन तथा डॉक्टर टी. ग्राहम बेली को धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिनके प्रारम्भिक प्रोत्साहन से ही मैं इस महान कार्य में प्रवत्त हुआ था। खेद है कि श्री ग्रियर्सन इस कार्य को समाप्त देखने के लिए जीवित न रहे। इसके अनंतर मैं अपने निरीक्षक-परीक्षकों सर्वश्री डॉक्टर धीरेन्द्र वर्मा, डॉक्टर राम प्रसाद त्रिपाठी, तथा रावराजा डॉक्टर श्यामबिहारी मिश्र के प्रति अपनी असीम कृतज्ञता प्रकाशित करना चाहता हूँ, जिन्होंने ‘थीसिस’ की विभिन्न रचना-स्थितियों में मेरा पथ-प्रदर्शन किया, और अपने अमूल्य परामर्शों से उसे सम्पन्न बनाया। पुनः मैं स्थानीय हस्तलेख-विशेषज्ञ श्री सी.ई. हार्डलेस का आभारी हूँ, जिनकी सहायता से मैंने हस्तलेखों के अनेक नमूनों का विश्लेषण किया है। इस ग्रंथ के लिखने में प्रयुक्त समस्त सामग्री के उन अधिकारियों के प्रति भी मैं आभार-प्रदर्शन करना चाहता हूँ, जिन्होंने अपनी वस्तुएँ निरीक्षण तथा उपयोग के लिए मुझे उदारतापूर्वक प्रदान कीं; विशेष रूप से मैं राजापुर, बाँदा के श्री मुन्नीलाल उपाध्याय तथा गोस्वामी जी के स्थान के अन्य अधिकारियों का कृतज्ञ हूँ, जिन्होंने तुलसीदास की उस प्रस्तर मूर्ति का प्रतिचित्र लेने दिया जो प्रस्तुत ग्रंथ के मुख पृष्ठ पर लगा हुआ है।

प्रकाशन के सम्बन्ध में मैं प्रयाग-विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर श्री पं. अमरनाथ झा जी का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जिन्होंने कृपा करके ‘थीसिस’ के प्रकाशन का मुझे अधिकार प्रदान किया तथा इस सम्बन्ध में हिन्दी परिषद को यूनिवर्सिटी की ओर से धन की भी सहायता प्रदान की; इस सहायता के बिना परिषद् के लिए इस ग्रंथ के मुद्रण कार्य को शीघ्र हाथ में लेना संभव न होता। अपने एम.ए. कक्षा के विद्यार्थियों, विशेष रूप से श्री रामसिंह तोमर, के प्रति भी मैं कृतज्ञता प्रकाश करना चाहता हूँ, जिन्होंने ‘थीसिस’ के कतिपय अंशों के अनुवाद करने, प्रूफ़-संशोधन और अनुक्रमणिका तैयार करने में मेरी बड़ी सहायता की है। अंत में मैं स्थानीय हिन्दी साहित्य प्रेस के मैनेजर तथा कर्मचारियों को धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिन्होंने भरसक पुस्तक को शुद्ध छापने में मेरे साथ पूर्ण सहयोग किया है। मुझे दुःख है कि युद्ध की अनिश्चित परिस्थितियों के कारण छपाई में जो थोड़ी जल्दी करनी पड़ी है उसके कारण छापे की भूलें कुछ न कुछ रह ही गई हैं। आशा है कि विज्ञ पाठक उन्हें शुद्धिपत्र देखकर शुद्ध कर लेंगे।

-माताप्रसाद गुप्त
हिन्दी विभाग,
प्रयाग विश्वविद्यालय,
2 मई, सन् 1942

द्वितीय संस्करण


पुस्तक के आकार-प्रकार में इस संस्करण में कम से कम परिवर्तन किया गया है। पिछले प्रायः तीन वर्षों से मैंने ‘रामचरितमानस’ के पाठ-निर्धारण की समस्या का अध्ययन किया है; उसके परिणामस्वरूप ‘कृतियों का पाठ’ शीर्षक अध्याय में तथा और भी कुछ स्थलों पर संशोधन करना पड़ा है, और नई सूचनाएँ जोड़नी पड़ी हैं, अन्यथा अधिकांश में अनुवाद की त्रुटियाँ और छपाई की भूलें ही ठीक करना आवश्यक प्रतीत हुआ है।
पिछले संस्करण की प्रस्तावना में मैंने लिखा था कि मेरा अनुमान है कि ‘रामचरितमानस’ की कथा का एक ‘आध्यात्मिक’ अर्थ भी है, जिसको अपने अध्ययन की अपूर्णता के कारण उस समय मैं नहीं प्रस्तुत कर सका था। आवश्यक अवकाश के अभाव में वह अध्ययन अब भी जहाँ का तहाँ है। यदि आगे कभी वह संतोषजनक रीति से पूर्ण हो सकेगा, तो अलग स्वतंत्र रचना के रूप में उसे प्रस्तुत करने का यत्न करूँगा।

प्रस्तुत पुस्तक का प्रथम संस्करण तीन वर्षों में ही समाप्त हो गया था; पिछले एक वर्ष से वह अप्राप्य रहा है। इसका कारण काग़ज़ तथा छपाई की असुविधा है। इस असुविधा को दूर करने में प्रांतीय पेपर कंट्रोलर तथा केंद्रीय अधिकारियों से जो सहायता प्राप्त हुई है, उसके लिए हमें उनका विशेष रूप से आभारी होना चाहिए। उनके अतिरिक्त हमें परिषद् के भी अधिकारियों का आभारी होना चाहिए जिन्होंने काग़ज़ की इस महँगाई के समय भी पुस्तक का मूल्य पूर्ववत् रखा है। हिन्दी साहित्य प्रेस ने इस बार भी पुस्तक की छपाई का भार लिया, और पूर्ण सहयोग के साथ उसका निर्वाह किया, इसलिए वह भी धन्यवाद का पात्र है। कुछ फ़र्मों का प्रूफ़ देखने में विश्वविद्यालय के पन्नालाल रिसर्च-स्कॉलर पं. उमाशंकर शुक्ल, एम.ए. ने मेरा हाथ बँटाया है, इसलिए उन्हें भी धन्यवाद है।

-माताप्रसाद गुप्त

तृतीय संस्करण


द्वितीय संस्करण में ग्रंथ में कम से कम परिवर्तन किया जा सका था, इसलिए जब जुलाई, 1952 में इसका वह संस्करण समाप्त हुआ, पूर्ववर्ती बारह वर्षों के तुलसीदास के अपने अध्ययन-अध्यापन में मेरी जो ज्ञान-वृद्धि हुई थी, उसका ग्रंथ में यथेष्ट रूप से समावेश और उसके अनुसार ग्रंथ का संशोधन परिवर्धन नितान्त आवश्यक हो गया। इस संशोधन-परिवर्तन का परिणाम यह हुआ कि ग्रंथ का वास्तविक आकार प्रायः सवाया हो गया। फिर भी ग्रंथ का मूल्य बढ़ाना प्रकाशकों को अभीष्ट नहीं था। इसलिए पृष्ठों की संख्या-वृद्धि के स्थान पर उनकी आकार-वृद्धि करके तथा अन्य संभव उपायों के द्वारा उस मूल्य-वृद्धि को रोका गया, जिसके लिए हमें प्रकाशकों का आभारी होना चाहिए।
इस संस्करण की नामानुक्रमणिका मेरे प्रिय छात्र श्री गायत्री प्रसाद शुक्ल, एम.ए. ने तैयार की है। इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ।
‘तुलसीदास’ के पाठकों को इस बार पुनः वर्ष भर से अधिक से इस संस्करण के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी है। काग़ज़ की विषम परिस्थितियाँ ही इस बार भी मुख्यतः विलंब की उत्तरदायिनी हैं। इसलिए पाठक क्षमा करेंगे।
छपाई में अधिक से अधिक शुद्धता चाहने पर भी भूलें अनेक रह गई हैं। पाठक उन्हें कृपया शुद्धि-पत्र देखकर शुद्ध कर लेंगे।
हिन्दी विभाग, प्रयाग विश्वविद्यालय

-माताप्रसाद गुप्त

चतुर्थ संस्करण


पिछले संस्करण के ग्यारह वर्षों बाद जब इस नए संस्करण के लिए मैंने पुस्तक उठाई, मुझे ऐसा ज्ञात हुआ कि रचना इस रूप में आ गई थी कि जिसमें घटाना-बढ़ाना उपयोगी न होता अतः इस संस्करण में पिछले संस्करण की ही समस्त सामग्री कुछ संशोधित रूप में जा रही है। उक्त संस्करण में मुद्रण की भूलें अवश्य बहुतेरी हो गई थीं, उन्हें दूर करने का यत्न किया गया है। आशा है कि यही पर्याप्त होगा।
हिन्दी विद्यापीठ, आगरा विश्वविद्यालय

-माताप्रसाद गुप्त

पंचम संस्करण


शोध के क्षेत्र में स्व. डॉक्टर माताप्रसाद गुप्त का महत्वपूर्ण स्थान है और ‘तुलसीदास’ उनके शोध कार्यों की श्रृंखला में प्रथम महत्वपूर्ण योगदान है। इसकी गणना आलोचना और शोध के मानक गंथों में की जाती है और हिन्दी के प्रायः सभी विद्वान तथा उच्च कक्षाओं के विद्यार्थी इस ग्रंथ से सुपरिचित हैं। इसका पाँचवा संस्करण आज तब प्रकाशित हो रहा है जब कि डॉ. गुप्त कीर्तिशेष हो चुके हैं अतः इसमें किसी नई सामग्री का समावेश नहीं किया जा सका है। इसके पिछले संस्करण में मुद्रण सम्बन्धी अनेक भूलें रह गई थीं जिनसे प्रस्तुत संस्करण को मुक्त कराने का श्रेय प्रेस को है।
हिन्दी विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय

-लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय
प्रोफ़ेसर तथा अध्यक्ष

भूमिका


1.    तुलसीदास और उनकी कृतियों का अध्ययन हिन्दी साहित्य के अध्ययन का एक सर्व-प्रमुख  अंग रहा है। आलोचनात्मक परिपाटी पर इस अध्ययन का आरंभ कब से होता है, उसका विकास किस प्रकार होता है, उसके विकास में प्रमुख रूप से किन महानुभावों के हाथ लगते हैं, वे इस अध्ययन को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं अब भी कवि के जीवन और कृतियों से संबंधित कौन-कौन सी दिशाएँ ऐसी हैं जिनमें मौलिक कार्य करने की विशेष आवश्यकता है और उन दिशाओं में अध्ययन के लिए हमें किस प्रकार आगे बढ़ना चाहिए, ये ही इस अध्याय के विषय हैं।


2.    पूर्ववपर्ती अध्ययन

इस परिपाटी के अध्ययन का एक प्रकार से श्री गणेश करने वाले स्वर्गीय एच.एच. विल्सन की रचनाओं का अध्ययन संभवतः न किया होगा, पर आपके बाद कई लेखकों ने जो तुलसीदास का अध्ययन हमारे सामने उपस्थित किया, उसमें दिए हुए जीवन-वृत्त के प्रमुख आधार आप ही थे। ‘ए स्केच आव् दि रेलिजस सेक्ट्स आव् दि हिंदूज़’ नामक आपका वह निबंध जिसमें हमारे कवि का उल्लेख हुआ था, पहले-पहल सं. 1888 में ‘एशियाटिक रिसर्चज़’ में1 प्रकाशित हुआ था। कवि के जीवन-वृत्त से सम्बन्ध रखनेवाली आपकी सूचना नाभादासजी के छप्पय और उस पर प्रियादासजी की टीका के अतिरिक्त कुछ जनश्रुतियों के आधार पर निर्मित है। इस सूचना में कवि की जाति, जन्म-स्थान, काशी में कार्यक्षेत्र, गुरु-परंपरा, जन्म-काल, देहावसान-तिथि और रचनाओं पर कुछ प्रकाश डाला गया है। तुलसीदास का अध्ययन आपके निबंध था मुख्य विषय न होने के कारण यद्यपि हमें यह आशा न करनी चाहिए कि जन-श्रुतियों के संग्रह करने में आपने कोई विशेष श्रम किया होगा, फिर भी वे हमारे लिए महत्व की हैं, क्योंकि एक तो वे पीछे संकलिक हुई जन-श्रुतियों से कुछ भिन्न हैं और दूसरे इतनी प्राचीन हैं कि इनसे पहले किसी भी आलोचनात्मक दृष्टि संपन्न व्यक्ति द्वारा संकलित की हुई जन-श्रुतियाँ इस समय अप्राप्य हैं।

3.    हिंदी और हिंदुस्तानी के कदाचित् प्रथम इतिहास-लेखक स्वर्गीय गार्सा द तासी ने सं. 1896 में अपने जिस महत्वपूर्ण इतिहास ‘इस्वार द ला लितरेच्योर इंदुई ए इंदुस्तानी’ का पहला खंड प्रकाशित किया, उसमें2 आपने हमारे कवि का परिचय देते हुए उपर्युक्त विल्सन साहब का ही आश्रय लिया। इस इतिहास के परिवर्द्धित और संशोधित संस्करण में, जो सं. 1927-28 में प्रकाशित हुआ, आपने कवि के ग्रन्थों और उनकी प्रतियों के सम्बन्ध में कुछ नवीन सामग्री अवश्य उपस्थित की, पर उसका जीवन-वृत्त ज्यों का त्यों रखा।
1.    जिल्द 16, पृ. 48।
2.    पृ. 516।

4.    इन प्राथमिक अध्ययन-कर्ताओं में एक और भी अधिक स्मरणीय नाम है स्वर्गीय एफ़.एस. ग्राउस महोदय का, जिन्होंने कवि की सबसे अधिक महत्वपूर्ण रचना ‘रामचरितमानस’ का कई वर्षों के निरंतर परिश्रम के अनंतर अंग्रेज़ी अनुवाद करके हमारे कवि का यश पाश्चात्य देशों में फैलाने का प्रयत्न किया। इस ओर आपका पहला प्रयास सं. 1933 में दिखाई पड़ा, जब ‘दि प्रोलॉग टु दि रामायण आव् तुलसीदास : ए स्पेसिमेन आव् ट्रांसलेशन’ नामक आपका लेख एशियाटिक सोसाइटी आव् बेंगाल के जनरल में1 प्रकाशित हुआ। पूरे ग्रंथ का अनुवाद दो खंडों में सं. 1934 से 1938 तक निकलता रहा। इस अनुवाद की भूमिका में आपने जो कवि का जीवन-वृत्त दिया है, वह विल्सन साहब की ही सूचना के आधार पर है, पर उक्त सूचना का उपयोग आपने सावधानी से किया है और उसकी कुछ भूलों पर भी आपने दृष्टिपात किया है।

5.    सं. 1934 में लिखने वाले ‘शिवसिंह सरोज’ के लेखक स्वर्गीय श्री शिवसिंह सेंगर का नाम भी उल्लेखनीय है। ‘सरोज’ में पहले2 हमारे कवि के सम्बन्ध में लिखते हुए आपने उसका एक संक्षिप्त जीवन-वृत्त दिया और फिर अन्यत्र3 किन्हीं पस्-कानिवासी बेनीमाधव दास द्वारा रचित एक बृहत् ‘गोसाईं-चरित्र’ की सूचना दी, जिसे आपने लिखा कि आपने देखा था। फिर भी आपने यह नहीं लिखा कि कवि का जो जीवन-वृत्त आपने दिया है, वह इस ‘गोसाईं चरित्र’ के आधार पर दिया गया था अथवा स्वतंत्र रीति से और न आपने उक्त ‘गोसाईं-चरित्र’ के प्राप्ति स्थान का निर्देश किया। परिणाम यह हुआ कि कवि के प्रेमियों में उक्त ‘चरित्र’ के देखने की उत्सुकता जगाकर आपने उसके समाधान का कोई मार्ग नहीं दिखाया।

कदाचित् इसीलिए आपके परवर्ती लेखकों ने यद्यपि आपकी ‘चरित्र’ विषयक सूचना का उल्लेख तो किया, पर आपके लिखे हुए कवि के जीवन-वृत्त को कोई महत्व नहीं दिया। इस सम्बन्ध में विशेष उल्लेख-योग्य सर जार्ज ग्रियर्सन हैं, जिन्होंने अपना ‘मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर आव् हिंदोस्तान’ लिखते समय आपके ‘सरोज’ का पूरा उपयोग किया, पर उसी में कवि का जीवन-वृत्त देते हुए—कदाचित् अपने स्वतंत्र अनुसंधानों से आपके उल्लेखों का विरोध देखने पर—आपके निष्कर्षों का उल्लेख भी नहीं किया।



6.    यशस्वी स्वर्गीय सर जार्ज ए. ग्रियर्सन की सेवाओं की इस क्षेत्र में तुलना नहीं हो सकती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आपने हमारे महाकवि के जीवन और रचनाओं के सम्बन्ध में पहले-पहल अनुसंधान किया और यह दुःख का विषय है कि उस दृष्टिकोण का परिचय पीछे आने वाले विद्वानों ने नहीं दिया। इस दिशा में आपने पहला उल्लेख-योग्य प्रयास सं. 1942 में किया, जब वेन की अन्तर्राष्ट्रीय ओरिएंटल कांगरेस के सामने4 आपने ‘हिंदुस्तान का मध्यकालीन साहित्य, विशेष रूप से तुलसीदास’ विषयक अपना सारगर्भित निबंध पढ़ा। इस लेख में आपने हमारे कवि के जीवन, उसकी कृतियों और विचारों पर पर्याप्त नया प्रकाश डाला। पीछे सं. 1946 में प्रकाशित होने वाले अपने ‘मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर आव् हिंदोस्तान’ नामक ग्रंथ में1।
1.    पृ. 1।
2.    पृ. 427।
3.    पृ. 432।
4.    ‘आरीशे’ खंड, पृ 179।


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