क्रान्तिकारी कोश भाग 1 - श्रीकृष्ण सरल Krantikari Kosh Part 1 - Hindi book by - Shrikrishna Saral
लोगों की राय

कोश-संग्रह >> क्रान्तिकारी कोश भाग 1

क्रान्तिकारी कोश भाग 1

श्रीकृष्ण सरल

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :300
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 328
आईएसबीएन :81-7315-232-2

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

444 पाठक हैं

भूले बिसरे क्रान्तिकारियों को समर्पित ग्रंथ

Krantikari Kosh Part 1 - A Hindi Book by - Shrikrishna Saral क्रान्तिकारी कोश भाग 1 - श्रीकृष्ण सरल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह ग्रंथ समर्पित है उन सभी क्रांतिवीरों को, जिन्होंने मातृभूमि को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करने हेतु अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया तथा उन भूले-बिसरे क्रांतिवीरों को, जिन्हें इस ग्रंथ में सम्मिलित नहीं किया जा सका।

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है। भारत की धरती के प्रति जितनी भक्ति और मातृ-भावना उस युग में थी, उतनी कभी नहीं रही। मातृभूमि की सेवा और उसके लिए मर-मिटने की जो भावना उस समय थी, आज उसका नितांत अभाव हो गया है।

क्रांतिकारी आंदोलन का समय सामान्यतः लोगों ने सन् 1857 से 1942 तक माना है। मेरा विनम्र मत है कि इसका समय सन् 1757 अर्थात् प्लासी के युद्ध से सन् 1961 अर्थात् गोवा मुक्ति तक मानना चाहिए। सन् 1961 में गोवा मुक्ति के साथ ही भारतवर्ष पूर्ण रूप से स्वाधीन हो सका है।

जिस प्रकार एक विशाल नदी अपने उद्गम स्थान से निकलकर अपने गंतव्य अर्थात् सागर मिलन तक अबाध रूप से बहती जाती है और बीच-बीच में उसमें अन्य छोटी-छोटी धाराएँ भी मिलती रहती हैं, उसी प्रकार हमारी मुक्ति गंगा का प्रवाह भी सन् 1757 से सन् 1961 तक अजस्र रहा है और उसमें मुक्ति यत्न की अन्य धाराएँ भी मिलती रही हैं।

सशस्त्र क्रांति की विशेषता यह रही है कि क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयास कभी शिथिल नहीं हुए। अपनी प्रमुख विशेषताओं और प्रवृत्तियों के कारण हम पूरे क्रांतिकारी आंदोलन का काल-विभाजन तथा उसका नामकरण भी कर सकते हैं।
युद्ध संगठन युग

प्लासी का युद्ध (सन् 1757)


प्लासी का युद्ध अंग्रेजों और बंगाल के शासक सिराजुद्दौला के बीच सन् 1757 में लड़ा गया था। यह युद्ध केवल आठ घण्टे चला और कुल तेईस सैनिक मारे गए। युद्ध में सिराजुद्दौला की ओर से मीर जाफर ने गद्दारी की और रॉबर्ट क्लाइव ने उसका भरपूर लाभ उठाया। प्लासी-विजय के पश्चात् भारतवर्ष में ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ गई।

बंगाल का प्रथम सैनिक विद्रोह (सन् 1764) नए फौजी नियमों के विरोध में थल सेना ने बगावत कर दी। मेजर मनरो ने ब्रिटिश सेना के बल पर घमासान युद्ध के पश्चात् विद्रोह को दबा दिया। जो विद्रोही जीवित हाथ लगे, उन्हें तोपों के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया।

जंगल महाल विद्रोह (सन् 1767)


गद्दार मीर जाफर ने बंगाल के कुछ जिलों की जमींदारियाँ अंग्रेजों को दे दीं। इनमें से कुछ जिलों में अत्याचारों के विरोध में अंग्रेज विरोधी लहर उत्पन्न हो गई।
जंगल महाल के जमींदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। मेजर फर्ग्यूसन को विद्रोहियों के साथ कई स्थानों पर युद्ध करना पड़ा। विद्रोही जमींदार जंगलों में छिप-छिपकर सशस्त्र प्रतिरोध करते रहे। झाड़ग्राम के जमींदार ने भी विद्रोह कर दिया। मेजर फर्ग्यूसन ने कड़े संघर्ष के पश्चात् झाड़ग्राम दुर्ग पर अधिकार कर लेने में सफलता प्राप्त की।
घाटशीला के जमींदार ने कड़ा संघर्ष किया। उसके चुआड़ सैनिकों ने अंग्रेजी सेना को भयंकर क्षति पहुँचाई।
वीरभूम के जमींदार आसद खाँ ने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया। मेजर यार्क ने उसपर विजय प्राप्त की। इस प्रकार मिदनापुर, वीरभूम और बर्दवान जिले कंपनी सरकार के अधीन हो गए।

संन्यासी एवं फकीर विद्रोह (सन् 1763 से 1773 तक)


बंगाल में संन्यासियों और फकीरों के अलग-अलग संगठन थे। पहले तो इन दोनों संगठनों ने मिलकर अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया; लेकिन बाद में उन्होंने पृथक्-पृथक् रूप से विरोध किया। संन्यासियों में उल्लेखनीय नाम हैं—मोहन गिरि और भवानी पाठक तथा फकीरों के नेता के रूप में मजनूशाह का नाम प्रसिद्ध है। ये लोग पचास-पचास हजार सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना पर आक्रमण करते थे। अंग्रेजों की कई कोठियाँ इन लोगों ने छीन लीं और कई अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। अंततोगत्वा संन्यासी विद्रोह और फकीर विद्रोह—दोनों ही दबा दिए गए।

बंगाल का द्वितीय सैनिक विद्रोह (सन् 1795)


बंगाल की पंद्रहवीं बटालियन को आदेश मिला कि वह ‘हमलक’ के स्थान पर पहुँच जाए। बटालियन वहाँ पहुँच गई। वहाँ पर उस बटालियन को बताया गया कि उसे जहाज पर चढ़कर यूरोप जाना है। यूरोप में इस बटालियन को डच लोगों के साथ युद्ध करना था। भारतीय सैनकों ने जहाज पर चढ़ने से इनकार कर दिया। उनमें से कुछ को गोलियों से भून दिया गया और कुछ को तोपों के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया।

वेल्लौर का सैनिक विद्रोह (सन् 1803)


वेल्लौर स्थित मद्रासी सेना ने भी अंग्रेजों के विरुद्र विद्रोह कर दिया। वह विद्रोह नंदी दुर्ग, सँकरी दुर्ग आदि स्थानों तक फैल गया। इसी विद्रोह के फलस्वरूप लॉर्ड विलियम वेंटिक को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

चुआड़ विद्रोह (सन् 1718 से 1820 तक)


चुआड़ बंगाल की एक वन्य जाति थी। चुआड़ विद्रोह इसी वन्य जाति का विद्रोह था। यह जाति जंगल महाल जिले के भिन्न-भिन्न परगनों में रहती थी। कई स्थानों पर चुआड़ वीरों ने अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंका। बाद में संगठित होकर अंग्रेजी सेना ने बड़ी निर्ममता से इस विद्रोह का दमन कर दिया। ‘रानी शिरोमणि’ नाम की एक महिला विद्रोही ने भी अच्छी वीरता का प्रदर्शन किया। बाद में वह बंदी बना ली गई।

नायक विद्रोह (सन् 1821)


इसी समय बगड़ी राज्य की नायक जाति ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया। अचलसिंह इस जाति का नेता था। गनगनी नामक स्थान पर अचल सिंह और अंग्रेज अफसर ओकेली की सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। दोनों ओर से बहुत जनहानि हुई। एक गद्दार के छल से अचलसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।

बैरकपुर का प्रथम सैनिक विद्रोह (सन् 1824)


यह नायक विद्रोह और बहावी विद्रोह के बीच की कड़ी है। बंगाल रेजीमेंट को आदेश मिला कि वह बैलों की पीठ पर बैठकर हुगली नदी पार करें। रेजीमेंट ने यह आदेश मानने से इनकार कर दिया। सारे सैनिकों को निहत्था करके भून डाला गया।

बहावी विद्रोह (सन् 1824 से 1831 तक)


बहावी आंदोलन धार्मिक परिवेश में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एक विद्रोहात्मक प्रयास था। बहावियों का विश्वास था कि यदि हमने अंग्रेजी शासन को नहीं उखाड़ा तो वह हमको उखाड़ देगा। इस आंदोलन के नेता सैयद अहमद ने इसका समुचित प्रसार किया। इसके एक अन्य नेता का नाम तीतू मियाँ था।
कई लड़ाइयों में अंग्रेजी सेनाओं की पराजय हुई। आखिर यह आंदोलन दबा दिया गया।

गुजरात का महीकांत विद्रोह (सन् 1836)


वैसे तो पूरे गुजरात में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की हवा चल रही थी; पर महीकांत में यह विद्रोह भड़ककर तीव्र हो गया। इस विद्रोह का दृढ़ता के साथ दमन कर दिया गया।

धर राव विद्रोह (सन् 1841)


इस विद्रोह का सूत्रपात सतारा के महाराज छत्रपति प्रतापसिंह को राज्यच्युत करने के साथ हुआ। इस विद्रोह का संगठन धर राव पँवार ने किया। बदामी दुर्ग पर अधिकार कर लिया गया। अंग्रेजी सेना ने प्रत्याक्रमण करके दुर्ग को वापस ले लिया और विद्रोहियों को कड़े दंड दिए।

कोल्हापुर विद्रोह (सन् 1844)


अंग्रेजों ने दाजी कृष्ण पंडित नाम के एक नए कर्मचारी की राज्य में नियुक्ति करके उसके द्वारा दोनों राजकुमारों को कैद करने का षड़्यंत्र रचा। प्रजा सजग हो गई और अंग्रेज अफसरों को ही कैद किया जाने लगा। कई किले अंग्रेजों से छीन लिए गए। अंग्रेजी खजाने लूट लिये गए। अंग्रेज रक्षक मार डाले गए। कर्नल ओवांस को कैद कर लिया गया। बड़ी मुश्किल से संगठित होकर अंग्रेजों ने विद्रोह का दमन किया।

संथाल विद्रोह (सन् 1854 से 1855 तक)


संथाल जाति बंगाल और बिहार में फैली हुई थी। एक बार अंग्रेजी कुप्रबंध के कारण चीजें महँगी हो गईं। तीस हजार संथाल अपनी प्रार्थना लेकर कलकत्ता के लिए प्रस्थित हुए। उनका नेता सिद्धो था। दल में स्त्रियाँ और बच्चे भी थे। एक झगड़े में संथालों ने एक पुलिस इंस्पेक्टर को मार डाला। फौज भेजी गई। फौज ने हजारों संथालों को मार डाला और विद्रोह का दमन कर दिया गया।

सन् 1855 का सैनिक विद्रोह


यह सैनिक विद्रोह निजाम हैदराबाद की फौज की तृतीय घुड़सवार सेना ने किया था। इस विद्रोह को दबाने में ब्रिगेडियर मैकेंजी के शरीर पर दस घाव लगे। मुश्किल से उसकी जान बच पाई। बड़ी फौज भेजकर विद्रोह दबा दिया गया।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (सन् 1857)


सीमित पृष्ठों में इतने बड़े स्वाधीनता संग्राम का विवरण देना संभव नहीं है। यहाँ तो उसकी गणना मात्र कराई जा रही है। अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में यह युद्ध लड़ा गया। कई रियासतों ने गद्दारी की और क्रांतिकारी सेना का साथ नहीं दिया। कई स्थानों पर अंग्रेजों की बुरी तरह पराजय हुई; पर अंत में विजय उन्हीं की हुई। महारानी लक्ष्मीबाई ने लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त की। इस स्वाधीनता संग्राम में एक लाख से ऊपर क्रांतिकारी सैनिक मारे गए।

नील विद्रोह (सन् 1850 से 1860 तक)


बंगाल और बिहार में नील की खेती की जाती थी। नील की खेती से अंग्रेज बनिये खूब धन कमाते थे और वे संथाल मजदूरों का भरपूर शोषण करते थे। आखिरकार संथाल मजदूरों और कृषकों ने विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों की कई कोठियाँ जल गईं और कई अंग्रेज मार डाले गए। विद्रोह दबा दिया गया; लेकिन मजदूरों का शोषण बंद हो गया।

कूका विद्रोह (सन् 1872)


कूके लोग सिखों के नामधारी संप्रदाय के लोग थे। इन लोगों के सशस्त्र विद्रोह को ‘कूका विद्रोह’ के नाम से पुकारा जाता है। गुरु रामसिंहजी के नेतृत्व में कूका विद्रोह हुआ। कूके लोगों ने पूरे पंजाब को बाईस जिलों में बाँटकर अपनी समानांतर सरकार बना डाली। कूके वीरों की संख्या सात लाख से ऊपर थी। अधूरी तैयारी में ही विद्रोह भड़क उठा और इसी कारण वह दबा दिया गया।

वासुदेव बलवंत फड़के के मुक्ति प्रयास (सन् 1875 से 1879)


वासुदेव बलवंत फड़के का क्षेत्र महाराष्ट्र था। उसने रामोशी, नाइक, धनगर और भील जातियों को संगठित करके उनकी एक सुसज्जित सेना बना डाली। अंग्रेजी सेना के विरुद्ध उसने कई सफल लड़ाइयाँ लड़ीं। ब्रिटिश शासन के लिए वह आतंक बन गया। किसी देशद्रोही ने उसे सोते में गिरफ्तार करा दिया। उसे आजीवन कारावास का दंड देकर अदन की जेल में बंद कर दिया गया। वहीं उसका प्राणांत हुआ।
वासुदेव बलवंत फड़के के साथ ही आमने-सामने के और छापामार युद्धों का युग समाप्त हो गया।

गोपनीय क्रांति संगठन युग
चाफेकर संघ (सन् 1897 के आसपास)


महाराष्ट्र के पूना नगर में दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वासुदेव हरि चाफेकर नाम के तीन सगे भाइयों ने एक संघ की स्थापना की और युवकों को अर्द्ध-सैनिक प्रशिक्षण देकर ब्रिटिश साम्रज्य के विरुद्ध उन्हें तैयार किया। इन लोगों को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का संरक्षण प्राप्त था। 22 जून, 1897 को उन्होंने पूना के अत्याचारी प्लेग कमिश्नर मि. रैंड और एक पुलिस अधिकारी मि. आयरिस्ट को गोलियों से भून डाला। इस कांड में दोनों चाफेकर बंधुओं को फाँसी का दंड मिला। सबसे छोटे भाई वासुदेव हरि चाफेकर को भी मुखबिर की हत्या के अपराध में फाँसी का दंड मिला।

बंग-भंग आंदोलन (सन् 1905)


बंगाल में स्वदेशी आंदोलन पहले से ही चल रहा था। इसके अंतर्गत विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करके स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा था। इसी बीच भारत के वाइसराय लॉर्ड कर्ज ने बंगाल प्रांत के विभाजन की घोषणा कर दी। इस घोषणा से सारा बंगाल भड़क उठा और गोपनीय क्रांतिकारी समितियाँ सक्रिय हो उठीं। अत्याचारी अंग्रेजों के विरुद्ध बमों और पिस्तौलों का उपयोग होने लगा। यह आंनदोलन केवल बंगाल तक सीमित न रहकर समस्त भारत की आजादी का आंदोलन बन गया।

यूरोप में भारतीय क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयास (सन् 1905 के आसपास)


भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान् श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना करके उसे भारतीय क्रांतिकारियों का केंद्र बना दिया। उनके सहयोगी थे विनायक दामोदर सावरकर, जो बाद में ‘वीर सावरकर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्हीं के एक नौजवान साथी मदनलाल धींगरा ने एक अत्याचारी अंग्रेज अफसर को लंदन में गोली मारकर फाँसी का दंड प्राप्त किया। उस समय लंदन में कई भारतीय क्रांतिकारी सक्रिय थे, जिनमें लाला हरदयाल का नाम प्रमुख है।
फ्रांस में भी भारतीय क्रांतिकारी सक्रिय हो उठे। वहाँ मदाम कामा और सरदारसिंह राणा ने अच्छा-खासा क्रांतिकारी संगठन खड़ा कर डाला।
जर्मनी में भी ‘बर्लिन कमेटी’ नाम से भारतीय क्रांतिकारियों का एक संगठन कार्य करने लगा।
अमेरिका तथा कनाडा में गदर पार्टी (प्रथम विश्वयुद्ध के आगे-पीछे)
अमेरिका और कनाडा पहुँचनेवाले प्रवासी भारतीयों ने सन् 1907 में ‘हिंदुस्तान एसोसिएशन’ नाम की एक संस्था स्थापित की। सन् 1913 में कनाडा के सान फ्रांसिस्को नगर में ‘गदर पार्टी’ नाम की एक महत्त्पूर्ण संस्था स्थापित की गई। इस संस्था का मुखपत्र ‘गदर’ दुनिया के कई देशों में निःशुल्क भेजा जाता था। गदर पार्टी के संस्थापकों में लाला हरदयाल, सोहनसिंह भकना, भाई परमानंद, पं. परमानंद, करतारसिंह सराबा और बाबा पृथ्वीसिंह आजाद प्रमुख थे। इस पार्टी के हजारों सदस्य भारत को आजाद कराने के लिए जहाजों द्वारा भारत पहुँचे। ये लोग पूरे पंजाब में फैल गए और अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध गोपनीय कार्य करने लगे। गद्दारी के दुष्परिणाम से यह आंदोलन भी दबा दिया गया। सैकड़ों लोग गोलियों से भून दिए गए और सैकड़ों को फाँसी पर लटका दिया गया।

विप्लववादी युग
रासबिहारी बोस की क्रांति चेष्टा


जब गोपनीय क्रांति समितियों द्वारा भारत की आजादी के प्रयास सफल नहीं हुए तो कुछ क्रांतिकारियों का ध्यान इस ओर गया कि सेना के बिना स्वाधीनता प्राप्त करना संभव नहीं है। सेना का निर्माण संभव नहीं था। इस बात का प्रयत्न किया गया कि अंग्रेजों के अधीन भारतीय सेनाओं को विप्लव के लिए भड़काया जाए और आजादी की दिशा में प्रयत्न किए जाएँ। महान् क्रांतिकारी रामबिहारी बोस इस योजना के सूत्रधार थे। इस कार्य के लिए सेनाओं को तैयार कर लिया गया; लेकिन कृपालसिंह नाम के एक गद्दार ने भेद देकर सारी योजना पर पानी फेर दिया। कई क्रांतिकारियों को फाँसी का उपहार मिला।

हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ (सन् 1915 के आसपास)


रासबिहारी बोस के लेफ्टीनेंट शचींद्रनाथ सान्याल ने समस्त उत्तर भारत में एक सशक्त क्रांति संगठन खड़ा कर दिया। इस संगठन की सेना के विभागाध्यक्ष रामप्रसाद बिस्मिल थे। इस संघ ने कई महत्त्पूर्ण कार्य किए; लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य ने इसके कार्य को विफल कर दिया।
सशस्त्र क्रांति का प्रगतिशील युग
इस युग को ‘भगतसिंह-चन्द्रशेखर आजाद युग’ के नाम से जाना जाता है। भगतसिंह क्रांतिपथ के मील के पत्थर की भाँति थे। इन लोगों ने ‘हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ कर दिया। इनके प्रगतिशील कार्य थे—
1.    अखिल भारतीय स्तर पर क्रांति संगठन खड़ा करना।
2.    क्रांति संगठन को धर्मनिरपेक्ष स्वरूप प्रदान करना।
3.    समाजवादी समाज की स्थापना का संकल्प करना।
4.    क्रांतिकारी आंदोलन को जन आंदोलन का स्वरूप प्रदान करना।
5.    महिला वर्ग को क्रांति संगठन में प्रमुख स्थान प्रदान करना।
इस युग में भारत की आजादी के लिए जो प्रयत्न किए गए, वे अहिंसात्मक आंदोलनकारियों और क्रांतिकारियों द्वारा मिलजुलकर किए गए। इस आंदोलन के दो प्रमुख चरण थे

अगस्त क्रांति (सन् 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’)


सन् 1942 में व्यापक जनक्रांति फूट पड़ी। ब्रिटिश शासन ने 9 अगस्त सन् 1942 को महात्मा गाँधी और सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया। गाँधी जी द्वारा ‘करो या मरो’ का नारा दिया जा चुका था। नेताविहीन आंदोलनकारियों की समझ में जो आया, वही उन्होंने किया। सशस्त्र क्रांति के समर्थक, जो ‘सत्याग्रह आंदोलन’ में विश्वास नहीं रखते थे, वे भी इस आंदोलन में कूद पड़े और तोड़-फोड़ का कार्य करने लगे। संचार व्यवस्था भंग करने के लिए तार काट दिए गए और सेना का आवागमन रोकने के लिए रेल की पटरियाँ उखाड़ी जाने लगीं। ब्रिटिश शासन ने निर्ममतापूर्वक इस आंदोलन को कुचल डाला। हजारों लोग गोलियों के शिकार हुए

दक्षिण-पूर्व एशिया में आजाद हिंद आंदोलन


द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों से ही भारत के क्रांतिकारी नेता सुभाषचंद्र बोस अपनी योजना के अनुसार ब्रिटिश जासूसों की आँखों में धूल झोंककर अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी जा पहुँचे। जब विश्वयुद्ध दक्षिण-पूर्व एशिया में उग्र हो उठा और अंग्रेज जापानियों से हारने लगे, तो सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से जापान होते हुए सिंगापुर पहुँच गए तथा आजाद हिंद आंदोलन के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिये। उन्हें ‘नेताजी’ के संबोधन से पुकारा जाने लगा। आजादहिंद आंदोलन के प्रमुख अंग थे—आजाद हिंद संघ, आजाद हिंद सरकार, आजाद हिंद फौज, रानी झाँसी रेजीमेंट, बाल सेना, आजाद हिंद बैंक और आजाद हिंद रेडियो।
आजाद हिंद फौज ने कई लड़ाइयों में अंग्रेजी सेनाओं को परास्त किया तथा मणिपुर एवं कोहिमा क्षेत्रों तक पहुँचने और भारतभूमि पर तिरंगा झंडा फहराने में सफलता प्राप्त की।
अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी नगरों पर परमाणु बम छोड़ देने और भारी तबाही के कारण जापान ने हथियार डाल दिए। स्वाभाविक ही था कि नेताजी सुभाष द्वारा भारत की आजादी के लिए किए जा रहे प्रयत्नों का पटाक्षेप हो गया। आजाद हिंद फौज के बड़े-बडे़ अफसरों को गिरफ्तार करके भारत लाया गया और उन पर मुकदमे चलाए गए। नेताजी सुभाष के विषय में सुना गया कि मोरचा बदलने के क्रम में विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण 18 अगस्त, 1945 को फारमोसा द्वीप के ताइहोकू स्थान पर उनकी मृत्यु हो गई।

नौसैनिक विद्रोह (सन् 1946)


नेताजी सुभाषचंद्र बोस बार-बार यह कहा करते थे कि हम नहीं कह सकते कि भारत की आजादी देखने के लिए हममें से कौन-कौन बचेगा; पर यह निश्चित है कि निकट भविष्य में ही भारत को आजादी मिलेगी और वह आजाद हिंद फौज के प्रभाव से मिलेगी। नेताजी की यह भविष्यवाणी पूर्ण रूप से सत्य निकली।
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर शाही भारतीय नौसेना के बेड़े भारत लौट रहे थे। शाही भारतीय नौसेना का एक जहाज उन दिनों अराकान में था। जहाज के कर्मचारी और अधिकारी जब नगर भ्रमण के लिए निकले तो कुछ प्रवासी भारतीय उन्हें बाजार में मिल गए। परिचय होने पर उन प्रवासी भारतीयों से नौसैनिकों को यह कहकर प्रताड़ित किया—
‘आप लोगो को धिक्कार है कि आप भारत मुक्ति के लिए न लड़कर उसकी गुलामी को स्थायी करने के लिए लड़े और आप लोगों ने दूसरे स्वतंत्र देशों को भी गुलाम बनाने में अंग्रेजों की सहायता की। आप लोगों से तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज लाख गुना अच्छी निकली, जो भूखी और अधभूखी रहकर अपने देश की आजादी के लिए लड़ी। आप लोगों को तो विजय की खुशी मनाने के स्थान पर चुल्लू-भर पानी में डूब मरना चाहिए।

 


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book