क्रान्तिकारी कोश भाग 2 - श्रीकृष्ण सरल Krantikari Kosh Part 2 - Hindi book by - Shrikrishna Saral
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क्रान्तिकारी कोश भाग 2

श्रीकृष्ण सरल

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :320
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 329
आईएसबीएन :81-7315-233-0

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अमेरिका तथा कनाडा में गदर पार्टी तथा प्रथम विश्व युग के क्रान्तिकारियों का वर्णन

Krantikari Kosh Part 2 - A Hindi Book by - shrikrishna saral क्रान्तिकारी कोश भाग 2 - श्रीकृष्ण सरल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रान्तिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। सामान्यतयः भारतीय स्वतंत्र्य आन्दोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है ;किन्तु प्रस्तुत ग्रन्थ में इसकी काल सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गयी है। लगभग 200 वर्ष की इस क्रान्ति यात्रा में उद्भट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग तपस्या की हजारों प्रतिमाएं साकार हुई। इनके अलावा राष्ट्र भक्त कवि, लेखक, कलाकार, विद्वान और साधक भी इसी के परिणाम पुष्प है। पाँच खण्डों में विभक्त 1500 से अधिक पृष्ठों का यह ग्रन्थ क्रान्तिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है। क्रान्तिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है। लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रान्तिकारियों के चित्र मिल सके, उनके रेखाचित्र दिये गये है। किसी भी क्रान्तिकारी का परिचय ढूढ़ने की सुविधा हेतु पाँचवे खण्ड के अन्त में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खण्डों की) भी दी गयी है। भविष्य में इस विषय में कोई भी लेखन इस प्रामाणिक ग्रन्थ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा।

भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी

अतीन राय, प्रबोध विश्वास, मोहिनी भट्टाचार्य, शिशिर घोष, सुरेश चक्रवर्ती

फोन की घंटी बजी और दुकानदार ने चोंगा उठाकर अपने कान से लगाया। आवाज सुनाई दी—
‘‘हैलो ! क्या सेठ साहब है ?’’
चोंगा कान से लगाने वाले ने उत्तर दिया—
‘‘हाँ, मैं सेठ बोल रहा हूँ। आप कौन हैं और कहाँ से बोल रहे हैं ?’’
उत्तर मिला।
मैं शंभूनाथ पंडित रोड, भवानीपुर, कलकत्ता से दलाल बोल रहा हूँ।’’
‘‘अच्छा ! अच्छा ! कहिए, क्या समाचार हैं ?’’
‘‘समाचार यह है कि पुराने चावल यहाँ उपलब्ध हैं। यदि लेना हो तो जल्दी आ जाएँ। ग्राहक बहुत हैं।’’
‘‘अच्छा-अच्छा ! आप वहाँ हमारी प्रतीक्षा कीजिए।’’ सेठ ने फोन का चोंगा रख दिया और अंदर चला गया। अंदर कुछ कारीगर अगरबत्तियाँ बनाने में व्यस्त थे। सेठ ने उनके पास जाकर धीरे से कहा—‘‘पुराने चावल शंभूनाथ पंडित रोड पर बिक रहे हैं। क्या खरीदना चाहते हो ?’’ अगरबत्तियाँ बनाने वाले कारीगर संकेत समझ गए और उनके चेहरों पर प्रसन्नता दौड़ गई। वे सभी क्रांतिकारी थे और सेठ भी। संकेत का अर्थ था—‘हमारा पुराना दुश्मन वसंतकुमार चटर्जी इस समय यहाँ है।’ फोन करनेवाला दलाल भी इसी दल का एक क्रांतिकारी सदस्य था।

    बिना देर किए हुए क्रांतिकारियों ने एक टैक्सी की और भवानीपुर के शंभूनाथ पंडित रोड के चौराहे पर पहुँच गए। उन्होंने टैक्सी छोड़ दी। उन्हें अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी कि दलाल उनके पास पहुँच गया। उसने बताया कि पास की गली में एक बड़ी चोरी हो गई है, उसी की जाँच करने के लिए डिप्टी सुपरिंटेंडेंट पुलिस वसंतकुमार चटर्जी एक अंगरक्षक के साथ वहाँ उपस्थित हुआ है। सेठ और दलाल नामधारी क्रांतिकारियों को मिलाकर कुल पाँच क्रांतिकारी उस समय वहाँ उपस्थित थे । वे थे—सुरेश चक्रवर्ती, प्रबोध विश्वास, अतीन राय, शिशिर घोष तथा मोहिनी भट्टाचार्य। योजना बन गई कि जहाँ वसंतकुमार चटर्जी तफतीश कर रहा है, उसी के निकट सुरेश चक्रवर्ती ‘बचाओ ! बचाओ !’ कहकर सहायता के लिए चिल्लाएगा तथा शेष उसे चारों ओर से मारने-पीटने का अभिनय करेंगे और यदि वसंतकुमार चटर्जी सहायता के लिए दौड़ता है तो वे चारों उस पर गोलियाँ दागेंगे।

योजना के अनुसार घटनास्थल से कुछ दूर हटकर सुरेश चक्रवर्ती ने ‘बचाओ ! बचाओ !’ कहकर चिल्लाना प्रारम्भ कर दिया और बाकी लोग उसे पीटने लगे। शोर सुनकर आसपास के लोग भी दौड़े और अपने अंगरक्षक के साथ डिप्टी सुपरिंटेंडेंट पुलिस वसंतकुमार चटर्जी भी वहाँ पहुँच गया। क्रांतिकारियों की मुराद पूरी हो गई। चारों क्रांतिकारियों ने अपनी पिस्तौलें निकालकर उसपर गोलियों की बौछार छोड़ दी। पुलिस अफसर की तत्काल मृत्यु हो गई। उसका अंगरक्षक भी घायल हो गया और उसकी मृत्यु अस्पताल में हो गई।

जो कई बार क्रांतिकारियों के हाथों में आकर भी बच जाता था, आखिर वह क्रूर पुलिस अफसर वसंतकुमार चटर्जी 30 जून, 1916 को उनके द्वारा समाप्त कर दिया गया। कोई भी क्रांतिकारी पुलिस के हाथ नहीं आ सका।

अत्तरसिंह, अब्दुल रज्जाक खाँ, इम्तियाज अली, जफर अली, तँवरसिंह, तन्नरसिंह, बग्गतसिंह, मुंशी खाँ, रल्लासिंह, रसूला, रुकनुद्दीन, वीरसिंह, सुलेमान, हजारासिंह


लगभग तीन सौ भारतीय क्रांतिकारियों से भरा हुआ एक जहाज अमेरिका से चला। ये क्रांतिकारी गदर के द्वारा स्वाधीनता का युद्ध लड़ने के लिए भारत आ रहे थे। इन क्रांतिकारियों के अतिरिक्त कुछ अन्य यात्री उस जहाज में थे और वे भी क्रांति मंत्र से दीक्षित होते जा रहे थे। जहाज बीच के बंदरगाह पर रुक-रुककर क्रांति की चिनगारियाँ सुलगाता हुआ जा रहा था। आखिर यह जहाज सिंगापुर जा पहुँचा।

     भारतीय क्रांतिकारी जहाज से उतरकर शहर के अंदर गए और उन्होंने वहाँ भारतीय फौजियों के साथ संपर्क स्थापित करने का यत्न किया। इस यत्न में उन्हें सफलता मिली। उस समय सिंगापुर का वातावरण क्रांतिकारियों के बहुत अनुकूल था। गदर पार्टी के महामंत्री भाई संतोखसिंह क्रांति का अच्छा वातावरण सिंगापुर में बना गए थे। उनका प्रभाव वहाँ शेष था। ‘गदर’ नामक अखबार की प्रतियाँ सिंगापुर पहुँचती रहती थीं और यह अखबार विद्रोह की आग भड़काने के लिए हवा का काम कर रहा था। तुर्क क्रांतिकारियों से भी विद्रोह की प्रेरणा मिल रही थी और वहाँ के मुल्ला-मौलवियों ने विद्रोह के लिए फतवा दे रखा था। इस फतवे की फोटो कापियाँ तैयार करवाकर उनका उपयोग फौज के मुसलमान भाइयों में किया जा रहा था। ऐसे ही समय भारतीय क्रांतिकारियों से भरा हुआ जहाज सिंगापुर जा पहुँचा।

उधर सिंगापुर की छावनियों में गोरों की संख्या बहुत कम थी। विश्वयुद्ध के विभिन्न मोरचों पर उन्हें भेज दिया गया था। भारतियों की एक बटालियन पाँचवी लाइट इन्फैंट्री वहाँ थी, जिसमें सभी लोग मुसलमान थे। और उन सबको भारत से भर्ती किया गया था। मिस्र और तुर्की से प्रेरणा पाकर ये मुसलमान फौजी भाई भी भारत माता को आजाद कराने के लिए उतावले हो रहे थे। यह स्थिति भी क्रांतिकारियों के लिए अनुकूल थी।

भारतीय क्रांतिकारियों ने सिंगापुर में उपस्थिति फौज के भारतीय अफसरों और सैनिकों को एक सभाभवन में एकत्रित किया। उनकी संख्या लगभग दो सौ होगी। कुछ भारतीय नागरिक भी थे। क्रांतिकारियों ने अपने प्रतिनिधि के रूप में झाँसीवाले पं. परमानंद से उद्बोधन के लिए आग्रह किया। पं. परमानंद ओजस्वी वक्ता थे और सिंगापुर में पहले ही वे अपना बहुत अच्छा प्रभाव छोड़कर गए थे, जब अमेरिका जाते हुए वहाँ उन्होंने ‘गीता’ के कर्मयोग पर कई प्रभावशाली भाषण दिए थे।

पं. परमानंद ने गदर पार्टी के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए आजादी के लिए किए गए प्रयत्नों का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत करते हुए लोगों की भावनाओं को उभारना प्रारंभ कर दिया—
‘‘.....अगर तुम्हारी आँखों में प्रताप और शिवाजी की दृष्टि है, दिल्ली के बूढ़े बादशाह की दृष्टि है तो आँखें खोलकर देखो, बदला लेने की वीर भावनाओं से ऊपर नजर उठाकर देखो। आजादी के दीवाने, तुम्हारे बहादुर पूर्वज तुम्हें पुकार रहे हैं, तुम्हें ललकार रहे हैं।’’
ऐसे ओजस्वी विचार उन फौजियों को कहाँ सुनने को मिलते थे। उनपर नशा जैसा छाने लगा। उस नशे पर और नशा चढ़ाने के लिए पं. परमानंद ने कहना जारी रखा—
‘‘अगर हमारा खून असली है तो वह हमारी भावनाओं की टक्कर लगते ही उछल पड़ेगा। अगर न उछले तो समझना कि हमारे रक्त में अवश्य कुछ फर्क पड़ गया है। वीरोचित भावनाएँ यदि आपके पवित्र रक्त में हिलोर पैदा करती हैं तो वीरों को युद्ध से अधिक परीक्षा का स्थान कब मिलता है !’’

पं. परमानंद ने फौजियों के रक्त को चुनौती दे दी थी। भला ऐसा कौन फौजी होता, जो अपने रक्त की शुद्धता को प्रमाणित करके न दिखाता ! भाषण की समाप्ति पर लोगों के चेहरों पर एक ही भाव दिखाई दे रहा था—कहकर नहीं, करके ही दिखाएँगे।
क्रांति की चिनगारी सुलगाकर क्रांतिकारियों का जहाज सिंगापुर छोड़कर चला गया। जब वह जहाज पीनांग पहुँचा तो वहाँ के गवर्नर ने जहाज को रुके रहने का आदेश दिया। उनकी आज्ञा के बिना वह आगे नहीं जा सकता था। क्रांतिकारियों की समझ में नहीं आ रहा था कि उनके जहाज को कैद करके क्यों रखा गया है। वे लोग जब पीनांग के गुरुद्वारे में गए तो उन्हें पता चला कि सिंगापुर के भारतीय फौजियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह प्रारंभ करके अंग्रेजों की मार-काट प्रारंभ कर दी है। क्रांतिकारियों की छोड़ी हुई चिनगारी वहाँ ज्वाला का रूप धारण कर चुकी थी।

भारतीय रेजीमेंट को सिंगापुर से हांगकांग ले जाने के लिए जहाज तैयार खड़ा था। जहाज पर सामान लादा जा रहा था। वह 15 फरवरी सन् 1915 का दिन था और समय अपराह्न तीन बजे का था। फौज को जहाज पर चढ़ाने के पहले सिंगापुर के कमांडिंग जनरल डी. रीड्यूड ने पाँचवी पल्टन का निरीक्षण किया। सबकुछ ठीक पाया गया। अचानक ही कहीं से एक गोली चली और ‘मारो फिरंगी को’ का नारा उठ खड़ा हुआ। अंग्रेज अफसर सकते में आ गए। उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया गया और उनमें से दो-एक गोलियों के शिकार हो गए।
क्रांतिकारी तीन टोलियों में विभक्त हो गए। एक टोली अंग्रेज अफसरों के बंगलों की तरफ बढ़ी, दूसरी उधर बढ़ी जिस तरफ जर्मन नजरबंदियों को रखा गया था और तीसरी टोली बाजार की तरफ बढ़ी।

जो टोली कर्नल की बंगले की तरफ बढ़ी थी, उसे कुछ अधिक सफलता नहीं मिली; क्योंकि दो अंग्रेज भागकर उस तरफ पहले ही पहुँच गए थे और कैप्टन स्मिथ तथा ‘मलाया स्टेट गाइड्स’ के कुछ जवान बीमार कर्नल तथा उसके परिवार की रक्षा के लिए नियुक्त हो चुके थे।
क्रांतिकारियों की जो टोली नजरबंदियों के कैंप की तरफ बढ़ी, उसने पहरेदारों पर गोलियाँ चलानी प्रारंभ कर दीं। कुछ पहरेदार मारे गए और कुछ भाग गए। क्रांतिकारियों ने जर्मन बंदियों से कहा, आप लोग आजाद हैं, आप हमारा साथ दें। कुछ जर्मन बंदी तो क्रांतिकारियों की ओर हो गए, पर अधिकांश ने वहाँ से भागने से इनकार कर दिया और क्रांतिकारियों द्वारा दिए गए हथियार भी उन्होंने नहीं लिये।

क्रांतिकारियों की जो टोली बाजार की तरफ बढ़ी थी, उसे रास्ते में जो अंग्रेज लोग मिलते गए, उन्हें मारती चली।
विद्रोह की पहली गोली 15 फरवरी को चली थी। 20 फरवरी तक गोलियाँ निरंतर चलती रहीं। सिंगापुर में क्रांतिकारियों की स्थिति सुदृढ़ हो चुकी थी। वे आसपास के प्रदेशों में फैलने लगे थे।

इधर विद्रोह का दमन करने के लिए भी तैयारियाँ होती रही थीं।’ मलाया स्टेट गाइड्स’ अंग्रेजो के साथ थे। जोहौर रियासत के सुलतान से भी मदद माँगी गई। उन्होंने लगभग एक सौ पचास सैनिकों की एक टुकड़ी क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए भेजी। अंग्रेजों की सहायता के लिए फ्रांसीसी, जापानी और रूसी लड़ाकू जहाज भी पहुँच गए। अब स्थिति अंग्रेजों के पक्ष में थी और क्रांतिकारी लोग भाग-भागकर जंगलों की तरफ जा रहे थे। उनमें से कुछ लोग गोलियों का शिकार भी हो चुके थे। मॉर्शल ला लागू कर दिया गया था और बडी बेरहमी के साथ विद्रोह को कुचला जा रहा था।
3 मार्च, 1915 को कोर्ट मॉर्शल द्वारा तीन क्रांतिकारियों को गोलियों से उड़ा देने का हुक्म हुआ। उन्हें सरेआम गोलियों से उड़ा दिया गया। वे थे—
1. रसूला : इसपर कैप्टेन ईजार्ड की हत्या का अभियोग था।
2. इम्तियाज अली : इस पर आरोप था कि इसने विद्रोहियों को हथियार दिए हैं।
3. रुकनुद्दीन : इस पर भी विद्रोहियों को हथियार देने का आरोप था।
13 मार्च, 1915 को पैंतालीस विद्रोहियों पर मुकदमा चला और उन सबको गोलियों से उड़ा दिया गया। गोलियों से उड़ाए जानेवाले चार अफसर भी थे—
1. हवलदार सुलेमान,
2. नायक मुंशी खाँ,
3. नायक जफर अली,
4. लांस नायक अब्दुल रज्जाक खाँ।
मुसलमानों के अतिरिक्त सात सिख सैनिकों को भी कोर्ट मॉर्शल करके गोलियों से उड़ा दिया गया। वे थे—
1.    बग्गतसिंह,
2.    अत्तरसिंह,
3.    तन्नरसिंह
4.    रल्लासिंह,
5.    हजारासिंह,
6.    तँवरसिंह,
7.    वीरसिंह।
आमने-सामने की भिड़ंतों में लगभग एक सौ तीन सैनिक और नागरिक क्रांतिकारियों की गोलियों के शिकार हुए।
भारत माता के सपूत अपनी बंदिनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए अपने जीवन की बलि दे गए।

अनुकूल चक्रवर्ती,अमृत सरकार


‘‘एक बार हम अंग्रेज अत्याचारियों को भले ही छोड़ दें, पर हम उन हिंदुस्तानियों को नहीं छोड़ सकते जो अंग्रजों के सामने दुम हिलाते हैं और आजादी के रास्ते में हम क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करते या कराते हैं।’’
ये वे विचार थे, जो तरुण क्रांतिकारी अनुकूल चक्रवर्ती ने अपने साथी क्रांतिकारी अमृत सरकार के समक्ष रखे। अमृत सरकार की प्रतिक्रिया थी—
‘‘मैं भी तुम्हारे विचार से पूर्ण सहमत हूँ और महसूस करता हूँ कि गुलाम प्रवृत्तिवाले हमारे भारतीय भाई अंग्रेजों की अपेक्षा हमारे अधिक दुश्मन हैं और वे हमारे रास्ते के काँटे हैं।

अनुकूल चक्रवर्ती का कथन था


‘‘इस प्रकार का एक काँटा खुफिया विभाग का बंकिमचंद्र चौधरी है, जो पूरे मैमनसिंह क्षेत्र में क्रांतिकारियों के लिए आतंक बना हुआ है। क्यों न हम इस काँटे को अपने रास्ते से हटा दें ?’’
‘‘मैं स्वयं भी इसी मत का हूँ और मेरा तो आग्रह है कि बिना विलंब किए हम इस काँटे को रगड़कर फेंक दें। यदि तुम सहमत होओ तो मैं चंद्रनगर जाकर कुछ बम लिए आता हूँ।’’ यह विचार व्यक्त किया अमृत सरकार ने।
अनुकूल चक्रवर्ती ने सहमत होते हुए कहा—

‘‘हाँ, रिवॉल्वर की अपेक्षा उसे बम से समाप्त करना अधिक आसान होगा, क्योंकि शाम के वक्त वह अपनी बैठक के बाहर अकेला ही बैठता है। वह समय बहुत ही उपयुक्त होगा।’’
दोनों के विचार एक जैसे ही थे। योजना को अंतिम रूप मिलते देर नहीं लगी।
30 सितंबर, 1913 की संध्या थी। बंकिमचंद्र चौधरी हवाखोरी के पश्चात् अपने घर वापस आ चुका था। परिवार के लोगों के साथ उसने कुछ बातचीत की और नौकर को आदेश दिया कि वह एक चारपाई बाहरी बैठक के सामने डाल दे और हुक्का तैयार करके उसे दे दे। नौकर ने आज्ञा का पालन किया।

बंकिमचंद्र चौधरी बैठक के बाहर चारपाई पर बैठ गया और नौकर से कुछ बातें करने लगा। उसकी पत्नी भी वहाँ पहुँचकर उससे कुछ निर्देश प्राप्त करने लगी। शाम का अँधेरा फैल चुका था। पास की एक विशाल वृक्ष की ओट में अमृत सरकार और अनुकूल चक्रवर्ती बम लिये हुए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि बंकिमचंद्र के अतिरिक्त किसी अन्य निर्दोष व्यक्ति की जान जाए। थोड़ी ही देर में बंकिमचंद्र चौधरी की पत्नी मकान के अंदर चली गई और नौकर भी आज्ञा लेकर अपने घर चला गया। क्रांतिकारियों के लिए यह उपयुक्त अवसर था। बंकिमचंद्र चौधरी चारपाई पर बैठा हुआ अपनी दोनों टाँगें नीचे लटकाए हुए था। वह आराम के साथ हुक्का गुड़गुड़ाता हुआ अपनी थकान मिटा रहा था। अमृत सरकार ने अपने बम का प्रहार बंकिमचंद्र चौधरी के ऊपर कर दिया। बम उसके पैरों के पास गिरा और भयानक विस्फोट हुआ। क्रांतिकारी लोग वहाँ से खिसक गए और कोई उन्हें देख भी नहीं सका।

बम के प्रहार से बंकिमचंद्र चौधरी की दोनों टाँगें उड़कर दूर जा गिरीं। उसके शरीर में लोहे की कीलें चुभी पाई गईं। उसकी बाईं आँख में भी एक कील चुभी हुई थी। उसके बैठकखाने की बाहरी दीवार में भी कीलें चुभी पाई गईं। पीले रंग का पाउडर बंकिमचंद्र चौधरी के शरीर पर फैला हुआ था। आजादी के दीवानों को सतानें का पुरस्कार उसे मिल चुका था।
पुलिस ने मामला दर्ज किया और बंकिमचंद्र चौधरी के हत्यारों का सुराग देनेवालों को भारी पुरस्कार घोषित किया गया; पर कोई परिणाम न निकला।

अनुकूल चक्रवर्ती, अमृत सरकार, गिरिजा बाबू, वीरेंद्र चटर्जी


ढाका में ‘बकलैंड बंद’ संध्या के समय बड़ा मनोरम दृश्य उपस्थित करता है। इस ओर आड़ी-तिरछी बहती हुई नदी और दूसरी ओर उससे सटी हुई सुंदर सड़क, दोनों ही सैलानियों के लिए आकर्षण के केंद्र रहे हैं। चहल-पहल भरी सड़क पर घूमते और नाव में सैर करने का आनंद लेनेवाले लोग उस क्षेत्र में संध्या समय ही पहुँचते हैं।

इसी ‘बकलैंड बंद’ स्थान पर 19 जुलाई, 1914 को ढाका का डिप्टी सुपरिंटेंडेंट पुलिस वसंत चटर्जी संध्या के समय पुलिस के काफी आदमियों के साथ किसी घटना की प्रतीक्षा कर रहा था। उसके लिए नदी में एक नाव तैयार थी, जिसमें उसके कुछ आदमी पहले से ही बैठे हुए थे। वह किसी क्रांतिकारी को पकड़ने या उसे गोली का निशाना बनाने की घात में था। क्रांतिकारियों को पहचानने के लिए उसने एक विशिष्ट व्यक्ति—रामदास—को नियुक्त कर रखा था। रामदास पहले ‘ढाका अनुशीलन समिति’ का ही सदस्य था, पर अब क्रांतिकारियों का साथ छोड़कर वह पुलिस का मुखबिर बन चुका था। इस समय उसके आसपास पुलिस के कई सिपाही नागरिक वेश में उपस्थित थे, जो उसके द्वारा बताए गए व्यक्ति को गिरफ्तार करने या उस पर गोली चलाने के लिए तैयार थे। ये लोग वसंत चटर्जी के ही निर्देश पर काम कर रहे थे।

वसंत चटर्जी किसी विशेष घटना की प्रतीक्षा में था। विशेष घटना घटित भी हुई; पर गोलियाँ उसके दल से नहीं, क्रांतिकारी दल ने चलाईं। चार क्रांतिकारी जाने कहाँ से वहाँ अचानक ही प्रकट हुए और उनमें से एक ने पुलिस के मुखबिर रामदास पर गोलियों की दनादन वर्षा प्रारंभ कर दी। रामदास वहीं गिरकर ढेर हो गया। गोली चलानेवाला क्रांतिकारी अमृत सरकार था और उसके साथी अनुकूल चक्रवर्ती, गिरिजा बाबू एवं वीरेंद्र चटर्जी इस बात के लिए तैयार थे कि यदि पुलिस के आदमी मुकाबला करें तो वे उनको डटकर टक्कर दे सकें। क्रांतिकारियों द्वारा किए गए इस आकस्मिक आक्रमण से डिप्टी सुपरिंटेंडेंट वसंत चटर्जी इतना घबरा गया कि वह अपने लिए तैयार नाव में कूदकर वहाँ से भाग गया। नागरिक वेश में रामदास के सहायक पुलिस के आदमियों ने भी इधर-उधर छिपकर जान बचाने में ही अपनी खैर समझी। वहाँ पड़ा रह गया केवल रामदास का शव, जो मूक भाषा में कह रहा था कि क्रांतिकारी लोग भले ही किसी अत्याचारी को बख्श दें, पर वे किसी गद्दार को कभी नहीं बख्श सकते।
कोई भी क्रांतिकारी न तो उस समय गिरफ्तार किया जा सका और न उसके पश्चात् ही।

अनुकूल चक्रवर्ती, आदित्य दत्त


वसंतकुमार भट्टाचार्य एक होनहार युवक था। वह ढाका के क्रांतिकारी दल का सक्रिय सदस्य था। एक बार तो वह पकड़ा जाकर एक वर्ष के कठोर कारावास का दंड भी भुगत चुका था। कारावास का दंड भुगतने के पश्चात् उसने जहाज की एक कंपनी में नौकरी कर ली थी। नौकरी के समय के पश्चात् वह क्रांतिकारी दल की बैठकों में सम्मिलित होकर कार्य योजनाओं में भी उत्साह के साथ भाग लेता था।
एक शाम वसंत भट्टाचार्य की भेंट एक पुलिस इंस्पेक्टर से हो गई, जिससे उसका परिचय जेल में रहते हो गया था। पुलिस इंस्पेक्टर ने उसे समझाया—‘देखो वसंत ! तुम एक वर्ष की सजा काटकर भी क्रांतिकारी दल से अपना संबंध-विच्छेद नहीं कर पाए। हमारे जासूसों ने सूचना दी है कि तुम अपनी नौकरी के पश्चात् कुछ संदिग्ध व्यक्तियों के साथ रहते हो।’’
‘‘नहीं-नहीं ! मैं किसी संदिग्ध व्यक्ति के साथ नहीं रहता। मैं तो कभी-कभी अपने मित्रों से मिलने चला जाता हूँ। क्रांतिकारियों से संबंध तोड़े हुए मुझे कितना समय हो गया है।’’

‘‘उड़ने की कोशिश मत करो, वसंत ! हमारे आदमी तुम्हारा निरंतर पीछा करते रहते हैं। मेरा तो परामर्श है कि तुम नौकरी भी करते रहो और अपने साथियों से भी मिलते रहो; पर उनकी गतिविधियों की सूचनाएँ हमें देते रहो।’’
‘‘अगर मेरे साथियों को भनक पड़ गई कि मैं पुलिस से मिला हुआ हूँ तो वे मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।’’

‘‘डरने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारी रक्षा का प्रबंध हम किए देते हैं। बाँगला बाजार में एक नागरिक से तुम्हारा परिचय कराए देते हैं, जो वहाँ किराए के एक कमरे में रहता है। पुलिस का कोई आदमी तुमसे मिलने न तो तुम्हारे घर आएगा और न तुम ही कभी पुलिस स्टेशन पहुँचना। जो सूचनाएँ तुम्हें देनी हो, उसी नागरिक को देना। तुम्हें माहवारी खर्च भी उस नागरिक के माध्यम से मिलता रहेगा। मैं समझता हूँ कि अब तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।’’
‘‘ठीक है, यह व्यवस्था मुझे स्वीकार है। मेरा माहवारी खर्च पाँच सौ रुपये होगा।’’
‘‘वैसे तो यह बहुत अधिक है, पर तुम्हारी जोखिम को देखते हुए तुम्हारा प्रस्ताव हमें भी स्वीकार है।’’
दोनों की बात पक्की हो गई। वसंतकुमार भट्टाचार्य अपने क्रांतिकारी साथियों की सूचनाएँ अपने नागरिक मित्र द्वारा पुलिस को देने लगा।




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