ज्ञान का युग और भारत - आर.के.मालकर, विनोद कुमार मिश्र Gyan ka Yug aur Bharat - Hindi book by - R. A. Malkar, Vinod Kumar Mishra
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ज्ञान का युग और भारत

आर.के.मालकर, विनोद कुमार मिश्र

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3293
आईएसबीएन :81-7315-538-0

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आधुनिक भारत के ज्ञान एवं विज्ञान पर आधारित पुस्तक...

Gyan Ka Yug Aur Bharat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वर्तमान युग ज्ञान का युग है। ज्ञान अब एक मूल्यवान सम्पदा बन चुका है। भारत सहित विश्व के तमाम देश बौद्धिक सम्पदा अधिकारों संबंधी अपने राष्ट्रीय ढाँचे को नया व अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप देते जा रहे हैं, जो ज्ञान अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता हुआ एक सशक्त कदम है।

ज्ञान आधारित समाज के निर्माण के लिए समाज के हर वर्ग का सहयोग आवश्यक है। आज हमारे पास वह सबकुछ है जो इस युग में भारत को पुनः वह स्थान दिला सकता है जो कभी इसे प्राप्त था।
प्रस्तुत पुस्तक के प्रथम खण्ड में ज्ञान व ज्ञान-प्रबंधन संबंधी विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया गया है। इसमें प्राचीन भारत में ज्ञान की महिमा और ज्ञान आधारित समाज व्यवस्था के अलावा विभिन्न प्रकार के ज्ञान, ज्ञान-प्रबंधन, ज्ञान संगठनों के लक्षणों, ज्ञान के अद्भुत भण्डार व संस्कृति पर भी प्रकाश डाला गया है। साथ ही, भविष्य में ज्ञान का आर्थिक लेखा-जोखा कैसे किया जाएगा तथा छोटे व मँझले स्तर के संगठनों में भी ज्ञान व्यवस्था की स्थापना से जुड़े पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक के द्वितीय खण्ड में भारत को एक ‘ज्ञान महाशक्ति’ बनाने वाली कार्य योजना के सम्बन्ध में विस्तार से समझाया-बताया गया है। इस खण्ड में भारत की शक्तियों व कमजोरियों तथा भारत के समक्ष वर्तमान में जो चुनौतियाँ हैं उनका विस्तार से वर्णन किया गया है। राष्ट्रीय विकास में ज्ञान की आवश्यकता, उसकी भूमिका एवं स्वरूप पर विस्तृत चर्चा पाठकों के लिए उपयोगी व ज्ञानप्रद है।

भूमिका

उन्नीसवीं सदी तक विश्व में कृषि-समाज व्यवस्था प्रधान थी। इसमें शारीरिक श्रम की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। इतना ही नहीं, उस समय तक जो उद्योग-धंधे व अन्य व्यवसाय चलते थे, उनमें भी शारीरिक श्रम की प्रधानता होती थी। किन्तु बीसवीं सदी में इन क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण बदलाव आए। शारीरिक श्रम की तुलना में प्रौद्योगिकी, पूँजी व श्रम प्रबंधन का महत्व काफी बढ़ा और बढ़ता ही चला गया। इस सदी के अन्तिम दशक में सूचना क्रान्ति का प्रादुर्भाव हुआ। लोगों को बीच आपसी संघर्ष बढ़ता चला गया। और फिर सॉफ्टवेयर उत्पादों ने धूम मचा दी।
उपर्युक्त परिवर्तनों ने विश्व में एक बार नए प्रकार के समाज के निर्माण का सूत्रपात किया। आज श्रम व पूँजी की तुलना में ज्ञान अधिक महत्त्वपूर्ण हो चुका है और जिसके पास ज्ञान होता है, पूँजी उसके पीछे-पीछे चली आती है।

ज्ञान समाज के निर्माण के लिए निम्न संकल्पनाएँ विकसित हो चुकी हैं-

ज्ञान- यह हमारे मस्तिष्क में संचित सूचना और आँकड़ों का भंडार है, जिसमें तर्क, आत्मबुद्धि तथा पूर्व अनुभव पर आधारित निजी व्याख्या शामिल होती है। इसमें तथ्यों, प्राकृतिक नियमों और सिद्धांतों की वैज्ञानिक जानकारी, कौशल अथवा काम करने की सामर्थ्य, कौन क्या जानता है तथा कोई कार्य किस प्रकार करें- इस प्रकार की सूचनाएँ भी शामिल होती हैं।
ज्ञान-अर्थव्यवस्था- यह वह अर्थव्यवस्था है, जो धनोपार्जन तथा जीवन-स्तर के उन्नयन के लिए ज्ञान व सूचना सृजन, बंटन तथा प्रयोग के इर्द-गिर्द घूमती है।

ज्ञानकर्मी- विचार रचकर, बाँटकर तथा उनका प्रयोग कर मूल्यवर्द्धन करनेवाला व्यक्ति ज्ञानकर्मी कहलाता है। वह जानता है कि क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है। हर स्तर का व्यक्ति ज्ञानकर्मी हो सकता है- चाहे वह वैज्ञानिक हो या कुशल शिल्पी। किसी भी संगठन में लोगों व उपयोगी सूचनाओं की जानकारी रखनेवाली रिसेप्शनिस्ट भी ज्ञानकर्मी कही जा सकती है।

ज्ञान-प्रबंधन- ज्ञान के अधिक मूल्यवान हो जाने के कारण पूर्ण लाभ प्राप्ति के लिए इसके प्रभावशाली प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। यह सामान्य प्रबंधन की एक महत्त्वपूर्ण शाखा के रूप में उभरती जा रही है।

जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि वर्तमान दौर में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। इस युग को संचालित करनेवाली शक्तियाँ इस प्रकार हैं-

1.    दुनिया भर की अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के कारण सभी स्तरों पर प्रतिस्पर्धाओं में व्यापक वृद्धि।
2.    प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से नेट तथा दूरसंचार प्रौद्योगिकी में हो रही तीव्र वृद्धि।
3.    विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य में निवेश की बढ़ती जन-रुचि।
4.    कौशल-परिवर्द्धन की बढ़ती माँग।
5.    बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण को लेकर बढ़ती चिंता।
6.    ज्ञान आधारित व्यापार का विकास।
7.    सहभागी कार्य-संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता में वास्तविक वृद्धि।
8.    नेटवर्किंग नीतियों में तीव्र प्रगति।

उपर्युक्त परिस्थितियों में इनोवेशन अर्थात् नवाचार व्यक्ति या फर्म की शक्ति को कई गुना बढ़ा देना है। यह दिन-पर-दिन महत्त्वपूर्ण होता चला जा रहा है। प्रसन्नता की बात यह है कि इस क्षेत्र ने भी अनेक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किए हैं; जैसे- सिंप्यूटर, डब्ल्यू.एल.एल., जेट्रोफा पौधे से बायोडीजल का निर्माण, खुले वितरण की नई प्रणाली, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयोग होनेवाली विशेष प्रौद्योगिकियाँ इत्यादि।

आज प्रौद्योगिकी में छोटे परन्तु उपयोगी सुधार बाजार का नक्शा ही बदल देते हैं, जैसे सामान्य फोटो खींचनेवाले कैमरे में डिजिटल प्रौद्योगिकी के समावेश ने बाजार का स्वरूप ही बदल दिया है। केवल यही नहीं, ऐसे प्रयोग हर क्षेत्र में किए जा रहे हैं, जैसे-

1.    बेहतर समय प्रबंधन।
2.    कामगारों की प्रौद्योगिकी व सूचना की कुशलता में वृद्धि।
3.    बिक्री की नई प्रणाली।

इस प्रकार इनोवेशन अर्थात् नवाचार कोई एक उत्पाद नहीं वरन् उत्पादों की एक श्रृंखला है।

बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति नया दृष्टिकोण

भारत सहित विश्व के तमाम देश बौद्धिक संपदा अधिकारों संबंधी अपने राष्ट्रीय ढाँचे को नया व अंतराष्ट्रीय स्वरूप देते जा रहे हैं, जो ज्ञान अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता हुआ एक सशक्त कदम है। हालाँकि अभी पेटेंट प्रदान करने की प्रक्रिया को तीव्र बनाया जाना और पेटेंट कानूनों के उल्लंघन के लिए दंड देने की व्यवस्था को और अधिक चुस्त-दुरुस्त बनाया जाना शेष है, पर फिर भी अब तक हुई प्रगति की प्रशंसा किए बिना नहीं रहा जा सकता।
 
आज हमारे पास सब कुछ है जो इस युग में भारत को पुन: वह स्थान दिला सकता है जो कभी इसे प्राप्त थी। इसकी विस्तृत चर्चा आगे के अध्यायों में की गई है।

ज्ञान आधारित समाज के निर्माण के लिए समाज के हर वर्ग का सहयोग आवश्यक है। जमीन से जुड़े आविष्कारों से लेकर उच्च राजनीतिक पदों पर विराजमान लोगों- सभी को इसमें अहम भूमिका निभानी है। इसके लिए जनजागरण प्रथम सोपान है।

प्रस्तुत पुस्तक इसी उद्देश्य से लिखी गई है। इसके  प्रथम खण्ड में ज्ञान व ज्ञान-प्रबंधन संबंधी विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया गया है। इसमें प्राचीन भारत में ज्ञान की महिमा और ज्ञान आधारित समाज व्यवस्था के अलावा विभिन्न प्रकार के ज्ञान, ज्ञान-प्रबंधन, ज्ञान संगठनों के लक्षणों, ज्ञान के अद्भुत भण्डार व संस्कृति पर भी प्रकाश डाला गया है। साथ ही, भविष्य में ज्ञान का आर्थिक लेखा-जोखा कैसे किया जाएगा तथा छोटे व मँझले स्तर के संगठनों में भी ज्ञान व्यवस्था की स्थापना से जुड़े पहलुओं पर भी रोशनी डाली गई है।

पुस्तक के द्वितीय खण्ड में भारत को एक ‘ज्ञान महाशक्ति’ बनाने वाली कार्य योजना के सम्बन्ध में विस्तार से समझाया गया है। यह खण्ड भारत की  एक समिति द्वारा तैयार रिपोर्ट पर आधारित है। जिसमें भारत को एक महान ज्ञान महाशक्ति बनाने पर गहराई से मंथन किया गया था।

इस खण्ड में भारत की शक्तियों व कमजोरियों तथा भारत के समक्ष वर्तमान में जो चुनौतियाँ हैं और उस पर जो खतरे मँडरा रहे हैं, उनपर भी विस्तृत चर्चा की गई है।

इस पुस्तक हेतु सामग्री एकत्रित करने के लिए अनेक विद्वानों की पुस्तकों व शोध-पत्रों की सहायता ली गई है। इसके लिए हम उन सभी के आभारी हैं। इन पुस्तकों व शोधपत्रों को एकत्रित करने में सी.एस.आई.आर. के अनुसंधान भवन स्थित पुस्तकालय की पुस्तकालयाध्यक्षा श्रीमती रेणु पांडेय व अन्य सहयोगियों ने अमूल्य सहयोग दिया। इसके लिए हम उनके आभारी हैं।

इसके अलावा अन्य कई महानुभावों ने अलग-अलग प्रकार से सहयोग दिया है। प्राचीन भारत में ज्ञान की महिमा व ज्ञान आधारित समाज की जानकारी जुटाने में डॉ. वीरेन्द्र शर्मा और डॉ. सी.डी. सिद्धू ने उपयोगी सहायता प्रदान की है और आइंस्टीन की ज्ञान संबंधी अवधारणा के लिए प्रो.जगदीश चन्द्र झा ने उपलब्ध कराई है। सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के वरिष्ठ जनों डॉ. एस.के. कैकर, सर्वश्री एस.के. संगल तथा योगेश त्यागी ने भी विविध रूपों में महत्त्वपूर्ण सहायता की।

यह पुस्तक भविष्य के ज्ञान आधारित समाज के निर्माण के लिए प्रारंभिक दिशा-निर्देश का कार्य करेगी, ऐसी आशा है। पाठकों से अनुरोध है कि यदि इस कार्य में कोई त्रुटि रह गई तो उससे अवगत कराएँ और सुझाव भी प्रेषित करें।


-डॉ. रघुनाथ अनंत माशेलकर,
विनोद कुमार मिश्र


प्राचीन भारत में ज्ञान की महिमा



न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।


श्रीमद्भगवद्गीता, 4/38


अर्थात् इस संसार में ज्ञान से पवित्र और कुछ नहीं है। ज्ञान की तुलना सदैव प्रकाश से की जाती रही है। प्राचीन भारत में ज्ञान की परख की बड़ी सशक्त परंपरा रही है। महाकवि कालिदास ने लिखा है-


पुराणमित्येव न साधु सर्वं
न चापि काव्यं नवामि त्यवद्यम्।
सन्त: परीक्ष्यान्यतद भजन्ते
मूढ: परप्रत्ययनेय बुद्धि:।।

इसका अर्थ है कि केवल पुराने होने से ही न तो सब अच्छे हो जाते हैं और मात्र नए न होने का कारण सभी काव्य बुरे हो जाते हैं। बुद्धिमान लोग तो दोनों की परीक्षा करके जो उत्तम होता है उसे ग्रहण करते हैं। दूसरों के विश्वास मात्र के आधार पर अपना मत बना लेना मूर्खों का काम है।

प्राचीन काल में ज्ञान के साथ-साथ ज्ञानियों की भी कड़ी परीक्षा होती थी। समय-समय पर ज्ञान-सत्र आयोजित होते थे, जिनमें सभी ऋषि-मुनि भाग लेते थे और नवीन ज्ञान पर चर्चा करते थे। इन संतों में नए ज्ञानी भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते थे।


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