क्रान्तिकारी कोश भाग 3 - श्रीकृष्ण सरल Krantikari Kosh Part 3 - Hindi book by - Shrikrishna Saral
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क्रान्तिकारी कोश भाग 3

श्रीकृष्ण सरल

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 330
आईएसबीएन :81-7315-234-9

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भगतसिंह तथा चन्द्रशेखर आजाद के युग के क्रान्तिकारियों का वर्णन

Krantikari Kosh Part 3 - A Hindi Book by - Shrikrishna Saral क्रान्तिकारी कोश भाग 3 - श्रीकृष्ण सरल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रान्तिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। सामान्यतयः भारतीय स्वतंत्र्य आन्दोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है; किन्तु प्रस्तुत ग्रन्थ में इसकी काल सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गयी है। लगभग 200 वर्ष की इस क्रान्ति यात्रा में उद्भट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग तपस्या की हजारों प्रतिमाएं साकार हुई। इनके अलावा राष्ट्र भक्त कवि, लेखक, कलाकार, विद्वान और साधक भी इसी के परिणाम पुष्प है। पाँच खण्डों में विभक्त 1500 से अधिक पृष्ठों का यह ग्रन्थ क्रान्तिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है। क्रान्तिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है। लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रान्तिकारियों के चित्र मिल सके, उनके रेखाचित्र दिये गये है। किसी भी क्रान्तिकारी का परिचय ढूढ़ने की सुविधा हेतु पाँचवे खण्ड के अन्त में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खण्डों की) भी दी गयी है।भविष्य में इस विषय में कोई भी लेखन इस प्रामाणिक ग्रन्थ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा।

अजयकुमार घोष

उसकी उम्र उस समय लगभग सोलह-सत्रह वर्ष की रही होगी; पर अपने सुडौल शरीर के कारण वह अधिक उम्र का लगता था। उस तेजवंत युवक का नाम अजयकुमार घोष था। वह कानपुर में एक व्यायामशाला चला रहा था।
कानपुर उन दिनों क्रांतिकारियों का गढ़ बना हुआ था। कुछ क्रांतिकारी ऐसे थे, जो किसी विशेष दल के रूप में संगठित हो चुके थे और कुछ व्यक्तिगत रूप से क्रांति कार्य कर रहे थे। अजयकुमार घोष को किसी दल की तलाश थी। शीघ्र ही उनका संबंध पंजाब से आए हुए एक क्रांतिकारी युवक भगतसिंह से हो गया। भगतसिंह ने अजयकुमार को परामर्श दिया कि जब तक योजनाबद्ध तरीके से पार्टी का निर्माण न हो, तब तक उसे अध्ययन में रत रहना चाहिए। अजयकुमार घोष इलाहाबाद चला गया और उसने वहाँ के विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. की परीक्षा पास कर ली।

जब क्रांतिकारियों का दल ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ नाम से गठित हो गया तो भगतसिंह ने इलाहाबाद पहुँचकर अजयकुमार घोष से संपर्क स्थापित किया और उसे अपने साथ ले आया। सक्रिय क्रांतिकारी होने के नाते अजयकुमार घोष ने उन सभी कार्यों में भाग लिया, जो उनकी पार्टी ने निश्चित किए थे।

भगतसिंह ने जब दिल्ली की असेंबली में बम विस्फोट कर अपनी गिरफ्तारी दी, तब उसे दिल्ली से लाहौर ले जाते समय मार्ग में छुड़ाने की योजना बनी तो उसमें अजयकुमार घोष को सम्मिलित किया गया। दुर्भाग्य से वह योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी। बाद में अजयकुमार गिरफ्तार कर लिया गया। लाहौर जेल में अधिकारियों के दुर्व्यवहार के विरोध में सभी क्रांतिकारियों ने लंबी भूख हड़ताल की और अजयकुमार घोष ने उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
लाहौर षड्यंत्र केस के अंतर्गत अजयकुमार घोष के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध न हो सका और उसे मुक्त कर दिया गया। बाद में एक अन्य मामले में फाँसकर उसे जेल की सजा दी गई।

सन् 1933 में जेल से मुक्त होने के बाद अजयकुमार घोष ने समाजवादी साहित्य का गहन अध्ययन किया और वह पक्का मार्क्सवादी क्रांतिकारी बन गया।
अजयकुमार घोष का जन्म 20 फरवरी, सन् 1909 को बंगाल के मिहिजाम नामक एक गाँव में हुआ था। उसके पिता डॉ. शचींद्रनाथ घोष भी प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे।

अमरीकसिंह, गुलाबसिंह, जहाँगीरीलाल
मलिक कुंदनलाल, मलिक नाथूराम, रूपचंद


वह एक तरुण क्रांतिकारी था। हाई स्कूल में पढ़नेवाला एक विद्यार्थी ही तो था। उसके चेहरे पर कमनीयता और कोमलता थी; लेकिन उसके हृदय में उन अरमानों ने जन्म ले लिया था, जो देश के ऊपर अपनी सर्वस्व न्योछावर कर देने के लिए तैयार रहते हैं। करतारसिंह सराबा को फाँसी हो चुकी थी और सरदार भगतसिंह फाँसी की प्रतीक्षा कर रहा था।
उस तरुण क्रांतिकारी का नाम गुलाबसिंह था। वह अपने पैतृक गाँव से अभी-अभी लाहौर आया था। लाहौर में पहुँचकर उसका यही प्रयत्न रहा कि कुछ स्थापित क्रांतिकारियों के साथ उसका संपर्क हो जाए और वह देश के लिए कुछ कर गुजरे। आखिर उसका सम्पर्क एक क्रांतिकारी इंद्रपाल के साथ हो गया। इंद्रपाल ने पहले यशपाल के साथ मिलकर वाइसराय लॉर्ड इरविन की ट्रेन को बम से उडा़ने के प्रयत्नों में अच्छी भूमिका का निर्वाह किया था। बाद में उसने लाहौर में स्वयं का संगठन खड़ा कर लिया था। इंद्रपाल ने अपने क्रांतिकारी संगठन को ‘आतिशी चक्कर’ नाम दिया था। गुलाबसिंह और उसका सगा भाई अमरीकसिंह—दोनों ही ‘आतिशी चक्कर’ के सदस्य बन गए।

इंद्रपाल और उसके साथियों ने मिलकर बम निर्माण का प्रयत्न किया। गुलाबसिंह ने स्वतंत्र रूप से बम बनाने के प्रयोग किए और उसे देशी बन बनाने में सफलता भी मिली। ये बम टीन के डिब्बे में आतिशबाजी का मसाला भरकर तैयार कर लिये जाते थे और डायनामाइट की तरह उनका उपयोग किया जाता था। अपने आपको ‘वैज्ञानिक’ कहनेवाला व्यक्ति हंसराज वायरलैस भी इनके दल में सम्मिलित हो गया। वह उन्नत किस्म के बम तो नहीं बना सकता था, पर आतिशबाजी के नमूने के बम के प्रयोगों का उसे अच्छा अभ्यास था।

उन दिनों पंजाब में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ चल रही थी। क्रांतिकारी भी यथासंभव पुलिस को दंड देने से चूकते नहीं थे। पुलिस को दंडित करने का ‘आतिशी चक्कर’ के क्रांतिकारियों ने एक अच्छा तरीका निकाला।
पंजाब के छह नगरों में एक साथ बम विस्फोट की योजना तैयार कर ली गई। ये छह नगर थे—लाहौर, अमृतसर, लायलपुर, गुजराँवाला, शेखूपुरा और रावलपिंडी। प्रत्येक नगर में क्रांतिकारियों ने एक-एक मकान किराए पर लिया। योजना यह थी कि प्रत्येक मकान में एक-एक बम रख दिया जाएगा। पिन के स्थान पर बम एक पतीला लगाया गया था। इस पतीले को मोमबत्ती के नीचे के सिरे से जोड़ दिया गया था। योजना थी कि मोमबत्ती जला दी जाएगी और जलते-जलते जब बम के पतीले से उसकी लौ का स्पर्श होगा तो पतीला आग पकड़ लेगा तथा बम का विस्फोट हो जाएगा। प्रत्येक मकान के अन्दर टूटे-फूटे संदूकों में कुछ पटाखे टाइप के अन्य बम भी रख दिए गए थे, जो पुलिस द्वारा तलाशी लेने की प्रक्रिया में हिलने-डुलने से फट सकते थे।

19 जून, 1930 को पंजाब के नियत सभी छह नगरों में बम रखकर मोमबत्तियाँ जला दी गईं और क्रांतिकारी लोग वहाँ से भाग निकले। भीषण धमाकों के साथ बमों का विस्फोट हुआ और पुलिस उन मकानों में पहुँच गई। पुलिस ने उन मकानों की तलाशी ली। क्रांतिकारियों की योजना के अनुसार उन मकानों में रखे अन्य बम भी फटे और पुलिस के दो आदमी मारे गए तथा कुछ घायल हुए। बहुत दौड़-धूप करने पर भी उस समय कोई क्रांतिकारी गिरफ्तार न हो सका। पुलिस को अंततोगत्वा इन क्रांतिकारियों का सुराग मिल गया और उन पर निगरानी रखी जाने लगी। क्रांतिकारियों को भी अपनी गिरफ्तारी का संदेह हो गया और वे इधर-उधर बिखर जाने का प्रयत्न करने लगे।

‘आतिशी चक्कर’ के कई क्रांतिकारी पुलिस के हाथों में पड़ गए थे। गुलाबसिंह अभी तक उनके हाथ नहीं लगा था। वह 29 अगस्त, सन् 1930 का दिन था। प्रातः लगभग दस बजे वह शहर छोड़ने के इरादे से बाहर खेतों में पहुँच गया। उसका विचार था कि पैदल-पैदल जंगल के रास्ते वह कहीं निकल जाएगा। उसने दो व्यक्तियों को देखा, जो उसकी गतिविधियों पर दृष्टि रखे हुए थे। उनमें से एक ने आवाज दी—
‘‘सरदारजी, जरा ठहरिए। हमें आपसे काम है।’’
उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही वे दोनों गुलाबसिंह की ओर लपक पड़े। गुलाबसिंह के पास भागने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। उसे भागते देख दोनों व्यक्तियों ने सीटियाँ बजाना प्रारम्भ कर दिया और देखते-ही-देखते कई लोग इधर-उधर से दौड़ पड़े तथा उसे पकड़ लिया गया। गुलाबसिंह को गिरफ्तार करके वे लोग पुलिस स्टेशन ले गए। उसके पैरों में बेड़ियाँ और हाथों में हथकड़ियाँ डाल दी गईं। दोपहर को एक थानेदार गुलाबसिंह के पास पहुँचा और उससे पूछताछ प्रांरभ की—

‘‘तुम क्रांतिकारी दल में कब सम्मिलित हुए थे ?’’
‘‘मैं किसी क्रांतिकारी दल के विषय में नहीं जानता और न मैं किसी दल का सदस्य हूँ।’’
‘‘तो फिर तुम क्या करते हो ?’’
‘‘मैं खालसा विद्यालय का विद्यार्थी हूँ।’’
‘‘क्या पुलिस से तुम्हारी कोई दुश्मनी है ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तो फिर तुमने पुलिस के आदमियों की जान लेने के लिए पंजाब के छह शहरों में बम क्यों रखे थे ?’’
‘‘न मैंने बम रखे थे और न मुझे उनके बारे में कोई जानकारी है।’’

गुलाबसिंह के उत्तरों से थानेदार बहुत निराश हुआ। उसने कहा—‘‘ठीक है, हम दूसरी तरह से इलाज करेंगे।’’
उसे किसी सूनसान स्थान पर ले जाया गया और बड़ी बेरहमी के साथ उसकी पिटाई की गई; पर फिर भी पुलिसवाले उससे कोई भेद नहीं पा सके। पुलिस वालों को यह आश्चर्य था कि जिन यातनाओं से त्रस्त होकर अच्छे-अच्छे अकड़बाज भेद खोल देते थे, उन सभी यातनाओं को यह कोमल शरीर झेल गया और उसने अपने किसी साथी को फँसाने के लिए अपना मुँह नहीं खोला।
पुलिस ने ये हथकंडे सभी गिरफ्तार साथियों के ऊपर आजमाए और उनमें से कुछ कच्चे निकल गए। उन्होंने सारा भेद पुलिस के सामने खोल दिया। उनमें से कुछ मुखबिर भी बन गए।

आखिर ‘आतिशी चक्कर’ के क्रांतिकारियों पर लाहौर षड्यंत्र केस के अंतर्गत एक पूरक मुकदमा चला। सरकारी पक्ष की ओर से पं. ज्वालाप्रसाद ने मुकदमा पेश किया। क्रांतिकारियों के वकील थे लाला श्यामलाल। लाला श्यामलाल बहुत योग्य और देशभक्त व्यक्ति थे। वे उन क्रांतिकारियों को बिलकुल अपने बच्चों की तरह मानते थे।

विशेष ट्रिब्यूनल के सामने दो वर्ष तक मुकदमा चला। इस ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष थे मि. ब्लैकर। 13 दिसम्बर, 1933 को मुकदमे का फैसला सुना दिया गया। फैसले के अनुसार, गुलाबसिंह, व अमरीकसिंह को फाँसी तथा रूपचंद, जहाँगीरीलाल एवं मलिक कुंदनलाल को आजीवन कारावास और मलिक नाथूराम को सात वर्ष का कठोर कारावास की सजाएँ दी गईं। दस अभियुक्तों को दो वर्ष से लेकर चार वर्ष तक कठोर कारावास के दंड दिए गए।
जिन अभियुक्तों को बरी किया गया, वे थे—धर्मवीर, जयप्रकाश, दियानत राय, बंसीलाल और महाराज कृष्ण।
इस मुकदमे में पाँच व्यक्ति मुखबिर बन गए। वे थे—इंद्रपाल, खैरातीलाल, सियाराम, सरनदास और मदनगोपाल। बाद में इंद्रपाल ने अपने बयान बदल दिए और उसने पुलिस के अत्याचारों की अदालत में शिकायत की। अंततः उसे भी मृत्युदंड सुनाया गया।

इस फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील की गई। हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार गुलाबसिंह के भाई अमरीकसिंह को बरी कर दिया गया। गुलाबसिंह और इंद्रपाल के मृत्युदंड घटाकर उन्हें आजीवन कारावास का दंड सुनाया गया।
गुलाबसिंह सोच रहा था कि यदि फाँसी का दंड हो गया होता तो अच्छा था। वह करतारसिंह सराबा तथा सरदार भगतसिंह के साथ स्थान पाने के लिए उत्सुक था।

इंद्रपाल


दिल्ली से मथुरा जानेवाली रेल लाइन के समीप, दिल्ली से लगभग नौ-दस मील के फासले पर एक टूटी-फूटी हुई सराय में एक साधु महाराज धूनी रमाए हुए बैठे थे। उन साधुजी के सिर के बाल और दाढ़ी-मूँछें सभी सफाचट थे। वे गेरुए वस्त्र पहनकर, व्याघ्र-चर्म पर पालथी मारकर बैठे हुए थे। उनके सामने धूनीस्थल में मोटी-मोटी अध-सुलगी लकड़ियों में से धुआँ उठ रहा था। धूनी के पास एक चिलम भी रखी थी। साधु महाराज के पास एक खाली कमंडलु रखा हुआ था साधु महाराज ध्यानावस्थित स्थिति में थे। उसी समय एक सेठ जैसे व्यक्ति ने उनके पास पहुँचकर जोर से आवाज लगाई—
‘‘साधु महाराज की जय !’’

साधु महाराज ने थोड़े से नेत्र खोले और आशीर्वाद दिया—
‘‘खुश रह, बच्चा !’
साधु महाराज और आगंतुक शिष्य दोनों ने ही इधर-उधर झाँककर यह देखना चाहा कि वहाँ उनके अतिरिक्त कोई और तो नहीं है। जब उन्हें यह विश्वास हो गया कि वहाँ और कोई नहीं है तो उनमें धीरे-धीरे बातें होने लगीं। आगंतुक शिष्य ने प्रश्न किया—
‘‘कहिए महाराज ! यहाँ आपको कोई कष्ट तो नहीं है ?’’
‘‘कष्ट की क्या पूछता है, बच्चा, अभी तो यहाँ कष्ट ही कष्ट है। सबसे बड़ा कष्ट तो यह है कि पिछले दो दिन से केवल पानी पर ही गुजारा हो रहा है, खाने को कुछ भी नहीं मिला।’’
‘‘क्यों महाराज, क्या आप भिक्षाटन को नहीं गए या गाँववालों ने कुछ दिया ही नहीं ?’’

‘‘गया तो था बच्चा, लेकिन जिस घर पर पहली आवाज लगाई, उस घर से सिर्फ एक मुट्ठी भर आटा ही मिला। दूसरे घर जाने में बहुत संकोच हुआ। वह मुट्ठी-भर आटा मैंने गाँववालों के सामने चीटियों के भिटे पर डाल दिया। एक गाँववाले ने इसका कारण पूछा तो उससे कह दिया कि जब आटा थोड़ा हो तो उससे छोटे प्राणियों का पेट भरना चाहिए। जब आटा ज्यादा होगा तो उससे मैं अपना पेट भरूँगा।’’
‘‘तो महाराज, आप दो दिन से भूखे हैं। मुझे बताइए कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?’’
साधुजी ने इधर-उधर देखकर अपने शिष्य को गाली देते हुए कहा—
‘‘अबे साले, पूछता ही रहेगा या कुछ खाने के लिए भी लाएगा ! साइकिल से दौड़ता हुआ दिल्ली जा और खाने के लिए कुछ ला। भूख के मारे मेरे तो प्राण ही निकले जा रहे हैं।’’

बातचीत से स्पष्ट हो गया कि न तो साधु महाराज असली थे और न ही उनका शिष्य। वे दोनों ही क्रांतिकारी थे और किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु साधु महाराज ने वहाँ धूनी रमाई थी। साधु महाराज का असली नाम इंद्रपाल था और उनके शिष्य का नाम यशपाल था। यशपाल बम विस्फोट से वाइसराय लॉर्ड इरविन की ट्रेन को उड़ाना चाहते थे और दिल्ली के निकट तेहखंड का वह स्थान उन्होंने इस कार्य के लिए उपयुक्त समझा था। उन्होंने लाहौर से अपने क्रांतिकारी साथी इंद्रपाल को बुलाकर टूटी-फूटी सराय में उसे साधु के वेश में टिका दिया था, जिससे वह सवारीगाड़ियों और विशेष रूप से रात के समय मालगाड़ियों के आने-जाने का समय नोट करता रहे; क्योंकि रेलवे टाइम टेबिल में मालगाड़ियों के आने-जाने का समय नहीं रहता। इंद्रपाल को यह काम भी दिया गया था कि वह यह भी देखता रहे कि गश्त देने वाले पुलिसवाले कब-कब पहुँचते हैं और कब सूनसान रहता है।

इंद्रपाल लाहौर का एक अच्छा कातिब था। उसका लेखन बहुत अच्छा था और वह उर्दू की किताबत करता था। यशपाल के संपर्क से वह क्रांतिकारी भगवतीचरण बोहरा, सरदार भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद और दल के अन्य क्रांतिकारियों से जुड़ा हुआ था। वह अच्छा क्रांतिकारी सिद्ध हो सकेगा या नहीं, इसके लिए चंद्रपाल ने स्वयं अपने ऊपर कुछ विचित्र प्रयोग किए थे।

इंद्रपाल की मान्यता थी कि नारी का आकर्षण बड़े-बड़े साधु-संन्यासियों और क्रांतिकारियों को विचलित कर देता है। नारी आकर्षण से वह विचलित होगा या नहीं, इसकी जाँच करने वह एक रात एक वेश्या के पास जा पहुँचा और एक पूरी रात के पैसे उसे पेशगी दे दिए तथा उसके साथ पलंग पर लेटा रहा। उस वेश्या से गपशप लड़ाते हुए उसने पूरी रात निकाल दी और उससे तनिक भी छेड़छाड़ नहीं की। वेश्या के पास इस प्रकार का पहला ही ग्राहक पहुँचा था। वेश्या ने पीर या औलिया समझा और सुबह उसके पैर छूकर सारे पैसे उसे लौटा दिए। अपने संयम पर इंद्रपाल को संतोष हुआ।

इंद्रपाल को यह भी मालूम था कि गिरफ्तार हो जाने पर कुछ क्रांतिकारी पुलिस की यातनाएँ सहन नहीं कर पाते और वे दल के सारे भेद बता देते हैं। गिरफ्तारी के पश्चात् पुलिस की यातनाओं से कहीं मैं तो कच्चा नहीं पड़ जाऊँगा, इसके लिए भी उसने अपनी जाँच करनी चाही। एक बार वह ऐसे स्थान पर जा पहुँचा, जहाँ रुका पानी मच्छरों और डाँसों का प्रजनन स्थल बना हुआ था। भैंस जैसा प्राणी भी उन मच्छरों को बरदाश्त नहीं कर पाता था। इंद्रपाल नंगे बदन होकर उस स्थान पर बैठ गया और रात-भर वहाँ बैठा रहा। लाखों मच्छरों ने अपनी समस्त शक्ति के साथ इंद्रपाल के खुले बदन पर चाँदमारी की; लेकिन इंद्रपाल टस-से-मस नहीं हुआ। उसने मच्छरों को भगाने या शरीर को खुजाने के लिए भी हाथ नहीं हिलाया। सुबह होते-होते उसका पूरा बदन ऐसा हो गया था जैसे चेचक निकली हो। स्वयं के द्वारा निर्धारित परीक्षा में वह खरा उतरा।

इंद्रपाल के इन्हीं गुणों को देखकर यशपाल ने उसे साधु के रूप में धूनी रमाने के लिए चुना था। लगभग एक महीने तक भूख और प्यास की चिंता किए बिना वह तेहखंड की टूटी-फूटी सराय में साधु के वेश में धूनी रमाए रहा तथा गाड़ियों के आने-जाने और पुलिस के गश्त लगाने के समय को नोट करता रहा। इस बीच आसपास के गाँववालों में उसकी सिद्धि की धाक जम गई थी और उसकी धूनी की भस्मी से लोगों की दुःख-बीमारियाँ दूर होने लगी थीं तथा उसके भाग्य खुलने लगे थे। इधर दिल्ली में यशपाल और भगवतीचरण रेलवे के नीचे बम रखने की तैयारियाँ करते रहे और उन्होंने सब तरह की तैयारियाँ पूर्ण भी कर डालीं। एक रात यशपाल एवं इंद्रपाल ने मिलकर रेलवे लाइन के नीचे जमीन खुरचकर बम रख दिए और फिर जमीन को ठीक-ठाक कर दिया। बम में चिनगारी पहुँचाने के लिए बिजली के दो तार उसके अंदर तक पहुँचाए गए थे और इन दोनों तारों को जमीन के अंदर-अंदर दूर तक पहुँचाकर एक झाड़ी में रखी बैटरी के साथ उनका संबंध स्थापित किया गया।

जो दिन बम विस्फोट के लिए नियत किया गया था, उसके पहले इंद्रपाल को सराय से हटाकर लाहौर भेज दिया गया। उसके स्थान पर एक नए साथी भागराम को यशपाल ने अपने साथ रखा।
23 दिसंबर, 1929 को सुबह लगभग छह बजे यशपाल ने बम का विस्फोट कर दिया। वाइसराय की गाड़ी को क्षति तो पहुँची, लेकिन वे स्वयं बाल-बाल बच गए।
इंद्रपाल जब लाहौर पहुँचा तो उसने सोचा कि मुझे किसी के आधीन रहकर कार्य नहीं करना चाहिए। परिणामतः उसने लाहौर के नौजवानों को भर्ती करके अपना एक नया क्रांतिकारी दल बना डाला और उसका नाम रखा—‘आतिशी चक्कर’। इस दल में उसने यशपाल के भाई धर्मपाल को भी लिया। गुलाबसिंह नाम का एक सिख नौजवान उस दल में विशेष रूप से सक्रिय था।

‘आतिशी चक्कर’ के सदस्यों ने स्वयं के प्रयत्नों से एक विशेष प्रकार के बम के निर्माण में सफलता प्राप्त की। उन्होंने पटाखे एवं आतिशबाजी के काम आनेवाली सामग्री का उपयोग किया तथा बम के खोल के अंदर कीलें और काँच के टुकड़े आदि भरे। बारूद लगे हुए पलीते का एक सिरा बम के अंदर रहता और दूसरे सिरे को एक मोमबत्ती के सिरे के साथ जोड़ दिया जाता था। मोमबत्ती जलते-जलते जब बारूदी पलीते के पास पहुँचती थी तो पलीता आग पकड़ लेता था और भीषण धमाके के साथ बम का विस्फोट हो जाता था।

उन दिनों पंजाब की पुलिस क्रांतिकारियों की धर-पकड़ कर रही थी। पुलिस से बदला लेने के लिए ‘आतिशी चक्कर’ के क्रांतिकारियों ने एक योजना बना डाली। एक साथ पंजाब के छह नगरों में बम विस्फोट का निर्णय लिया गया। ये नगर थे-लाहौर, अमृतसर, लायलपुर, शेखपुरा, गुजराँवाला, और रावलपिंडी।
19 जून, 1930 को किराए पर लिए हुए मकानों में बम रख दिए गए और रात के समय विस्फोट हुए। जहाँ बम रख गए थे वहाँ कुछ संदूकों में पटाखे टाइप के अन्य बम भी रखे गए, जो सामान इधर-उधर करने से ही फट सकते थे। जहाँ-जहाँ बमों का विस्फोट हुआ था, पुलिस वहाँ-वहाँ पहुँची और सामान की तलाशी करते समय संदूकों में रखे गए बम फट गए तथा पुलिस के दो लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा।

गिरफ्तारी के क्रम में ‘आतिशी चक्कर’ के सभी क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गए। उनपर मुकदमे चले और बड़ी-बड़ी कठोर सजाएँ उनको मिलीं।
‘आतिशी चक्कर’ का नेता इंद्रपाल भी गिरफ्तार हुआ। इस समय तक उसके जीवन की स्थितियाँ बदल चुकी थीं। उसकी शादी हो चुकी थी। वह इंद्रपाल, जो बड़ी-बड़ी परीक्षाओं में खरा उतरा था, यह सहन नहीं कर सका कि उसके जेल जाने या फाँसी होने के कारण उसकी नव विवाहिता पत्नी का जीवन नरक बन जाए। वह पुलिस का मुखबिर बन गया और क्रांतिकारी दल के सारे भेद पुलिस को बता दिए।

इंद्रपाल की आत्मा उसे कचोटती रही कि उसने अच्छा नहीं किया। उसने निर्णय कर लिया कि मामला अदालत में जाने दो, फिर देखा जाएगा। मामला अदालत में पहुँचा तो इंद्रपाल ने अपने बयान बदल दिए। इतना ही नहीं, उसने अदालत में पुलिस का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया कि उसने किस-किस क्रांतिकारी को कौन-कौन-सी यातनाएँ दी हैं। अपनी पोल खुल जाने पर पुलिस बहुत बौखलाई और इंद्रपाल उसका कट्टर शत्रु बन गया। पुलिस ने बदला लेने के लिए इंद्रपाल को फँसाने में अपनी सारी शक्ति लगा दी।
जब लाहौर की अदालत ने अपना फैसला सुनाया तो अन्य मुखबिरों को तो बरी कर दिया गया, लेकिन इंद्रपाल को आजीवन कारावास का दंड दिया गया। आजीवन कारावास का दंड़ भुगतते हुए इंद्रपाल को अफसोस नहीं हुआ। उसे संतोष था कि गलत रास्ते पर कदम रखकर भी वह सही रास्ते पर पहुँच गया।



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