कोई अजनबी नहीं - शैलेश मटियानी Koi Ajnabi Nahin - Hindi book by - Shailesh Matiyani
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कोई अजनबी नहीं

शैलेश मटियानी

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3300
आईएसबीएन :81-88267-45-7

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एक सामाजिक उपन्यास....

Koi Ajnabi Nahin

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


शैलेश मटियानी हिंदी के शार्षस्थ उपन्यासकार थे। भारतीय कथा साहित्य की जनवादी जातीय परंपरा से शैलेश मटियानी के कथा साहित्य का अटूट रिश्ता है। वे दबे-कुचले, भूखे-नंगों, दलितों-उपेक्षितों के व्यापक संसार को बड़ी आत्मीयता से अपनी कथा में पनाह देते हैं। उपेक्षित और बेसहारा लोग ही मटियानी की रचना की ताकत हैं। दलित एवं उपेक्षित जीवन का व्यापक और विशाल अनुभव तथा उनकी जिजीविषा और एवं संघर्ष को अपनी कथा-रचना में ढ़ाल देने की सिद्धहस्तता मटियानी को कथा के शिखर पर पहुँचाती है।

इस उपन्यास द्वय में शैलेश मटियानी के दो सामाजिक उपन्यास ‘कोई अजनबी नहीं’ और ‘मंजिल-दर-मंजिल’ प्रस्तुत हैं। दोनों उपन्यास कारुणिक, मार्मिक व ह्रदयस्पर्शी हैं, जो पाठकों के अंतर्मन को छू जाएँगी।

1


तेज धूप निकल आने से कँपकँपी छूटनी बंद हो गई तो रामप्यारी सोचने लगी कि कहीं कोई उसे तब से यहाँ बस-स्टैंड के पास ही खड़ी न देख रहा हो, जब से वह उमर हुसैन ताँगेवाले की कोठरी से निकलकर आई है।
रामप्यारी जब उमर हुसैन ताँगेवाले की कोठरी से बाहर निकल आई थी, उस समय घना कुहरा छाया हुआ था और ठंडी हवा आर-पार ऐसे सनसना रही थी कि वह अपने को किसी बर्फीली नदी में बहता हुआ-सा महसूस कर रही थी। गुस्से और घबराहट में वह लोई भी उमर हुसैन ताँगेवाले के यहाँ ही छोड़ आई थी और अब सिर्फ धोती और कुरती में उसे ठंडी हवा अपनी सारी देह में काँटीले के पत्तों की तरह चुभती हुई लग रही थी। जैसे काँटा या सुई चुभने पर देह में कँपकँपी-सी उठती है और नसों में बहता हुआ खून पीछे को लौटता हुआ-सा महसूस होता है-तीखी ठंडी हवाओं के बीच में फँसे हुए अपने कद्दावर जिस्म को रामप्यारी ने ठीक वैसे ही पीछे को लौटता हुआ-सा महसूस किया था। उसे याद आया था, जिस समय रेलवे स्टेशन से यहाँ निजामुद्दीन अपने घर तक लाने के लिए उमर हुसैन ने उसे ताँगे पर बैठाया था, उस समय और भी घना कुहरा छाया हुआ था। हवा उस समय जरूर थमी हुई थी। रामप्यारी ने देखा, खुद ताँगे पर चढ़ने से पहले अमर हुसैन ने घोड़ी के पुट्ठे पर जोर से थाप मारी थी।...और घोड़ी अपने सारे जिस्म को कँपकँपाते हुए कई कदम पीछे तक हटती चली गई थी।

रामप्यारी को याद आता रहा था, जब अमर हुसैन ने उसकी पीठ पर हाथ मारते हुए कहा था कि ‘बिगड़ती क्यों है, बीबी ? हथिनी का एक ही दरवाजे के आगे खड़ा रहना ठीक रहता है,’-तब रामप्यारी भी ठीक वैसे ही कई कदम पीछे हट आई थी।
ठंड तब भी बहुत थी।
रामप्यारी अब भी यह महसूस करती है कि जिस समय उमर हुसैन ताँगेवाले ने घोड़ी के पुट्ठे पर थाप मारी थी, उस समय वह ठंड से काँपती हुई पीछे नहीं हटी होगी। रामप्यारी यह भी महसूस करती रही है कि अपनी पीठ पर उमर हुसैन की हथेली की थाप पड़ने पर भी उसका कद्दावर जिस्म नहीं हिला था बल्कि अंदर कोई ऐसी चीज हिलती चली गई थी, जिससे उसे अपने सिर्फ औरत जात ही नहीं बल्कि राजपूतनी होने का बोध भी बना ही रहता है। जितनी देर तक अंदर कँपकँपी उठती रहती है, बाहर की ठंड नहीं चुभती। रामप्यारी ने कँटीले के पत्तों की तरह पीठ पर चिपककर, बर्फीली लहर की तरह आर-पार सनसनाती हुई तीखी हवा को तब तक महसूस नहीं किया था, जब तक उमर हुसैन की कोठरी से काफी दूर नहीं निकल आई थी।

रामप्यारी सोचती रही है कि उमर हुसैन ने उसकी नंगी पीठ पर कँटीले का पत्ता चिपका दिया होता तो वह बरदाश्त कर सकती थी। कँटीले के पत्ते की चुभन औरत जात के आत्म-बोध के उस हिस्से तक नहीं पहुँच पाती है, जहाँ तक किसी पुरुष की हथेली का स्पर्श पहुँच जाता है। रामप्यारी ने उन ठंडी हवाओं को बरदाश्त कर लिया था, जो उसके कद्दावर जिस्म को किसी बर्फीली नदी में डूबती हुई चट्टान की तरह हिलाती चली जा रही थीं।
अब कोहरा छँट चुका है। धूप लोहे के तसले में से बिखरते हुए चावलों की तरह फैलती चली जा रही है। रामप्यारी धीरे-धीरे सहमती हुई-सी अपनी छोटी-छोटी आँखें उघाड़ती है। रामप्यारी को लगता है जैसे कुछ देर पहले कोहरे को चीरती हुई किरणें सिलेटी रंग की चूनर में काढ़े हुए चाँदी के एकदम महीन-महीन तारों की तरह साफ-साफ दिखाई दे रही थीं, अब ठीक वैसे ही खोमचे और स्कूटरवालों की दृष्टियाँ उसके साँवले कद्दावर जिस्म पर फैलती जा रही हैं। रामप्यारी सामने की कोठियों की तरफ को मुँह फेर लेती है, लोगों की नजरें उसे अपनी पीठ पर सफेद कनखजूरों की तरह रेंगती हुई महसूस होती हैं वह जानती है कि लोगों का उसे यों देखना स्वाभाविक ही है। न जाने कितनी बसें जा चुकी हैं दोनों ओर को, मगर रामप्यारी बस-स्टॉप पर ही खड़ी-की-खड़ी है। न जाने कितने लोग यहाँ पर एकत्र हुए हैं और फिर कोहरे की तरह छँट गए हैं, मगर वह अभी भी यहीं ऐसी चट्टान की तरह खड़ी है, जिसपर से किसी बर्फीली नदी की बाढ़ का पानी गुजर गया हो।

हो सकता है, बगल के चाय के खोमचेवाले ने स्कूटरवाले सरदारजी से यह बात रामप्यारी को सुनाकर कही हो कि ‘सरदारजी, दिल्ली शहर की यह सख्त सर्दी तो वही शख्स बरदाश्त कर सकता है, जिसके पास जिस्म सेंकने के लिए बगैर कोयलोंवाली सिगड़ी हो।’
और, हो सकता है, सरदारजी ने भी सिर्फ खोमचेवाले को सुनाकर ही यह कहा हो कि ‘अरे, याराँ, बगौर कोयलोंवाली सिगड़ी तो कोई नहीं होती, बादशाहो ! इत्ता फर्क जरूर हौंदा सी, याराँ, कि किसी में सिर्फ दो कोयले सुलगते हैं जी, किसी में दो किलो !’
हो सकता है, खोमचेवाले ने सरदारजी को यह जवाब देते समय रामप्यारी की ओर कोई संकेत न किया हो कि ‘सरदारजी, तब तो कोयले नहीं बल्कि कंडे बोलो, कंडे।’

हो सकता है, सिर्फ रामप्यारी ही लोगों की नजरों को अपनी पीठ पर कँटीले के पत्तों की तरह चिपकता हुआ महसूस कर रही हो और उसे कोई देख भी न रहा हो। मगर रामप्यारी अपनी धोती को कुरती पर दोहरा कर लेती है।
जिंदगी में रामप्यारी पहली बार शहर में पहुँची है और वह भी दिल्ली जैसे बड़े शहर में। मगर जो कुछ रामप्यारी महसूस कर रही है, यह सबकुछ जिंदगी में सिर्फ पहली ही बार नहीं महसूस हो रहा है। उसके कद्दावर जिस्म को कँटीले के पत्तों-जैसे चुभनवाली नजर से देखनेवाले उसके गाँव और कस्बे में भी कम नहीं थे। पुरुषों की हथेलियों और आँखों के स्पर्श से अपने को कई कदम पीछे हटता हुआ महसूस करने की मनःस्थिति रामप्यारी के लिए बहुत पुरानी है। ऐसी स्थितियों में उसने अपने को हमेशा पीछे को सिमटता हुआ सा अनुभव किया है, जब उसे यह बोध हुआ है कि उसकी कद्दावर देह को आस-पास खड़े मर्द ठीक वैसी ही आँखों से घूरते जा रहे हैं, जैसे हथिनी को पहली-पहली बार देखनेवाले बच्चे अपने कौतूहल को नहीं सँभाल पाते हैं और मुट्ठियों में भर-भरकर धूल-कंकर हथिनी की ओर उछालने लगते हैं।

पीठ पर ठंड बरदाश्त की जा सकती है, लू बरदाश्त की जा सकती है, पीठ पर कँटीले के पत्ते और रेंगते हुए कनखजूरे बरदाश्त किए जा सकते हैं। इस हद तक बरदाश्त किए जा सकते हैं कि इनकी चुभन से सिर्फ अपनी देह में ही कँपकँपी, तपिश या बेचैनी अनुभव हो। रामप्यारी अनुभव करती है कि पीठ पर चुभती हुई मरदों की हथेलियाँ और आँखें इस सीमा तक नहीं सही जा सकती हैं कि किसी एक ओर को मुँह फेरकर खड़ा रहा जा सके।

रामप्यारी बिलकुल नहीं चाहती थी कि स्कूटरवाले सरदारजी की तरफ देखे, मगर उसने देखा। हो सकता है, सरदारजी ने खोमचेवाले की ओर आँखें टिमटिमाई हों। हो सकता है, सरदारजी की मूँछें नींद या सरदी के कारण बड़ी देर तक हिलती रही हों। रामप्यारी जानती है कि ठंड से सुन्न पड़ी हुई अंगुलियाँ भी एकाएक धूप मिलने पर बड़ी देर तक हिलती रहती हैं। रामप्यारी जानती है कि तेज धूप पड़ने पर ओस से भीगा हुआ कँटीले का पत्ता भी बड़ी देर तक काँपता रहता है।
मगर रामप्यारी फिर भी अपने को यह महसूस करने से नहीं रोक पाती है कि उसके साँवले और कद्दावर जिस्म को देखकर भी कई तमाशाई मरदों की आँखें, पलकें और मूँछें बड़ी देर तक हिलती रहती हैं।

अपने गाँव और कस्बे में भी रामप्यारी ऐसा अनुभव करने की मनःस्थितियों से गुजरती रही है। गाँव और कस्बे में भी रामप्यारी ने तीखी-बर्फीली हवाएँ बरदाश्त की हैं। रामप्यारी के लिए ऐसा सबकुछ बरदाश्त करना अब नया नहीं रह गया है। मगर दिल्ली जैसे बड़े शहर में भी अपने गाँव और कस्बे की अनुभूतियों का ज्यों-का-त्यों बना रह जाना जरूर नया लगता है। मगर शहर नया नहीं लगता है। गाँव और कस्बों की तरह ही इतने बड़े शहर में भी पीठ पर कँटीले के पत्तों का ज्यों-का-त्यों बना रहना जरूर नया लगता है। रामप्यारी गाँव छोड़कर हरिहर सिंह अहीर के साथ कस्बे में सिर्फ इसीलिए गई थी कि अपने ही मायके के लोगों का अपने को तमाशाइयों की तरह देखना उससे बरदाश्त नहीं हो पाया था।

 रामप्यारी कस्बे को छोड़कर मातादीन सिंह चौकीदार के साथ दिल्ली शहर को भी सिर्फ इसलिए चली आई थी कि शायद दिल्ली जैसे बड़े शहर शाहपुर जैसे कस्बे से एकदम नया-नया लगे। शायद दिल्ली जैसे बड़े शहर में वह अपने को अजनबी पा सके और यह महसूस कर सके कि उसका कद्दावर जिस्म पीठ पर लदे हुए नागफनी के पत्ते और कँटीले के पौधों के बोझ से मुक्त हो गया है। मगर अब चूँकि दिल्ली शहर में आकर भी रामप्यारी बिलकुल वैसी ही अनुभूतियों से घिरती चली जा रही है-महसूस कर रही है कि जगह बदलने मात्र से अपने अंदर का वह आत्म-बोध कहीं भी नहीं बदल पा रहा है, जो पुरुषों की हथेलियों को नागफनी के पत्तों और दृष्टियों को कँटीले के पौधों की तरह से पीठ पर चिपकता हुआ महसूस करता है-उसको दिल्ली शहर भी शाहपुर कस्बे से नया नहीं लग पा रहा है।

रामप्यारी एक छोटे से कस्बे से इतने बड़े शहर में आकर भी अपने को जरा सा भी अनजबी महसूस नहीं कर पा रही है। रामप्यारी महसूस कर रही है कि किसी भी जगह या आदमी का सिर्फ उसके कद्दावर जिस्म के लिए-उसकी छोटी-छोटी आँखों के लिए-अजनबी होना, उसकी मनःस्थितियों और अनुभूतियों के लिए अजनबी होना कदापि नहीं है। रामप्यारी महसूस करती है कि उसके लिए औंरों का अजनबी होना तब तक कोई मूल्य नहीं रखता, जब तक वह खुद दूसरों के लिए अजनबी न हो।...मगर जहाँ भी वह जाती है, कुछ लोगों के बीच में घिरी रहती है-जैसे कि इस समय खोमचेवालों और स्कूटरोंवालों के बीच में उसे खड़ा होना पड़ रहा है-वहाँ उसे हर नया आदमी भी बखूबी पहचानता होता है।

रामप्यारी महसूस करती है कि उस जैसी कद्दावर औरत के जिस्म को जिस रूप में गाँव के लोग देखते थे, ठीक उसी रूप में कस्बे के लोगों ने भी देखा था। और अब इस दिल्ली शहर में भी वह हरेक के द्वारा अपने को ठीक उसी तरह देखा जा रहा महसूस कर रही है, तो दोहरी धोती के बावजूद उसे ऐसा लग रहा है कि वह कहीं अपने ही कद्दावर जिस्म के किन्हीं हिस्सों को उपलों की तरह सुलगता हुआ महसूस कर रही है। बार-बार साँस चढ़ती हुई सी लग रही है और उपले और ज्यादा सुलगते हुए से महसूस हो रहे हैं। रामप्यारी धोती को छाती के पास तिहरा-चौहरा कर लेना चाहती है, मगर जानती है कि अपने कद्दावर जिस्म को कपड़ों से ढाँकना अपने को औरों के लिए अजनबी बनाना कदापि नहीं हो सकता।

और जब तक व्यक्ति औरों के लिए अजनबी न बन सके, खुद को भी दूसरों के लिए अजनबी बना सकने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। रामप्यारी अपनी छोटी-छोटी आँखें की पुतलियों को बरामदे में टँगी हुई लालटेनों की तरह नीचे की ओर झुकाती है। अपने कद्दावर जिस्म को देखती है। दिल्ली में आने के बाद से उसने अभी तक अपनी जितनी कद्दावर औरत कोई नहीं देखी है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि शायद जितने लोगों ने रामप्यारी को देखा है, उनमें से भी बहुतों ने कोई रामप्यारी जितनी कद्दावर औरत दूसरी न देखी हो ! मगर इसके बावजूद शायद, हर आदमी उसके कद्दावर जिस्म से परिचित है।...और रामप्यारी जानती है कि जिन लोगों की आँखों के सामने अपनी देह अजनबी न हो, उनके लिए अपनी आत्मा अजनबी रह जाती है।

रामप्यारी महसूस करती है कि उसके कद्दावर जिस्म को हर आदमी पहचान सकता है, मगर उसकी भीड़ में खोई हुई छोटी बच्ची जैसी उस आत्मा को-उसके औरत जात होने के उस बोध को-कोई नहीं पहचान पाता है, जो इतने बड़े शहर में एकदम बेसहारा हो जाने पर भी इसलिए, सिर्फ इसीलिए जी भरकर रो भी नहीं सकती है कि उसे गाँव के बिरखा चौधरी की कही हुई बात हमेशा याद रहती है।
बिरखा चौधरी के पास जब वह कभी बच्ची की तरह रोने-बिलखने लगती थी, तो बिरखा चौधरी तीखी आवाज में कह देते थे-‘रामप्यारी, यों हिया तोड़ के न रोया कर औरों के सामने, बेटी ! तेरा रोना किसी की समझ में नहीं आएगा। कहा जो है सुसरा कि हथिनी को पेशाब करते हरेक देख लेता है, आँसू बहाते कौन देखता है ?’

न जाने किस चीज के बारे में खोमचेवाला सरदारजी से कह रहा है-‘‘साढ़े तीन रुपए किलो के भाव से पूरे सात सौ की बैठेगी, सरदारजी ! दो क्विंटल तो कहीं नहीं गई। बौनी में बिठा ले जाओ।’’
हँसी के कारण सरदारजी की पगड़ी सिर पर से गरदन की ओर उतरती जा रही है-‘‘अक्ख-अक्ख-अक्ख...याराँ, की केंदा सी तुसी ? मैं बोल्या डी.टी.यू. की बस के टायर भी बैठ जावेंगे, बादशाहों ! अक्ख-अक्ख-अक्ख...’’
रामप्यारी की पीठ पर कँटीले के पौधों की चुभन और छाती में उपलों की आँच बढ़ती जा रही है। याद आ रहा है, बिरखा चौधरी का कहना कि ‘बेटी, ईश्वर ने तुझे जितना बड़ा तन दे रखा है, ना, बस इतना ही बड़ा मन तू बना ले, फिर तुझे किसी की दीठ नहीं लगेगी।’

मगर नजर तो व्यापती है। जहाँ कहीं भी व्यक्ति अपने बाहरी अस्तित्व में औरों के लिए अजनबी नहीं हो पाता है, वहाँ उसे औरों की दीठ जरूर व्यापती है।
नहीं, इतनी बसें छूट गई हैं, तो और भी छूटती चली जाएँगी। रामप्यारी इस बस में भी नहीं जा पाएगी। दोपहर होने को आ गई है। कहीं कोई जगह अपनी निर्णय-शक्ति के वश में होती तो रामप्यारी अब तक बस में बैठकर चली भी गई होती। लेकिन जहाँ जाती, वहाँ भी इससे और नया क्या होता।

रामप्यारी फिलहाल किसी जगह पहुँचने की अपेक्षा अजनबी होने की स्थिति में पहुँचना चाहती है। कोई सज्जन अपनी पाँच-छह वर्षों की बच्ची की अंगुली पकड़े ठीक रामप्यारी के समीप खड़े हो गए थे-बस की प्रतीक्षा में। रामप्यारी ने महसूस किया कि शायद वे सज्जन भी एक बार उसकी ओर और दूसरी बार अपनी बच्ची की ओर देख रहे हैं। रामप्यारी अपनी आँखों की पुतलियों को उबलती चाशनी में डाले गए आँवले के दानों की तरह घूमता महसूस कर रही है। रामप्यारी को एक बार अपने को, एक बार उस बच्ची को देखा जाना बुरा नहीं लग रहा है। रामप्यारी को शायद, सिर्फ अपना यह महसूस करना बुरा लग रहा है कि उसे देखने और बच्ची को देखने में फर्क किया जा रहा है।

रामप्यारी ने उस बच्ची को ऐसे देखा, जैसे कोई बच्ची सयानी औरत को देखती है।...और तब उसे लगा कि वह खुद भी उस बच्ची को अलग और, उसकी तुलना में, अपने को बिलकुल अलग दृष्टि से देखने की कोशिश कर रही है। रामप्यारी की इच्छा हो आई कि वह थोड़ा सा हँस ले। हर नई अनुभूति पर थोड़ा हँस लेना या रो लेना अपने को अपने ही लिए अजनबी पा लेने का क्षण होता है। रामप्यारी को लगा कि इस बच्ची को वह पहली-पहली बार देख रही है। उसके पिता को भी पहली-पहली बार देख रही है। और बार-बार अपनी बेटी के माथे को चूमता हुआ वह व्यक्ति उसे अजनबी लग रहा है।

रामप्यारी चाहती है कि इस बच्ची को ले जानेवाली बस थोड़ी देर तक नहीं आए। रामप्यारी ने देख लिया है कि बच्ची की एक चोटी का रिबन खुल गया है, मगर उसके पिता का या तो उधर ध्यान नहीं है और या वह उसकी माँ के लिए रिबन को खुला छोड़ दिया करता है।...रामप्यारी अपनी छोटी-छोटी आँखों को थोड़ा सा और उधाड़ लेती है। वह किसी ऐसे ही-या शायद इसी-खुले हुए रिबन को ठीक से बाँध देना चाहती है। कस्बे के डॉक्टर साहब के यहाँ आया की नौकरी करते हुए रामप्यारी ने ऐसे रिबन बाँधना सीख रखा है कि सहसा देखनेवाले को बच्ची के सिर पर रंगीन तितली के बैठे हुए होने का बोध हो आए। रामप्यारी रिबन को ऐसे गाँठती है कि वह हवा से हिलते-हिलते उड़ती हुई-सी लगने लगती है। रामप्यारी ने कई बार अपनी चोटियों में भी ऐसे ही ‘रिबन’ बाँधे थे और डॉक्टरनी साहिबा ने अपनी किसी सहेली से कहा था कि ‘छिह ! गँवारू औरतों को और ज्यादा फैशन का शौक होता है। हमारे साहब कहते हैं कि बड़ी उम्र में भी बच्चियों के जैसे रिबन बाँधने वाली औरतें बड़ी ‘लस्टफुल’ होती हैं। जब से वो  नई आया रखी है ना, तब से हमारे साहब बहुत हँसते हैं। कहते हैं कि यह मेरे लिए ‘डाइजेस्टिंग-मशीन’ है !’ रामप्यारी यह भी नहीं चाहती थी कि उसे डॉक्टर शर्मा के घर से निकलना पड़े। रामप्यारी यह भी नहीं चाहती थी कि इस बच्ची को...मगर बस आ चुकी है।

रामप्यारी टुकुर-टुकुर देखती रह गई कि बच्ची को उसके पिता ने गोद में उठा लिया है और बच्ची का खुला हुआ रिबन पिता की पीठ पर लटक गया है।
हरिहर सिंह अहीर रामप्यारी को शाहपुर कस्बे में पहुँचाकर खुद वापस लौट गया था। रामप्यारी को शाहपुर कस्बे से पिछले शनिवार को उसी के मायके का मातादीन दिल्ली शहर में ले आया था। रामप्यारी को मातादीन चौकीदार शनिवार की आधी रात को ही बड़े स्टेशन तक ऐसे पहुँचा गया था कि वह खुद तो अपने यार-दोस्तों के साथ कोठरी में रामप्यारी को गालियाँ देता रहा होगा, मगर रामप्यारी उसको ऐसे अपने पीछे-पीछे आता महसूस करती रही थी, जैसे कोई भीड़ में खोई हुई बच्ची किसी ओर से अपने पिता को अपनी ओर आता हुआ पाने की आशा में भीड़ को चीरने की कोशिश करे। रामप्यारी को आज-सोमवार की सुबह-उमर हुसैन ताँगेवाला अपना नाम उमराव सिंह बताकर अपने साथ ले आया था कि उसे किसी साहब के यहाँ आया रखवा देगा।

रामप्यारी हर ओर से विश्वासघात की चोटों से आहत होकर इस बस-स्टॉप की छत के नीचे सुबह से ही खड़ी है।...और रामप्यारी जहाँ भी खड़ी होती है, अपने को भीड़ में खोई हुई बच्ची-जैसा व्याकुल अनुभव करती है। रामप्यारी अपने को अपने ही कद्दावर जिस्म के अंदर रोता हुआ महसूस करती है। रामप्यारी अब भी ऐसा ही अनुभव कर रही है और चाह रही है कि काश, कोई उसे भी यों ही काँखों में हथेलियाँ डालकर ऊपर उठा लेता और इस बस-स्टॉप से ही नहीं, बल्कि इस मनःस्थिति से भी कहीं दूर ले जाकर उसको सबके लिए अजनबी बना देता।
बस को बड़ी दूर तक देखती रही रामप्यारी। फिर उसे लगा कि उस बच्ची का खुला हुआ रिबन उसकी आँखों से नीचे लटकता चला जा रहा है।

रामप्यारी ने महसूस किया कि सिर्फ इसी जगह के लिए नहीं, बल्कि शायद समूची पृथ्वी के लिए वह सिर्फ एक कद्दावर साँवली औरत मात्र है-एक ऐसी कद्दावर औरत, जिसे कोई पुरुष गोद में या कंधे पर नहीं बैठा सकता। अपने ही कद्दावर जिस्म के अछिद्र पिंजरे में कैद उसकी आत्मा सिर्फ इन खोमचेवालों और स्कूटरवालों के लिए ही नहीं बल्कि शायद संसार भर के लोगों के लिए अनजबी है। कहीं किसी के भी पास उसके अंदर की औरत जात को पहचानने वाली आँखें नहीं हैं।
रामप्यारी को याद आ रहा है कि परसों शाम कोठरी में पहुँचने के कुछ ही घंटे बाद जब मातादीन ने रेहड़ी और खोमचेवाले अपने पाँच दोस्तों को भी उसी छोटी सी कोठरी में सोने को कह दिया था तो वह उठ खड़ी हुई थी।
रामप्यारी ने नागफनी के पौधे देख रखे हैं। नागफनी के पत्ते अलग-अलग दिशाओं की ओर तिरछे घूमे हुए होते हैं। छह-छह मरदों के बीच उस छोटी सी कोठरी में सोते हुए रामप्यारी ने ऐसा ही अनुभव किया था। कोई सिरहाने सोया हुआ है तो कोई पायताने और कोई दाहिनी ओर सोया हुआ है तो कोई बाईं ओर। चतुर्भुज के बीच का केंद्रबिंदु काफी छोटा होना चाहिए। रामप्यारी ने महसूस किया था कि वह किसी एक ही अष्टभुज पुरुष के बीच में घिर गई है और मातादीन चौकीदार के मंतव्य का निषेध करती हुई, वह ठीक वैसे ही भिनभिनाई थी जैसे अष्टपाद मकड़े की पकड़ में फँसी हुई कोई मक्खी भिनभिनाती है।

सुगनचंद खोमचेवाला ठीक वैसे ही हँसा था, जैसे स्कूल की लड़कियों को दही-भल्ले खिलाते समय हँसता है। वह कहना चाहता था कि कि ‘हरे राम, इतनी कद्दावर औरत और ऐसी इस्कूल की छोकरियों की जैसी महीन आवाज !’ मगर बोला था-‘‘मातादीन, अरे यार, इस भागवान से बोल कि इसे घबराकर उठ खड़ा होने की जरूरत क्या है भला ? घबराना तो हम लोगों को चाहिए था ?’’
रामप्यारी कहना चाहती थी मातादीन से कि ‘उसका जिस्म नहीं घबराता है, बल्कि उसके अंदर की औरत जात का जी घिना रहा है कि ऐसे मरदों और कुत्तों में कोई फर्क भी हो सकता है’, मगर बोली थी-‘‘क्यों ठाकुर ! क्या कहके बुला लाए थे तुम हमें दिल्ली शहर ? हमने पहले ही नहीं बोला था कि हमारे को घरवाली बनाने में अच्छे-अच्छों की ठकुरैती उतर जाती है ? तुम जैसे मरदों की जात तो चोट्टी औरत जात का हिया नहीं देख सकती ना भड़ैत ? काहे को ले आए थे तुम हमें यहाँ, ये ही कुत्तों लोग के साथ सुलाने को ? त्थू...’’

इसके बावजूद मातादीन चौधरी ने उसका हाथ पकड़ लिया था-‘‘अरी, बैठ भी जा ! यहाँ कोई नजदीक में तेरा मैहर-नैहर थोड़े ही है, जो रिसिया के चली जाएगी ? ऐसे तो पाँच पांडवों की दुरोपदी भी उठके ना खड़ी हुई होगी, जैसे तू हो गई ? तू ही सोच कि अकेला तो तुझे वह रखेगा जिसका दुनिया से जी भर गया हो।’’
सुगनचंद फिर हँस पड़ा था-‘‘अरे मातादीन ! जरा सँभालकर ही नीचे बिठाना, यार ! नहीं तो सीधे सफदरजंग अस्पताल में भरती होना पड़ेगा !’’ नीचे सोए हुए पाँचों उठ बैठे थे।
रामप्यारी झटके से हाथ छुड़ाकर बाहर निकल आई थी। मातादीन भी बाहर तक आ गया था-‘‘तेरे को हम साफ-साफ बता दें, रामप्यारी ! तेरे को मैं लाया ही इसलिए था कि सभी लोगों का साथ निभ जाएगा। अब तू जान कि तेरी जैसी दमदार औरत के लिए तो अकेला मैं रोटी भी नहीं कमा सकता। और दूसरे, तू जान कि दिल्ली शहर में रहने को कोठी तो मेरी है नहीं ? साझे की कोठरी है और सर्दी के दिन हैं। अब तेरे को अपने साथ सुलाकर औरों को बाहर कैसे निकाल दूँ भला ? अगल-बगल बैठ हुए हैं तो तेरा क्या बिगाड़ लेता है भला कोई ? शहर में तो घर-गिरस्तीवाले भी यों ही सोते हैं।’’




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