मुसलमान और शरणार्थी ( सरदार पटेल) - पी. एन. चोपड़ा, प्रभा चोपड़ा Musalman aur Sharnarthi - Hindi book by - P. N. Chopra, Prabha Chopra
लोगों की राय

इतिहास और राजनीति >> मुसलमान और शरणार्थी ( सरदार पटेल)

मुसलमान और शरणार्थी ( सरदार पटेल)

पी. एन. चोपड़ा, प्रभा चोपड़ा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :182
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3312
आईएसबीएन :81-7315-593-3

Like this Hindi book 12 पाठकों को प्रिय

359 पाठक हैं

भारत और पाकिस्तान के युद्ध के समय का वर्णन ....

Musalman aur sharnarthi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सरदार पटेल के राजनीतिक विरोधियों द्वारा उनके बारे में समय-समय पर यह दुष्प्रचारित किया गया कि वे मुसलमान-विरोधी थे। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत थी। उन पर यह आरोप लगाना न्यायसंगत नहीं होगा और इतिहास को झुठलाना होगा। सच्चाई यह थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ लाने के लिए सरदार पटेल ने हरसंभव प्रयास किए। इतिहास साक्षी है कि उन्होंने कई ऊँचे-ऊँचे पदों पर मुस्लमानों की नियुक्ति की थी। वह देश की अंतर्बाह्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे और इस संबंध में किसी तरह का जोखिम लेना उचित नहीं समझते थे।
पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान (अब बँगलादेश) से भागकर आए शरणार्थियों के प्रति सरदार पटेल का दृष्टिकोण अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण था। उन्होंने शरणार्थियों के पुनर्वास एवं उनकी सुरक्षा हेतु कोई कसर बाकी न रखी और हरसंभव आवश्यक कदम उठाए।

प्रस्तुत पुस्तक में मुसलमानों और शरणार्थियों के प्रति सरदार पटेल के स्पष्ट, व्यावहारिक एवं सहानुभूतिपूर्व दृष्टिकोण को स्पष्ट किया गया है। इससे पता चलेगा कि किस प्रकार उन्होंने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की सुरक्षा की।

प्रस्तावना

बहुत दिनों से यह बात योजना में थी कि कुछ ऐसे ग्रंथ सुलभ होने चाहिए, जिनमें सरदार पटेल से संबंधित महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई हो, जो उनके जीवन काल में विवाद का विषय बने रहे तथा सन् 1950 के पश्चात् भी विवादों में घिरे रहे। उदाहरण के लिए, यह महसूस किया गया कि यदि सरदार पटेल को कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति दी जाती तो जैसा कि उन्होंने स्वयं भी महसूस किया था, हैदराबाद की तरफ यह समस्या भी सोद्देश्यपूर्ण ढंग से सुलझ जाती। एक बार सरदार पटेल ने स्वयं एच.वी. कामत को बताया था कि ‘‘यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीरी मुद्दे को निजी हिफाजत में न रखते तथा इसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह इस मुद्दे को भी देश-हित में सुलझा देता।’’

इसी प्रकार से, हैदराबाद के मामले में जवाहरलाल नेहरू सैनिक कारवाई के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने सरदार पटेल को यह परामर्श दिया-‘‘इस प्रकार से मसले को सुलझाने में पूरा खतरा और अनिश्चितता है।’’ वे चाहते थे कि हैदराबाद में की जानेवाली कारवाई को स्थगित कर दिया जाए। इससे राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। प्रख्यात कांग्रेसी नेता प्रो. एन.जी. रंगा की भी राय थी कि विलंब से की गई कारवाई के लिए नेहरू, मौलाना और माउंटबेटन जिम्मेदार हैं। रंगा लिखते हैं कि हैदराबाद के मामले में सरदार पटेल स्वयं महसूस करते थे कि पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री पद पर उनके दावे को निष्फल कर दिया था और इसमें मौलाना आजाद एवं लार्ड माउंटबेटन ने सहयोग दिया था। सरदार पटेल शीघ्र ही हैदराबाद के एकीकरण के पक्ष में थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरू इससे सहमत हीं थे। लार्ड माउंटबेटन की कूटनीति से सरदार पटेल के विचार और प्रयासों को साकार रूप देने में विलम्ब हो गया।

सरदार पटेल के विरोधियों ने उन्हें मुसलिम वर्ग के विरोधी के रूप में वर्णित किया; लेकिन वास्तव में सरदार पटेल हिंदू-मुसलिम एकता के लिए संघर्षरत रहे। इस धारणा की पुष्टि उनके विचारों एवं कार्यों से होती है; यहां तक कि गांधी जी ने भी स्पष्ट किया था कि ‘‘सरदार पटेल को मुसलिम-विरोधी बताना सत्य को झुठलाना है। यह बहुत बड़ी विडंबना है।’’ वस्तुत: स्वतंत्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दिए गए उनके व्याख्यान में हिंदू-मुसलिम प्रश्न पर उनके विचारों की पुष्टि होती है।

इसी प्रकार, निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर लोगों ने नेहरू और पटेल के बीच विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया है तथा जान-बूझकर पटेल और नेहरू के बीच परस्पर मान-सम्मान और स्नेह की उपेक्षा की। इन दोनों दिग्ग्ज नेताओं के बीच एक-दूसरे के प्रति आदर और स्नेह के भाव उन पात्रों से झलकते हैं, जो उन्होंने गांधीजी की हत्या के बाद एक-दूसरे को लिखे थे। निस्संदेह, सरदार पटेल की कांग्रेस संगठन पर मजबूत पकड़ थी और नेहरूजी को वे आसानी से (वोटों से) पराजित कर सकते थे। लेकिन वे गांधीजी की इच्छा का सम्मान रखते हुए दूसरे नंबर पर कमान पाकर संतुष्ट थे। तथा उन्होंने राष्ट्र के कल्याण को सर्वोपरि स्थान दिया।

विदेशी मामलों में सरदार पटेल के विचारों के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है, जो उन्होंने कैबिनेट की बैठकों में स्पष्ट रूप से व्यक्त किए थे तथा पं. नेहरू पर लगातार दबाव डाला कि राष्ट्रीय हित में ब्रिटिश कॉमनवेल्थ का सदस्य बनने से भारत को मदद मिलेगी; जबकि नेहरू पूर्ण स्वराज पर अड़े रहे, जिसका अर्थ था–कॉमनवेल्थ से किसी भी प्रकार का नाता न जोड़ना। किन्तु फिर भी सरदार पटेल के व्यावहारिक एवं मजबूत सहयोग/समर्थन के कारण नेहरू कॉमनवेल्थ का सदस्य बनने के लिए प्रेरित हुए। तदनुसार समझौता किया गया, जिसके अंतर्गत भारत गणतंत्रात्मक सरकार अपनाने के बाद क़ामनवेल्थ का सदस्य रहा।

सरदार पटेल चीन के साथ मैत्री तथा ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के विचार से सहमत नहीं थे। इस विचार के कारण गुमराह होकर नेहरू जी यह मानने लगे थे कि यदि भारत तिब्बत मुद्दे पर पीछे हट जाता है तो चीन और भारत के बीच स्थायी मैत्री स्थापित हो जाएगी। विदेश मंत्रालय ने तत्कालीन महासचिव श्री गिरिजाशंकर वाजपेयी भी सरदार पटेल के विचारों से सहमत थे। वे संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के दावे का समर्थन करने के पक्ष में भी नहीं थे। उन्होंने चीन की तिब्बत नीति पर एक लंबा नोट लिखकर उसके दुष्परिणामों से नेहरू को आगाह किया था।

सरदार पटेल को आशंका थी कि भारत की मार्क्सवादी पार्टी की देश से बाहर साम्यवादियों तक पहुँच होगी, खासतौर से चीन तक, और अन्य साम्यवादी देशों से उन्हें हथियार एवं साहित्य आदि की आपूर्ति अवश्य होती होगी। वे चाहते थे कि सरकार द्वारा भारत के साम्यवादी दल तथा चीन के बारे में स्पष्ट नीति बनाई जाए।
इसी प्रकार, भारत की आर्थिक नीति के संबंध में सरदार पटेल के स्पष्ट विचार थे तथा कैबिनेट की बैठकों में उन्होंने नेहरूजी के समझ अपने विचार बार-बार रखे, लेकिन किसी-न-किसी कारणवश उनके विचारों पर अमल नहीं किया गया। उदाहरण के लिए, उनके विचार में उस समय समुचित योजना तैयार करके उदारीकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। आज सोवियत संघ पर आधरित नेहरूवादी आर्थिक नीतियों के स्थान पर जोर-शोर से उदारीकरण की नीति ही अपनाई जा रही है।

खेद की बात है कि सरदार पटेल को सही रूप में नहीं समझा गया। उनके ऐसे राजनीतिक विरोधियों के हम शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने निरन्तर उनके विरुद्ध अभियान चलाया तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया, जिससे पटेल को अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान मिला। समाजवादी नेहरू को अपना अग्रणी नेता मानते थे। इन लोगों ने पटेल को बदनाम किया तथा उनकी छवि पूँजीवाद के समर्थक के रूप में प्रस्तुत की। इन्होंने सरदार पटेल को क्रांतिकारी माना; लेकिन सौभाग्यवश सबसे पहले समाजवादियों ने ही यह महसूस किया था कि उन्होंने पटेल के बारे में गलत निर्णय लिया है।
प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे महत्त्वपूर्ण तथा संवेदनशील पर विचार करने का प्रयास किया गया है, जो आज भी विवादग्रस्त हैं। इस बारे में स्वयं तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने मई 1959 में लिखा-‘‘सरदार पटेल की नेतृत्व-शक्ति तथा सुदृढ़ प्रशासन के कारण ही आज भारत की चर्चा हो रही है तथा विचार किया जा रहा है।’’ अगर राजेन्द्र प्रसाद ने यह जोड़ा- ‘‘अभी तक हम इस महान् व्यक्ति की उपेक्षा करते रहे हैं।’’ उथल-पुथल की घड़ियों में भारत में होनेवाली गतिविधियों पर उनकी मजबूत पकड़ थी। यह ‘पकड़’ कैसे आई ? यह प्रश्न पटेल की गाथा का एक हिस्सा है।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज गोपालाचारी ने लिखा-‘‘निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। यदि पटेल कुछ दिन और जीवित रहते तो उन्हें यह पद मिल जाता, जिसके लिए संभवत: वे सही पात्र थे। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत चीन और धार्मिक विवादों की कोई समस्या नहीं रहती।’’

लेकिन निराशाजनक स्थिति यह रही कि सरदार पटेल के आदर्शों का बढ़-चढ़कर प्रचार करने वाले तथा उनके कार्यों की सराहना करने वाले भारतीय जनता पार्टी के अग्रणी नेताओं ने कांग्रेस से भी ज्यादा उनकी उपेक्षा की। ‘’सरदार पटेल सोसाइटी’ के संस्थापक एवं यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री एस. निजलिंगप्पा ने अपनी जीवनी ‘माइ लाइफ ऐंड पॉलिटक्स’ (उनकी मृत्यु के कुछ माह पश्चात् प्रकाशित) में लिखा था-

‘‘......आश्चर्य होता है कि पं. नेहरू से लेकर अब तक कांग्रेसी नेताओं को उनकी जीवनियाँ तथा संगृहीत चुनिंदा कार्यों को छपवाकर स्मरण किया जाता है। उनकी प्रतिमाएँ लगाई जाती हैं तथा उनके नामों पर बड़ी-बड़ी इमारतों के नाम रखे जाते हैं। लेकिन सरदार पटेल के नाम की स्मृति में ऐसा कुछ नहीं किया गया। जब हम सरदार पटेल की उपलब्धियों पर विचार करते हैं तो गांधी जी को छोड़कर अन्य कोई नेता उनके समकक्ष नहीं ठहरता। मेरा आशय अन्य नेताओं की समर्पित सेवाओं की प्रतिष्ठा को नीचा दिखाना नहीं है; लेकिन सरदार पटेल की सेवाएँ सर्वोपरि हैं।

‘‘पिछले आठ वर्षों से मैं तत्कालीन प्रधानमंत्री से भी बार-बार अनुरोध करता रहा कि इस सोसायटी को उचित स्तर की इमारत दी जाए। हम वहाँ पर सरदार पटेल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व संबंधी विशेषताओं को प्रदर्शित करना चाहते हैं। यह सोसायटी एक पुस्तकालय बनवाना चाहती है तथा बैठकों के आयोजन की व्यवस्था करना चाहती है। लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ नहीं किया गया, जबकि प्रत्येक प्रधानमंत्री को इस बारे में असंख्य पत्र लिखे और अनेक बार अपील की गई।’’
और अंतत:, डॉ. प्रभा चोपड़ा ने खंड़ों के संकलन और संपादन में मेरी बहुत सहायता की। हम श्री एम.पी. चावला, लेखाधिकारी श्री अरूण कुमार यादव तथा श्री रवीन्द्र कुमार के आभारी हैं, जिन्होंने कुशलता एवं तत्परतापूर्वक पांडुलिपि तैयार की।

-पी.एन.चोपड़ा

भूमिका

सरदार पटेल से मतभेद रखनेवाले तथा उनके राजनीतिक विरोधियों ने निहित स्वार्थोंवश उनकी ऐसी छवि बनाई है कि वे मुसलिम-विरोधी थे तथा उनके प्रति भेदभाव बरतते थे। यहाँ यह ध्यातव्य है कि नीतिगत एवं महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर पं. जवाहरलाल नेहरू तथा वल्लभभाई पटेल के बीच मतभेद थे।

राष्ट्रवादी मुसलिम जवाहरलालजी के समर्थक थे तथा कई मुसलिम नेता उनके घनिष्ठ मित्र थे। मौलाना आजाद, रफी अहमद किदवई, शेख अब्दुल्ला, डॉ. सईद मदमूद, आसफ अली तथा अन्य नेता पं. नेहरू के घनिष्ठ मित्रों में थे; जबकि वल्लभभाई पटेल के साथ उनके औपचारिक संबंध ही थे।

दूसरी ओर, वल्लभभाई पटेल अकेले थे तथा उनके बहुत कम मित्र थे। उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों के साथ ही संबंध रखे थे। इसमें राजेन्द्र प्रसाद, जी.बी. पंत, पी.डी. टंडन, मोरारजी देसाई, जमनालाल बजाज तथा कुछ गुजराती लोगों के नाम शामिल किए जा सकते हैं। कुछ निचली श्रेणी के नेताओं अथवा विरोधी नेताओं ने, जिनमें कुछ वामपंथी भी शामिल थे। (जैसे- के.डी. मालवीय, अशरफ, अरुणा आसफ अली, मृदुला साराभाई, पद्मजा नायडू), नेहरू के समक्ष मुसलमानों के प्रति पटेल के वैमनस्यपूर्ण रवैए के बारे में मनगढ़ंत कहानियाँ सुनाते रहते थे। इनमें से अधिकांश मुसलिम निस्संदेह मुसलिम लीग की पाकिस्तान बनाने की मांग के समर्थक थे। जब कभी चुनाव हुए, उन्होंने पाकिस्तान के लिए ही मत दिया।



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book