गुलमोहर फिर खिलेगा - कमलेश्वर Gulmohar Phir Khilega - Hindi book by - Kamleshwar
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गुलमोहर फिर खिलेगा

कमलेश्वर

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3330
आईएसबीएन :81-7016-571-7

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हिन्दी के पन्द्रह नवोदित कहानीकारों के द्वारा लिखी गई कहानियाँ

Gulmohar Phir khilega

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘गुलमोहर फिर खिलेगा’ का संयोजन

हिंदी के पंद्रह नवोदित कहानीकारों के इस संचयन की भी एक कहानी है।
‘किताबघर प्रकाशन’ के संस्थापक पंडित जगतराम आर्य की स्मृति में प्रतिवर्ष दिए जाने वाले ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के लिए इस बार (वर्ष 2002) उन नवोदित कहानीकारों की एक-एक अप्रकाशित कहानी आमंत्रित की गई थी, जिनका वर्ष 2001 तक कोई भी स्वतंत्र कहानी-संग्रह प्रकाशित न हुआ हो।

सम्मान के लिए यह एक लगभग अभिनव प्रयोग था। इस प्रयोग की प्रतिक्रिया पर मन में किंचित् आशंका भी थी, लेकिन कथा-आमंत्रण की घोषणा के बाद जिस प्रकार से कहानियों का प्रवाह आया, उससे लगा कि नवलेखन के क्षेत्र में न केवल तुलना से लेखन हो रहा है, बल्कि पर्याप्त उत्साह और सक्रियता भी है। अंतिम तिथि तक कहानियाँ आने का क्रम थमा नहीं। देश के हिंदी ही नहीं, अहिंदी प्रदेशों से भी कहानियाँ आईं तो इस योजना का स्वरूप अखिल भारतीय जैसा हो गया।
प्रारंभिक जाँच-प्रक्रिया के पश्चात्म कुछ चुनी हुई कहानियों को हमने निर्णायक के रूप में वरिष्ठ लेखकों - डॉ. महीप सिंह, डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल तथा मिथिलेश्वर को उनका मूल्यांकन करने के लिए भेजा। हम सब इस बात पर सहमत रहे कि प्रस्तुत कहानी के माध्यम से कथाकार की संभावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। एक कहानी उत्तम हो या दोयम-लेकिन यदि कथाकार में संभावना है तो उसे आगे लाया जाना चाहिए-यही हमारा उद्देश्य था।
निर्णायकों के हम कृतज्ञ हैं कि उन्होंने अपनी घनघोर व्यस्तताओं में से समय निकाला, कहानियों का मूल्यांकन किया तथा उन पर टिप्पणी की। इस मूल्यांकन के आधार पर हमने प्रतियोगिता की 15 श्रेष्ठ कहानियों का चयन किया जो प्रस्तुत संकलन में शामिल हैं।

संकलन के संपादन के लिए वरिष्ठ कथाकार श्री कमलेश्वर ने हमारा अनुरोध स्वीकार किया, इसके लिए उनका विशेष आभार। अपने दीर्घ संपादन-काल में कमलेश्वर जी ने नए कथाकारों के लिए जो भूमिका निबाही है वह सर्वज्ञात है। आशा है कि उनके संपादन में प्रकाशित हो रहे ये कथाकार, इस अवसर को एक अविस्मरणीय घटना के रूप में स्मरण करेंगे।
हमारा यह दायित्व भी बनता है कि इस योजना में सक्रिय हिस्सेदारी करने वाले सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद दें। उन्हें हमारा साधुवाद। जिन कहानीकारों की कहानियाँ सम्मानित होने से रह गई हैं, उन्हें मात्र यही कहना है कि रचनात्मक जगत् में ‘निर्धारित’ कुछ भी नहीं होता, सम्मान भी नहीं। अतः आपसे हमारा विनम्र अनुरोध है कि आप कथा लेखन के पथ पर अनवरत आगे बढ़ते जाएँ।
किताबघर प्रकाशन
नई दिल्ली-110002
-सत्यव्रत
(संयोजक : आर्य स्मृति साहित्य सम्मान)

कुछ अनाभूषित कहानियों से गुज़रते हुए


एक हिंदी कथा-प्रेमी और कहानीकार होने के नाते, हिंदी कथा का जीवन-स्तर सुधरता देखकर मुझे बड़ा संतोष मिलता है। कथा-लेखन के विगत लगभग एक शती के आरोह-अवरोह ने हम कथाकारों को यह सिखा दिया लगता है कि कहानी में अप्रयोग्य क्या है तथा उस अनपेक्षित को कैसे अपनी संसृष्टि के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। कथ्य, शिल्प और शैली भी आत्मसंपादन के बाद ही मन में उदित हों तो ऐसी स्थिति को रचना का संपूर्ण क्षण और छंद कहा जा सकता है। कहना न होगा कि हिंदी कथा-रचना का यह क्षण और छंद अर्जित करने में, आधारभूत रूप से हम गुलेरी प्रेमचंद यशपाल तथा अमृतलाल नागर जैसे सिद्ध कथाशिल्पियों के चिरऋणी हैं।

प्रतिदिन तेज़ी से बदलते भारतीय परिवेश, वैचारिकता, सांस्कृतिक तथ्य तथा मीडिया के व्यापक आक्रमण के तले दबती-कुचलती हमारी संवेदनाएँ...अब मात्र पारंपरिक कथा-प्रयोगों तथा कथानकों के माध्यम से शब्दांकित नहीं की जा सकतीं। उन्हें अभिव्यक्त करने के लिए एक ऐसा व्यापक, स्वच्छ तथा निर्मल संवेदनात्मक और वैचारिक आकाश चाहिए, जिस पर सबका समान अधिकार है। परिवेश में परिव्याप्त परिवर्तन को पारिवारिक तथा समाजिक व्यवस्था देने का सत्कार्य करने वाले लेखपालनुमा कहानीकारों की आज आवश्यकता हिंदी कथा-समाज को नहीं है, बल्कि हम आज उस सीढ़ी तक आ पहुँचे हैं, जहाँ पहुँचकर लेखक, कहीं न कहीं, मनुष्यता का स्वामित्व भी धारण किया करता है। इस प्रयास में लेखक का आत्ममंथन तथा दृष्टि ही उसकी सबसे बड़ी उर्जा होती है और हथियार भी।

‘किताबघर प्रकाशन’ द्वारा ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ से सम्मानित उदीयमान कथाकारों का यह संकलन मुझे इस अर्थ में आश्वस्ति देता है कि इन कहानीकारों ने अपने समय को कुछ इस भंगिमा में सत्यापित किया है कि जहाँ जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए याचक वृत्ति को नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास तथा न्याय को सहकर्म के रूप में प्रयुक्त किया गया है। इन प्रायः सभी कहानियों में कहीं व्यवस्था, कहीं स्त्री-पुरुष की अस्मिता की असमताएँ, कहीं परिवेश, कहीं चुनाव, धर्म क्षेत्रवादी आंदोलन और कहीं-कहीं स्वयं कहानी-विधा भी, ‘नायक’ और ‘नायिकाओं’ के रूप में ‘सशरीर’ उपस्थित हैं और इन्हें पढ़ते हुए हम मानो समकालीन समाज का पूरा परिदृश्य देख लेते हैं। इन कहानियों की तिलमिला देने वाली त्रासदियाँ जब हमें पाठक के रूप में विचलित करती हैं तो यह सचमुच कठिन से कठिनतर होते जा रहे हमारे जीवन की अनावृत पेशकश लगती हैं और तब महसूस होता है कि कहानी, मनोरंजन करने की दानार्थ प्रस्तुतिकरण करने का खेल नहीं, बल्कि वह प्रलयकारी विपरीत स्थितियों से लड़ने का तंत्र और मंत्र दोनों है। ‘गुलमोहर फिल खिलेगा’ की ये कहानियाँ पाठक और समाज के मध्य ऐसे ही सक्रिय और सोद्देश्यपूर्ण सूत्रधार के रूप में अवतरित हुई प्रतीत होती हैं।

इन सम्मानित कहानीकारों की रचनाओं में जहाँ एक ओर संभावनाओं के चरम बिंदु मिलते हैं तो वहीं नव्यताबोध का खुरदरापन...बेबाकी और कहीं-कहीं असावधानी तथा कई बार गंभीर चूकें भी मिलती हैं। संपादित करने के क्रम में यह भरसक ध्यान रखा गया है कि लेखक की मूल कहन में कोई निशान न पड़े तथा उसकी तरलता-सरलता को भी किसी परिपक्व संपादकीय पट्टिका से न नापा-जोखा जाए।

मैं अत्यंत विनम्रता से यह भी कहना चाहूँगा कि इन कहानियों में स्मित हँसी हँसते दूधिया दाँतों ने मेरे कथाकार और पाठक-दोनों को खूब-खूब आंदोलित भी किया है और मुग्ध भी। कहानी का यह भोलापन, परिपक्वता के आने के साथ पता नहीं कहाँ खो जाया करता है ! बहरहाल, इन सम्मानित कहानीकारों को मैं व्यक्तिगत रूप में धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे हिंदी कहानी के अद्यतन रूप से अवगत कराया तथा आश्वस्त भी।
हिंदी कहानी में जिस विचार, शाश्वतता, मनुष्यता, समानता तथा शोषणविहीन समाज की अवधारणा निहित रही है-ये कहानियाँ तथा कहानीकार इसी लोक-अभियान में संलग्न हैं। इनकी कथामय यात्रा की यह ‘पदयात्रा’ जारी रहे, ताकि भावी पीढ़ियाँ भी इनके पदचिह्न पा सकें-इसी शुभकामना के साथ मैं यह संकलन पाठकों को सौंप रहा हूँ।

5/116, इरोज़ गार्डन
सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली-110044


गुलमोहर फिर खिलेगा


रामेश्वर द्विवेदी


शिलौंग की वह एक बेहद डरावनी शाम थी। छब्बीस जनवरी, खासी स्टुडेंट यूनियन ने बाजार-ऑफिस बंद का आह्वान किया था। मेघालय से बाहर के लोगों को ‘उडकार’ (विदेशी) मानने की प्रबल इच्छा के कारण, मतदाता सूची में इन्हें शामिल न करने की उनकी जिद को सरकार द्वारा तोड़ने का प्रयत्न किया जा रहा था। यूनियन के नेता चुन-खोजकर बंद किए जाने लगे थे। शिलौंग में पहले की तरह फिर भयानक शामें उगने लगीं। पाँच बजते ही जिंदगी घरों में कैद हो जाती। आसपास के कस्बाई लोग भी अपना काम जल्दी निपटाकर, भागने की सोचते। ऑफिस समय से पहले ही खाली हो जाते। कभी उमसासन रोड पर मैट्रिक का विजातीय परीक्षार्थी जला दिया जाता। तो कभी सिविल अस्पताल के सामने की सूनी सड़क पर किसी बंगाली, नेपाली या बिहारी की लाश मिल जाती। डर यहाँ के नम मौसम की तरह बरस रहा था और जिंदगी घिसट रही थी।

दिन के दो बजे होंगे। छोटी-कक्षाओं से निकलकर प्रिया मल्ल स्टाफ रूम में आईं। चीनी-नमक के पानी में से, बच्चों से सुबह प्रार्थना सभा में मिला जकरांदा के फूलों का गुच्छा उन्होंने उठाया अपनी कुर्सी से पर्स उतारकर कंधे पर लटकाया और गले में पहने बुद्ध के लॉकेट को आँखों से छुआकर प्राचार्य कक्ष की तरफ तेजी से बढ़ती हुई पुकार उठीं, ‘‘चल चम्पा, चल ! रीति को बुला।’’

मिसेज चम्पा राय बाहर निकल आईं। आसमान घटाओं से भरा हुआ था और हवा में चुभती-सी ठंड थी।
‘शिलौंग वालों के तो पौ-बाहर हैं, मैडम !’’ छोटी कक्षाओं से बाहर आते राधेश्याम यादव ने मानो अपनी डाह उगल दी।
‘‘तो जाकर आप भी शिलौंग में रहिए ! कभी घिर गए दंगाइयों में, तो आपके भी पौ-बारह हो जाएँगे।’’
प्रिया मल्ल को नाराज होते देखकर यादव ने रँगे सियार-सा पैंतरा बदला, ‘‘जकरांदा का गुच्छा लिए आज आप बहुत हसीन दीख रही हैं, मैडम ! यह सूट भी नया है क्या, न्यू पिंच...सचमुच कयामत ढा रही हैं, मैडम !’’

‘‘धत् ! बरसों पुराना सूट आपको नया दिख रहा है, फिर मोतियाबिंद के चलते दो वर्ष बाद प्रिंसी की छाँह में उलटा अखबार पकड़ते गुजारोगे क्या ? या कि अभी डिपार्टमेंट को और चूना लगाना बाकी रह गया है ? सैंडिल नहीं देखे इस कयामत के पाँव में ? सैंडिल एकदम नए हैं।’’ यादव से ऐसे ही मजाक संभव थे। हँसता हुआ बढ़ गया वह। ‘‘प्रिया ! तुम जाकर प्रिंसी से कहो, घंटा-भर बाकी है-हाफ सी.एल. दे दूँ ? मैं रीति को बुलाती हूँ। चल भागें, वरना रास्ते में मर-मरा गए तो गए काम से।’’ चम्पा चार कदम ही बढ़ी होगी कि प्रिया मल्ल ने पुकारा, ‘‘ही इज सिटिंग ऑन द चेयर, ही मस्ट हैव बीकम ऑलमोस्ट गॉड नाऊ।’’

‘‘सो, यू आस्क लाइक अ ह्यूमन देम।’’ चम्पा राय दूसरी तरफ बढ़ गईं। खिड़की के शीशे से प्रिंसी चोयल की गंजी चिकनी खोपड़ी चमक रही थी। ‘‘वह खुदा हो रहा होगा तू बंदे की तरफ पूछ न, प्रिया ! बहुत खुश होने के लिए आधा सी.एल. ही तो लेगा।’’ चक्रवर्ती से अभी-अभी राय बनीं चम्पा अपने काम के प्रति गंभीर और समर्पित थीं, इतनी कि किसी पक्षपात या पूर्वग्रह में कोई बॉस फूँककर उन्हें उड़ा न पाता। साथ के विद्यालयों की भी रूटीन यही बनाती थीं।
टैक्सी के लिए डाइक प्वॉइंट तक तेज कदमों से चलती प्रिया मल्ल ने मन के भीतर तक उतरी हरी हताशा से निजात पाने का प्रयास किया, ‘‘कौए, बिहारी और मारवाड़ी हर जगह मिलते हैं, चम्पा जैसे भैंस, वैसे कौए भी यहाँ तो कभी नहीं दिखते।’’

‘‘मांस और दूध साथ नहीं खाया जाता, सो भैंस नहीं। होती तो भी पहाड़ पर चढ़कर घास कैसे चरती ? पर कौए का क्या करेगी, उसे हाँकेगी क्या ?’’ रीति ने वातावरण को हलका करते हुए कहा।

‘‘नहीं, सुनते हैं कि आफत आनी हो तो कौए सबसे पहले भागते हैं, सो भाग गए। लगता है, मुक्ति का मुहूर्त आज ही है....’’
‘‘चुप कर, शुभ-शुभ बोल ! यहाँ भूइला, गिरगिट माटा और साँप तक को खा जाते हैं ! कौआ चालाक पक्षी है, भला क्यों रहे यहाँ ?’’ रीति अपनी जमीन  पर व्यंग्य करके चुप हो गई। अब ट्राइबल नहीं रही थी रीति। माँ-पिता की नौकरी के साथ एम.ए. की पढ़ाई दिल्ली से पूरी कर शिलौंग लौटी तो अपने समाज के खाऊ-पीऊ जीवन में एकदम मिसफिट थी। क्या जीवन है भई, चौदह साल की कम उम्र से शराब शुरू कर, तीस वर्ष की आयु तक अधिकांश व्यक्ति मर जाते हैं ! नमक और लाइपत्ता के साथ पिएँगे तो इसके अलावा हश्र क्या होगा ? क्या समझ है ! कहीं पार्टी में जाओ तो औरतें पीछे ही पड़ जाती हैं-ब्याह क्यों नहीं किया ? कैसे बताऊँ कि उठते-बैठते, हर वक्त शराब पीना मुझे पसंद नहीं। फिर कौन बचा है मेरे समाज में जो पैंतीस वर्ष तक अनब्याहा हो और जो बत्तीस की रीति को प्रपोज करे ? चुप रहो तो कहेंगी कि ब्याह नहीं करने से भी चलता है, किसी से भी एक बच्चा हो जाए, ठीक है। क्या पागलपन है ! औरत किसी मर्द का एक बच्चा जने बिना नहीं रह सकती क्या ? मुझे तो घिन आती है इस देहवाद से। मुझे नहीं करना-न ब्याह, न बच्चा। मर जाऊँगी, संपत्ति गरीबों के भले के लिए कार्यरत किसी संस्था के नाम कर जाऊँगी।

रीति इस परंपरा के विरुद्ध थी कि अकेली संतान कभी योग्य नहीं होती। वह उडकार में उडकार (इंदराज लोग, जो विदेशी हैं) और खासियों में खासी जैसी लगती थी। उम्र से अधिक परिपक्व, अवस्था से अधिक संतुलित, सो शराब में डूबी क्षणजीवी उन्मुक्तता और चौदह की उम्र से जारी चलताऊ भोगवाद उसे रास नहीं आता। कोई योग्य व्यक्ति मातृप्रधान समाज की पारंपरिक रीति से स्वयं चलकर आए, संग शांति से टिक जाए तो ठीक वरना ‘गॉड इज इन द हेवेन एंड ऑल इज राइट इन वर्ल्ड।’ तभी वह कहती है कि सुख हमारे पास स्वयं चलकर आए तो दरवाजा बंद कर लूँ, मैं ऐसी संत भी नहीं, पर उसके लिए मैं हथेली फैलाए दरवाजे-दरवाजे भागूँ, यह मुझसे कभी हो न सकेगा।

अपनी अल्हड़, आत्मीयता और गैरजरूरी सहजता में होली-डे होम के महँगे कमरे से, खसरा के मोतियों का बुंदा, किसी के द्वारा चुरवा लेने के बाद, मिसेज प्रिया मल्ल आर्मी क्वार्टर में अब अकेली रहती थीं। बात करने का नशा, सो कुछ आत्मीय मित्र-परिवार और जैसे पिछले जन्म की ही परिचिता कामवाली जयंती, जिसके शराबी देवर ने शीतकालीन अवकाश में उनके देहरादून चले जाने पर, घर लूट लिया और लौटकर उन्होंने स्वयं उसे पुलिस हिरासत से छुड़वाया-‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटने को उत्पात।’ कोई पूछता तो अपना ही दोष बतातीं, हमें क्या जरूरत थी जयंती को घर की चाभी देकर जाने की ?’ या ‘बुभुक्षति किं न करोति पापम् ?’ भूखा था सो माफ कर दिया।

समझेंगे, नौकरी दो महीने और देर में ज्वाइन की। वह बोलती जातीं, ‘एक बार भिक्षा माँगते समय किसी गृहस्वामी ने बुद्ध को दुत्कार दिया-‘शर्म नहीं आती, इतने हट्टे-कट्ठे हो, भीख  माँगते हो, कमाकर नहीं खा सकते हो तो डूब मरो ! बुद्ध सुबुद्ध थे। भाव मलिन न हुआ। उलटे आशीष दिया। आनंद क्रोध और दुःख में पछाड़ खाकर गिरता रहा-भन्ते ! गृहस्वामी ने आपको गाली दी, फिर भी आपने उसे आशीर्वाद दिया। बुद्ध ने मुस्कराते हुए कहा-आनंद, तुम्हारे बोध का अधूरापन बाकी है अभी, वरना दुखी न होते। गृहस्वामी के पास देने को गाली थी और मेरे पास आशीर्वाद। जिसके पास जो होता है, वही तो देगा। तुम दुखी क्यों होते हो ? फिर बुद्ध का लॉकेट आँखों से छुआ लेतीं। पति का तबादला हो गया था। बेटा फिलीपिंस में पानी के जहाज का इंजीनियर और बेटी बैंगलोर से मेडिकल की पड़ाई कर रही थी। तभी इन्होंने नौकरी ज्वाइन की थी।
 


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