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पटेल,गाँधी, नेहरू एवं सुभाष ( सरदार पटेल)

पी. एन. चोपड़ा, प्रभा चोपड़ा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :183
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3336
आईएसबीएन :81-7315-595-X

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अपने समय के चार दिग्गजों के परस्पर संबंधों और विचारों की झलक पर आधारित पुस्तक

Ghandi,Nehru Avam Subhash

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह आम धारणा है कि सरदार पटेल कांग्रेस के तीन दिग्गजों-महात्मा गाँधी, पं. नेहरु और सुभाषचंद्र बोस के खिलाफ थे। किंतु यह मात्र दुष्प्रचार ही है। हाँ, कुछ मामलों में-खासकर सामरिक नीति के मामलों में-उनके बीच कुछ मतभेद जरुर थे, पर मनधेद नहीं होता था। परंतु जैसा कि इस पुस्तक में उद्घाटित किया गया है, सरदार पटेल ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिए जाने के प्रस्ताव पर गाँधीजी का विरोध नहीं किया था; यद्यपि वह समझ गए थे कि ऐसा करने की कीमत चुकानी पड़ेगी। इसी तरह उन्होंने प्रधानमंत्री के रुप में पं. नेहरु के प्रति भी उपयुक्त सम्मान प्रदर्शित किया। उन्होंने ही भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल में शामिल करने के लिए पं. नेहरु को तैयार किया था; यद्यपि नेहरु पूरी तरह इसके पक्ष में नहीं थे। जहाँ सुभाष चंद्र बोस के साथ उनके संबंधों की बात है, वे वरन् सन् 1939 में दूसरी बार सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने के खिलाफ थे। सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार सरदार पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल-जिनका विएना में निधन हो गया था, के अंतिम संस्कार में मदद की थी, उससे दोनों के मध्य आपसी प्रेम और सम्मान की भावना का पता चलता है।
अपने समय के चार दिग्गजों के परस्पर संबंधों और विचारों की झलक देती महत्त्पूर्ण पुस्तक।

प्रस्तावना

बहुत दिनों से यह आवश्यकता हो रही थी कि कुछ ऐसे ग्रंथ सुलभ होने चाहिए, जिनमें सरदार पटेल से संबंधित महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई हो, जो उनके जीवन-काल में विवाद का विषय बने रहे तथा सन् 1950 में उनके निधन के पश्चात् भी विवादों में घिरे रहे। उदाहरण के लिए, यह अनुभव किया गया कि यदि सरदार पटेल को कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति दी जाती, जैसा कि उन्होंने स्वयं भी अनुभव किया था, तो हैदराबाद की तरह यह समस्या भी सोद्देश्यपूर्ण ढंग से सुलझ जाती। एक बार सरदार पटेल ने स्वयं श्री एच.वी. कामत को बताया था कि ‘‘यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीर मुद्दे पर हस्तक्षेप न करते और उसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह ही इस मुद्दे को भी आसानी से देश-हित में सुलझा लेता।’’

    हैदराबाद के मामले में भी जवाहरलाल नेहरु सैनिक काररवाई के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने सरदार पटेल को यह परामर्श दिया-‘‘इस प्रकार से मसले को सुलझाने में पूरा खतरा और अनिश्चितता है।’’ वे चाहते थे कि हैदराबाद में की जानेवाली सैनिक काररवाई को स्थगित कर दिया जाए। इससे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। प्रख्यात कांग्रेसी नेता प्रो.एन.जी.रंगा की भी राय थी कि विलंब से की गई काररवाई के लिए नेहरू, मौलाना और माउंटबेटन जिम्मेदार हैं। रंगा लिखते हैं कि हैदराबाद के मामले में सरदार पटेल स्वयं अनुभव करते थे कि उन्होंने यदि जवाहरलाल नेहरू की सलाहें मान ली होतीं तो हैदराबाद मामला उलझ जाता; कमोबेश वैसी ही सलाहें मौलाना आजाद एवं लॉर्ड माउंटबेटन की भी थीं। सरदार पटेल हैदराबाद को भारत में शीघ्र विलय के पक्ष में थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरु इससे सहमत नहीं थे। लॉर्ड माउंटबेटन की कूटनीति भी ऐसी थी कि सरदार पटेल के विचार और प्रयासों को साकार रूप देने में विलंब हो गया।

    सरदार पटेल के राजनीतिक विरोधियों ने उन्हें मुसलिम वर्ग के विरोधी के रूप में वर्णित किया; लेकिन वास्तव में सरदार पटेल हिंदू-मुसलिम एकता के लिए संघर्षरत रहे। इस धारणा की पुष्टि उनके विचारों एवं कार्यों से होती है। यहाँ तक कि गांधीजी ने भी स्पष्ट किया था कि ‘‘सरदार पटेल को मुसलिम-विरोधी बताना सत्य को झुठलाना है। यह बहुत बड़ी विडंबना है।’’ वस्तुतः स्वतंत्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में दिए गए उनके व्याख्यान में हिंदू-मुसलिम प्रश्न पर उनके विचारों की पुष्टि होती है।

    इसी प्रकार, निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर लोगों ने नेहरू और पटेल के बीच विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया तथा जान-बूझकर पटेल व नेहरू के बीच परस्पर मान-सम्मान और स्नेह की उपेक्षा की। इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच एक-दूसरे के प्रति आदर और स्नेह के भाव उन पत्रों से झलकते हैं, जो उन्होंने गांधीजी की हत्या के बाद एक-दूसरे को लिखे थे। निस्संदेह, सरदार पटेल की कांग्रेस संगठन पर मजबूत पकड़ थी और नेहरूजी को वे आसानी से (वोटों से) पराजित कर सकते हैं लेकिन वे गांधी जी की इच्छा का सम्मान रखते हुए दूसरे नंबर पर रहकर संतुष्ट थे। उन्होंने राष्ट्र के कल्याण को सर्वोपरि स्थान दिया।

    विदेश नीति के संबंध में सरदार पटेल के विचारों के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है, जो उन्होंने मंत्रिमंडल की बैठकों में स्पष्ट रूप से व्यक्त किए थे तथा पं. नेहरू पर लगातार दबाव डाला कि राष्ट्रीय हित में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने से भारत को मदद मिलेगी। जबकि नेहरू पूर्ण स्वराज पर अड़े रहे, जिसका अर्थ था-राष्ट्रमंडल से किसी भी प्रकार का नाता न जोड़ना। किंतु फिर भी, सरदार पटेल के व्यावहारिक एवं दृढ़ विचार के कारण नेहरू राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने के लिए प्रेरित हुए। तदनुसार समझौता किया गया, जिसके अंतर्गत भारत गणतंत्रात्मक सरकार अपनाने के बाद राष्ट्रमंडल का सदस्य रहा।

    सरदार पटेल चीन के साथ मैत्री तथा ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के विचार से सहमत नहीं थे। इस विचार के कारण गुमराह होकर नेहरूजी यह मानने लगे थे कि यदि भारत तिब्बत मुद्दे पर पीछे हट जाता है तो चीन और भारत के बीच स्थायी मैत्री स्थापित हो जाएगी। विदेश मंत्रालय के तत्कालीन महासचिव श्री गिरिजाशंकर वाजपेयी भी सरदार पटेल के विचारों से सहमत थे। वे संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के दावे का समर्थन करने के पक्ष में भी नहीं थे। उन्होंने चीन की तिब्बत नीति पर एक लंबा नोट लिखकर उसके दुष्परिणामों से नेहरु को आगाह किया था। सरदार पटेल को आशंका थी कि भारत की मार्क्सवादी पार्टी की देश से बाहर साम्यवादियों तक पहुँच होगी, खासतौर से चीन तक। अन्य साम्यवादी देशों से उन्हें हथियार एवं साहित्य आदि की आपूर्ति भी अवश्य होती होगी। वे चाहते थे कि सरकार द्वारा भारत के साम्यवादी दल तथा चीन के बारे में स्पष्ट नीति बनाई जाए।

    इसी प्रकार, भारत की आर्थिक नीति के संबंध में सरदार पटेल के स्पष्ट विचार थे। मंत्रिमंडल की बैठकों में उन्होंने नेहरुजी के समक्ष अपने विचार बार-बार रखे; लेकिन किसी-न-किसी कारणवश उनके विचारों पर अमल नहीं किया गया। उदाहरण के लिए, उनका विचार था कि समुचित योजना तैयार करके उदारीकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। आज सोवियत संघ पर आधारित नेहरूवादी आर्थिक नीतियों के स्थान पर जोर-जोर से उदारीकरण की नीति ही अपनाई जा रही है।

    खेद की बात है कि सरदार पटेल को सही रूप में नहीं समझा गया। उनके ऐसे राजनीतिक विरोधियों के हम शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने निरंतर उनके विरुद्ध अभियान चलाया तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया, जिससे पटेल को अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान मिला। समाजवादी विचारवादी विचारधारा के लोग नेहरू को अपना अग्रणी नेता मानते थे। उन्होंने पटेल की छवि पूँजीवाद के समर्थक के रूप में प्रस्तुत की। लेकिन सौभाग्यवश, सबसे पहले समाजवादियों ने ही यह महसूस किया था कि उन्होंने पटेल के बारे में गलत निर्णय लिया है।

    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे महत्त्वपूर्ण तथा संवेदनशील मुद्दों पर विचार करने का प्रयास किया गया है, जो आज भी विवादग्रस्त हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मई 1959 में लिखा था-‘‘सरदार पटेल की नेतृत्व-शक्ति तथा सुदृढ़ प्रशासन के कारण ही आज भारत की चर्चा हो रही है तथा विचार किया जा रहा है।’’ आगे राजेंद्र प्रसाद ने यह जोड़ा-‘‘अभी तक हम इस महान् व्यक्ति की उपेक्षा करते रहे हैं।’’ उथल-पुथल की घड़ियों में भारत में होनेवाली गतिविधियों पर उनकी मजबूत पकड़ थी। यह ‘पकड़’ उनमें कैसे आई ? यह प्रश्न पटेल की गाथा का एक हिस्सा है।

    भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज-गोपालाचारी ने लिखा-‘‘निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। यदि पटेल कुछ दिन और जीवत रहते तो वे प्रधान मंत्री के पद पर अवश्य पहुँचते, जिसके लिए संभवतः वे योग्य पात्र थे। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत, चीन और अन्यान्य विवादों की कोई समस्या नहीं रहती।’’

     लेकिन निराशाजनक स्थिति यह रही कि उनके निधन के बाद सत्तासीन राजनीतिज्ञों ने उनकी उपेक्षा की और उन्हें वह सम्मान नहीं दिया गया, जो एक राष्ट्र-निर्माता को दिया जाना चाहिए था। प्रस्तुत पुस्तक अपने विषय को लेकर सरदार पटेल के लौह व्यक्तित्व, उनके दृढ़ विचारों और राष्ट्र-निर्माण में उनके अभूतपूर्व योगदानों का लेखा-जोखा है।

    और अंततः, डॉ. प्रभा चोपड़ा ने विषय के संकलन और संपादन में मेरी बहुत सहायता की। मैं श्री एम.पी. चावला, लेखाधिकारी श्री अरुण कुमार यादव तथा श्री रवींद्र कुमार का आभारी हूँ, जिन्होंने तत्परतापूर्वक पांडुलिपि तैयार की।

-पी.एन.चोपड़ा


भूमिका


    2 सितंबर, 1946 को सरदार पटेल जब अंतिम सरकार में शामिल हुए, तो उस समय उनकी आयु 71 वर्ष थी। हम भली-भाँति जानते हैं कि गांधीजी की इच्छा का सम्मान करते हुए ही सरदार पटेल ने सन् 1946 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया था, जबकि 15 प्रांतों की कांग्रेस समितियों में से 12 ने उनके नाम का अनुमोदन कर दिया था। यदि उन्हें चुनाव लड़ने दिया जाता, तो निस्संदेह वह स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनते।

गांधीजी के इस निर्णय पर कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने रोष प्रकट किया था। मध्य प्रांत के तत्कालीन गृहमंत्री डी.पी. मिश्र ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में शिकायत भी की थी कि उनके (पटेल के) कारण ही कांग्रेसी नेताओं ने चुपचाप सबकुछ स्वीकार कर लिया। वस्तुतः सरदार पटेल और उनके समर्थक नेता पद के भूखे नहीं थे, उनके अपने राजनीतिक आदर्श थे, जिन्हें वे किसी भी स्थिति में छोड़ना नहीं चाहते थे।

    डी.पी. मिश्र के पत्र के उत्तर में सरदार पटेल ने लिखा था कि पं. नेहरू चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए चुने गए हैं। उन्होंने आगे लिखा था कि पं. नेहरू अकसर बच्चों जैसी नादानी कर बैठते हैं, जिससे हम सभी के सामने बड़ी-बड़ी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। इस तरह की कुछ मुश्किलों का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा था, ‘‘कश्मीर में उनके द्वारा किया गया कार्य, संविधान सभा के लिए सिख चुनाव में हस्तक्षेप और अखिल भारतीय कांग्रेस के तुरंत बाद उनके द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस-सभी कार्य उनकी भावनात्मक अस्वस्थता को दरशाते हैं, जिससे इन मामलों को जल्दी-से-जल्दी सुलझाने के लिए हमारे ऊपर काफी दबाव आ जाता है।’’

    जब पं. नेहरू को मंत्रिमंडल का गठन करने और उसके सदस्यों की सूची भेजने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपनी प्रथम सूची में सरदार पटेल को कोई स्थान नहीं दिया था। बाद में जब सरदार पटेल को मंत्रिमंडल में सहायक (उप-प्रधानमंत्री) के रूप में शामिल किया गया तो उन्होंने अपने एक कनिष्ठ सहकर्मी को सहयोग देना सहर्ष स्वीकार कर लिया। पं. नेहरू ने स्वयं भी अहसास किया कि उनका प्रधानमंत्री बनना सरदार पटेल की उदारता के कारण ही संभव हो सका।

    सरदार पटेल को उप-प्रधानमंत्री बनाकर उन्हें सबसे महत्त्वपूर्ण विभाग-गृह तथा सूचना एवं प्रसारण-सौंपा गया। बाद में 5 जुलाई, 1947 को एक और महत्त्वपूर्ण विभाग-राज्य मंत्रालय भी उन्हें सौंप दिया गया। वस्तुतः सरदार पटेल कांग्रेस के सबसे सशक्त नेता के रूप में स्थापित थे, लेकिन पं. नेहरू को सूचित किए बिना या उनकी स्वीकृति लिये बिना शायद ही उन्होंने कभी कोई बड़ा फैसला लिया हो। अपनी अद्भुत सगंठन क्षमता और सूझ-बूझ के बल पर उन्होंने देश को विभाजन के बाद की मुश्किलों और अव्यवस्थाओं से उबारने में सफलता प्राप्त की।

    यह सच है कि पं. नेहरू के साथ उनके कुछ मतभेद थे, लेकिन ये मतभेद स्वाभाविक थे, जो कुछ विशेष मामलों-खासकर आर्थिक, सामुदायिक और समय-समय पर उठनेवाले संगठनात्मक मामलों-को लेकर ही थे। किंतु दुर्भाग्य की बात है कि कुछ स्वार्थ-प्रेरित तत्त्वों ने उनके इन मतभेदों को गलत अर्थ में प्रस्तुत करके जनता को गुमराह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मणिबेन ने इस संदर्भ में पद्मजा नायडू, मृदुला साराभाई और रफी अहमद किदवई के नामों का उल्लेख किया है, जिन्होंने मौके का भरपूर फायदा उठाने का प्रयास किया था। यहाँ तक कहा गया कि सरदार पटेल पद के भूखे हैं और वह उसे किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहेंगे। गांधीजी को जब इसका पता चला तो उन्होंने सरदार पटेल को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अत्यंत कड़े शब्दों में उनकी शिकायत की थी-

    मुझे तुम्हारे खिलाफ कई शिकायतें सुनने को मिली हैं।....तुम्हारे भाषण भड़काऊ होते हैं...तुमने मुसलिम लीग को नीचा दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ रखी।...लोग तो कह रहे हैं कि तुम (किसी भी स्थिति में) पद पर बने रहना चाहते हो।

    गांधीजी के इन शब्दों से सरदार पटेल को गहरा आघात लगा। उन्होंने 7 जनवरी, 1947 को गांधीजी को लिखे अपने पत्र में स्पष्ट रूप में उल्लेख किया कि पं. नेहरू ने उन्हें पद छोड़ने के लिए दबाव डालते हुए धमकी दी थी, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इससे कांग्रेस की गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। अपने ऊपर लगाए गए निराधार आरोपों के संदर्भ में सरदार पटेल ने गांधीजी को बताया कि ये अफवाहें मृदुला द्वारा ही फैलाई गई होंगी, जिन्होंने मुझे बदनाम करने को अपना शौक बना लिया है। वह तो यहाँ तक अफवाह फैला रही हैं कि मैं जवाहरलाल से अलग होकर एक नई पार्टी का गठन करने जा रहा हूँ। इस तरह की बातें उन्होंने कई मौकों पर की हैं। पत्र में उन्होंने यह भी लिखा कि कार्यसमिति की बैठक में भिन्न विचार व्यक्त करने में मुझे कोई बुराई दिखाई नहीं देती। आखिरकार हम सभी एक ही दल के सदस्य हैं। वस्तुतः पं. जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम के साथ सरदार पटेल के जो भी मतभेद थे, वे व्यक्तिगत मामलों को लेकर नहीं, बल्कि सिद्धांतों और नीतियों को लेकर थे। जो लोग उनके मतभेदों के बारे में जानते थे, उन्होंने इसका लाभ उठाते हुए दोनों के बीच खाई खोदने की पूरी कोशिश की।

    पं. नेहरू के साथ सरदार पटेल के मतभेद उस समय और गहरा गए, जब गोपालस्वामी आयंगर का हस्तक्षेप कश्मीर मामले के साथ-साथ अन्य मंत्रालयों कार्यों में बढ़ने लगा। गोपालस्वामी ने पंजाब सरकार को कश्मीर के लिए वाहन चलाने का निर्देश दे दिया, जिसका सरदार पटेल ने यह तर्क देते हुए विरोध किया कि यह मामला राज्य मंत्रालय के कार्य क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जो उस समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के पुनर्वास कार्य में लगे हुए थे, हालाँकि बाद में गोपालस्वामी ने सरदार पटेल के दृष्टिकोण की सराहना की, लेकिन पं. नेहरू किसी भी स्थिति में सरदार पटेल से सहमत नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने प्रधानमंत्री की शक्ति का मामला उठाते हुए कड़े शब्दों में सरदार पटेल को लिखा, ‘‘यह सब मेरे ही आग्रह पर किया गया था और मैं उन मामलों से संबंधित अपने अधिकारों को नहीं छोड़ना चाहता, जिनके प्रति मैं स्वयं को उत्तरदायी मानता हूँ।’’

    इसी तरह अजमेर में सांप्रदायिक अशांति के दौरान पहले तो पं. नेहरू ने घोषणा की कि वह स्वयं अजमेर का दौरा करके स्थिति का जायजा लेंगे, लेकिन अपने भतीजे के निधन के कारण वह दौरे पर नहीं जा सके। अतः इसके लिए उन्होंने एक सरकारी अधिकारी एच.आर.वी. आयंगर को नियुक्त कर दिया, जिसने एक पर्यवेक्षक की हैसियत से शहर का दौरा किया। इस दौरान उसने उपद्रव के कारण हुई क्षति का जायजा लिया और दरगाह, महासभा तथा आर्य समाज के प्रतिनिधियों से भेंट की। उसकी गतिविधियों से ऐसा लगा कि उसे अजमेर के मुख्य आयुक्त और उसके अधीनस्थ अधिकारियों के कार्यों की जाँच करने के लिए भेजा गया है। शंकर प्रसाद ने इसकी शिकायत सरदार पटेल (गृहमंत्री) से की, जिसे गंभीरता से लेते हुए सरदार पटेल ने पूरी बात पं. नेहरू के सामने रखते हुए कहा कि यदि वह स्वयं दौरे पर जाने में असमर्थ थे तो वह अपने स्थान पर एक सरकारी अधिकारी को नियुक्त करने की बजाय किसी मंत्री को या स्वयं मुझे नियुक्त कर सकते थे। अपने अधिकारों के संबंध में उठाए गए इस सवाल पर नेहरू ने कड़ा रुख अपनाते हुए विरोध जताया और कहा कि इस तरह तो मैं एक कैदी की तरह हो जाऊँगा, जिसे स्थिति को देखते हुए कोई कार्य करने की स्वतंत्रता न हो। हालाँकि उन्होंने स्वीकार किया कि विभिन्न मामलों पर उनकी सोच और सरदार पटेल की सोच में व्यापक अंतर है।

पं. नेहरू द्वारा गृह और राज्य मंत्रालयों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप किए जाने के मामले पर भी दोनों के बीच में अकसर मतभेद उभर आते थे। पं. नेहरू की शिकायत होती की कि राज्य मंत्रालय से संबंधित कार्यों की प्रगति की जानकारी मंत्रिमंडल को नियमित रूप से नहीं दी जाती, जबकि सरदार पटेल ने इसका खंडन करते हुए कहा था कि वह सभी नीतिगत मामलों से संबंधित सूचना प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल को नियमित रूप से देते रहने का विशेष ध्यान रखते हैं। त्रिलोकी सिंह और रफी अहमद किदवई ने एक छोटा सा अल्पसंख्यक गुट बनाया था, जो बहुसंख्यकों पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता था। सरदार पटेल को यह बात बिलकुल पसंद नहीं आई। उन्होंने सुझाव दिया कि इसका निर्णय करने का सबसे अच्छा तरीका सद्भावपूर्ण समझौता है और यदि यह तरीका सफल नहीं होता तो स्थिति को देखते हुए इसका एकमात्र लोकतांत्रिक रास्ता चुनाव कराकर बहुसंख्यक मतों द्वारा इसका निर्धारण करना हो सकता है। त्रिलोकी सिंह को यह बात पसंद नहीं आई और वह अपने छोटे से गुट के साथ कांग्रेस से अलग हो गए। वस्तुतः, रफी अहमद किदवई स्वयं को उत्तर प्रदेश में गोबिंद वल्लभ पंत के प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करना चाहते थे, क्योंकि वह पं. नेहरू के अधिक निकट थे। बाद में जब उन्हें केंद्र में आने का मौका मिला तो यह निकटता और भी बढ़ गई।

    4 जून, 1948 को लिखे एक पत्र में सरदार पटेल ने पं. नेहरू को बताया कि वह उत्तर प्रदेश में चल रही स्थिति से खुश नहीं हैं। पत्र में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था-‘‘रफी उत्तर प्रदेश की प्रांतीय कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।...केंद्र में एक मंत्री के रूप में रहते हुए उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। उनका गुट संभवतः यही सोच रहा है कि उनके पास कोई अन्य प्रत्याशी ऐसा नहीं है, जो टंडनजी को चुनाव में हरा सके।’’

संभवतः, वैचारिक मतभेदों के चलते ही सरदार पटेल ने 16 जनवरी, 1948 को गांधीजी को पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया था कि उन्हें पद से मुक्त कर दिया जाए, हालाँकि पत्र में उन्होंने कारण का उल्लेख नहीं किया था। इससे पूर्व 6 जनवरी, 1948 को पं. नेहरू ने भी गांधीजी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने अपने और सरदार पटेल के बीच उत्पन्न मतभेदों को विस्तृत करते हुए लिखा था कि या तो सरदार पटेल को अपना पद छोड़ना होगा, नहीं तो मैं स्वयं त्याग-पत्र दे दूँगा। नेहरू द्वारा उठाए गए मामलों पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए सरदार पटेल ने गांधीजी को पत्र के माध्यम से पुनः स्पष्ट किया था कि उनके बीच हिंदू-मुसलिम संबंधों और आर्थिक मामलों को लेकर कोई मतभेद नहीं है, जैसा प्रधानमंत्री (पं. नेहरू) ने भी स्वीकार किया है, और आखिरकार दोनों के लिए देश का हित ही सर्वोपरि है। उन्होंने आगे स्पष्ट करते हुए लिखा था कि यदि पं. नेहरू की नीतियों को स्वीकार कर लिया जाए तो देश में प्रधानमंत्री की भूमिका एक तानाशाह की हो जाएगी।

    सरदार पटेल की टिप्पणी की यह सच्चाई उस समय स्वयं ही सामने आ गई जब नेहरू की तानाशाही नीतियों पर अंकुश लगाने वाले सशक्त नेता सरदार पटेल हमारे बीच नहीं रहे। इसके कई वर्षों बाद पं. नेहरू ने स्वयं भी यह सब अनुभव किया और ‘नेशनल हेराल्ड’ में एक अनाम लेख के माध्यम से उन्होंने एक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी ही भूमिका की आलोचना की। सचमुच, नेहरू की यह भूमिका देश और उसके लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए बहुत घातक रही।

नेहरु ने अपने और सरदार पटेल के बीच बढ़ते मतभेदों को दूर करने के लिए गांधीजी के साथ एक बैठक करने का प्रस्ताव रखा था, किंतु गांधीजी के उपवास के कारण उसे टालना पड़ा। गांधीजी की हत्या से एक घंटे पूर्व सरदार पटेल ने उनसे मिलकर लंबी बातचीत की थी। गांधीजी ने इस संबंध में माउंटबेटन से भी विचार-विमर्श किया था। माउंटबेटन ने दृढ़ता पूर्वक अपनी राय प्रकट की थी कि मौजूदा परिस्थितियों में नेहरू या पटेल में से किसी का भी मंत्रिमंडल से बाहर होना देश के हित में नहीं होगा। महात्मा गांधी दोनों-सरदार पटेल और पं. नेहरू-के लिए शक्ति का स्रोत थे। उनकी हत्या के बाद स्थितियाँ पूरी तरह बदल गईं। 3 फरवरी, 1948 को पं. नेहरू ने सरदार पटेल को एक अत्यंत भावपूर्ण पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सरदार पटेल से आपसी मतभेदों को भुलाकर साथ-साथ कार्य करने का आग्रह किया था, पत्र में उन्होंने लिखा था-
बापू के निधन के बाद अब सबकुछ बदल गया है और अब हमें पहले से भी कठिन स्थितियों का सामना करना है। पुराने विवादों और मतभेदों का अब कोई महत्त्व नहीं रहा और मुझे लगता है कि हमें एक साथ मिलकर कार्य करना चाहिए, यही समय की माँग है, इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है।

....मैं तुमसे मिलकर ढेर-सारी बातें करना चाहता था, लेकिन अत्यधिक व्यस्तता के कारण लंबे समय तक हम एक-दूसरे से व्यक्तिगत रूप से मिल भी नहीं पा रहे थे। मुझे आशा है, हम जल्दी ही मिलकर आपसी मदभेदों और गलतफहमियों को दूर कर लेंगे।
पत्र के उत्तर में सरदार पटेल ने भी कुछ इसी तरह के भाव प्रकट किए थे-
...मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि हमें आपसी बातचीत के लिए समय निकालना होगा, ताकि हम अपने दृष्टिकोण से एक-दूसरे को अवगत करा सकें और मतभेदों को दूर कर सकें।
 



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