चाक - मैत्रेयी पुष्पा Chaak - Hindi book by - Maitreyi Pushpa
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उपन्यास >> चाक

चाक

मैत्रेयी पुष्पा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :435
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3375
आईएसबीएन :9788171785711

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‘चाक’ का दूसरा नाम है समय-चक्र। चाक घूमेगा नहीं तो कुछ बनाएगा भी नहीं।...

Chak a hindi book by Maitreyi Pushpa - चाक - मैत्रेयी पुष्पा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अचल है चलने का व्यापार
‘चाक’ का दूसरा नाम है समय-चक्र। चाक घूमेगा नहीं तो कुछ बनाएगा भी नहीं। वह घूमेगा और मिट्टी को बिगाड़कर नया बनाएगा-नए रूप में ढालेगा।
अतरपुर गाँव को, उसमें रहनेवाली किसान-पत्नी सारंग को भी ढालकर नया बना रहा है चाक। लेकिन बनाना एक यातना से गुज़रना भी तो है। न चाहते हुए भी सारंग निकल पड़ी है ‘ढाले’ जाने की इस यात्रा पर। इसी यात्रा की कहानी है यह उपन्यास।

अतरपुर जाट किसानों का गाँव है और जैसा है वैसा ही बने रहना चाहता है। वह हर बदलाव का विरोधी है यथास्थिति में जब-जब परिवर्तन होता है, कुछ मूल्य और विश्वास टूटते हैं। हर विकास परंपरागत मान्यता को बदलता और तोड़ता है। सारंग नहीं जानती कि वह इस परिवर्तन और विकास की शिकार है या सूत्रधार। ‘‘इतिहास काग़ज़ के पन्नों पर उतरने से पहले मानव-शरीरों पर लिखा जाता है।’’

पिछड़े इलाक़ों के अतरपुर जैसे गाँव, परिवर्तन की मुख्यधारा के प्रवाह से अछूते नहीं हैं, अपने रीति-रिवाजों, जाति-संघर्षों, गीतों-उत्सवों, नृशंसताओं-प्रतिहिंसाओं, प्यार-ईर्ष्याओं और कर्मकांडी अंधविश्वासों के बीच धड़कता हुआ अतरपुर गाँव सारंग और रंजीत के आपसी संबंधों के उतार-चढ़ावों में समय को आत्मसात कर रहा है।
मैत्रेयी पुष्पा का पहला लगभग क्लासिक उपन्यास इदन्नमम दशवें दशक की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। चाक उनकी कलम का अगला चरण है-गाँव को रग-रेशों में जीता हुआ आत्मीय दस्तावेज़-पुरुष समाज में स्त्री की अपनी पहचान का संकल्पपत्र। इदन्नमम का क्षेत्र था बुंदेलखंड और चाक घूमता है ब्रज प्रदेश के किसानों के बीच।
चाक न राजनैतिक उपन्यास है, न समाजशास्त्रीय, मगर उस समाज की रोचक-या भयावह ? -कथा है जो इन दोनों से अछूती नहीं है।

भाषा के बिंबों और दृश्यों को उतारने की अद्भुत दृष्टि है कथाकार मैत्रेयी के पास। उनके इस नये उपन्यास को पढ़ना-कथा-रस की ‘पकड़’ के सामने विवश होने के विलक्षण अनुभव से मुठभेड़ करना है।

 

मैं मुक्त करती हूँ तुम्हें
मेरे सुन्दर भीषण भय।
मैं मुक्त करती हूँ तुम्हें, तुम थे
मेरे प्रिय और मेरे घृणित जुड़वाँ, पर
अब नहीं पहचानती तुम्हें जैसे कि ख़ुद को
मैं मुक्त करती हूँ तुम्हें
उस समूचे दर्द के साथ जो अनुभव
होता मुझे अपनी बेटियों की मृत्यु पर।

 

-रेडइंडियन कवयित्री ज्वॉय हार्जौ
(वीरेन्द्रकुमार बरनवाल द्वारा अनूदित
‘रक्त में यात्रा’ से)

 

एक

 

 

काश यह मौत होती !
मगर यह हत्या ! पतित स्त्री, गर्भिणी औरत की हत्या !!
सारंग की बहन रेशम मौत के घाट उतार दी गई—बुआ की बेटी रेशम, उम्र में उससे ठीक पाँच वर्ष छोटी। मजबूत कदकाठी के चलते कसी-ठुकी देह और गुलाबी दूध सा जगमगाता रंग...अब रेशम कहाँ ! रेशम एक लाश, फिर मुट्ठी-दो मुट्ठी खाक में बिखरती...अँधियारी ने ढक लिया उजियारा, सारंग को कुछ नहीं सूझता। आँख फाड़-फाड़कर देखती है—चारों दिशाओं में घिरी कालिमा...

गाँव की सहज सरल दिनचर्या में अचानक धमाका हुआ, धरती हिल उठी। रात-दिन काँप गए। हाय-हाय, त्राहि-त्राहि के भयानक दर्द-भरे कोलाहल में डूब गई गँवई धरती...लेकिन कुछ घड़ियों के उफान के बाद ठंडी शांति की फरेबी परतें....धीरे-धीरे उतरने लगीं ! सारंग का कलेजा फटकर चिथड़ों-चिथड़ों में बिखरने लगा। सहज सामान्य गति पकड़ता...जीवन उसे भयभीत कर रहा है। स्त्रियाँ जिंदगी के गीतों, संस्कारजनित उत्सवों और रोजमर्रा की जरूरतों के चलते अपने-आपको प्राकृतिक लीला में उतार रही हैं ! या कि भीतर से उमड़ते करुण खूँखार हाहाकार को पीकर महाविनाश को चुनौती देती हुई जीने की अदम्य चेष्टा कर रही हैं ! शायद पिए हुए समस्त विष को अपनी मुस्कानों में ढालकर अमृत कर देना चाहती हैं ! नहीं, शाश्वत सत्य की तरह उजागर होती हुई अनहोनी को पहचानते हुए भी अनजान बने रहने का ढोंग !

इस गाँव के इतिहास में दर्ज दास्तानें बोलती हैं—रस्सी के फंदे पर झूलती रुकमणी, कुएँ में कूदनेवाली रामदेई, करबन नदी में समाधिस्थ नारायणी—ये बेबस औरतें सीता मइया की तरह ‘भूमि प्रवेश’ कर अपने शील-सतीत्व की खातिर कुरबान हो गईं। ये ही नहीं, और न जाने कितनी...
बूढ़ी खेरापतिन, जिनका जीवन गाँव की पुरोहिताई करते बीता है, इसी तरह की करुण कथाएँ सुनाती हैं, भले वे आधी-अधूरी हों। ख्यालीराम, ढोलावाले ‘दादू’, तन्मय होकर ऐसी अनेक गीतकथाएँ सुनाते हैं सुनाते हैं गाँव-समाज को, जिनमें अकाल मौत को ‘विपता’ के सिर मढ़कर, कभी भाग्य के गले डालकर असल कातिल को बेदाग बचा लिया जाता है।...मगर दादू और खेरापतिन सजल नेत्र, रुँधे कंठ गाते जाते हैं निरंतर, धीरज क्षीण होता जाता है आहिस्ता-आहिस्ता...हिल्की भर आती है।

नई पीढ़ी विश्वास नहीं करती—कहानी-किस्सों की बात पर रोना-धोना ! सठिया गए हैं दोनों बूढ़े।....लेकिन कहाँ मानते हैं दोनों पुरख़ा, गीत की कड़ियों की धार से लहूलुहान हो जाती है धरती—लाल-लाल खून के दाग...
किस्से-कहानियाँ नहीं हैं गीतकथाएँ, जिंदगी और मौत के अनमिट दस्तावेज हैं। रेशम का वध न हुआ होता तो सारंग भी हँसकर टाल जाती, और यह बेरहम घटना धरती में दफन हो जाती धीरे-धीरे—सीता मइया की भूमिसमाधि—देवी-देवता नहीं बच सके करम गति से, रेशम तो साधारण प्राणी...
-खेरापतिन दादी, आज तुम्हारी गाई हुई गीतकड़ियों की स्वरतरंग भयानक बवंडर की तरह चपेट रही है मुझे...धरती आसमान हिल रहे हैं, रूखे पेड़ थर्रा रहे हैं। पंछी-परेबाओं ने चिचियाना आरंभ कर दिया....गली-गैलों को रौंदता हुआ खौफनाक जलजला चला आ रहा है, मैं सुन्न...

असाढ़ की उमसभरी काली रात !
निस्तब्धता तोड़ता हुआ मोर फड़फड़ाता है चौक में खड़े पीपल पर। मोरनी पंख फटफटाती हुई कोंकियाती है—करुण रोदन ! सारंग बुरी तरह चौंकी। सिकुड़कर आधी हो गई। यह मोर नहीं, रेशम की दर्दनाक पुकार—ओ बीबीऽऽऽ...बीबी ऽऽऽ ! सारंग विकल मन सोच की रस्सियों से बँधी हुई...
-मैं छटपटा-छटपटाकर खत्म हो जाऊँगी रेशम ! तू अपनी बहन की व्यथा इतनी न बढ़ा। सारे दुख-दर्द सोखकर जूझनेवाली तू...मुझे अपनी तरह मजबूत समझ रही है ! ना री, मैं निरी कमजोर औरत...जी पा रही, न मर ही सकी।
उठकर बैठ गई सारंग। बराबर में रंजीत सोए हुए हैं। अँधियारे में पति का सोया हुआ रूप साकार है उसकी आँखों में। इतना अँधेरा बर्दाश्त नहीं होता रंजीत ! दम घुटता है। वह पति की मजबूत साँसों को शिद्दत से महसूस करने के लिए उनके ऊपर झुक आई। अपने भीतर उजाले की महीन-सी रेखा पैदा करना चाहती है। ‘....मेरा दुख कम करने की ताकत तुममें है रंजीत !’ उनके चौड़े कंधों को टटोलने लगी। और मन को मजबूत करती हुई भीतर ही भीतर पुकार उठी—‘तुम जागो रंजीत ! उठो ! तुम्हारे सिवा मेरा कौन...’

हाथ कंधें से होता हुआ माथे पर आ गया—चौड़ा माथा, घनी भवें ! सारंग की नरम हथेली का स्पर्श पाते ही रंजीत की पलकें कुनमुनाईं, जीवन की सी लहर।
उसके मन से उठी पुकार ने धरती से आसमान तक एक गूँज कायम कर दी—देखो रंजीत, मैं क्या देख रही हूँ। सुनो, मैं क्या सुन रही हूँ। यदि महसूस कर सकते हो तो उसी तरह अनुभव करो, जैसे मैं कर रही हूँ।....इस मनहूस रात का सामना हमें....
रंजीत की आँखों में उठी हलचल बंद हो गई, सारंग की साँसें थमने लगीं। अपनी ही आवाज की उदास प्रतिध्वनि में घिरी हुई विकल।

‘अरे ! तुम रो रही हो !’ वे उठकर बैठ गए उनींदे से।
अलसाया हुआ हाथ उसकी पीठ पर फिराते हुए, ऊँघती आवाज में बोले, ‘‘सारंग, जो होना था हो गया। रोकर क्या होगा ? चुप हो जाओ..चुप, चुप !’ कहकर अपने होंठ उसके सिर पर रख दिए अँधेरे में....
‘‘सच कहते हैं रंजीत। सब्र न आए तो भूख-नींद का सिलसिला खत्म हो जाएगा। पागल होती जा रही हूँ मैं। काम-धंधा सब ठप्प !’’
‘सारंग, संसार में जो आया है, जाएगा। रेशम के जाने का बहाना यही था। संसार की लीला यही है। तुम गीता पढ़ा करो।’ रंजीत ने पत्नी को बाँहों में भर लिया और छाती से लगाकर सुला लिया।
सारंग के सीने में फिर तूफान घिरा। फिर बवंडर उठे। ज्वार ठाठें मारने लगा—मैं दहशत से काँप उठती हूँ। चारों ओर पिशाच ही पिशाच...घिर गई हूँ। उस हादसे को तुम भूल गए रंजीत ? सच कहना तो ! या कि मैं ही बाबरी हो चली ?
...मैं नहीं भूलती, लेकिन...

तमाशगीर आ गए। भीड़ जुट गई। चार-पाँच लोग फावड़े ले-लेकर आ रहे हैं। खोदने का सिलसिला चालू हुआ। बिटौरा (कंडा और गोबर से बना घरौंदा) की सूखी जर्जर लैमन का मलवा हटाया जाने लगा। मेरी आँखों के आँसू धुएँ की तरह फैलने लगे—मेरी बहन की कटी-फटी दूधिया देह चिथड़ों-चिथड़ों में निकलेगी—सँभालकर फावड़े चलाओ रे लोगों, उसके और न चोट लगे...पेट के भीतर का जीव....बचा लो रे कोई...

रेशम का छोटा जेठ डोरिया—छत्तीस-सैंतीस वर्ष का गबरू जवान...नरपिशाच ! मोटी गर्दन के समतल घुटी खोपड़ी पर पसीने की बदबूदार धारें...मैं इस समय भी साफ-साफ देख रही हूँ रंजीत, वह बड़ी मुस्तैदी से मलवा हटा रहा है। गजब की फुर्ती है उसके पहलवानी हाथों में। बनैले जानवर की तरह शिकार को फाड़कर खा जाने की फुर्ती !
रेशम का बड़ा जेठ—थानसिंह मास्टर ! शराफत में डूबा चेहरा...शोक में सने खड़े हैं। ‘जल्दी करो, जल्दी करो’ का गहरा और भारी स्वर...पर उस धर्मपुत्र की आवाज मेरे कानों के पर्दों को फाड़े डाल रही है।
मेरी नजर रेशम के ससुर ‘साध जी’ से जा टकराई। बूढ़े रथ की तरह, लंबे-चौड़े शरीर पर झुके हुए, लठिया के सहारे खड़े रुआँसे—सोगवार हैं। उनकी बड़ी-बड़ी सफेद मैली मूँछें और उसी रंग की घोंसले सी दाढ़ी बड़ी दयनीय लग रही है। मेरे घूँघट ने केवल इन तीनों को ही देखा, या और कुछ भी ? नहीं मालूम।

हाहाकार बराबर मच रहा था—चलियो रे ! बचइयो रे ! जुलम हो गया !
शोर ने मौत को चादर की तरह ढक लिया। दिन डूबने को था, गाँव के घर खाली होते जा रहे थे। सारी जनता बिटौरा और घूरे के आसपास अँट गई।
स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े....जितने मुँह उतनी बातें—
‘अरे भाई, जैसी भी थी, गाँव की बहू थी।’
‘भाग की पोच (कमजोर) निकली।’
‘मौत का हाथ बड़ा लंबा होता है, कहाँ से खेंच लाया करम की मारी को !’
‘अरे, जितनी उमर लिखाकर लाई थी, उतनी ही तो भोगेगी।’

‘सती थी भाई। करमवीर (पति) को मरे छः महीने भी पूरे नहीं हुए, लो खुद भी चोला छोड़ दिया।’
‘अरी ऐसा भाग कितनियों का कि मालिक के पीछे ही पीछे चल दे।’
‘सारंग नहीं रोई।’
‘मइया, बड़ी कठकरेज लुगाई है। बहन मरी और यह देखो बर्द की सी निर्जल आँखें...’
मुझे किसी ने हौल से देखा, किसी ने घृणा से। किसी ने धिक्कार से, तो किसी ने तरस खाकर।
समतल जमीन पर धर दी देह। चादर डाल दी। सास ने पछाड़ खाई तो चचिया सास ने रो-रोकर बैन किए। थानसिंह की घरवाली छाती कूटने लगी।...ये मौत पर किए गए जरूरी विधान....मैं सूखी आँखों देखती रही। आँसुओं के वे ही कतरे तापभरी प्रचंडिनी घटा बनकर घुमड़ रहे हैं। गड़गड़ाकर उस हत्यारे को दबोच लेना चाहते हैं, जिसने... मैंने बहन के अंतिम दर्शन किए, उसके अजन्मे बालक को छाती से लगाया कि खुद ही भस्म होने लगी उसके संग-संग...। इनका खून किन हथेलियों में लगा है ? कौन था इतना कायर ? मेरे वे ही आँसू किस कदर बिफरते हैं रंजीत ! खयालों की फौजें छाती को रौंदती हैं—तुम उठो !

‘तू बड़ी नादान है सारंग !’
बूढ़ी खेरापतिन दादी स्त्री की अंतहीन व्यथा की साक्षी बनकर बहलाती हैं उसको। अपनी अनेक लोककथाओं, गीतकथाओं की मार्फत उसी करुणा को खेलती हैं, बार-बार—
‘चंदना की कथा और क्या है बेटी ?’ वृद्धा का सलवटें पड़ा गोरा चेहरा कँपकँपा उठता है। ढीले होंठ थरथराते हैं।
‘दादी, मुझे चंदना से रेशम तक की कहानी मालूम है, पर अब आगे मत जाना दादी...आगे जाओगी तो प्रलय...आगे जाओगी तो संसार खत्म......आगे जाओगी तो रसातल....बस करो दादी, बस !’’ सारंग हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती है।
पर दादी क्या करें ? उनका मानना है कि जो माता बेटी जनती है, उसकी साँसे मरते दम तक काँटों में उलझी रहती हैं। आत्मा शूलों से बिंधी घिसटती रहती है। जिंदगी सूली पर टँगी रहती है। लोकाचार और जगत-व्यवहार में आनेवाली परम्पराएँ सारे अपयश की गठरी बेटी के सिर धरकर न जाने उसे कब संगीन से संगीन सजा देने की हिमायती हो उठें ? दादी के आखरों का सार यही है—बेटी की मइया सुख की नींद सोई है कभी ? बूढ़ी खेरापतिन इस व्यथा को गीत की लय में ढालने से पहले काँपती आवाज में यह सवाल जरूर पूछती हैं—घर की आबरू धिय-बेटी की देह में धजा की तरह नहीं गड़ी रहती भला ?

फिर कोई मंगलाचरण न देवी-वंदना। सूरज-चन्द्रमा की स्तुति न धरती मइया को प्रणाम। केवल कुछ बूँदें आँसू मटमैली पुतलियों पर छा जाते हैं, और मुरझाए हुए गालों पर ढुलक पड़ते हैं। जमाने की मार खाई हुई झुर्रीदार चमड़ी की आड़ी-तिरछी रेखाएँ भीग उठती हैं।
झुंड के रूप में पास बैठी स्त्रियाँ समझ लेती हैं—खेरापतिन ने भैमाता (सृष्टि की देवी) के चरणों में जल ढार दिया। अनकहे ही कह दिया—मइया, तेरी सिरजना में ऐसी दुभाँति ! कोख देकर कोख का महापातक दिया बेटियों को.....
बूढ़ी गा उठती है....


तीजन चरचा चंदना की चल रही जी,
ए जी कोई मच्यौ है सहर में सोर—
सिर बदनामी चंदना बेटी लै रहीं जी ऽ ऽ ऽ...


अगली कड़ी गाने से पहले दादी का कंठ विश्राम लेना चाहता है। फूली हुई साँस थमती है कि लय न टूटे कहीं, कड़ी न बिखरे।


बोल रे बोलो जा गाम के पंडितै जी
ए जी कोई चंदना की गौनों सुधवाउ
सिर बदनामी चंदना बेटी लै रहीं जी ऽ ऽ ऽ...


दादी खँखारकर गले को साफ करती हैं। कंठ में पानी का गोला अटका है। नाक से ‘सुन्न सुन्न’ की ध्वनि निकल रही है।
वह गीतकथा निर्जीव होती है, जो पूरे भाव के साथ न सुनाई जाय। दादी हाथ और उँगलियों के संकेतों से समझाती हैं—महतारी अभागिन, बाप बेबस ! चंदना के गौने की चिट्ठी सावन के महीने में लिखवानी पड़ी, जब गाँव की बेटियाँ पीहर लौट रही थीं...


सेत पै स्याही पंडित के ने करदई जी,
ए जी कोई दैदई नाऊ के के हाथ—
चिठिया तौ पहुँची सजन जी के थान पै जी ऽ ऽ ऽ..


-दीवानखाने में कँवरजी की मजलिस लगी है। जन-परजा बैठी है। सावन मास में ससुराल का नाई ! कुँवरजी चकित हैं। किस कारण आया ? चंदना तो माई-बाप के यहाँ है। चिट्ठी पढ़ते समय की आँखों की रंगत बदली। पुतलियों पर खून उतर आया, दसों दिशाएँ जलने लगीं। सन्नाकर उठे कुँवरजी। घुड़सार में गए, नीलबरन घुड़िला के ऊपर जीन कसी। लगाम पकड़कर माता के चरन छूने आए, और हो गए असवार घोड़ा की पीठ पर। चंदना का पीहर—पेसवाजी—खातिरदारी की क्या बात कि चत्तुरसारी में पचरंग पालिका, मखमली विछौना, रेसमी गेंदुआ। छप्पन भोग, छत्तीसो व्यंजन।
-पर जिसकी छाती में अपनी स्त्री ने ही बान मारा हो, उसको भूख कहाँ, नींद कहाँ ? औरत जात....यह हिम्मत ! जिसके जीवन की डोर कुँवरजी के हाथों में थमी है, वह पराये खेत में मुँह मारने की जुर्रत करे ! खिंचवा लेंगे नाका डालकर। पौहे-पसु और तिरिया को बस में रखने के लिए हर समय नाका रखना पड़ता है। उसकी भूल मालिक की इज्जत पर भारी पड़ती है।....कोड़ा ! कोड़ा !
-पर चंदना ! जिसने मन-प्रान से सकल जैसे सखा को चाहा हो, अपने बस में रहे तो कैसे रहे ? ब्याह हो गया, पर मन नहीं बंध पाया। पिता ने कन्यादान कर दिया पर चंदना मन का दान कर बैठी सकल के हाथ। नादान छोरी मछली सी छटपटाने लगी। कल जाना होगा ! सकल को छोड़कर चले जाना है ! अब के बिछुड़े कब मिलें....? सकल से भेंट करने की मनोकामना में तड़पती हुई चंदना एक-एक घड़ी रात काटने लगी।
-आधी रात बीत गई। तारों से आसमान भर गया। अँधिरिया धरती पर पसरी है...चंदना तारों की छाँव चल दी। ऊपर को देखा—पेड़ों पर पंछी-परेबा सोए हैं। नीचे को देखा—गली में कुत्ते बिल्ली औंघ रहे हैं। पर सावन का महीना...घनघोर घटा घिरी थी। बादल गड़गड़ाया और एक मोर नीम के पेड़ पर अचानक फड़फड़ा उठा। चंदना काँप गई। नन्हीं बच्ची सी सिकुड़-सहमकर दीवार से चिपक गई।
‘सकल !’
‘हाँ !’
‘यहाँ !’
‘तुम्हारी राह में खड़ा था। मैं जानता था कि तुम...’
चंदना की राहें उजियारे से भर गईं। सकल चंदना को छाती से लगाकर तड़पने लगा..बूढ़ी खेरापतिन का हिया गाते समय कलप-कलप उठता है—


अब के तो बिछुड़े पाँखी पंछी कब मिलें जी,
ए जी कोई हुए री करेजा के टूँक,
जतन बता जा चंदना अपने मिलन कौ जी ऽ ऽ ऽ..

 

चंदना रोती रही ज़ार-ज़ार...सकल ठहरा सुनार का बेटा, मुँदरी लाया था—चंदना की उँगली में पहनाते समय बोला—इससे ज्यादा क्या है मेरे पास ?
सबेरा हुआ। बिदा हो गई।
चंदना रोती-कलपती, पीछे को मुड़-मुड़कर देखती हुई माता-पिता और सकल को गाँव के सिवाने पर छोड़कर चल दी। नाइन ने लोटे में से पानी पिलाया था—चंदना ने चाँदी के सिक्के के संग अपनी कंगनियाँ लोटे में डाल दी—सकल को दे देना। मेरे माँ-बाप की देहरी हरी रहे, मेरा गाँव फले-फूले—नाइन ने चंदना से ये दो बोल कहलाए।
‘नीलबरन घोड़ा की चाल जैसे गरुन महाराज की असवारी !’ दादी उँगली उठाकर ऐसा संकेत देती है, जैसे चंदना चलते-चलते थक गई हो। एक वन लाँघा, दूजे वन आए और तीजे वन में आकर कुँवरजी बिसराम को रुके। दोनों पिरानी तोसक बिछाकर बैठ गए। चंदना की झीनी-गुलाबी चुनरी और लंबा घूँघट—नाक की नथुलिया बिजुरी सी चमकी। उठती-गिरती पलकें। मालिक देख रहे हैं....कुँवरजी ने सवाल किया फिर—


कहा गढ़ायौ चंदना माई बाप ने जी,
ए जी कोई कहा तौ रे दियौ भइया बीर
कहा गढ़ायो सकल सुनार ने जी ऽ ऽ ऽ



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