प्रेरक कथाएँ - शम्भूनाथ पाण्डेय Prerak Kathayein - Hindi book by - Shambhunath Pandey
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प्रेरक कथाएँ

शम्भूनाथ पाण्डेय

प्रकाशक : अमरसत्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :68
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3387
आईएसबीएन :81-88466-25-5

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किशोरोपयोगी कथाएँ.....

Prarak Kathayain

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बहस

किसी जगह फूल और काँटे में बहस छिड़ गई। कांटे ने फूल से कहा, ‘भई, तुम्हें ईश्वर ने व्यर्थ ही बनाया है। तुम तो इतने कोमल हो कि शीत और ताप के एक मामूली से झोके को नहीं सह सकते। एक-दो दिन खिलकर मुरझा जाते हो। मुझे कई बार तुम्हारी क्षणभंगुरता पर तरस आता है। मुझे देखो, मैं कितने दिनों से जी रहा हूं। तुम्हारे जाने कितने पूर्वज इस टहनी पर खिले और मुरझाए लेकिन मैं ज्यों का त्यों हूँ। जानते हो क्यों ? क्योंकि जो कोई मेरे पास आता है, मैं उसे काट खाता हूं। लोगों में हिम्मत नहीं कि मुझे छुएँ।’’
फूल ने सहज भाव से कहा, ‘‘बंधु, तुम्हारा कहना सही है। मगर मुझे तो मरने-जीने का खयाल ही नहीं आता। उत्सर्ग ही मेरे जीवन का ध्येय बन गया है। मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन भले एक पल का हो, पर अपनी सुगंध से सबके मन को मोहित कर सकूँ। देखने वाला प्रसन्न और गद्गद हो जाए।’’
यह सुनते ही काँटें का घमंड चकनाचूर हो गया। कहते हैं, उसी रोज से उसने फूलों की रक्षा को अपना कर्त्तव्य मान लिया।

स्वर्ग-नरक


एक गुरु के दो शिष्य थे। दोनों किसान थे। वे भगवान का भजन-पूजन भी नित्य करते थे। किंतु विडंबना यह थी कि उनमें एक सुखी था, तो दूसरा बहुत दुखी। गुरु की मृत्यु पहले हुई और शिष्यों की बाद में। संयोग से स्वर्गलोक में तीनों को एक ही स्थान मिला। स्थिति यहाँ भी पहले जैसी थी। जो मृत्युलोक में सुखी था, वह वहाँ स्वर्ग में भी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा था और जो पृथ्वी पर दुखी था, वह वहाँ भी अशांत दिखाई पड़ा।
यह देख दुखी शिष्य ने गुरु से कहा, ‘‘लोग कहते हैं कि ईश्वर-भक्ति से स्वर्ग में सुख मिलता है, पर हम तो यहां भी दुखी के दुखी ही रहे।’’
गुरु ने गंभीर होकर उत्तर दिया, ‘‘वत्स, भक्ति से स्वर्ग तो मिल सकता है, पर सुख और दु:ख मन की अवस्था है। मन मुक्त हो तो नरक में भी सुख है और मन मुक्त न हो तो स्वर्ग में भी कोई सुख नहीं है। जिसका मन जितना मुक्त है, वह उतना ही सुखी है।’’


बुद्ध की बुद्धिमता



भगवान बुद्ध एक बार किसी गाँव के गुजर रहे थे। गाँव के कुछ लोग उन्हें अपशब्द कहकर उनका अपमान करने लगे। कुछ देर बाद बुद्ध ने कहा, ‘‘अगर आप लोगों की बात समाप्त हो गई हो तो मैं यहाँ से जाऊँ ? मुझे दूसरे गाँव पहुंचना है।
यह शब्द सुनते ही सारे ग्रामवासी आश्चर्यचकित हो गए। वे बोले, ‘‘हमने बात को कुछ नहीं की। आपको सिर्फ अपशब्द कहे हैं, फिर भी आप दुखी नहीं हुए ? बदले में अपशब्द का उत्तर तो दिया होता या कुछ कहा होता ?’’
स्थितप्रज्ञ बुद्ध बोले, ‘‘मुझे अपमान से दु:ख या स्वागत से सुख नहीं मिलता। मैं तो अपने लिए भी सिर्फ द्रष्टा मात्र रह गया हूँ। अब मैं आप लोगों के साथ भी वही करूँगा जो मैंने पिछले गाँव में किया है।’’ कुछ लोगों के पूछने पर कि आपने वहाँ क्या किया ? बुद्ध ने कहा, ‘पिछले गाँव में कुछ लोग मुझे फल-फूल व मिठाई भरी थालियाँ भेंट करने आए थे। मैंने कहा कि मेरा पेट भरा हुआ है, मुझे क्षमा करो । मेरे ऐसा कहने पर वे वापस चले गए। अब आप लोग अपश्ब्द लेकर आए हैं, अत: आप भी इन्हें वापस ले जाएँ क्योंकि वापस ले जाने के अलावा आप लोगों के पास कोई दूसरा उपाय नहीं है। उस गाँव के लोगों ने मिठाइयाँ और फल तो लोगों में बांट दिये होंगे, लेकिन आप लोग ये सारी गालियाँ किसको बाँटोगे, क्योंकि मैं इन्हें लेने से इनकार कर रहा हूँ।’’
अपशब्द कहनेवाले एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए और बुद्ध अपने रास्ते आगे बढ़ गए।


क्षमादान महादान



एक राजकर्मचारी ने बेटी के विवाह में अपने मालिक के रुपयों में से कुछ रुपए खर्च कर डाले। पता चलने पर मालिक के बेटे ने उस कर्मचारी को पुलिस के हवाले कर देने का विचार किया, लेकिन पिता ने रोक दिया। उसने कहा, ‘‘इसे सजा मैं दूँगा।’’
मालिक ने कर्मचारी से कहा, ‘‘तुम्हें रुपयों की जरूरत थी तो मुझसे कहते !’
कर्मचारी रोने लगा। मालिक ने कहा, ‘‘आज से मैं तुम्हारी तनख्वाह दोगुनी किए देता हूँ।’’
पुत्र ने पिता से पूछा, ‘‘आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ?’’
पिता ने कहा, ‘‘बेटे, यदि इसे हम पुलिस के हवाले कर देते तो इसका घर तबाह हो जाता। दूसरे, अपराध हमारा भी है कि हमने इसके क्रियाकलापों पर ध्यान नहीं दिया। तीसरे, क्षमा से बढ़कर और कोई दंड नहीं है, इसलिए इसके साथ यही व्यवहार उचित है।’’


शिक्षक की शिक्षा



कलकत्ता के रेलवे स्टेशन पर एक नवयुवक गाड़ी से उतरते ही ‘कुली-कुली’ चिल्लाने लगा। हालाँकि उसके पास सामान भी कम था, जिसे वह आसानी से ढो सकता था। एक सज्जन, जो सादी वेशभूषा में थे, उसके पास आए और बोले, ‘‘नौजवान, तुम्हें कहाँ जाना है ?’’ वह नवयुवक किसी शिक्षा संस्थान में पढ़ने के लिए आया था। उसने अपना नाम बताया। वे सज्जन उसे सामान के साथ उस पास के स्कूल में ले गए, जहाँ उसे जाना था। जब वे सज्जन सामान रखकर जाने लगे तो उस युवक ने उन्हें इनाम देना चाहा।
उन सज्जन व्यक्ति ने इनाम लेने से इनकार कर दिया फिर बोले, ‘‘आप भविष्य में अपना काम खुद कर लेंगे, बस, यही मेरा इनाम है। इतना कहकर वह सज्जन चले गए।
अगले रोज वह विद्यार्थी विद्यालय पहुंचा तो उसने देखा कि सज्जन पुरुष प्रधानाचार्य के उच्चासन पर विराजमान थे। वह नवयुवक विद्यार्थी हतप्रभ रह गया। उसके तो पसीने छूटने लगे। प्रार्थना के बाद जब सारे विद्यार्थी अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गए तो उसने प्रधानाचार्य से माफी माँगी।
वह महान सज्जन थे-ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जिन्होंने सामान ढोकर उस नवयुवक को उसकी कर्त्तव्यपराणयता का बोध कराया।


फ्रायड की वैचारिक शक्ति



प्रसिद्ध चिंतक फ्रायड ने अपनी जीवनी में लिखा है कि एक बार वे अपनी पत्नी व छोटे से बच्चे के साथ बगीचे में घूमने गए। देर शाम तक वे अपनी पत्नी के साथ बातचीत करते रहे और टहलते रहे। जब गेट बंद होने का समय आया तो उनकी पत्नी को याद आया कि उनका बच्चा जाने कहां छूट गया है। वह घबरा उठी। फ्रायड ने कहा, ‘‘घबराओ मत। मुझे यह बताओ कि क्या तुमने उसे कहीं जाने से मना किया था ? अगर मना किया था तो समझो कि पूरी-पूरी उम्मीद है कि वह वहीं गया होगा।’’
पत्नी ने कहा, ‘‘हां, मना किया था और कहा था कि फव्वारे पर मत पहुंच जाना,’’ अंतत: दोनों उस फव्वारे की तरफ गए और जब बेटे को फव्वारे के पानी में पैर लटकाए देखा तो फ्रायड की पत्नी हैरान हो गई। उसने पति से पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि हमारा बेटा यहीं होगा ?’’
फ्रायड ने कहा, ‘‘यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मन को जहाँ जाने से रोका जाता है, वह वहीं जाने के लिए बाध्य करता है।’’
फ्रायड ने आगे लिखा है कि मनुष्य इस छोटे से सूत्र का पता आज तक नहीं लगा पाया। हमारे धर्म, नीतियाँ और समाज जितना ही दमन पर जोर दे रहे है, हम परमात्मा से उतने ही दूर होते जा रहे हैं। दमन से मुक्ति ही परमात्मा के घर तक पहुंचने के एकमात्र साधन हो सकता है।


सदगुरु की दृष्टि



एक बार किसी गुरु ने अपने शिष्य सम्राट का खजाना देखने की इच्छा जाहिर की। सम्राट् ने खुद अपने धनागार को खोला, जिसमें कहीं हीरे, कहीं जवाहररात तो कहीं मणि-रत्न आदि रखे थे। उन्हें देखकर गुरु ने पूछा, ‘‘इन रत्नों से तुम्हारी कितनी कमाई होती है ?’’
सम्राट ने कहा, ‘‘इनसे कमाई नहीं होती, बल्कि इन पर व्यय होता है। इनकी रक्षा के लिए पहरेदार रखने पड़ते हैं।’’
गुरु ने पूछा, ‘‘इन्हें रखने के लिए खर्च होता है ? चलो, मैं तुम्हें इससे भी बढ़िया पत्थर दिखाता हूँ।’’
चलते-चलते दोनों काफी दूर निकल गए। थोड़ी देर बाद वे एक गरीब विधवा के घर पहुंचे। वह चक्की पीस रही थी।
गुरु ने कहा, ‘‘देखो राजन्, यह चक्की तुम्हारे पत्थरों से ज्यादा उपयोगी और अच्छी है। यह आटा पीसती है, जिससे लोगों की भूख मिटती है, और बुढ़िया का जीवनयापन भी होता है, इसलिए यही वास्तविक रत्न है।’’


सफलता की कुंजी



किसी गाँव में एक बूढ़े किसान के चार पुत्र थे। चारों बड़े ही आलसी प्रवृत्ति के थे। किसान हमेशा ही अपने पुत्रों के भविष्य को लेकर चिंतिंत रहता था। कुछ ही दिनों बाद वह बूढ़ा किसान बीमार पड़ गया। उसने अपने चारों पुत्रों को अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘मेरी मृत्यु निकट है। अत: मैं तुम लोगों को अपने धन के बारे में बताना चाहता हूँ। मैंने अपना सारा धन घर के पीछे वाले खेत में दबा दिया है। मेरे मरने के बाद तुम लोग उसे खोदकर निकाल लेना। इतना कहकर बूढे किसान ने अपने प्राण त्याग दिए।

चारों पुत्रों ने धन खोजने के लिए खेतों को खोदना शुरू कर दिया। वे कई दिनों तक खेतों को खोदते रहे, पर उन्हें कोई भी खजाना नहीं मिला। इससे उन्हीं बड़ी निराशा हुई। गाँव का बूढ़ा सरपंच उस किसान का दोस्त था। उसने चारों पुत्रों को सलाह दी कि अब तुमने खेत खोद ही डालें हैं, तो इनमें बीज भी बो दो। निराश पुत्रों ने अनमने भाव से गेहूँ बो दिए। कुछ ही दिनों में फसल तैयार हो गई। चारों पुत्र प्रसन्नता से खिल उठे।
यह देख बूढ़े सरपंच ने किसान के पुत्रों को समझाया कि परिश्रम ही वह गड़ा हुआ धन है। परिश्रम से ही धन कमाया जा सकता है। सरपंच की बात सुनकर किसान के बेटों को छुपे हुए खजाने का रहस्य समझ में आ गया। इस तरह वे आलस्य त्यागकर सदैव के लिए परिश्रमी बन गए।


अभय सुकरात



सुकरात के बारे में एक काहनी प्रचलित है। उन्हें जब विष का प्याला पीने के लिए दिया गया तो उनके पास आस्तिक और नास्तिक दोनों ही प्रकार के मित्र मौजूद थे।
पहले उनके नास्तिक मित्रों ने पूछा, ‘‘क्या आपको मौत का भय नहीं है ?’’

सुकरात ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘इस समय मैं आप लोगों के ही मत और विश्वास के अनुसार निर्भय हूँ। आप लोग कहते हैं कि आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है, तो फिर चिंता कैसी ? आत्मा है ही नहीं। शरीर नश्वर है। इसे एक न एक दिन नष्ट होना ही है, तो फिर चिंता का प्रश्न ही नहीं उठता। विषपान के बाद मैं मर जाऊंगा, तो कहानी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।’’
यह सुनकर फिर सुकरात के आस्तिक मित्रों ने भी वही सवाल किया। सुकरात ने उन्हें कहा, ‘‘आप लोगों के अनुसार आत्मा अमर है। विषपान के बाद यदि मैं मर गया, तो भी आत्मा तो मरेगी नहीं। फिर डर किस बात का ?
इस प्रकार सुकरात ने अपने अंतिम समय में भी अपने आस्तिक और नास्तिक दोनों प्रकार के मित्रों को संतुष्ट किया।
वास्तव में आस्तिकता और नास्तिकता का उतना महत्त्व नहीं है, जितना कि जीवन में विचारों की शुद्धता एवं पवित्रता से ऊर्जा ग्रहण करने का है।


संकल्पःशक्ति ही महाशक्ति



परमात्मा ने मानव-जाति को ढेर सारी अलौकिक शक्तियों से पूर्ण कर रखा है। अगर आवश्यकता है तो इस बात कि मनुष्य अपने अंदर छिपे हुए असीम कोष को जागृत कर सकें। अपनी प्रबल संकल्प-शक्ति के सहारे वह अंसभव को संभव बना सकता है।
ऐसा कहा जाता है कि एक बार चार दैवी शक्तियाँ पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। रास्ते से गुजरते गुए एक सिद्ध महात्मा ने उन्हें पहचानकर प्रणाम किया। वे शक्तियाँ यह नहीं समझ पाईं कि प्रणाम किसे किया गया। अत: आपस में विवाद करते हुए वे शंका-समाधान के लिए महात्मा के पास पहुंची। महात्मा ने उन सबका क्रमश: परिचय पूछा।
एक शक्ति बोली, ‘‘मैं विधाता हूँ सबका भाग्य लिखती हूँ। मेरी खींची हुई रेखाएँ अमिट होती हैं।’’
महात्मा ने प्रश्न किया, ‘‘क्या आप खींची हुई भाग्य –रेखाओं को स्वयं मिटा सकती हैं या बदल सकती हैं ?’’
उत्तर नहीं में मिला। महात्मा बोले, तब मैंने आपको प्रणाम नहीं किया है।

दूसरी शक्ति बोली, ‘‘मैं बुद्धि हूं, विवेक की स्वामिनी हूँ।
महात्मा बोले, मैंने आपको भी प्रणाम नहीं किया, क्योंकि मैं इस सत्य को जानता हूँ कि मार खाने पर बुद्धि आती है और फिर चली जाती है। मनुष्य ठोकर खाने पर ही सचेत होता है, समर्थ हो जाने पर फिर बुद्धि से काम लेना बंद कर देता है।
तीसरी शक्ति बोली, ‘‘मैं धन की देवी हूँ। मनुष्य को समृद्धि देती हूँ, भिखारी को भी राजा बना सकती हूँ।’’
महात्मा मुस्कराए और बोले, ‘‘आप जिसको धन-वैभव से पूरित करती हैं, वह विवेक खो बैठता है तथा लोभ, अंहकार, काम, क्रोध आदि में उसकी प्रवृत्ति बढ़ने लगती है। मेरा प्रणाम आपको भी नहीं था।’’

अब चौथी शक्ति ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं संकल्प-शक्ति हूँ। मुझे धारण करने वाला कालजयी होता है। वह त्रैलोक्य की अलभ्य चीजें सहज ही प्राप्त कर सकता है।’’
महात्मा ने ये शब्द सुनते ही चौथी शक्ति को पुन: प्रणाम किया और कहा, ‘‘माते ! आप महाशक्ति हैं, अजेय हैं, अनंत है, कल्याणी हैं। आपके सहारे मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है। मेरा प्रणाम आपको ही निवेदित था।


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