श्रावणी - आशापूर्णा देवी Shravani - Hindi book by - Ashapurna Devi
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श्रावणी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3427
आईएसबीएन :81-284-0058-4

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आशापूर्णा देवी का एक और रोचक उपन्यास

Shravani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित आशापूर्णा देवी का जन्म 8 जनवरी, 1910 को हुआ था। कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘भुवन मोहिनी’ स्वर्ण पदक से अलंकृत आशापूर्णा जी को 1976 में पद्मश्री से विभूषित किया गया। सन् 1977 में अपने उपन्यास ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ पर टैगोर पुरस्कार तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया।
अपनी 175 से भी अधिक औपन्यासिक कृतियों के माध्यम से आशापूर्णा जी ने समाज के विभिन्न पक्षों को उजागर किया है।

श्रावणी


सुबह तक इस गृहस्थी का रंग-ढंग रोज़ दिन के समान था और जब हॉल में टंगी घड़ी में आठ बजकर सत्रह मिनट हुए, तब भी गृहस्थी का पहिया यथा नियम चल रहा था।
पौ फटते की माली ने बगीचे में पानी पटाया था। नत्थूसिंह ने आकर गैरेज खोला और वह छोकरा जिस पर दोनों गाड़ियों का जिम्मा था, अपने काम में लग गया था।
आठ बजकर सत्रह मिनट पर रसोई की रूपरेखा जैसी होनी चाहिए थी, वैसी ही थी। घड़ी में कांटों के कठोर निर्देश में लोकमोहन की गृहस्थी का पहिया रोज़ की तरह उस दिन भी उस घटना के घटने के पहले तक प्रतिदिन के नियमानुसार चल रहा था।

पर घटना को ठीक आठ बजकर सत्रह मिनट पर जैसे घटना ही था। अचानक आकस्मिक रूप से सब-कुछ बन्द हो गया।
पर नहीं, हॉल में टंगी उस खानदानी घड़ी की सुइयां अभी भी नहीं रुकी थीं। कुछ बन्द हो गया था तो लोकमोहन की गृहस्थी का चालू पहिया। एक ज़बर्दस्त धक्के से मानो अचानक ही उसकी गति रूक गयी।
तप्त रक्तवाही एक सजीव हृदय की गति अचानक ही बन्द हो गयी थी और उसके साथ ही लोकमोहन के घर-संसार पर घने बादल छा गए थे।

रोगी को देखकर डॉक्टर स्तब्ध रह गए थे। नाड़ी देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। वे स्तब्ध मौन दृष्टि से केवल क्षणभर के लिए संज्ञाहीन निर्लिप्त चेहरे को देखते रहे थे पर लोगों को लग रहा था कि डॉक्टर युग-युगान्तर से निश्चेष्ट भाव से रोगी के सम्मुख खड़े थे।
-डॉक्टर साहब, आप नाड़ी क्यों नहीं देख रहे हैं ?
फिर अचानक गिद्ध के पंजों में फंसी एक गौरेया की भांति एक मार्मिक आर्तनाद सुनाई पड़ी। वह आर्तनाद तीर की भांति डॉक्टर के कानों में जा बिंधा और फिर कान से पूरी चेतना में फैल गया। डॉक्टर, लोकमोहन के पारिवारिक चिकित्सक थे। परिवार के सभी गले की आवाज़ से परिचित भी थे-फिर भी इस क्षण उन्हें लगा, यह कोई अपरिचित आवाज़ है। उनकी एक उदास दृष्टि उस आर्तनाद को खोजने के लिए सारे घर के लोगों पर दौड़ गयी।

इस दु:खद माहौल में विश्वमोहन का निष्प्राण शरीर पड़ा हुआ था। शव के चारों तरफ लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। नौकर-चाकर से गाड़ी के ड्राइवर तक आ जुटे थे। मोहल्ले में दो चार-जन भी आ पहुँचे थे। भीड़ छटने के लिए अगर इस समय डॉक्टर साहब भी कोई कड़ा आदेश देते तब भी ये लोग यहां से हिलने वाले नहीं थे।
कभी विश्वमोहन के इस सजे-संवरे कमरे में उसके खास नौकर विष्टु के अलावा और कोई छांकने तक की हिम्मत नहीं कर सकता था। पर आज यहां आने में कोई बाधा नहीं थी। सबको छूट मिल गयी थी। गंभीर स्वभाव का विश्वमोहन आज अपनी सारी गंभीरता छोड़कर असहाय शिशु की भांति पड़ा रहकर उनके साहस को मानो समर्थन दे रहा था। सभी चुप थे।

डॉक्टक के लगा इस निस्तब्ध भीड़ की आकुलता और उत्कंठा का आवेग एक तीक्ष्ण बाण की भांति उसे बांधने को तैयार है। यह बाण उस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का बाण था। प्रश्न का यह बाण बस उसी प्रतीक्षा में था कि डॉक्टर कब विश्वमोहन की नाड़ी से हाथ हटाए। लगता था जैसे ही वह समय पूरा हो जाएगा अर्थात् नाड़ी के स्पन्दन के अनुभव की भूमिका खत्म होते ही वह तीक्ष्ण बाण डॉक्टर पर छूट पड़ेगा।
-क्या देखा आपने, डॉक्टर साहब ?

ऐसी स्थिति में किस हिम्मत से डॉक्टर रोगी की नाड़ी देख भी सकता है ? पर बिना देखे उपाय भी क्या था ?
कोई आहत पक्षी अपने पंखों को पछाड़ता हुआ पूछ रहा था- आप नाड़ी क्यों नहीं देख रहे, डॉक्टर साहब ?
डॉक्टर ने आंखें उठाईं। आवाज़ विश्वमोहन की माँ अनुसूया की थी, जिसकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर को महीने में तीन-चार बार आना ही पड़ता था।
विश्वमोहन के पत्थर-से स्थिर पड़े हाथ को डॉक्टर ने अपनी तीन उंगलियों से दबाया पर जहां प्रतिदिन हर पल जीवन रहता है-कहता है- ‘मैं हूं, मैं हूं’; वहां आज जीवन का वह स्पन्दन कहां ?

नाड़ी पर हाथ रखे असहाय दृष्टि से डॉक्टर ने विश्वमोहन के पिता लोकमोहन की तरफ देखा।

पत्थर की तरह मज़बूत सेहत है लोकमोहन की। उनके लिए कभी भी डॉक्टर को इस घर में आना पड़ा है या नहीं, यह शायद डॉक्टर सोचकर ही बता सकते थे। डिस्ट्रिक्ट जज के पद से रिटायर होने के बाद वे अब सचिवालय में किसी ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित थे। चाल-ढाल और व्यवहार से इस प्रौढ़ावस्था में भी उस ऊंचे पद की गरिमा झलकती थी।
पर आज लोकमोहन पूर्णत: बदले हुए-से लगते थे। आज उनके चेहरे पर उस ऊंचे पद का परिचय नहीं लिखा हुआ था......चेहरे पर जीवन भर दूसरों के बारे में फैसला देने वाले जज की भी कोई छाप नहीं थीं।

आज उनका चेहरा एक वृद्ध का चेहरा था। आतंकित और विचलित आंखों में अजीब-सा सूनापन था। डॉक्टर की असहाय दृष्टि के सामने पड़कर उनकी शून्य दृष्टि अनन्त शून्य में डूब गयी थी।

डॉक्टर की आशंका व्यर्थ गयी। जो जहां खड़े थे, मूर्तिवत खड़े रहे। किसी ने नहीं पूछा-मरीज़ का क्या हाल है, डॉक्टर बाबू ? क्योंकि सभी समझ गये थे कि प्रश्न करने लायक अब कुछ रहा नहीं था। डॉक्टर की उस असहाय दृष्टि में सभी अपना उत्तर पा गये थे।
किसी ने कुछ नहीं पूछा। सिर्फ़ विश्वमोहन पर से जब डॉक्टर ने अपना हाथ हटा लिया तब एक और पक्षी- ‘ओह, मां !’ कहकर बिलख उठा।

बस एक बार से अधिक वह शब्द फिर उच्चारित नहीं हुआ। आर्तनाद करने वाली ने केवल विश्वमोहन के निष्प्राण शरीर पर गिरकर उसमें अपना मुँह छिपा लिया। वह थी विश्वमोहन की प्यारी पत्नी श्रावणी।
लज्जा और संकोच का प्रश्न खो गया था और फिर सर्वनाश के चरम मुर्हूत में लज्जा की जगह ही कहां ? लज्जा, भय, शर्म, संकोच और सभ्यता का आश्रय जिस चेतना में रहता है; इस आकस्मिक आघात में श्रावणी उस चेतना को ही तो खो बैठी थी। डॉक्टर की राय के पहले तक सोलह आने आशंका के बीच भी एक क्षीण आशा रह गयी थी- भाग्य और ईश्वर पर थोड़ा-सा भरोसा रह गया था- अब वह आशा और विश्वास की जड़ ही उखड़ गयी थी। अपनी चेतना खोकर निढाल पड़ जाने के अलावा और क्या करने की शक्ति उसमें रह गयी थी ?
ताज्जुब तो यह था कि चिररुग्णा अनुसूया ने अपने होश संभाल लिये थे पर सुगठित, स्वस्थ, नवयौवन श्रावणी अपनी चेतना खो बैठी थी।
शायद ससुर लोकमोहन की आंखों के अनन्त शून्य की छाया में श्रावणी ने अपने जीवन भविष्य को देखा था और उसी शून्य में उसकी सांस रुक गयी और वह बेहोश हो गयी थी। पति की मृत देह पर वह भी मृतवत् पड़ी थी। किसी ने उसके मुंह पर पानी के छींटे नहीं डाले, उसे उठाने की कोशिश नहीं की। क्या सभी लोग आज यह भूल बैठे थे कि श्रावणी कितनी कीमती है ? लोग भूल गए थे कि लोकमोहन की बड़ी स्नेह और आदर की पुत्रवधू थी वह। विश्वमोहन की बड़े सुख और प्यार की पत्नी थी वह। इस क्षण क्या यह भी भूल गए कि अभी तो शादी को एक साल भी पूरा नहीं हुआ था। विवाह की पहली वर्षगांठ धूमधाम से मनाने के लिए ज़ोर-शोर से तैयारियां चल रही थीं।

हो सकता था इस क्षण किसी को ये बातें याद नहीं पड़ रही हों। थर्मामीटर का पारा ठंडे पानी में अचानक ही बहुत नीचे गिर जाता है-क्या उसी तरह श्रावणी का सम्मान देखते-देखते कम हो गया था ? विश्वमोहन का गरम शरीर एकाएक ठंडा पड़ गया था, क्या इसीलिए ? या फिर ममतावश ही लोगों ने उसे इस तरह चेतनाहीन छोड़ रखा था ? चेतना के जगत् में उसे लौटाने का अर्थ था-उसे असीम दु:ख के आगे असहाय खड़ा कर देना। इससे क्या लाभ ?
अनुसूया के महीन रुग्ण गले के विलाप के आगे श्रावणी का नीरव दुख मानो दब गया। अनुसूया रो-रोकर कराह रही थी-अरे, यह क्या हो गया रे ! मेरा सोने-जैसा लड़का। सुबह बिस्तर से रोज की तरह भला-चंगा उठा, अभी तो यहां बैठकर उसने चाय पी थी। उसे एकाएक क्या हो गया ? किसने क्या कर दिया ? इसीलिए तो मेरा बच्चा फिर उठा नहीं, खाया नहीं। ‘मां’ कहकर पुकारा नहीं। एक बार आंखें खोल, बेटा ! एक बार तो देख। सात दुनिया ढूंढकर तेरे लिए बहू लायी थी उसे किस तरह छोड़ गया है ? हाहाकार नहीं, अनुसूया केवल दुर्बल स्वर में विलाप कर रही थी।

 चिल्ला-चिल्लाकार, छाती पीट-पीटकर शोक प्रकट करने की क्षमता अनुसूया में नहीं थी। हमेशा की रागिनी वह अपनी छाती निचोड़कर शक जता रही थी। उसके बाद तो डॉक्टर भी बगल वाले कमरे में चले गए थे। लोकमोहन का एक भानजा सीढ़ी के पास रखे टेलीफोन रिसीवर को उठाकर एक के बाद एक नम्बर घुमाता और समाचार सुनाता- ‘‘यह कुछ ही देर पहले यह घटना घटी। रोज़ की तरह सुबह नहा-धोकर नाश्ता-पानी किया, फिर आफिस जाने के लिए कपड़े पहनने लगे.....क्या कर रहे हैं ? खाने में कुछ गड़बड़ी ? नहीं-नहीं। यह बात नहीं। सभी ने तो एक साथ एक ही टेबल पर खाया था....डॉक्टर के आने के पहले ही सब-कुछ खत्म हो गया। डॉक्टर का कहना है ब्लड प्रेशर से ही....नहीं, हाल में तो प्रेशर बढ़ा नहीं था। अचानक ही....’’

इतनी बड़ी खबर चारों तरफ पहुंचाने का ओहदा पाकर छोकरा खुशी से डगमगा रहा था। खैर ! सिर्फ़ लोकमोहन के भानजे की शिकायत करने से क्या फायदा ? मनुष्य स्वभाव ही यही है। किसी के दु:ख या शोक की खबर या शोचनीय आकस्मिक मृत्यु का समाचार या किसी की गम्भीर बीमारी की खबर एक-दूसरे को बताकर मनुष्य को जितना रस मिलता है-उसका एक प्रतिशत सुख दूसरों के सुख, आनंद, आनन्द, उन्नति या आकस्मिक सौभाग्य का समाचार सुनाकर नहीं होता।
मनुष्य का यही स्वभाव है। दूसरों पर करुणा जताने, सहानुभूति दरशाने और दया दिखाने में ही लोगों को खुशी होती है। इसके लिए लोग उत्सुक रहते हैं। और जब तक यह अवसर प्राप्त नहीं होता, हृदय की यह वृत्ति निकम्मी बनकर पड़ी रहती है। इसीलिए तो दूसरों की विपत्ति में अवचेतन मन मानों तृप्ति से भर उठता है। यही तृप्ति सहानुभूति का मुखौटा चढ़ा लेती है। फिर कोई कहता है-सुना आपने, उनके घर ऐसा हो गया, बड़े दु:ख की बात है।

लोकमोहन के घर में आयी यह आकस्मिक विपत्ति भी आज बहुतों के घरों में आलोचना की अच्छी खुराक बनेगी। बहुतों के हृदय में दबा वह ‘आ....ह’ का शब्द विश्वमोहन की मृत्यु पर अब सार्थक हो उठेगा।
और यह ‘आह’ रूपी संवेदना ही क्या कम ज़ोरदार है ? विश्वमोहन लोकमोहन का एकमात्र पुत्र था। यही तो अंतिम बात नहीं थी। वह रूपवान, गुणी, सुशिक्षित था। और उस पर उसका विवाह भी हाल ही में हुआ था। अंतिम खबर ही तो असली खबर थी।

रुग्णा, दुर्बल, वृद्धा अनुसूया का करुण शोक नवयौवना श्रावणी के अकाल वैधव्य की चोट से तुच्छ हो गया था। श्रावणी का वैधव्य मानो विधाता की निष्ठुरता के प्रखर नमूने के तौर पर जल रहा था।

लोकमोहन पत्थर की भांति बैठे हुए थे। आकस्मिक आघात के चेहरे की जो रेखाएं लटक गयी थीं, धीरे-धीरे फिर तन गयीं। लोकमोहन अब पहले के लोकमोहन बन गए थे। अब वे स्थिर, संभ्रान्त, आत्मस्थ बन चुके थे-मानों इतनी देर में ही विधाता के व्यंग्य को वापस कर देने में समझौता कर लिया था। पत्थर की मूर्ति की तरह वे इस दृश्य को देख रहे थे, बेटे का एक हाथ दोनों हाथों में लेकर सदा बीमार अनुसूया का रोना, और देख रहे थे पति की छाती पर बेहोश पड़ी श्रावणी की मृदु सांसों के भार से उठती-गिरती हुई उसकी पीठ को, और विश्वमोहन के भावहीन चेहरे को। यह सब देखते सहसा मन-ही-मन एक संकल्प कर बैठे लोकमोहन। उठकर इस कमरे में आए और जीवन भर जज के रूप में काम करने की उसी पुरानी गंभीरता से बोले-और अधिक देर करने से क्या फायदा, डॉक्टर ?
डॉक्टर उठ खड़े हुए।

   


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