महात्मा कबीर - गिरिराजशरण अग्रवाल Mahatama Kabir - Hindi book by - Girirajsharan Agarwal
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महात्मा कबीर

गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3447
आईएसबीएन :81-7182-938-4

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महात्मा कबीर का व्यक्तित्व

Mahatma Kabeer

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारत के संत कवि महात्मा कबीर-
कबीर नाम है-प्रेम का।
कबीर दर्शन है-एकता का, सद्भाव का।
कबीर विशेषण है-मस्त, फक्कड़ और निडर व्यक्ति का।
कबीर संगम है-दो संस्कृतियों का।
कबीर का संगम प्रयाग के संगम से ज्यादा गहरा है।
वहाँ कुरान और वेद ऐसे खो गये हैं कि रेखा भी नहीं छूटी।
कबीर एक मार्ग है-सहजता का।
ऐसा मार्ग जो सीधा और साफ़ है।
कबीर क्रांतिकारी हैं- क्रांति की जगमगाती प्रतिमा।
जाति-पाँति के भेद-भावों से मुक्त एक सच्चा इंसान।
मानवता के संकल्प से ओतप्रोत।
ज्ञान की गंगा।
ऐसी गंगा जो अपनी सम्पूर्ण पावनता के साथ एक-एक मन को शीतल करती हुई
निरंतर प्रवाहित रहती है।
कबीर समर्पण की सही पहचान है।
अहंकार से लाखों कोस दूर।
ऐसे सहज और क्रान्तिकारी संत कवि महात्मा कबीर के जीवन और काव्य से परिचित कराने का संकल्प लेकर समर्पित है प्रस्तुत पुस्तक ‘‘महात्मा कबीर’’।

महात्मा कबीर


कबीर नाम है-प्रेम का।
कबीर दर्शन है-एकता का सद्भाव का।
कबीर विशेषण है-मस्त फक्कड़ और निडर व्यक्ति का।
कबीर संगम है-दो संस्कृतियों का।
कबीर का संगम प्रयाग के संगम से ज़्यादा गहरा है।
वहाँ कुरान और वेद ऐसे खो गए हैं कि रेखा भी नहीं छूटी।
कबीर एक मार्ग है—सहजता का।
ऐसा मार्ग, जो सीधा और साफ़ है।
टेढ़ी-मेढ़ी बात कबीर को पसंद नहीं।
इसलिए उनके रास्ते का नाम है-सहज योग।
पंडित नहीं चल पाएगा, इस मार्ग पर। निर्दोष चित्त, कोरा काग़ज़ जैसा मन ही चल पाएगा उस पर।
कबीर क्रांतिकारी हैं-क्रांति की जगमगाती प्रतिमा।
जाति-पांति के भेद-भावों से मुक्त एक सच्चा इंसान।
मानवता के संकल्प से ओतप्रोत।
ज्ञान की गंगा।
ऐसी गंगा, जो अपनी संपूर्ण पावनता के साथ एक एक मन को शीतल करती हुई निरंतर प्रवाहित रहती है।

कबीर का जन्म कहाँ हुआ ? उनके जन्मदाता कौन थे ? नाम क्या था ? इस संबंध में प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों में एक रूपता नहीं है।
इतिहासकार, साहित्यिक विद्वान और कबीरपंथी भी एकमत नहीं।
कबीर के संबंध में निश्चित नहीं कि वे हिंदू थे या मुसलमान। हिंदुओं को विश्वास है : हिंदू थे; मुसलमानों का दावा है : मुसलमान थे।
उनके जन्म के संबंध में कई प्रकार की किंवदंतियाँ प्रसिद्ध हैं :
लगभग छह सौ वर्ष पूर्व की घटना है।
नीरू अपनी पत्नी नीमा के साथ काशी की तरफ आ रहा था। उसी दिन उनका गौना हुआ था।
काशी का जुलाहा था नीरू।

रास्ते में लहरतारा तालाब पड़ता था। सोचा : हाथ-पैर धो लिए जाएँ। तभी उसने किसी बालक के रोने की आवाज सुनी।
आस-पास उसकी पत्नी के अतिरिक्त कोई भी न था।
फिर आवाज़ कहाँ से आई।
जिज्ञासा हुई। चारों तरफ देखा। आवाज़ एक झाड़ी की तरफ़ से आ रही थी। उसी ओर भागा। देखा, वहाँ एक प्यारा-सा बच्चा पड़ा था। इतना छोटा जैसे कुछ देर पहले ही जन्मा हो।
इतना प्यारा बच्चा नीरू जुलाहे ने कभी देखा नहीं था।
उसकी आँखें ऐसी थीं जैसे मणि।

ऐसी रोशनी थी। उसकी आँखों में कि आँखें चौंध से भर उठीं।
नीमा डरी कि कुछ झंझट होगा। लोग क्या कहेंगे। अपवाद होगा। मगर जब उसने बच्चे को देखा तो उसका दिल भी डोल गया।
अंत में उन लोगों ने लोकलाज की परवाह नहीं की। वे बच्चे को अपने साथ ले आए।
काशी में जो मुहल्ला कबीरचौरा के रूप में आज प्रसिद्ध है, उसी में संभवतः नीरू का घर था।
वे घर पहुँचे। अपने रिवाज के अनुसार बच्चे का नामकरण करने के लिए उन्होंने क़ाज़ी को बुलाया। उसने कुरान खोला। कहते हैं कि उसमें हर जगह कबीर, कुब्रा, अकबर आदि शब्द मिले।
अरबी में ये शब्द महान परमात्मा के लिए आते हैं।
क़ाज़ी हैरान था।

साधारण जुलाहे के बच्चे को किस तरह परमात्मा का नाम दिया जाए ?
अपना शक् मिटाने के लिए उसने कई बार कुरान देखा।
उसे हर बार वही शब्द मिले।

यह समाचार पाकर कई क़ाज़ी इकट्ठा हो गए।
आखिर उन्होंने नीरू को सलाह दी इस बच्चे का कत्ल कर दे, नहीं इसके कारण कोई बड़ी आफ़त आने वाली है।
नीरू-नीमा इतना क्रूर कर्म न कर सके। इस प्रकार बच्चे का नाम कबीर पड़ गया।
यही बच्चा जिसके माँ-बाप का पता दुनिया को आज तक नहीं ज्ञात हुआ, आगे चलकर भारत का महान संत कबीर हुआ।
कबीर के जन्म को लेकर एक किंवदंती हिंदू-समाज में भी प्रचलित है।
एक दिन एक ब्राह्मण अपनी विधवा कन्या के साथ स्वामी रामानंद के दर्शनों के लिए गया।
पिता के साथ ही कन्या ने भी रामानंद के चरण स्पर्श किए।
रामानंद अपनी मस्ती में थे।

उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि चरण कौन छू रहा है ?
अचानक उनके मुँह से निकला-‘पुत्रवती भव !’
आशीर्वाद दे दिया कि ‘पुत्रवती होओ’।
महात्मा जी का आशीर्वाद असत्य नहीं हो सकता था।
कुछ समय बाद उसके गर्भ से एक पुत्र ने जन्म लिया।
लोक-लाज स्वाभाविक थी।
ब्राह्मणी ने मन को कड़ा किया और बच्चे को लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया।
इस बालक को ही नीरू और नीमा ने लहरतारा के किनारे से पाया था।
ऐसा लगता है कि कबीर हिंदू घर में पैदा हुए और मुसलमान घर में पले। इसमें एक अपूर्व संगम हुआ, एक अपूर्व समन्वय हुआ।

‘कबीर में हिंदू और मुसलमान संस्कृतियाँ जिस प्रकार ताल-मेल खा गईं, इतना तालमेल गंगा और यमुना में, प्रयाग में भी नहीं मिलेगा; दोनों का जल अलग-अलग मालूम होता है। कबीर में जल ज़रा भी अलग अलग मालूम नहीं होता।
तीसरी कहानी और अधिक रोचक है।
एक पुराणपंथी कहानी की तरह।

इसके अनुसार कबीर साहब शुकदेव जी के अवतार थे।
कहा जाता है कि महादेव की आज्ञा से शुकदेव जी लोककल्याण के लिए पृथ्वी पर आए।
पूर्वजन्म में वे बारह वर्ष तक गर्भवास का दुख भोग चुके थे। इसलिए इस बार गर्भवास से बचने के लिए उन्होंने अपने को एक सीपी में बंद कर लिया और उसे गंगा के किनारे बहाव में छोड़ दिया।
यही सीपी बहते-बहते लहरताला तालाब में पहुँच गई और दैवयोग से वहीं एक कमल के पत्ते पर खुल गई।
इसमें एक सुंदर बालक प्रकट हुआ।

यही बालक आगे चलकर कबीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कबीर के जन्म के संबंध में जितनी कथाएँ ज्ञात हैं, उन सबको मिलाकर यही कहा जा सकता है कि इन महात्मा को जन्म देने वालों का पता किसी को नहीं है।
कबीर का जन्म किस सन् में, किस तिथि को हुआ, इसे भी ठीक-ठीक बता पाना बहुत कठिन है।
उनकी जन्मतिथि के संबंध में एक छंद बहुत समय से प्रचलित है।


चौदह सौ पचपन साल गए,
चंद्रवार इक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को,
पूरनमासी प्रकट भए।


अर्थात् विक्रम के 1455 साल व्यतीत होने पर, सोमवार को जेठ की पूनो, वटसावित्री के पर्व पर कबीर साहब प्रकट हुए थे।
वटसावित्री या बरसायत के दिन कबीरपंथी अब भी कबीर साहब का जन्मदिन मनाया करते हैं।
कुछ विद्वानों ने गणना करके पता लगाया कि सोमवार को जेठ पूनो संवत् 1455 में नहीं बल्कि 1456 में पड़नी चाहिए।
इसलिए 1455 साल गए का अर्थ यह भी हो सकता है कि 1455 वाँ संवत बीत जीने पर अर्थात् सं. 1456 में कबीर का जन्म हुआ होगा।

कबीर के जन्मस्थान के संबंध में भी तीन मत हैं : मगहर, काशी और आजमगढ़ में बेलहरा गाँव।
मगहर के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि कबीर ने अपनी रचना में वहाँ का उल्लेख किया है : "पहिले दरसन मगहर पायो पुनि कासी बसे आई अर्थात् काशी में रहने से पहले उन्होंने मगहर देखा। मगहर आजकल की वाराणसी के निकट ही है और वहाँ कबीर का मकबरा भी है।

कबीर का अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत हुआ। वे काशी के जुलाहे के रूप में ही जाने जाते हैं। कई बार कबीरपंथियों का भी यही विश्वास है कि कबीर का जन्म काशी में हुआ। किंतु किसी प्रमाण के अभाव में निश्चयात्मकता अवश्य भंग होती है।
बहुत से लोग आजमगढ़ जिले के बेलहरा गाँव को कबीर साहब का जन्मस्थान मानते हैं।
वे कहते हैं कि ‘बेलहरा’ ही बदलते-बदलते लहरतारा हो गया।

फिर भी पता लगाने पर न तो बेलहरा गाँव का ठीक पता चला पाता है और न यही मालूम हो पाता है कि बेलहरा का लहरतारा कैसे बन गया और वह आजमगढ़ जिले से काशी के पास कैसे आ गया ?
आजमगढ़ जिले में कबीर, उनके पंथ या अनुयायियों का कोई स्मारक नहीं है।
कबीर बड़े होने लगे।

अपनी अवस्था के बालकों से एकदम भिन्न।
खेल में कोई रुचि नहीं।
मदरसे भेजने लायक साधन पिता-माता के पास नहीं थे।
जिसे हर दिन भोजन के लिए ही चिंता रहती हो, उस पिता के मन में कबीर को पढ़ाने का विचार भी न उठा होगा।
यही कारण है कि वे किताबी विद्या प्राप्त न कर सके। उन्होंने स्वीकार किया-





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