काका के प्रहसन - काका हाथरसी Kaka Ke Prahsan - Hindi book by - Kaka Hathrasi
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काका के प्रहसन

काका हाथरसी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3448
आईएसबीएन :81-288-1023-5

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प्रस्तुत है हास्य व्यंग्य....

Kaka Ki Chaupal

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

काका हाथरसी ने अपने जीवनकाल में हास्यरस को भरपूर जिया था वे और हास्यरस आपस में इतने घुलमिल गए हैं कि हास्यरस कहते ही उनका चित्र सामने आ जाता है।
उन्होंने कवि सम्मेलनों, गोष्ठियों, रेडियो और टी. वी. के माध्यम से हास्य-कविता और साथ ही हिन्दी के प्रसार में अविस्मरणीय योग दिया है।
उन्होंने साधारण जनता के लिए सीधी और सरल भाषा में ऐसी रचनाएँ लिखीं, जिन्होंने देश और विदेश में बसे हुए करोड़ों हिन्दी-प्रेमियों के ह्रदय को छुआ।
‘काका की चौपाल’ एक नए ढंग की पुस्तक है, जिसमें गोष्ठियाँ सम्मिलित हैं। इन गोष्ठियों में श्रोताओं द्वारा समाज, राजनीति, कला, धर्म, संस्कृति और जीवन के अनेक पहलुओं पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कविता के रूप में दिए गए हैं।

चौपाल की चोंच

प्रिय पाठक मित्र, कभी-कभी ऐसे प्रश्न सामने आ जाते हैं कि जिनके उत्तर धीर-गंभीर शब्दों में दिए जाएँ तो कुतर्कियों के तर्क-वितर्कों द्वारा बेचारे उत्तर छिन्न-भिन्न होकर उत्तराखंड की ओर भागकर संन्यास ले लेते हैं। इसलिए हमने प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देने के लिए हास्य-व्यंग्य का सहारा लिया। किसी ने प्रश्न किया, उत्तर कविता में दे दिया। जब बहुत से प्रश्नोत्तर इकट्ठे हो गए तो काका विचार सागर में खो गए।

काकी से पूछा-क्या करें इस गट्ठर का ? कहने लगीं-रक्खा रहने दो, रद्दी खरीदनेवाला आएगा, उसे बेच दूँगी। हमने कहा-धन्य हो देवी, क्या मस्तिष्क पाया है तुमने। भारत सरकार को चाहिए कि तुमको ‘बचत योजना’ विभाग की मम्मी बना दे। अच्छा यह बताओ कि इस तथाकथिक रद्दी के जो आएँगे पैसे उनका उपयोग करोगी कैसे ?
‘बच्चों के लिए टॉफी मँगाकर बाँट दूँगी।’

‘बहुत सुंदर विचार हैं। तुम्हारे हृदय में बच्चों के प्रति जो प्यार भावना है वह तो नेहरूजी से भी अधिक है, उनको नेहरू चाचा के नाम से बच्चे याद करते हैं, तुम टॉफीवाली काकी के नाम से प्रसिद्धि पाओगी, अमर हो जाओगी। लो यह 10 रुपए का नोट, इसकी टॉफियाँ मँगाकर बाँट देना, मन में समझ लेना कि तुमने रद्दी बेच दी। जिसे तुम रद्दी समझ रही हो उसे हम अपनी कला द्वारा नोटों की गड्डी में बदल देंगे।’
वे चली गईं मुँह मटकाकर हम उठे एक झटका मारकर।

सभी प्रश्नोत्तरों के कागजों को इकट्ठा किया, उनमें हास्य के कुछ और इंजेक्शन लगाए एवं अपनी 28 वीं पुस्तक ‘भोगा एंड योगा’ के बाद जो छोटी-बड़ी कविताएँ तैयार हुई थीं वे भी इसमें चिपकाई और सजा-धजाकर पांडुलिपि तैयार करके श्रीमतीजी को दिखाई, तो वे ऐसे मुसकाईं जैसे हरियाणा के चुनाव परिणाम देखकर चौधरी चरणसिंह और हिमाचल के परिणामों पर अटलजी प्रसन्न हुए थे।

प्रस्तुत पुस्तक में बहुत से ऐसे प्रश्नोत्तर भी हैं जो कालांतर में ‘दीवाना’ में प्रकाशित हो चुके हैं और दीवाना के पाठकों को दीवाना बना चुके हैं। इसके संपादक श्री विश्वबंधु जी ने भी कह दिया कि इनको पुस्तकाकार देकर छपा लीजिए और विश्व में फैला दीजिए।

सबसे पहले तो अपनी भारत भूमि पर इनका प्रसारण कर रहे हैं। इसके बाद हमारी अन्य पुस्तकों की भाँति यह ‘काका की चौपाल’ भी रूस, अमेरिका, इंग्लैड, सिंगापुर, थाइलैंड, फिजी, अफ्रीका आदि देशों में पहुँचकर जन-गण का मनोरंजन करेगी, मानव जाति के संकट हरेगी।

जे.के.प्रतिष्ठान के साहित्य-प्रेमी डाक्टर गौरहरि एवं श्री गोविंदहरि की कृपा से हम प्रति वर्ष 2 महीने मसूरी ‘कमला कैसल्स’ में अपनी हास्य बैटरी चार्ज करते हैं। वहीं पर एक पुस्तक का जन्म हो जाता है। अत: इस पुण्य कार्य का श्रेय सिंघानियाँ परिवार को अवश्य पहुँचेगा। बस, और अधिक शब्दाडंबर द्वारा आपको नहीं करेंगे बोर, चलिए चौपाल की ओर।
-काका हाथरसी

प्रसाद गुण

प्रसादे सर्वदु:खानां, हानिरस्योपजायते
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते

-गीता 2.65

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : प्रसाद (प्रसन्न रहना) गुण धारण करने पर अर्थात् चित्त को निर्मल एवं प्रसन्न रखने से समस्त मानसिक क्लेशों की निवृत्ति हो जाती है क्योंकि जिनका मन प्रसन्न रहता है, उनकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

हास्याष्टक

‘काका’ से कहने लगे, शिवानंद आचार्य
रोना-धोना पाप है, हास्य पुण्य का कार्य
हास्य पुण्य का कार्य, उदासी दूर भगाओ
रोग-शोक हों दूर, हास्यरस पियो-पिलाओ
क्षणभंगुर मानव जीवन, मस्ती से काटो
मनहूसों से बचो, हास्य का हलवा चाटो
आमंत्रित हैं, सब बूढ़े-बच्चे, नर-नारी
‘काका की चौपाल’ प्रतीक्षा करे तुम्हारी
-काका

गोष्ठी-एक

कविवर किलोलजी ने किया प्रवेश, मारकर एक ठहाका, ‘नमस्कार काका।’
‘आओ बेटा किलोल, कहाँ रहे इतने दिन ? मसूरी योगाश्रम कांड के बाद आज दर्शन हुए हैं तुम्हारे। बहुत हल्के हो गए हो, शक्ल-सूरत एकदम बदल गई है, चुनाव में पराजित नेता की भांति तोंद भी पिचक गई है।’
‘क्या बताऊँ काकू, भयंकर संकटों को पार करके यह काया बचाई है, एक ज्योतिषी ने शनि की दशा बताई है। जबसे हमारा आपका बिछोह हुआ है, एक के बाद एक मुसीबत आटोमेटिक आती रही है। अभी कुछ दिनों की बात है, बदायूँ में एक कवि सम्मेलन हुआ था आपने सुना ही होगा, उसमें कवियों की बुरी तरह पिटाई हुई। कोई जूते छोड़कर भागा, कोई बैग, किसी की चादर छूट गई, किसी की खोपड़ी फूट गई।’

‘तुम्हारी खोपड़ी तो राजी-खुशी है, तुम कैसे फँस गए उसमें ?’
‘दुर्भाग्य से एक पत्र आ गया था हमारे पास भी। अपने राम तो बहुत दिनों से कवि सम्मेलन के भूखे बैठे थे, पत्र का उत्तर दिए बिना ही चल दिए बदायूँ। वहाँ कवियों की काफी भीड़ थी, जब 8-10 कवि कविता पाठ कर चुके तो आधी रात्रि के बाद एक राज्य मंत्रीजी पधारे। उनके आने पर एक कवयित्री तथा 2-3 कवियों ने राजनेताओं के प्रति कुछ अशिष्ट शब्दों का प्रयोग कर डाला। मंत्रीजी क्रुद्ध होकर मंच से उठकर चल दिए, तब श्रोताओं में से कुछ जोशीले जवान मंच पर पहुँच गए और कवियों की धुनाई कर दी शुरू।’

‘तुम पिटे कि नहीं गुरू ?’
‘हाँ जी, हल्की-सी धौल-धप्प हमारी भी हो गई थी, बस पाँच-छ: धौल, तीन चार धक्के। अच्छा हुआ आप नहीं गए उस सम्मेलन में।’
‘तुमको मालूम नहीं किलोल, हमने तो अब कवि सम्मेलनों में जाना बहुत ही कम कर दिया है। महीने में 15-20 निमंत्रण आते हैं, उनमें से बस एक या दो ही स्वीकार करते हैं, शेष पत्रों के उत्तर में यह छक्का लिखकर भेज देते हैं-
मिला निमंत्रण आपका, धन्यवाद श्रीमान
किंतु हमारे हाल पर, तनिक दीजिए ध्यान
तनिक दीजिए ध्यान, हुक्म काकी का ऐसा
बहुत कर चुके प्राप्त, प्रतिष्ठा-पदवी-पैसा
खबरदार अब कवि सम्मेलन में मत जाओ
लिखो पुस्तकें हास्य व्यंग्य के फूल खिलाओ

फिर भी कोई-कोई संयोजक हाथरस आकर अड़ जाता है, तो जाना पड़ जाता है। सोच रहे हैं अगले वर्ष से घोषणा कर दें कि-
अब कवि सम्मेलनों से लेते हैं संन्यास
फाड़ देंय वह निमंत्रण, जो आएगा पास

‘लेकिन काका जी, सोच समझकर घोषणा करना संन्यास की। कहीं चरणसिंह जैसा आचरण मत करना कि संन्यास के न्यास को तोड़कर फिर कूद पड़े राजनीति में।’
‘इसीलिए अभी जल्दी नहीं कर रहे हैं। अच्छा यह बताओ कि अब प्रोग्राम क्या है तुम्हारा ?’
‘काका, अभी तक बैठा हूँ कुँवारा। किसी तरह शादी का प्रोग्राम बन जाए आपके द्वारा तो धन्य हो जाऊँगा। जीवन-भर आपकी सेवा करूँगा ?’
‘हमारी सेवा करेगा या अपनी किल्लोलिनी की ?’
‘आपकी सेवा दिन में करूँगा, है कोई कन्या मेरे लायक ?’

 ‘तेरे लायक तो ‘टुनटुन’ टाइप की लड़की ढूंढ़नी पड़ेगी बेटा।’
‘कैसी भी सही काका ? ज्यादा उम्र बढ़ गई तो फिर कोई लड़कीवाला घास नहीं डालेगा।’
‘कितनी उम्र हो गई अब तुम्हारी ?’
‘उम्र तो ज्यादा नहीं है लेकिन मेरे डील-डौल को देखकर लड़कियाँ बिदक जाती हैं।’
‘तो कुछ दिनों डाइटिंग कर लो ! चावल-मक्खन, दूध, मलाई मत खाओ भाई।’
‘नहीं-नहीं काकू, मुझसे यह अशुभ काम नहीं हो सकता। मेरे गुरुजी ने तो यह पाठ पढ़ाया था-

भोजनं कुरूदुर्बुद्ध ना शरीरे दयां कुरु
परान्नं दुर्लभं लोके, शरीराणि पुन: पुन:


अर्थात्-अरे मूर्ख, जितना भी कर सके भोजन कर इस नाशवान शरीर पर दया मत कर, क्योंकि यह शरीर तो अनेक जन्मों में बारंबार मिलता रहेगा लेकिन पराया अन्न इस संसार में तो बड़े भाग्य से मिलता है।
‘इसीलिए काका, मैं तो जहाँ भी जाता हूँ, खूब खाता हूँ।’
‘खूब खाओ, लेकिन अखाद्य मत खाओ।’
‘अखाद्य ?’
‘हाँ-हाँ, खाने के अनेक प्रकार हैं। सुनो-

कौन क्या-क्या खाता है ?
खान-पान की कृपा से, तोंद हो गई गोल,
रोगी खाते औषधी, लड्डू खाएँ किलोल।
लड्डू खाएँ किलोल, जपें खाने की माला,
ऊँची रिश्वत खाते, ऊँचे अफसर आला।
दादा टाइप छात्र, मास्टरों का सर खाते,
लेखक की रायल्टी, चतुर पब्लिशर खाते।

दर्प खाय इंसान को, खाय सर्प को मोर,
हवा जेल की खा रहे, कातिल-डाकू-चोर।
कातिल-डाकू-चोर, ब्लैक खाएँ भ्रष्टाजी,
बैंक-बौहरे-वणिक, ब्याज खाने में राजी।
दीन-दुखी-दुर्बल, बेचारे गम खाते हैं,
न्यायालय में बेईमान कसम खाते हैं।

सास खा रही बहू को, घास खा रही गाय,
चली बिलाई हज्ज को, नौ सौ चूहे खाय।
नौ सौ चूहे खाय, मार अपराधी खाएँ,
पिटते-पिटते कोतवाल की हा-हा खाएँ।
उत्पाती बच्चे, चच्चे के थप्पड़ खाते,
छेड़छाड़ में नकली मजनूँ, चप्पल खाते।

सूरदास जी मार्ग में, ठोकर-टक्कर खायं,
राजीव जी के सामने मंत्री चक्कर खायं।
मंत्री चक्कर खायं, टिकिट तिकड़म से लाएँ,
एलेक्शन में हार जायं तो मुँह की खाएँ।
जीजाजी खाते देखे साली की गाली,
पति के कान खा रही झगड़ालू घरवाली।

मंदिर जाकर भक्तगण खाते प्रभू प्रसाद,
चुगली खाकर आ रहा चुगलखोर को स्वाद।
चुगलखोर को स्वाद, देंय साहब परमीशन,
कंट्रैक्टर से इंजीनियर जी खायं कमीशन।
अनुभवहीन व्यक्ति दर-दर की ठोकर खाते,
बच्चों की फटकारें, बूढ़े होकर खाते।

दद्दा खाएँ दहेज में, दो नंबर के नोट,
पाखंडी मेवा चरें, पंडित चाटें होट।
पंडित चाटें होट, वोट खाते हैं नेता,
खायं मुनाफा उच्च, निच्च राशन विक्रेता।
काकी मैके गई, रेल में खाकर धक्का,
कक्का स्वयं बनाकर खाते कच्चा-पक्का।

‘क्या करें यार, खाना बनाना तो हमसे आता नहीं, जैसा भी बन जाता है, खा लेते हैं। आज तो तुम आ गए हो, बोलो क्या खाओगे, हम बनाएँ या तुम बनाओगे ?’
‘मैं तो काकू, खाना ही जानता हूँ, बनाने की कष्ट क्रिया में नहीं पड़ता, आपके साथ कुछ हैल्प अवश्य कर दूँगा।’
‘खाना तो बनाएँगे बाद में, आज चौपाल में हमारे श्रोता तथा प्रश्नकर्ता आएँगे, उनके प्रश्नों के उत्तर देंगे, तुम प्रश्नोत्तरों को नोट करते रहो, इसी बहाने एक पुस्तक भी हो जाएगी तैयार, बोलो रैडी ?’
‘यस डैडी ! लेकिन मुझे पारिश्रमिक क्या मिलेगा ?’
‘खाना मिलेगा और क्या मिलेगा?’
‘सुनो काका, मैं केवल खाने पर काम नहीं करूँगा।’
‘क्यों ?’

‘यों कि निकट भविष्य में मेरी शादी होने वाली है, उस गृहिणी के लिए भी तो कुछ धन इकट्ठा करना है।’
‘अच्छा तो ऐसा करेंगे, पुस्तक की रॉयल्टी आएगी, उसमें से कुछ तुमको भी देंगे, मंजूर ?’
‘स्वीकार हुजूर ! बुरा मत मानना काका, खाने के बदले काम या काम के बदले सिर्फ खाना मैं इसलिए स्वीकार नहीं करता कि इस चक्कर में एक बार धोखा खा चुका हूँ।’
‘कैसा धोखा ?’
‘ऐसा हुआ कि एक अखबार में विज्ञापन निकला। ‘सिर्फ भोजन पर ही संतुष्ट हो सके ऐसे त्यागी व्यक्ति की आवश्यकता है।’ उन दिनों मैं कड़की में था, पहुँच गया विज्ञापनदाता के पास। मैंने कहा-आपका विज्ञापन देखकर आया हूँ भोजन कराइए और काम बताइए।’
उस ‘महापुरुष’ ने कहा-देखो, वह सामने लंगर है न, अन्न क्षेत्र। वहाँ सदावर्त्त बँटता है, तुम भरपेट भोजन कर आया करो और मेरे लिए ले आया करो। यह सुनकर मैं वहाँ से खिसक लिया चुपचाप।’
‘बहुत बचे, तो देखो, अब चौपाल पर काफी प्रश्नकर्ता आ गए हैं, संभालो कागज और उठाओ लेखनी।’

काव्य प्रेमियों के लिए लगा रखी चौपाल,
आगे आए प्रश्न, हम उत्तर दें तत्काल।
उत्तर दें तत्काल, एक घंटा बैठेंगे,
एक गोष्ठी में पचास के उत्तर देंगे।
प्रश्न गद्य में करो, पद्य में उत्तर पाओ,
अंग-अंग में हास्य-व्यंग्य की गंग बहाओ।

प्र.-इंसान को बलवान बनने के लिए क्या करना चाहिए ?
उ.-भ्रष्टाचारी टॉप का, वी.आई.पी.के ठाठ,
  इतनी चौड़ी तोंद हो, बिछा लीजिए खाट।
प्र.-मध्यावधि चुनावों में काँग्रेस (आई) की जीत का क्या कारण है ?
उ.-कुर्सी लालच द्वेष की, लूटम फूट प्रपंच,
  बंदर आपस में लड़ें, बिल्ली छीना मंच।
प्र.-लेकर कलम जो बैठा, तो भूल गया सब,
   वरना मुझे कुछ आपसे, कहना ज़रूर था ?
उ.-कुछ फिक्र नहीं, अपनी बात भूल गए तुम,
   हैं आप उधर चुप, तो इधर हम भी हैं गुमसुम।
प्र.-इंसान जब ठोकर खाता है तो क्या करता है ?
उ.-खाते-खाते ठोकरें, बिगड़ गई जब शक्ल,
  संभल गए, तब लौटकर वापिस आई अक्ल।
प्र.-मनुष्य कितना ही अच्छा हो, उसमें दोष निकालने वाले क्यों पैदा हो जाते हैं।
उ.-मानव की तो क्या चली, बचा नहीं भगवान,
   उसके निंदक देख लो, हैं नास्तिक श्रीमान्।
प्र.-काकाजी, मैं आपको दावत पर बुलाना चाहता हूँ ?
उ.-‘मीनू’ में क्या चीज है, बतलाओ यह बात,
   कितनी दोगे दक्षिणा, दावत के पश्चात्।
प्र.-मौत और सौत में क्या फ़र्क है काका ?
उ.-मौत अच्छी फ़क़त इक बार मरने पर जलाती है,
   सौत है मौत से बदतर, ज़िंदगी भर जलाती है।

प्र.-देवानंद कहते हैं ‘जॉनी मेरा नाम’। राजकपूर कहते हैं ‘मेरा नाम जोकर’ तो आप क्या कहते हैं ?
उ.-‘काका’ काका ही रहें, हुआ नाम सरनाम,
   दलबदलू की तरह हम, क्योंकर हों बदनाम।
प्र.-नारी की दृष्टि में पुरुष क्या है ?
उ.-कार की दृष्टि में ड्राइवर,
  जनता पार्टी में चंद्रशेखर,
  उसी प्रकार समझ लो मिस्टर,
  नारी की दृष्टि में है नर।
प्र. बैलबॉटम (सड़क झाड़ती) के बाद अब कौन-सा फैशन आएगा ?
उ.-बाबू बाँधे साड़ियाँ, बीबी पहिनें पैंट,
  बीबीजी अफसर बनें, बाबू जी सरवैंट।
प्र.-इंसान छुटपन में बालक, जवानी में युवा, तो बुढ़ापे में ?
उ.-बूढ़ेपन में बुढ़उ बन, करें प्रभु का ध्यान,
   या मुरारजी की तरह, ‘जीवन जल’ का पान।
प्र.-वैरी गुड लाइफ़, विद-आउट वाइफ़, आपकी एडवाइस ?
उ.-वाइफ़ से लाइफ़ बने, बिन वाइफ़ सुनसान,
  नहीं किराए पर मिले, उसको कहीं मकान।
प्र.-नेता जब चारों ओर से निराश हो जाए तो ?
उ.-सत्ता से पत्ता कटे, हो करके असहाय,
  भाषण देकर विरोधी, जनता को बहकाय।

प्र.-मेरी इच्छा हेमामालिनी से शादी करने की थी, किंतु उसे धर्मेन्द्र ले गए। अब क्या करूँ काका ?
उ.-छोड़ी जो धर्मेन्द्र ने, उसे पटालो यार,
  बिना परिश्रम मुफ्त में, बच्चे पाओ चार।
प्र.-राजनारायण का दाढ़ी का एक बाल मुझे दिला सकते हैं ?
उ.-दाढ़ी की गाड़ी गिरी, बाल हुआ बेकार,
  यदि तुमने मँगवा लिया, मिले हार पर हार।
प्र.-एक लड़की मेरी दुकान के सामने से गुजरती है तो मुसकरा देती है क्यों ?
उ.-उल्लूजी उल्लू बनें, लल्ली जब मुसकात,
  जाय अँगूठा दिखाकर, जब आ जाए बरात।
प्र.-अगर लड़की चाँदनी चौक है तो लड़का ?
उ.-सीधा-सा यह प्रश्न है, नोट करो उत्तर्र,
लली चाँदनी चौक है, लल्ला घंटाघर्र।
प्र.-चार सौ की नौकरी में गृहस्थी की गुजर नहीं होती, रेलवे में काम करता हूँ, क्या करूँ ?
उ.-थ्री टायर की कोच के टी.टी.ई. बन जाउ,
  मौज उड़ाओ रात दिन, इतने नोट कमाउ।





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