मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ - नरेन्द्र कोहली Meri Ekyavan Vyangya Rachanayen - Hindi book by - Narendra Kohli
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मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :327
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3455
आईएसबीएन :81-284-0087-8

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51 व्यंग्य रचनाएँ...

Meri ikyavan vyangya rachanayein.

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लेखक के बारे में

कहानीकार नरेन्द्र कोहली ने 1965 ई. में व्यंग्य लिखना आरंभ किया तो वे व्यंग्यकार ही हो गए। पहला संकलन ‘एक और लाल तिकोन’ 1970 ई. में आया। था तो प्रथम संग्रह, किन्तु व्यंग्य में पर्याप्त प्रौढ़ता थी। 1972 ई. में ‘पांच एब्सर्ड उपन्यास’ के प्रकाशन के साथ ही यह अनुभव किया गया कि हिन्दी के व्यंग्य-लेखन में शिल्प के नये आयाम उद्धाटित हुए हैं। यह शिल्प अभूतपूर्व था। कार्टून शैली में लिखी गई औपन्यासिक रचनाएं। उपमाएं और रूपक मौलिक थे और जीवन की तर्कहीनता अपने नग्न रूप में पाठक के सम्मुख थी। एक व्यंग्यकार की दृष्टि से अपनी समग्रता में देखा गया समाज। 1973 ई. में ‘आश्रितों का विद्रोह’ का प्रकाशन हुआ। यह उपन्यास शैली में लिखा गया व्यंग्य था। महानगर दिल्ली के सामान्य जन की अपनी आवश्यकताओं-राशन, दूध, यातायात इत्यादि के लिए जूझने की एक फंतासीय कथा।

इसमें समाज का वर्तमान भी था और भविष्य भी। उसमें उनकी दुर्दशा भी चित्रित हुई थी और उससे मुक्त होने के मार्ग का संकेत भी था। स्वाधीनता और आत्मनिर्भरता का संदेश देनेवाला यह अद्भुत व्यंग्य उपन्यास अपने प्रकार की एक ही रचना है। 1973 ई. में ही आया ‘जगाने का अपराध’। यह व्यंग्य कुछ और तीखा और धारदार हो गया है। सामाजिक चेतना कुछ अधिक उभरकर आयी है। 1975 ई. में पौराणिक प्रसंग पर आधृत आधुनिक जीवन संबंधी व्यंग्य नाटक ‘शंबूक की हत्या’ प्रकाशित हुआ, जिसमें राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को उधेड़कर उसमें बहुत गहरे झांका गया है। 1978 ई. में ‘आधुनिक लड़की की पीड़ा’, 1982 ई. में ‘त्रासदियां’ और 1986 ई. में ‘परेशानियां’ व्यंग्य-संकलन प्रकाशित हुए।

 इनमें नये विषयों पर तीव्र व्यंग्यात्मक शैली में अपने समसामयिक समाज का विश्लेषण किया गया है। दस वर्षों के अंतराल के पश्चात् 1996 में ‘आत्मा की पवित्रता’ आया और 1997 में ‘गणतंत्र का गणित’।
इन बत्तीस वर्षों में नरेन्द्र कोहली ने कभी व्यंग्य की अवहेलना नहीं की। समय के साथ उनका व्यंग्य और प्रखर और पैना हुआ है। ‘अट्टहास’ और ‘चकल्लस’ पुरस्कारों से सम्मानित नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य-लेखन में पिछले दिनों राजनीति का रंग कुछ गहरा हुआ है। वे दूसरों की बनाई हुई रूढ़ सीमाओं में बंधकर, फैशनेबल नारों को ध्यान में रखकर रचना नहीं करते, न ही वे साहित्यिक रूढ़िवादियों की मान्यता और स्वीकृति की चिंता करते हैं। इसलिए वे उन विसंगतियों पर भी लिखते हैं, जिसे लोगों ने देखा और भोगा तो है किन्तु जिसके विषय में लिखने का साहस वे कर नहीं सकते।

प्रकाशक

दि कॉलेज

एक
भारत की राजधानी दिल्ली। इसी दिल्ली का एक कॉलेज। कॉलेज काफी बिखरा-बिखरा है। लड़के-लड़कियों के बहुत सारे दल इधर-उधर फैले हुए हैं। पतलूनें कसी हुई और चपटी हैं। कमीजों के तीन-चार बटन खुले हुए हैं। भीतर से गंदी-गंधाती बनियान नज़र आती है। आस्तीनें रुई की बत्ती के समान लपेटी हुई हैं और सीकों जैसी बांहे नज़र आ रही हैं। किसी के भी हाथ में कोई कॉपी-किताब नहीं है। किसी-किसी ने दो-चार कागज़ और एक-आध किताब मोड़-तरोड़कर अपनी जेबों में
ठूसी हुई हैं या हाथ में डायरी जैसी कोई चीज़ पकड़ रखी है।
लड़कियों ने चुस्त कमीजें और सलवारें पहन रखी हैं या फिर साडियां हैं, जो शरीर को बहुत आकर्षक रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। शक्लों पर मनहूसियत है और सिरों पर ऊंचे-ऊंचे रूखे बाल। हाथों में बड़े-बड़े पर्स हैं। उन पर्सों के भीतर की बात इस उपन्यास का लेखक नहीं जानता (या उनके विषय में लिखना नहीं चाहता)।
ये अमीर और पढ़े-लिखे, सभ्य-सुसंस्कृत पेरैंट्स के बच्चे हैं।
एक और दल भी है। इस दल में लड़के भी हैं और लड़कियां भी। उनके कपड़े ढीले-ढाले और काफी चपटी कंघी की हुई है। लड़कियों ने कसी हुई कुरुप चोटियां कर रखी हैं। इन लोगों के हाथों में बहुत सारी पुस्तकें हैं। ये लोग कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठते हैं। सबसे डरते हैं। किसी से मन की बात नहीं कहते। न ऊंचा बोलते हैं, न ऊंचा हंसते हैं। ये कॉलेज के बैकवर्ड लोग हैं। एकदम डल और भौंदू समझे जाते हैं। इनसे कोई बात करना भी पसन्द नहीं करता। ये लोग ऐसे मूर्ख हैं, केवल पढ़ने के लिए ही कॉलेज आते हैं।
ये गरीब और अनपढ़ माता-पिता के बच्चे हैं।

दो
कॉलेज का एक दूसरा अंग उसकी बिल्डिंग है। बहुत लम्बी-चौड़ी बिल्डिंग है। सारी खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं। ये पिछले विद्यार्थी-जागरण के चिह्न हैं। इस कॉलेज के एक प्रोफेसर ने एक लड़के से कहा था और लड़के ने दूसरे कॉलेज में पढ़ने वाले अपने एक दोस्त लड़के से कहा था, ‘‘माई डीयर यार ! सारा स्टूडेंट-अनरेस्ट साला तुम्हारे कॉलेज तक ही आकर रुक गया। हमारे हिस्से में कुछ नहीं पड़ा। नो, पापे ! दिस इज़ नॉट गुड। कुछ अनरेस्ट हमारे कॉलेज में भी भेजों। वी विल मदद यू !’’

दूसरे दिन दूसरे कॉलेज के पांच-सात लड़के और बाकी न पढ़ने वाले उन लड़कों के दोस्त लड़के-कुल मिलाकर चालीस-पचास लड़के-आए थे। उन्होंने पत्थर मार-मारकर खिड़कियों के सारे शीशे तोड़ दिए थे।
इस कॉलेज के उसी प्रोफेसर ने पुलिस को टेलीफोन किया था। उसी लड़के ने अपने कॉलेज के लड़के की ओर से पथराव का विरोध किया था। पुलिस आयी थी। लड़के और लड़कों के देस्त लड़के भागकर पुलिस के पास गए थे कि बाहर के लड़के आकर उनको पत्थर मार रहे हैं। पथराव रुक गया था। पुलिस चली गई थी-और इस कॉलेज में भी स्टूडेंट्स-जागृति और छात्र-अनरेस्ट आ गया था।

बिल्डिंग के कमरों के भीतर डेस्क और कुर्सियां एक-दूसरे के ऊपर पड़ी हैं, जिसका मतलब यह है कि थोड़ी देर पहले कुछ लड़के यहां बैठे हुए थे। जब वे आपस में मिलकर बैठते हैं तो धींगा-मस्ती जरूर करते हैं। एक-दूसरे को कुर्सियों और डेस्क फेंककर जरूर मारते हैं। न भी मारें तो फर्नीचर की उठा-पटक तो करते ही हैं। एक्टिव और स्मार्ट स्टूडेंट्स किसी कमरे को ठीक-ठीक नहीं रहने देते।

बिल्डिंग की दीवार पर चाक और पेंसिलों से और कहीं-कहीं कोयले से भी ढेर सारी चित्रकारी की गई है। इससे दीवारें अजन्ता और एलोरा की गुफाओं के समान चित्रमयी हो गई हैं। अधिकांश स्थानों पर परिवार-नियोजन से सम्बद्ध बहुत सारी बातें लिखी गई हैं। सरकार का काम है, अत: जनता भी करती है। इस देश का युवक वर्ग अब अपना कर्तव्य समझने लगा है। युवक वर्ग जाग्रत है।

तीन
उस बिल्डिंग के एक कोने में एक बड़ा-सा कमरा हैं। उसके दरवाजों पर बड़ी-सी चिक लटक रही है और उस चिक से छनकर बहुत-सा शोर बाहर आ रहा है, जो बरामदों में तैरता हुआ सारी बिल्डिंग में फैल जाता है।
चिक के भीतर शोर और भी ज्यादा है। यहां किसी को शोर मचाने से नहीं रोकता। यहां सच्चा स्वराज्य हैं। यहां वे लोग बसते हैं, जो केवल बोलते हैं, सुनते नहीं हैं। यह स्टाफ-रूम है।
खिड़कियों के कपड़े वर्षों बाद धुलने गये हैं, अत: वर्षों बाद लौटेंगे। इसीलिए बाहर से कभी भी कोई चिड़िया या कौवा आकर खिड़की की सलाखों पर बैठ जाता है।

 इस समय खिड़की की उन्हीं सलाखों में से एक पर बैठा हुआ एक कौवा बकवास कर रहा है।
और साथ-साथ स्टाफ-रूम में कुर्सियों पर बैठे, सूट-बूट वाले लोग बकवास कर रहे हैं।
‘‘स्टूडेंट्स में इनडिसिप्लिन बहुत बढ़ रहा है।’’
‘‘देश में गरीबी बहुत बढ़ रही है।’’
‘‘गरीबी नहीं, महंगाई बढ़ रही है।’’
‘‘आपका दिमाग खराब हैं।’’

‘‘दिमाग खराब होगा आपका ! हम सही बात कह रहे हैं, क्योंकि डालडा खाते हैं।’’
‘‘एक्सेलसियर पर ‘यहूदी की बेटी’ लगी हुई है।’’
‘‘कल साला सब्जीवाला सड़े हुए टिंडे दे गया।’’
‘‘कांग्रेस के राज में सड़े हुए टिंडे नहीं बिकेंगे तो और क्या बिकेगा !’’
‘‘महाशय ! पांच सौ श्लोक याद हैं मुझे।’’
‘‘आपकी क्या बात है ! आप तो डिक्शनरी हैं, जनाब !’’
‘‘इन्हें उठवाकर पुस्तकालय में रखवा दो। ’’
‘‘सुरैया ज्यादा अच्छा गाती है लता से।’’
‘‘बकवास बन्द करो।’’
और कौवा बकवास बन्द करके उड़ गया !   

चार
कॉलेज के समीप बस-स्टैंड पर एक लड़का और एक लड़की खड़े हैं। वे दोनों आपस में प्रेम करते हैं और पिछले ढाई वर्षों से करते आ रहे हैं-भविष्य की बात स्टूडेंट्स यूनियन जाने। लड़का बहुत सीरियस है अपने इस प्रेम में। पहले वर्ष इसी प्रेम के कारण उसकी अटैनडेंस शॉर्ट हो गई थी। दूसरे वर्ष प्रेम की अथाह गहराइयों में डूबे रहने के कारण वह पढ़ाई में गोता खा गया था और अब तीसरे वर्ष भी वह प्रथम वर्ष का ही होनहार विद्यार्थी है। कोई उसकी पढ़ाई के विषय में पूछे तो बताता है, ‘‘थर्ड इयर इन फर्स्ट इयर। अण्डरस्टैंड ?’’

   


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