योगायोग - रबीन्द्रनाथ टैगोर Yogayog - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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योगायोग

रबीन्द्रनाथ टैगोर

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3457
आईएसबीएन :81-7182-978-3

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रोचक उपन्यास....

Yogayog

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


रवीन्द्रनाथ एक गीत हैं, रंग हैं और हैं एक असमाप्त कहानी। बांग्ला में लिखने पर भी वे किसी प्रांत और भाषा के रचनाकार नहीं हैं, बल्कि समय की चिंता में मनुष्य को केन्द्र में रखकर विचार करने वाले विचारक भी हैं। "वसुधैव कुटुम्बकम्" उनके लिए नारा नहीं आदर्श था। केवल "गीतांजलि" से यह भ्रम भी हुआ कि वे केवल भक्त हैं, जबकि ऐसा है नहीं। दरअसल, ह्विटमैन की तरह उन्होंने "आत्म साक्ष्य" से ही अपनी रचनाधर्मिता को जोड़े रखा। इसीलिए वे मानते रहे कविता की दुनिया में दृष्टा ही सृष्टा है "अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति।" हालांकि वे पारंपरिक दर्शन की बांसुरी के चितेरे हैं फिर भी इसमें सुर सिर्फ रवीन्द्र के हैं। अपनी आस्था और शोध के सुर। कला उनके लिए शाश्वत मूल्यों का संसार था।

दो शब्द


दो-दो राष्ट्रगानों के रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर के पारंपरिक ढांचे के लेखक नहीं थे। वे वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे। ब्रह्मसमाजी होने के बावजूद उनका दर्शन एक अकेले व्यक्ति को समर्पित रहा। चाहे उनकी ज्यादातर रचनाएं बांग्ला में लिखी हुई हों, मगर उन्हें इस आधार पर किसी भाषिक चौखटे में बांधकर नहीं देखा जा सकता। न ही प्रांतवाद की चुनन्नट में कसा जाना चाहिए। वह एक ऐसे लोक कवि थे जिनका केन्द्रीय तत्व अंतिम आदमी की भावनाओं का परिष्कार करना था। वह मनुष्य मात्र के स्पन्दन के कवि थे। एक ऐसे कलाकार जिनकी रगों में शाश्वत प्रेम की गहरी अनुभूति है, एक ऐसा नाटककार जिसके रंगमंच पर सिर्फ ‘ट्रेजडी’ ही जिंदा नहीं है, मनुष्य की गहरी जिजीविषा भी है। एक ऐसा कथाकार जो अपने आस-पास से कथालोक चुनता है, बुनता है, सिर्फ इसलिए नहीं कि घनीभूत पीड़ा के आवृत्ति करे या उसे ही अनावृत्त करे, बल्कि उस कथालोक में वह आदमी के अंतिम गंतव्य की तलाश भी करता है।

वर्तमान की गवेषणा, तर्क और स्थितियों के प्रति रवीन्द्रनाथ सदैव सजग रहे है। इसी वजह से वह मानते रहे कि सिर्फ आर्थिक उपलब्धियों और जैविक  जरूरतें मनुष्य को ठीक स्पंदन नहीं देते। मौलिक सुविधाओं के बाद मनुष्य को चाहिए कि वह सोचे कि इसके बाद क्या है, उत्पादन, उत्पाद और उपभोग की निस्संगता के बाद भी ‘कुछ’ है जो पहुंच के पार है’। यही कारण है कि रवीन्द्र क्षैतिजी आकांक्षा के लेखक है।
इन तमाम आधारों से रवीन्द्र, कालिदास और कीट्स के समकक्ष ठहरते हैं। उनके वर्षा गीत इस बात के समर्थन में खड़े हैं। ‘प्रकिया’ और ‘व्यक्तिवाद’ में आस्था के कारण वे पारंपरिक सिलसिलों में परम्परावादी नहीं हैं। अपने निबंध कला और परंपरा में वह कहते हैं—

‘कला कोई भड़कीला मकबरा नहीं, विगत के एकाकी वैभव पर गहन चिंतनशील-जीवन के जुलूस के निवेदित, यथार्थ-चेतना है, भविष्य की तीर्थयात्रा पर निकली यथार्थ चेतना, भविष्य जो अतीत से उतना ही अलग है जितना बीज से पेड़। तीर्थों के तमाम बिखरे हुए संदर्भों के बावजूद रवीन्द्र साहित्य पुनरुत्थानावादी नहीं है। वह किसी खांचे में फिट नहीं बैठते। जैसे—
भीड़ से अलग
अपना भाव जगत
टोहा है मैंने
चौराहे पर...।’
चौराहे पर यूं भी मनुष्य मुक्त भाव में रहता है। जिसे शापेनहावर व्यक्तिवाद का संत्रास कहता है। इसके परिष्कार का रवीन्द्रनाथ का तरीका अलग रहा है। वह मानते थे कि व्यक्तियों की अभिव्यक्तियां अलग हो सकती हैं, पर उनकी नियति अलग नहीं हो सकती, उन्हें चाहिए कि वे अपनी हर कृति में उसे शाश्वत की गवेषणा करे, उसका स्पर्श अनुभव करे जो सबका नियति नियंता है। टायनबी इसे रेशीरियलाइजेशन कहते हैं। समझा जा सकता है कि मार्क्स यदि ‘अतिरिक्त’ का भौतिक स्वरूप व्यक्त करते हैं तो रवीन्द्र आधिभौतिक। राबर्ट फ्रास्ट की तरह वह भी मानते हैं कि देवी अतिरेक के स्पर्श से मनुष्य लौकिक यथार्थ के पार चला जाता है।

रवीन्द्र साहित्य पर, उनके मूल्यांकन पर उनकी मनुष्य की आवधारणा पर काफी काम होना है। संभवतया इसलिए भी कि वैश्विक चेतना का इससे बड़ा कवि और कहीं है ही नहीं। डायमंड पाकेट बुक्स और उसके निदेशक कुमार सदैव ही हिन्दी के आम पाठकों तक भारतीय भाषा के रचनाकारों को पहुंचाने में सक्रिय रहे हैं। यह सब भी इसी की कड़ी है।

प्रदीप पण्डित

योगायोग



आषाढ़ के सातवें दिन अविनाश घोषाल की वर्षगांठ थी। उसके जीवन का बत्तीसवां साल पूरा हुआ है। सवेरे से ही बधाई के तार चले आ रहे हैं और आ रहे हैं गुलदस्ते।

हमारी कहानी का आरंभ यहीं से होता है। पर आरंभ भी एक आरम्भ होता है। सांझ का दीया जलाने के पहले सुबह बत्ती तैयार करनी होती है।
इस कहानी के पौराणिक युग की खोज करने पर पता चलता है कि घोषाल-वंश किसी समय सुन्दरवन की तरफ रहता था; उसके बाद वह चला आया हुगली जिले के नूरनगर में। ठीक से नहीं बताया जा सकता कि बाहर से पुर्तगालियों के दबाव से उसे इस ओर आना पड़ा, या भीतर से समाज के धक्के से। जो लोग मन से पुराना घर छोड़ सकते हैं, उनमें तेजी के साथ नया घर बसाने की शक्ति भी पाई जाती है। इसीलिए घोषाल-वंश के ऐतिहासिक युग के आरम्भ से ही देखा जाता है, कि उनके यहां जमीन-जायदाद, गाय-भैंस नौकर-चाकर की कमी नहीं रही, और तिथि-त्योहार, उत्सव-समारोह भी धूम-धाम से मनाए जाते हैं। आज भी उनके पुराने गांव शेयाकुलि में प्रायः दस बीघे विस्तार वाला घोषाल-तालाब अतीत गौरव की गवाही दे रहा है। अब उस तालाब पर उसका केवल नाम ही रह गया है। उसके पानी पर चटर्जी-वंश के जमींदारों का अधिकार है। उन्हें अपनी पैतृक महिमा को क्यों छोड़ना पड़ा, यह जानना जरूरी है।

घोषाल-वंश के इतिहास से जाना जाता है कि चटर्जी-वंश के जमींदार के साथ उनकी शुरू से ही खटपट हो गई थी। मगर इस बार का झगड़ा सम्पत्ति विवाद नहीं था बल्कि देव पूजन को लेकर हुआ था। घोषाल-वंश के लोगों में प्रतिस्पर्धा के चलते जो प्रतिमा गढ़ी थी, वह चटर्जी वंश वालों की प्रतिमा से दो हाथ ऊँची थी। चटर्जी-वंश वालों ने उसका जवाब दिया। रातों रात प्रतिमा विसर्जन के रास्ते में बीच–बीच में उन्होंने ऐसे नाम के तोरण बनाए, जिनसे घोषाल-वंश वालों की प्रतिमा का सिर बार-बार टकरा जाता ऊंची प्रतिमा वाला दल तोरण तोड़ने दौड़ता था और नीची प्रतिमा वाला दल विपक्षियों के सिर तोड़ने। नतीनजन देवी ने उस बार काफी खून वसूल किया। फौजदारी का मामला चला। वह मामला घोषाल-वंश के सर्वनाश के किनारे आकर रुका।

आग जब बुझी तब काठ का एक टुकड़ा भी बाकी न था। सब-कुछ राख हो गया। चटर्जी वंश वालों की वास्तुलक्ष्मी का मुख भी श्रीहीन हो गया। विवश होने पर संधि हो सकती है, पर उससे स्थायी शांति नहीं होती। खड़े और चित्त पड़े तबकों में गुस्सा उबाल ले रहा था। एक को लग रहा था कि वे कुछ कर नहीं पाए, दूसरे को लग रहा था बेकार छोड़ दिया। चटर्जी वंश वालों ने घोषाल वंश वालों पर अंतिम चोट चलाई, समाज के खांडे से। उन्होंने यह अफवाह फैला दी कि घोषाल वंश वाले किसी जमाने में भंगज ब्राह्मण थे। यहां आकर उन्होंने यह बात बता दी है, और अब केचुए ने काले सांप का रूप धारण कर लिया है। जिन्होंने यह कोंचा दिया, उनके पास रुपये के साथ गले का भी जोर था। इसलिए स्मृतिरत्न वाले मुहल्ले में भी उस अपकीर्ति के प्रचार में बढ़ा-चढ़ाकर ढोल बजाने वालों का दल भी जुट गया। कलंक भंजन के लिए यथेष्ट प्रमाण तक दक्षिणा घोषाल वंश वालों के पास नहीं थी। इसलिए चंडी-मंडप बिहारी समाज के अत्याचार से तंग आकर उन्हें दूसरी बार जमीन-जायदाद छोड़नी पड़ी। वहां से वे किसी तरह रजबपुर जाकर बस गए।

जो लोग मारते हैं, वे भूल जाते हैं, पर जो मार खाते हैं वे आसानी से नहीं भूल पाते। लाठी उनके हाथ से खिसक जाती है, इसलिए वे मन-ही-मन लाठी भांजते रहते हैं। एक लम्बे अर्से बाद तक हाथ ठंडा पड़े रहने में उनके वंशी में मानसिक लाठी का जोर बराबर बना हुआ है। उन लोगों के घर में अभी तक सच झूठ के मिश्रण के साथ इस प्रकार के किस्से जमा हैं, कि चटर्जी वंश वालों को किस तरह उन लोगों ने पछाड़ा था। फूस की झोंपड़ी में, आषाढ़ की सांझ में बच्चे उन किस्सों को बड़ी उत्सुकता से सुनते रहते हैं। चटर्जी वंश वालों का विख्यात दाशु सरदार जब रात में सो रहा था तब बीस-पच्चीस लठैतों ने उसे पकड़ कर किस प्रकार घोषालवंश वालों की कचहरी से बे-मालूम ढंग से गायब कर दिया था, यह किस्सा आज भी सौ वर्षों से घोषाल-वंश वालों के यहां सुना जाता है। पुलिस उस मामले की खानातलाशी के लिए आई तक घोषाल-वंश के नायब भुवन विश्वास ने सहज भाव से बताया, हां, वह कचहरी में आया तो था—अपने काम से; मौका पाकर मैंने उसे कुछ अपमानित भी किया है। सुना है कि किसी वजह से वह घर-बार छोड़कर कहीं चला गया है। पर इस तरह की बात से हाकिम का संदेह नहीं गया। भुवन ने कहा, ‘‘हुजूर, यदि इसी साल उसका पता न लगा लूं तो मेरा नाम भुवन विश्वास नहीं। न जाने कहां से उसने दाशु के आकार-प्रकार का एक आदमी खोज निकाला। उसे भेज दिया सीधा ढाका। वहां उसने एक लुटिया चुराई और पुलिस में अपना नाम बताया दाशरथि मंडल। उसे एक महीने की कैद की सजा दी गई। जिस दिन वह जेल से छूटा उसी दिन भुवन ने मजिस्टरी में इस बात की सूचना दी कि दाशु सरदार ढाका की जेल में है। खोज करने पर पता चला कि दाशु जेल में अवश्य था, पर जेल के बाहर वाले मैदान में अपनी दुलाई फेंककर भाग निकला। प्रमाण पाया गया कि वह दुलाई दाशु सरदार की ही थी। उसके बाद वह कहां चला गया, इसकी खबर देने कि जिम्मेदारी भुवन की नहीं थी।

इस प्रकार के किस्से दिवालिए वर्तमान के भूतकालीन चैक के जैसे हैं। गौरव के दिन चले गए, इसीलिए उनका पुरातत्व खोखला होने की वजह से इतना खड़खड़ाता है।
जो भी हो, जिस प्रकार तेल समाप्त होता है, जिस प्रकार दीया बुझता है, उसी प्रकार एक समय ऐसा आता है जब रात बीत जाती है। घोषाल-परिवार का सूर्योदय दिखाई दिया मधुसूदन के भाग्य के जोर से।


2


मधुसूदन के पिता आनन्द घोषाल रजबपुर के आढ़तियों के यहां मुंशी का काम करते थे। मोटे अनाज और मोटे कपड़े से उनके परिवार की गुजर होती थी। गृहणियों के हाथ में सीप के सस्ते कंगन होते थे, पुरुषों के गले में रक्षामंत्र से अभिषिक्त पीतल का कवच और बेल की गिरी से रगड़ा हुआ खूब मोटा जनेऊ रहता था। ब्राह्मण-मर्यादा का प्रमाण क्षीण होने पर जनेऊ के परिमाण में काफी वृद्धि हो गई थी।

मुफस्सिल के स्कूल में मधुसूदन की पहली शिक्षा हुई थी। साथ ही अवैतनिक शिक्षा उसने प्राप्त की थी नदी कि किनारे, आढ़त के प्रांगण में पाट की गांठों के ऊपर चढ़कर। माल बेचने वालों, खरीदने वालों, बैलगाड़ियों के गाड़ीदानों के बीच वह मुक्ति का अनुभव करता, जहां बाजार में टीन से पटे हुए शेडों से भीतर सजी रहती हैं, गुड़ से भरे घड़ों की कतारें, तमाखू के पत्तों की गड्डियां, गांठ बांधे हुए विलायती रैपर, मिट्टी के तेल के कनस्तर, सरसों के ढेर, दाल के बोरे, बड़े-बड़े तराजू और बटखरे। वहीं, उन्हीं सब चीजों के चारों ओर चक्कर लगाने में उसे बाग में टहलने से भी अधिक आनन्द मिलता था।
बाप ने सोचा कि लड़के को कहीं लगाया जा सकता है। किसी तरह दो-चार परीक्षाएं पास करा लेने पर भद्र गृहस्थों के मोक्ष तीर्थ यानी स्कूल मास्टरी से लेकर मुख्तारगिरी और वाकलत में से किसी-न-किसी में मधु अवश्य ही जमा लेगा। दूसरे तीन लड़कों की भाग्य-सीमा-रेखा गुमाश्तागिरी तक ही बंधी रह गई। उनमें से किसी ने तो आढ़तियों के यहां और किसी ने ताल्लुकेदारों के दफ्तर में कान में कलम ठूंसकर ‘शिक्षानवीस’-अथवा-‘एप्रेंटिस’-का काम शुरू कर दिया। इधर मधुसूदन आनन्द घोषाल के क्षीण सर्वस्व पर निर्भर करके कलकत्ता के एक मेस में जाकर रहने लगा।

 

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