उकाव - क्षितिज शर्मा Ukaav - Hindi book by - Kshitij Sharma
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विविध उपन्यास >> उकाव

उकाव

क्षितिज शर्मा

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :252
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3524
आईएसबीएन :81-7016-769-8

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कुमाऊँ के पहाड़ों का ग्रामीण जीवन का अंतरंगता और विविधतापूर्ण चित्रण...

Ukav

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘उकाव’ पहाड़ी जिंदगी की चढ़ाई की गाथा है। एक मायने में उपन्यास की कथा पुरुष-नियंत्रित समाज द्वारा नारी पर थोपे गये उत्पीड़क नियमों की भर्त्सना है। नैतिकता के इकहरे मानदंडों के कारण किन्हीं कमजोर क्षणों में हुई एक तथा कथित ‘गलती’ के प्रतिकार में श्यामा किस तरह अपना जीवन होम कर देती है, लेखक ने इस संघर्ष को इतने मार्मिक और प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया है कि वह पहाड़ी औरत की जिंदगी का दस्तावेज बन गया है। कुमाऊँ के पहाड़ों का ग्रामीण जीवन जितनी अंतरंगता और विविधता से इस उपन्यास में चित्रित हुआ है,वह बरबस रेणु और शैलैश मटियानी की याद दिला देता है। संभवतः किसी रचना का आंचलिक बनना इस बात पर निर्भर है कि वह किसी स्थान विशेष के लोगों का चित्रण करते हुए वहाँ की भौगोलिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक और मूल्यगत विशिष्टताओं को कितनी उत्कृटता व सघनता से अभिव्यक्त करती है। इस संदर्भ में देखें तो ‘उकाव’ निश्चित ही एक आंचलिक रचना है, पर तब दुनिया की कौन-सी ऐसी रचना है जो इस बात से न पहचानी जाती हो की उसमें कितनी गहराई और मजबूती से अपने समय की पहचान छिपी है ?
सही मायनों में देखा जाये तो प्रेम, प्रतिकार, बलिदान और संघर्ष की यह गाथा अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई पहाड़ी औरत के ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय नारी के बहुआयामी व विराट स्वरुप का दर्शन कराती है। और यही लेखक की सृजनात्मकता की कसौटी है।
यह इत्तफाक नहीं है कि क्षितिज शर्मा लेखन की उस परंपरा के अधिक निकट पड़ते हैं जिसका स्त्रोत शैलैश मटियानी हैं।मटियानी जी की रचनाओं में पहाड़ी जीवन की झाँकी सबसे ज्यादा वास्तविक और प्रमाणिक ढंग से नजर आती है। क्षितिज शर्मा उस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पहाड़ी गांवो के संघर्षमय जीवन को जिस तरह से चित्रित करते हैं, वह मुझ जैसे तथाकथित पहाड़ियों के लिये एक‘रिबिलेशन’ से कम नहीं है।


गाँव से कठपतिया तक, मील-भर के उकाव (चढ़ान) को पल-भर में लाँघ जाना चाहती थी श्यामा।
अभी आधा रास्ता भी पार नहीं हुआ था, पसीने से नहा गई थी। सूरज ठीक सिर के ऊपर आ गया जान पड़ रहा था।
जेठ की दोपहरी शुरू भी तो जल्दी हो जाती है। पहली किरण के साथ ही तपने लगती है।
काम पर पहुँचने की हड़बड़ी में, धूप की चिलमिलाहट ज्यादा ही बेचैन करने लगी थी। जिस हिसाब से वह दौड़ना चाहती थी, पाँव उस रफ्तार से बढ़ नहीं पा रहे थे। उनमें दुखन भरने लगी। गला सूखता जा रहा था। उकाव (चढ़ान) का रास्ता थका भी जल्दी देता है।
उनसे सोचा, जोशियों के धारे पर पानी पीकर हाथ-मुँह धो लेगी। थोड़ी देर अखरोट की छाया में सुस्ता लेगी। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा-कुछ और देर हो जाएगी, मुँह बना लेगा मालदार। अगर खुद समय पर आ गया होगा, तो ? न भी आया हो, सीधा थान की दुकान पर ही चला गया हो, तब भी खबर तो उसे हो ही जाती है। पर इतना आसान भी नहीं है श्यामा को टोकना। कभी देर की है उसने ? मजबूरी की बात दूसरी ठहरी।

ये तो अपना मन ही ऐसा है, जो कोहराम मचा देता है कि किसी का पैसा लेना है तो काम भी पूरा करना चाहिए। मन का डरना वाजिब भी ठहरा। मजदूरी तो मजदूरी हुई। पराधीन ठहरी वह। अपनी मर्जी कैसे चल सकती है उसमें। किसी ने ‘जरा टैम से आया करो हो’ कह दिया तो चुप हो जाना हुआ। उस वक्त थप्पड़ जैसी लग जाने वाली हुई मुँह पर। बात भी सही ठहरी, सब अपने हिसाब से आने-जाने लगें तो काहे का मालदार, काहे की मजदूरी।
जोशियों के धारे पर पहुँचते ही राहत मिली। लगा, एक पड़ाव पार कर लिया है।
उसने हाथ-पाँव धोए। कुल्ला करके पानी पिया। सुस्ताने नहीं बैठी। बैठ जाती तो उठना भारी हो जाता। फिर पहुँचने में ही आधा दिन निकल जाता।

धोती के छोर से चेहरा पोंछकर, लंबे-लंबे कदम भरती हुई, किनारे से मकानों के पीछे को निकल गई। सामने से जाती तो रुकना पड़ जाता। जसोदी की आमा (दादी) जरूर टोक देती। इस बुढ़िया को तो आदमी दिखना चाहिए।, लपककर बैठा लेगी उसे। घंटे-भर तक बोलती चली जाएगी। इसलिए निकली बचकर। बुढ़िया ने देख लिया तो छोड़ेगी नहीं। घास-पात का रोना लेकर बैठ जाएगी। कब से पीछे पड़ी है-घास दे दे, घास दे दे करके। कहाँ से दे दें इसे घास, अपने डंगर पालने ही मुश्किल हो रहे हैं। बुढ़िया को तो बात करने का बहाना चाहिए। और नहीं तो बहुओं की करतूतों को ही गाने लगती। बेकार में टैम खराब होता। पहले ही इतनी देर हो चुकी थी कि एक मिनट भी जाया करना अपनी बेचैनी को और बढ़ा देना था।
देर, सवेरे उठने में ही हो गई थी। जिस समय आँख खुली, भोर का तारा सामने की पहाड़ी के काफी ऊपर आ चुका था। अँधेरा करीब-करीब मिटने को था। चिड़ियों की चीं-चीं शोर में तबदील होने लगी थी।
बाहर निकलते ही लगा-घड़ी-भर में दिन साफ हो जाएगा।

हड़बड़ा वह तभी गई थी। काम सारे करने थे, समय कम था। अभी दूध दुहना था। घास-पात का इंतजाम करना था। डिग्गी से पानी लाना था-अपने लिए भी और डंगरों के लिए भी। चाय बनानी थी। दिन के लिए भात उबालना था। कलेवे को रोटियाँ बनानी थीं।
दूध दुहकर चाय का पानी चूल्हे पर रखते ही ध्यान आया, दवा का टाइम भी हो गया है। सिब्बू के बौज्यू (पिताजी) की दवा तो पीसनी भी पड़ेगी। दीदी के लिए पुड़िया बनी-बनाई है, पानी के साथ निगल लेगी।
वैद्य कह गए थे-दवा का टैम नहीं बिगाड़ना चाहिए। पर सिब्बू के बौज्यू को अभी से कैसे जगा दूँ ? रात-भर सोए नहीं हैं। तकलीफ ही ऐसी लग गई है, चैन ही नहीं लेने देती। वैद्य भी थक गए हैं आते-आते, पर छाती की घर्-घर् जस की तस बनी हुई है। श्यामा रात-भर छाती मलती रही। कभी उठाया, कभी बैठाया। आखिरी पहर में लगी उनकी आँख। तभी सो पाई श्यामा भी।
इसी कारण उठने में विलंब हो गया।

दीदी ठीक रहती तो इतनी परेशानी नहीं होती। बाहर के काम ही करने पड़ते। अंदर का वह सँभाल लेती। पर उसकी तबीयत भी अचानक ऐसी बिगड़ी कि उठना मुश्किल हो गया। पिछली बार भी ऐसा हुआ था। पिछली बार ही नहीं, कई सालों से हो रहा है। जेठ का महीना लगते ही पेट कटना शुरू हो जाता है। कहती है, नए गेहूँ की रोटी आँतों को काट देती है। लेकिन इस बार तो नए गेहूँ को अभी छुआ भी नहीं है। गेहूँ ज्यादा हुआ भी नहीं है। डेढ़ बोरी हुआ है, बस ! वैसे ही पड़ा है। सर्दियों में काम अच्छा मिल गया था। हाथ में दो पैसे थे। बाजार का गेहूँ खरीद लाई थी। मडुवा और जौ मिलाकर लहोट-महोट ही खा रहे हैं। निखालिस गेहूँ के चार फुलके सिब्बू के बौज्यू के लिए बनते हैं या कभी-कभी सिब्बू के लिए। रोज-रोज लहोट-महोट उसके लिए भी ठीक नहीं ठहरे। पढ़ने वाला लड़का है। दिमाग पर जोर पड़ता है।
फिर भी जेठ लगते ही दीदी पड़ गई। जतन तो खूब किए। दही-मट्ठा जितना था, सब उसी को दिया। साग-सब्जी का भी परहेज किया। पर हालत सुधरी नहीं, गिरती गई। दस्तों के साथ उल्टी भी शुरू हो गई। लगा, इसको ही जो कुछ हो जाना है अब। भला हो गुसाईं दत्त वैद्य का, जो दो खुराक में ही उल्टी थम गई। दस्त रुकने में टैम लग गया।
कुछ तो दीदी अपने हाथ से भी बिगाड़ देती है, परहेज नहीं करती। सवेरे भी चाय की केतली नीचे उतरने तक, चूल्हे के पास आ गई थी। उसकी ललचाई नजर देखकर श्यामा ने तभी टोक दिया था, ‘‘चाय तो तुमको नहीं देनी है हो दीदी ! थोड़ा-सा दही रखा है-पानी जैसा, उसे पी लो। चाय के लिए वैद्य ने मना कर रखा है।’’

पर मानी नहीं-‘‘बिना चाय की घुटुक लगाए, आँख भी तो नहीं खुलती। ज्यादा नहीं, थोड़ी-सी पीऊँगी। दो घूँट।’’
यही ऐब है इसमें। मानती नहीं किसी की। पड़ जाएगी तो भुगतेंगे सब। कुछ कह दूँ तो मुँह फुला देगी। जगह-जगह गाती फिरेगी, सौत ने ये कहा, वो कहा। ये नहीं सोचेगी। इसमें सौतिया बात कौन-सी हो गई ? भले के लिए ही कहा है। मुझे क्या ? पीओ, खूब पीओ। पूरी केतली उलट लो मुँह में। खामखाँ अपना दिमाग मैं तो खराब नहीं करूँगी।
वह उठी, चंथरी पर सिब्बू के बौज्यू की दवा पीसने लगी। पिसी दवा को कटोरी में बटोरकर उनके पास जाते-जाते रुक गई। अभी नहीं पिलानी इनको दवा। काम-धंधा करके जाते समय पिलाऊँगी। अभी से उठा लिया तो दोबारा नींद नहीं आएगी। फिर दिन-भर गिरे-गिरे रहेंगे। न गला खुल पाएगा, न आँखें। गला साफ करने के लिए सारा दिन हुक्का गुड़गुड़ाते रहेंगे। जब तब खाँसते-खाँसते दोहरे नहीं हो जाएँगे, छोड़ेंगे नहीं हुक्के को।
जोशियों के पिछवाड़े को पार कर वह घोड़िया सड़क पर आ गई। वहाँ से चढ़ाई थोड़ा कम हो जाती है। रोतेलों की छानी तक आराम का रास्ता हुआ। वहाँ पहुँच गए तो आगे कितना भी लंबा रास्ता हो, भारी नहीं पड़ता। यहाँ से बाँज का जंगल शुरू हो जाता है। हवा में नीचे के इलाके जैसी गरमाहट नहीं रहती, ठंडक होने लगती है। कठपतिया का फासला भी ज्यादा नहीं रहता, पर उसको जितनी जल्दी थी, उस हिसाब से लग रहा था, अभी बहुत रास्ता तय करना बाकी है।
कठपतिया पर, जहाँ घोड़िया सड़क मोटर रोड को काटती है, वहाँ पहुँचते-पहुँचते वह हाँफने लगी थी। बाजार की तरफ बढ़ने से पहले थोड़ी देर सुस्ता लेना चाहती थी।

ढइया से बाजार की ओर उतरने से पहले उसने मोटर रोड को दूर तक देखा। पहाड़ों की ओट से टुकड़ों-टुकड़ों में दिखाई देने वाली सड़क पर पैसिया के उस पार तक कहीं भी धूल उठती दिखाई नहीं दी। तो गाड़ी के आने में अभी टैम है। इसका मतलब ज्यादा देर नहीं हुई है।
उसे जैसे सुस्ताने का समय मिल गया।
बाँज के जुड़वाँ पेड़ की चपटी जड़ से कमर सटाकर पैर लंबे करके बैठ गई। ठंडी हवा के हलके-हलके झोंके, थकान को बाहर खींचते-से जान पड़ रहे थे।
बाँज और देवदार के पेड़ों के बीच से सीधी निकलती सड़क माँग में भरे सिंदूर की तरह खूबसूरत लगती है उसे। अकसर सोचती है-मोटर रोड आ जाने से इस उजाड़ जगह में भी रौनक आ गई।
शुरू में, ककड़ीखाल की चढ़ाई पर, सड़क से दस हाथ ऊपर उठती धूल को देखकर धुकधुकी होने लगती थी-लो, डेढ़-दो मील के रास्ते को घड़ी-भर में नापकर गाड़ी घरघराती हुई अभी यहाँ खड़ी हो जाएगी। पहियों के चर्र-चर्र करने तक दुकानदार और स्कूली लड़के घेर लेंगे उसे। उचक-उचककर झाँकने लगेंगे। अंदर चिपके चेहरों को पढ़ने लगेंगे। कहीं कोई परिचित खबर-समाचार लाया हो किसी का !

अब नहीं होती वैसे धुकधुकी। परिचित हो गई हैं आँखें गाड़ी के टैम, रंग-रूप, आवाज और भँवर की तरह ऊपर उठती धूल से। अब पता है सबको, स्कूल की घंटी और गाड़ी का हॉरन एक साथ बजते हैं।
श्यामा देखती है, बखत कितनी जल्दी बदल गया है। कुछ भाग-भोग भी होता है जगह का। नहीं तो जहाँ दिन में भी डर लगता था, बाघ का, भूत का, कहाँ आधी रात तक चहल-पहल ! दोपहरी में भी अकेले कौन आता था इस रास्ते से ? दूर से ही ध्यान रहता था, आगे कठपतिया है। कठपतिया मायने भूत का टीला। पता नहीं कैसे लोग थे वे, जिन्होंने मुर्दे को यहाँ विश्राम दे दिया। एक बार मुर्दा उठ गया घर से तो तिथाड़ (मुर्दघाट) पर ही उतरता है। उन्होंने मुर्दे को आधे रास्ते में उतार दिया। कहते हैं, मुर्दे की आत्मा वहीं रह गई, तड़पती-बिलखती। तब से आने-जाने वाले इस जगह पर कुछ न कुछ फेंक जाते हैं। न हुआ कुछ तो, आसपास सूखी लकड़ियों के टुकड़े ही डाल दिए। धीरे-धीरे टीला बन गया था यहाँ पर। उसी का नाम हो गया कठपतिया।
मोटर रोड आई तो पता नहीं कब बिला गया टीला, कहाँ खो गया कठपतिया ? एकाएक भूल गए लोग घास-पात फेंकना। अब तो यह भी मालूम नहीं पड़ता, सड़क ही चीर गई कठपतिया को या हवा के साथ उड़ गया टीला ?
जिन्होंने देखा नहीं, वे कैसे जानेंगे क्या होता है कठपतिया ? क्या होता है कठपतिया का डर ?।

श्यामा आज भी सड़क के किनारे पहुँचती है तो कठपतिया के आकार को भूल नहीं पाती। क्षण-भर को आँखें मूँदकर सिर नवा देती है। सब कुछ एक पल में मिट तो नहीं जाता। बाहर का भले ही मिट जाए, भीतर किसी कोने में जरूर छिपा रहता है। भीतर का यह छिपा हुआ ही बाहर की खत्म हो गई चीज को जिंदा रखता है।
देखा जाए तो भय-खौफ को खा गया समय। वरना कितनों ने देखा ठहरा कठपतिया के टीले पर खबीस जैसा बैठा हुआ। बाघ भी उसे दूर से नमस्कार करके जाने वाला हुआ। एक तरह से राजा ठहरा वो इस बियाबान का। कइयों पर लगा भी। आती-जाती बहू-बेटियों पर हाव-खाब भी रहा उसका। पर जल्दी ही मान जाने वाला भी ठहरा। सौंफ-सुपारी, लौंग-धूप की पूजा से ही खुश हो जाने वाला हुआ।
ऐसी जगह पर निर्भय होकर बस गए ठहरे लोग। आदमी से बड़ा भूत कौन ठहरा ?
मोटर रोड क्या आई, भाग्य खुल गया इस जगह का। इस कोने से उस कोने तक कितनी दुकानें बन गई हैं, बाप रे ! एक-दो-तीन-दस-ग्यारह। चाहे रोज गिन लो, शाम तक भूल जाती है गिनती। सवेरे आओ, नई दुकान की बुनियाद खुदती दिखाई देती है। मुर्दघाट तक के पत्थर लग गए हैं, पर चिनाई पूरी होने पर ही नहीं आ रही।

सोचती बहुत है श्यामा ! बहुत खयाल आते हैं-अच्छे भी, बुरे भी। सवेरे उठने से अब तक सोचती चली आ रही है। सिब्बू के बौज्यू अभी तक ठीक नहीं हुए। जेठ में खाँसी कम नहीं हो रही है, पूस-माघ में क्या होगा ? भगवान् जाने क्या करवाएगी यह तकलीफ ?
चिंतामणि सभापति ने मिलने के लिए दो बार खबर भिजवा दी है। उसके साथ ब्लॉक ऑफिस जाना था। बगीचे के लिए कर्जे की अर्जी लगाए इतने दिन हो गए। अब आई है खबर, जब सिब्बू के बौज्यू उठ भी नहीं पा रहे। मैं जाऊँगी सभापति के घर। हाथ जोड़ आऊँगी और क्या करूँ ? नहीं तो एक उम्मीद बँधी थी, वह भी जाती रहेगी।
दीदी अपनी थोड़ी सुधरी हालत को फिर न बिगाड़ ले। गुसाईं दत्त वैद्य का पैसा दो हफ्ते से नहीं दिया है। भला आदमी है, चुप है। हमारे लिए तो भगवान् ही है। जब बुलाते हैं, सीधा चला आता है। जो दिया, चुपचाप रख लेता है। कभी शिकायत नहीं करता।...पैसे की तंगी अब भी कम नहीं होनी है। इस साल घास भी नहीं बेच पाएँगे। मैं रहूँगी दिन-भर काम पर। दीदी की हालत है खराब। हरी घास तो आने से रही। सूखी घास पर ही गुजारा करना पड़ेगा। डंगरों को तो पूरा चाहिए। एक भैंस है। नाम की तो दूध देने वाली हुई, उसके लिए कमी नहीं की जा सकती। एक उसकी थोरी (कटिया) है, ढाई बरस की। अभी से मेहनत-खुराक अच्छी रहेगी, तब तैयार हो पाएगी डेढ़-दो साल तक। बैलों के लिए कमी हो तो सब तरफ से गए। बीमारियाँ अगर पल्ला छोड़ देतीं, तो भी झेल लेते। सिब्बू कब से कह रहा है, उसका जूता इस बार भी नहीं आ पाएगा। पैसा बचेगा ही नहीं। सिब्बू का ध्यान आते ही जैनल के झूले वाले पुल की तरह डोलने लगता है चित्त। नजर बार-बार स्कूल की तरफ उठ जाती है। भागुली टोकती है, ‘‘क्या हो गया श्यामा ! इतनी परेशान क्यों है ?’’

श्यामा भागुली के सवाल को टाल जाती है। दबी निगाहों से उसकी ओर देख लेती है। नजर फिर उठ जाती है स्कूल की ओर।
मन उखड़ा तो उख़ड़ ही गया। किसी भी तरह ध्यान काम पर नहीं लौट रहा।
सिब्बू के पास-फेल की सुनाई होनी है। आठ पास कर लेगा उसका सिब्बू आज ही, उसे विश्वास है। दो साल बाद दस पास कर लेगा। फिर एक दिन पूरा जवान और काबिल आदमी बन जाएगा।
चौदह वर्षों से इंतजार है श्यामा को इस दिन का।
इसलिए उठ रही है बार-बार नजर स्कूल की तरफ। पैरों में टूटन थकान से इतनी नहीं है, जितनी सिब्बू के मुँह से ‘पास हो गया हूँ’ सुनने की व्याकुलता से है। काम में व्यवधान पड़ता है, तो पड़े। उसके लिए ज्यादा जरूरी है-सिब्बू का जल्दी आना।
ककड़ीखाल की चढ़ाई पर अभी धूल नहीं उठी है। सूरज की ओर देखती है श्यामा। बहुत टैम है अभी गाड़ी के आने और स्कूल की घंटी बजने में। पर आज घंटी से क्या मतलब ? पास-फेल सुनाया और छुट्टी।
और इस छुट्टी का बेसब्री से इंतजार कर रही है श्यामा। सवेरे से ही घर की बीमारी, काम-धंधे की हड़बड़ाहट से अलग सिब्बू का खयाल भूसे में लगी आग की तरह सुलग रहा था। जबसे कठपतिया की ढइया को पार कर स्कूल पर नजर पड़ी थी, बेचैनी और बढ़ गई थी।

इस एक खबर पर भविष्य तय होना है-सिब्बू का, श्यामा का और सिब्बू के बौज्यू का भी !
आधे सिर तक उठाया पत्थर बद्द से नीचे गिर गया। पैर बचाकर देखा उसने, सिब्बू नजर की परिधि में आ गया था। दूर से ही देख लेती है, वह बच्चों के झुंड में चला आ रहा है। उसकी शिनाख्त के लिए किसी खास चिह्न की जरूरत नहीं है श्यामा को। चार मील दूर से भी पहचान लेती है उसे।
धुकधुकी बढ़ी गई है। क्या खबर लाया है सिब्बू ? इतनी दूर से ठीक अंदाजा भी तो नहीं लग सकता। ध्यान से नजर गाड़ती है। चाल में ढिलाई है कि तेजी ? चेहरा कैसा है-खिला हुआ या मुरझाया ? हँस रहे हैं शायद सब। नहीं, खाली बात कर रहे हैं।
जैसे–जैसे सिब्बू नजदीक आ रहा था, श्यामा की धड़कन बढ़ती जा रही थी। खड़ा रहना मुश्किल होता जा रहा था। अगर बुरी खबर लाया सिब्बू तो ?...तो श्यामा यहीं गिर पड़ेगी।
‘‘इजा....आ...’’ चिल्लाता हुआ आता है सिब्बू। श्यामा अपलक उसे पढ़ती रहती है। हँस रहा है। चेहरा खिला हुआ है।
सिब्बू बिलकुल करीब आ गया है।
‘‘इजा (माँ), पास हो गया हूँ।’’
श्यामा ने जैसे सुना नहीं, अपलक उसे देखती रह गई। कुछ देर पहले की आतुरता, जो पैरों में ऐंठन पैदा कर रही थी, अब एक वेग के साथ कँपकँपी में बदल गई। इतनी बड़ी खबर सुनते ही जो झटका-सा लगता है, उसी में पगला गई थी। वह आहिस्ता-आहिस्ता उसे सीने से लगा लेती है। उसके सिर पर हाथ फेरकर माथे को चूम लेती है। बोल नहीं फूटते। धीमी-धीमी सिसकी उठती है भीतर। आँखों की कोर गीली हो जाती है। फिर चूमती है उसके माथे को।
उसी पर अंकित है, उसका और सिब्बू का भविष्य !
मन का उछाल धीरे-धीरे ठंडा होने लगता है।

‘‘अच्छे नंबर आए हैं इजा ! अपनी क्लास में तीसरा नंबर है।’’ सिब्बू का उत्साह ऊँचाई पर था। माँ के आगे सब कुछ जल्दी-जल्दी उगल देना चाहता था। जानता था-माँ को खुशी होगी।
‘‘तू पास हो गया च्यला (बेटा), इतना बहुत है। तेरे बौज्यू रात में भी बड़बड़ा रहे थे-‘सिब्बू की सुनाई होनी है कल।’ श्यामा खुशी के उन्माद को पानी की तरह बहने देना चाहती थी। इसलिए थोड़ा सँभली। बेटे को छाती से अलग किया। धीरे-धीरे दुकान की तरफ बढ़ गई।
‘‘एक चहा बनाना हो पांडे ज्यू !’’ खुद बेटे के साथ दुकान के बाहर पत्थर पर बैठ गई।
‘‘सवेरे रोटी खाकर नहीं आया ना ?’’
‘‘लड़कों ने कहा था, पहले मंदिर जाएँगे। इसलिए नहीं खाई कि मंदिर में जूठा मुँह करके नहीं जाते।’’
‘‘अच्छा ! अब भी चहा पीकर मंदिर के रास्ते ही जाना,’’ धोती के छोर पर बँधी गाँठ खोलकर उसने सिब्बू को पैसा दिया, ‘‘भेंट चढ़ा आना और कहना, मेरे बौज्यू जल्दी ठीक हो जाएँ तो फिर भेंट चढ़ाऊँगा।..तेरे बौज्यू जरा चलने-फिरने लायक हो जाएँ, एक भेली का परसाद चढ़ाना है।’’
सिब्बू हामी में सिर हिला देता है।
‘‘मंदिर से सीधा घर जाना। काफल के पेड़ों पर न चढ़ना। काफल हैं भी नहीं अब। तेरे बौज्यू की तबीयत ठीक नहीं है, उनको दो बार दवा पीसकर देनी है। अनुपान के लिए सौंफ का पानी अंदर की अलमारी में रखा है, जहाँ दही की ठेकियाँ रहती हैं। अपनी ढुलइजा (बड़ी माँ) को भी दवा खाने के लिए कह देना। पुड़िया उनके सिरहाने पर ही रखी है। ताजे पानी में देनी है।....भैंस को एक बार और पानी दिखा देना। गर्मी के दिन ठहरे जानवरों में भी प्राण होता है, घड़ी-घड़ी प्यास लग जाती है। धूप तेज हो जाए तो उन्हें अंदर बाँध देना।..पारवती के गाय-बैलों के साथ हमारे बैल भी चरने गए होंगे। मैं सवेरे कह आई थी उससे। वो ले गई होगी। तू एक चक्कर लगा लीयो। बल्कि घर लाने के लिए खुद जाना हमारा कबरा जरा फवाँ-फूँ ज्यादा करता है। रास्ते में मार न कर दे। रास्ता भी आजकल सूखकर खसखसा हो रहा है।...समझ गया ना ? अब तू जा, घाम बढ़ रहा है।’’

सिब्बू बढ़ने को हुआ, उसने फिर आवाज लगा दी, ‘‘जाते ही पहले भात खा लीयो। बनाकर रख आई हूँ। तू मत जाना चूल्हे पर। अपनी ढुलइजा से कहना, वे झोई (कढ़ी) गरम कर देंगी। रास्ते में रुकना नहीं।’’
सिब्बू चला गया। वह उसे जाता हुआ देखती रही। देवी-मंदिर यहाँ से सीधे रास्ते पर है। मंदिर के उस पार तक मोटर रोड नदी के धारा की तरह बहती दिखाई देती है।
सिब्बू एक बिंदु की तरह ठीक उसकी आँखों के सामने चल रहा था। लाल कमीज और काली पैंट में कितना खिल जाता है ! भला हो दीवानसिंह की घरवाली का-दिल्ली जाते समय दे गई थी अपने बेटे की उतरन। उसके लिए दो पुरानी धोती, एक पेटीकोट दे गई थी और शांति के लिए एक फ्रॉक। उसका एहसान कैसे भूल सकती है श्यामा ? हमारे पास क्या है उसे देने के लिए ? भट, गहत मडुवे का आटा, और क्या ? दिल्ली आते-जाते समय उसका सामान मोटर तक पहुँचा आती हूँ, इसी को बहुत मानने वाली हुई। जाते-जाते दो-चार रुपए बच्चों के हाथ पर भी रख जाती है।
इन कपड़ों ने बड़ी इज्जत रखी है। किसी खास मौके पर ही पहनता है सिब्बू इन्हें। जिस दिन पहनता है, आँखों के सामने से हटाने को मन नहीं होता।
ककड़ीखाल की तरह से धूँ-धूँ की आवाज आई है। धूल उठी है ऊपर को। अब हुआ है गाड़ी के आने का टैम।
सिब्बू आधा रास्ता पार कर गया है। श्यामा की निगाहें अभी भी उस पर जमी हुई हैं। कितना बड़ा हो गया है अब ! बच्चे के बढ़ने में टैम लगता है ! कद-काठी में बिलकुल अपने बाप पर गया है।

यहीं आकर चक्कर खा जाती है श्यामा। सिब्बू के साथ जुड़े बाप के सवाल पर। यह सवाल जब उठता है, मथनी की तरह हिला देता है अंतर के कण-कण को।
इसी सवाल पर भटकी है उसकी जिंदगी भी।
सिब्बू की उम्र हो गई है चौदह वर्ष। इतने ही साल हो गए हैं श्यामा को तीमिली आए। कभी-कभी सोचती है श्यामा-जिंदगी भी क्या चीज ठहरी ! हवा के झोंके की तरह अगर बह गई तो कहाँ आकर बिखेर देगी, क्या करवा देगी-कौन जानता है ? तीमिली की धार दूर से भी नहीं देखी थी पहले। किसी ने इशारे से ही दिशा बता दी हो, याद नहीं पड़ता। इस फाट का नाम जरूर सुना था। जगह तो मशहूर हुई-देवी मंदिर के कारण। सोचा, सपने में भी नहीं था कि किस्मत बेहोशी में लड़खड़ाती हुई यहाँ पटक देगी उसे। तीमिली श्यामा का गाँव हो जाएगा। खेती-बाड़ी के अलावा कुली-मजदूरी उसका रोजगार।
बीते दिनों पर सोचने का अवसर कम ही मिलता है उसे। तीमिली की सरहद पर जिस दिन से पाँव रखा है, उसी दिन से जिंदगी को पकड़ने की अनवरत दौड़ जारी है। कभी क्षण-भर रुकने का मौका मिलता है तो यादों की कोठरी से पुराने दिन एक-एक कर बाहर आ जाते हैं। कचोटते रहते हैं लगातार।
तीन भाइयों में अकेली बहन थी श्यामा। दो बड़े थे, एक छोटा। भाई भी ऐसे-वैसे नहीं, खूब चाहते थे उसे। खूब प्यार करते थे। सबसे ज्यादा लगाव छोटे वाले को था। ‘दीदी-दीदी’ कहता हुआ साये की तरह हर वक्त साथ रहता था। आज भी श्यामा की आँखों में उसकी छुपटन की सूरत हू-ब-हू उतरी रहती है।

बौज्यू जिंदा थे। खेती थी अच्छी-खासी। समय ठीक था। आज की तरह चाय-चीनी जैसी जरूरतें नहीं थीं। गुजर हो जाती थी। पेट भरने लायक अन्न और तन ढकने लायक लत्ता चाहिए था। इतना हो जाता था। कभी-कभी गाय-भैंसों का व्यापार कर लेते थे बौज्यू ! बड़े भाइयों को ज्यादा नहीं पढ़ा पाए थे। आठ तक का स्कूल गाँव के नजदीक था। बस, इतना ही पढ़ाया, बाद में बड़े ददा दिल्ली में नौकरी करने लगे थे। मझले फौज में चले गए थे। बौज्यू को सहारा मिल गया। सही में, भविष्य के बारे में सोचने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ था। बड़े ददा को श्यामा और छोटे भाई की चिंता थी। चिट्ठी आई थी उनकी-छोटे को पढ़ाना है। जहाँ तक पढ़ना चाहे, पढ़े। बौज्यू ने कोई कमी नहीं रखी। पर पढ़ाई उसकी किस्मत में नहीं थी। दिमाग का ज्यादा तेज नहीं था उन दिनों। अब तो सुना है, दुकान कर ली है गल्ले की। प्रधान हो गया है और वृत्ति भी करता है। अच्छी हाम चल रही है बल उसकी।
श्यामा की बहुत फिकर थी बड़े भाई को। बौज्यू को बार-बार कहते थे। चिट्ठी भी दी थी-श्यामा की शादी देख-सुनकर करना। पहले वाली बात नहीं है कि जिसके पास चार हल जमीन हो, आँख बंद करके लड़की उसे पकड़ा दो। जमाना बदल गया है। पढ़ा-लिखा लड़का ढूँढना। खर्चे की चिंता नहीं है। एक ही बहन है, उसके लिए कमी नहीं रहनी चाहिए। कल को उसे कोई तकलीफ हुई तो कोसेगी हमें। अन्न-लत्ते की टूट रही तो जिंदगी-भर हम भी दुःख मनाते रहेंगे, इसलिए जल्दी नहीं करना, देख-सुन लेना अच्छी तरह।




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