साक्षी कृष्ण और रासलीला - ओशो Sakshi Krishna Aur Raslila - Hindi book by - Osho
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साक्षी कृष्ण और रासलीला

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3544
आईएसबीएन :81-288-0491-X

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ओशो के द्वारा कृष्ण के ऊपर लिखी गई पुस्तक...

Sakhsi Krishna Aur Raslila

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मनुष्य की जो चरम सम्भावना है, वह ओशो में सम्भव हुई है। वे मनुष्य में बसी भगवत्ता के गौरीशंकर हैं। वे स्वयं भगवान हैं। ओशो श्रीजगत और जीवन को उसकी परिपूर्णता में भी स्वीकारते हैं। वे पृथ्वी और स्वर्ग, चार्वाक और बुद्ध को जोड़ने वाले पहले सेतु हैं। उनके हाथों पहली बार अखंडित धर्म का, वैज्ञानिक धर्म का, जागतिक धर्म का प्रसार हो रहा है। यही कारण है कि जीवन निषेध पर खड़े अतीत के सभी धर्म उनके विरोध में संयुक्त होकर खड़े हैं। ओशो श्री व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रथम मूल्य देते हैं। धर्म नहीं, धार्मिकता उनका मौलिक स्वर है।

उनके अब तक बोले वचनों की 500 पुस्तकें बन चुकी हैं और दुनिया की 35 से अधिक भाषाओं में अनुवादित-प्रकाशित हो रही हैं। सारी दुनिया में श्रेष्ठतम वैज्ञानिक, कलाकार और चैतन्य के खोजी ओशो द्वारा दिशा निर्देशित ‘वर्ल्ड अकादमी ऑफ क्रिएटिव साइंस, आर्टस एंड कान्शसनेस’’ में सम्मिलित हो रहे हैं और अपनी सारी ऊर्जा को सृजन में नियोजित कर रहे हैं। हंसते-गाते, उत्सव मनाते ये सृजनशील व्यक्ति ‘‘क्षण-क्षण जीने की कला’’ सीख रहे हैं और इसी दुनिया को स्वर्ग में रूपांतरित कर देने के आधार बन रहे हैं।

रास का मूल्य सदा ही रहेगा। रास का मूल्य उसके भीतर छिपे हुए गहन तत्त्वों में हैं। वह तत्त्व इतना ही है कि स्त्री और पुरुष अपने-अपने में अधूरे हैं। आधे-आधे हैं। निकट होकर वे पूरे हो जाते हैं और अगर ‘अनकंडीशनली’ निकट हों, तो अद्भुत अर्थों में पूरे हो जाते हैं। अगर ‘कंडीशंस’ के साथ, शर्तों के साथ निकट हों, तो शर्तें बाधाएं बन जाती हैं और उनकी पूर्णता पूरी नहीं हो पाती। जब तक पुरुष है पृथ्वी पर, जब तक स्त्री है पृथ्वी पर, तब तक रास बहुत-बहुत रूपों में जारी रहेगा। यह हो सकता है कि वह उतनी महत्ता और उतनी गहनता और उतनी उंचाई को पा सके, जो कृष्ण के साथ पाई जा सकी।

प्रवेश से पूर्व

रास का मूल्य सदा ही रहेगा। रास का मूल्य उसके भीतर छिपे हुए गहन तत्त्वों में हैं। वह तत्त्व इतना ही है कि स्त्री और पुरुष अपने-अपने में अधूरे हैं। आधे-आधे हैं। निकट होकर वे पूरे हो जाते हैं और अगर ‘अनकंडीशनली’ निकट हों, तो अद्भुत अर्थों में पूरे होजाते हैं। अगर ‘कंडीशंस’ के साथ, शर्तों के साथ निकट हों, तो शर्तें बाधाएं बन जाती हैं और उनकी पूर्णता पूरी नहीं हो पाती। जब तक पुरुष है पृथ्वी पर, जब तक स्त्री है पृथ्वी पर, तब तक रास बहुत-बहुत रूपों में जारी रहेगा। यह हो सकता है कि वह उतनी महत्ता और उतनी गहनता और उतनी उंचाई को पा सके, जो कृष्ण के साथ पाई जा सकी।

लेकिन अगर हम समझ सकें तो वह पाई जा सकती है। और सभी आदिम जातियों का उसका अनुभव है। दिन भर काम करने के बाद आदिम जातियाँ रात को इकट्ठी हो जाएँगी—फिर स्त्री-पुरुष, पति-पत्नी का सवाल न रहेगा, स्त्री और पुरुष ही रह जाएँगे—फिर वे नाचेंगे आधी रात, रात बीतते-बीतते, और फिर सो जाएँगे, वृक्षों के तले, या अपने झोपड़ों में नाचते-नाचते थकेंगे, और सो जाएँगे। और इसलिए आदिवासी के मन में जैसी शांति है, और आदिवासी के मन में जैसी प्रफुल्लता है, और आदिवासी की दीनता में, हीनता में भी जैसी गरिमा है, वह सभ्य से सभ्य आदमी भी सारी सुविधा के बाद उपलब्ध नहीं कर पा रहा है। कहीं चूक हो रही है, कहीं कोई बहुत गहरे सत्य को नहीं समझा जा रहा है।

ओशो

ओशो परम कल्याणमित्र हैं, अस्तित्व का माधुर्य है।
उनकी करुणा का सहारा पाकर मानवता धन्य हुई है।

ओशो जिनका न कभी जन्म हुआ न कभी मृत्यु। जो इस पृथ्वी ग्रह पर 11 दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 केवल एक आगंतुक रहे।

प्रस्तुत प्रवचन सम्मुख-उपस्थित श्रोताओं के प्रति ओशो के सहज प्रतिसंवेदन हैं, जिनका मूल्य शाश्वत व संबंध मानव-मानव से है।<

पहला प्रवचन


जीवन के बृहद् जोड़ के प्रतीक कृष्ण
श्रीकृष्ण के गर्भाधान व जन्म की विशेषताओं व रहस्यों पर सविस्तार प्रकाश डालने की कृपा करें। और क्राइस्ट की जन्म-स्थितियों से साम्य हो तो उसे भी स्पष्ट करें।

कृष्ण का जन्म हो, या किसी और का जन्म, हो जन्म की स्थिति में बहुत भेद नहीं है। इसे थोड़ा समझना जरूरी है। लेकिन सदा से हम भेद देखते आए हैं। वह कुछ प्रतीकों को न समझने के कारण।

कृष्ण का जन्म होता है अँधेरी रात में, आमावस में। सभी का जन्म अँधेरी रात में होता है और अमावश में होता है। जन्म तो अँधेरे में ही होता है। असल में जगत् में कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती, सब कुछ जन्म अँधेरे में ही होता है। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अँधेरे में जन्मता है। फूल खिलते हैं प्रकाश में, जन्म अँधेरे में होता है।

असल में जन्म की प्रक्रिया इतनी रहस्यपूर्ण है कि अँधेरे में ही हो सकती है। आपके भीतर भी जिन चीजों का जन्म होता है, वह सब गहरे अंधकार में, गहन अंधकार में होती हैं। एक कविता जन्मती है। बहुत ‘अनकांसॅस डार्कनेस’ में पैदा होती है। एक चित्र का जन्म होता है, तो मन की बहुत अतल गहराइयों में, जहाँ कोई रोशनी नहीं पहुँचती जगत् की, वहाँ होता है। समाधि का जन्म होता है, ध्यान का जन्म होता है, तो सब गहन अंधकार में, गहन अंधकार से अर्थ है, जहाँ बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुँचता। जहाँ सोच समझ में कुछ भी नहीं आता, हाथ को हाथ नहीं सूझता है। कृष्ण का जन्म  जिस रात में हुआ, कहानी कहती है कि हाथ को हाथ नहीं सूझता था, इतना गहन अंधकार था। लेकिन कब कोई चीज जन्मती है, जो अन्धकार में न जन्मती हो  ? इसमें विशेषता खोजने की जरूरत नहीं है। यह जन्म की सामान्य प्रक्रिया है।

दूसरी बात कृष्ण के जन्म के साथ जुड़ी है-बंधन में जन्म होता है कारागृह में। किसका जन्म है, जो बंधन और कारागृह में नहीं होता है ? हम सभी कारागृह में जन्मते हैं। हो सकता है कि मरते वक्त हम कारागृह से मुक्त हो जाएँ, जरूरी नहीं है। हो सकता है हम मरे भी कारागृह में। जन्म एक बंधन में लाता है, सीमा में लाता है। शरीर में आना ही बड़े बंधन में आ जाना है। बड़े कारागृह में आ जाना है। जब कोई आत्मा जन्म लेती है तो कारागृह में ही जन्म लेती है।
लेकिन इस बात को ठीक से नहीं समझा गया। इस बहुत काव्यात्मक बात को, ऐतिहासिक घटना समझकर बड़ी भूल हो गई। सभी जन्म कारागृह में होते हैं, सभी मृत्युएँ कारागृह में नहीं होती हैं। कुछ मृत्युएँ मुक्ति में होती हैं। जन्म तो बंधन में होगा, मरते क्षण तक अगर हम बंधन से छूट जाएँ, टूट जाएँ सारे कारागृह, तो जीवन की यात्रा सफल हो गई।

कृष्ण के जन्म के साथ एक और तीसरी बात जुड़ी है वह यह है कि जन्म के साथ ही उनके मरने का डर है। उन्हें मारे जाने की धमकी है। किसको नहीं है ? जन्म के साथ ही मरने का घटना संभव हो जाती है। जन्म के बाद-एक पल बाद भी मृत्यु घटित हो सकती है। जन्म के बाद प्रतिपल मृत्यु संभावी है। किसी भी क्षण मृत्यु घट सकती है। मौत के लिए एक ही शर्त है जरूरी है, वह जन्म है; और कोई शर्त जरूरी नहीं है। जन्म के बाद एक पल जिआ हुआ बालक भी मरने के लिए उतना ही योग्य हो जाता है जितना सत्तर साल जिया हुआ आदमी होता है। मरने के लिए और कोई योग्यता नहीं होनी चाहिए, जन्म-भर चाहिए। कृष्ण के जन्म के साथ वही है। जन्म के बाद हम मरने के अतिरिक्त और करते ही क्या हैं ? जन्म के बाद हम रोज-रोज मरते ही तो हैं। जिसे हम जीवन कहते हैं। वह मरने की लंबी यात्रा ही तो है, जन्म से शुरू होती है, मौत पर पूरी हो जाती है।

लेकिन कृष्ण के जन्म के साथ एक चौथी बात भी जुड़ी है कि मरने की बहुत ही घटनाएँ आती हैं, लेकिन वे सबसे बचकर निकल जाते हैं। जो भी उन्हें मारने आता है, वही मर जाता है। कहें कि मौत ही उनके लिए मर जाती है। मौत सब उपाय करती है और बेकार हो जाती है। इसका भी बड़ा मतलब है। हमारे साथ ऐसा नहीं होता। मौत पहले ही हमले में हमें ले जाएगी। हम पहले पहले हमले से ही नहीं बच पाएँगे। क्योंकि सच तो यह है कि हम करीब-करीब मरे हुए लोग हैं, जरा-सा धक्का और मर जाएँगे। जिंदगी का हमें कोई पता भी तो नहीं है। उस जीवन का हमें कोई पता नहीं है, जिसके दरवाजे पर मौत सदा हार जाती है।

कृष्ण ऐसी जिन्दगी है, जिस दरवाजे पर मौत बहुत रूपों में आती है और हारकर लौट जाती है। बहुत रूपों में। वे सब रूपों की कथाएँ हमें पता हैं कि कितने रूपों में घेरती हैं और हार जाती हैं। लेकिन कभी हमें खयाल नहीं आया कि इन कथाओं को हम गहरे समझने की कोशिश करें। सत्य सिर्फ उन कथाओं में एक है, और वह यह है कि कृष्ण जीवन की तरफ रोज जीतते चले जाते हैं और मौत रोज हारती चली जाती है। मौत की धमकी एक दिन समाप्त हो जाती है। जिन-जिन ने चाहा है जिस-जिस ढंग से चाहा है कृष्ण मर जाएँ, वह-वह ढँग असफल हो जाते हैं और कृष्ण जिए ही चले जाते हैं। इसका मतलब है मौत पर जीवन की जीत। लेकिन ये बातें इतनी सीधी, जैसा मैं कह रहा हूँ, कही नहीं गई हैं। इतने सीधे कहने का पुराने आदमी के पास उपाय नहीं था। इसे भी थोड़ी समझ लेना जरूरी है।

जितना पुरानी दुनिया में हम वापस लौटेंगे, उतना ही चिंतन का जो ढंग है वह ‘पिक्टोरियल’ होता है, चित्रात्मक होता है, शब्दात्मक नहीं होता। अभी भी रात आप सपना देखते हैं, कभी आपने खयाल किया कि सपनों में शब्दों का उपयोग करते हैं कि चित्रों का ? सपने में शब्दों का उपयोग नहीं होता है। क्योंकि सपने हमारी आदिम भाषा हैं, ‘प्रिमिटिव लेंग्वेज’ हैं। सपने के मामले में हममें और आज से दस हजार साल पहले के आदमी में कोई फर्क नहीं पड़ा। सपने अभी भी पुराने हैं, ‘प्रिमिटिव’ हैं। अभी भी सपना आधुनिक नहीं हो पाया। अभी भी कोई आदमी आधुनिक सपना नहीं देखता है। अभी भी तो सपने वही हैं, जो दस हजार साल, दस लाख साल पुराने थे।
 


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