धर्म का परम विज्ञान महावीर वाणी - ओशो Dharm ka Param Vigyan Mahavir Vani - Hindi book by - Osho
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धर्म का परम विज्ञान महावीर वाणी

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :296
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3552
आईएसबीएन :81-7182-860-4

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महावीर वाणी पर ओशो द्वारा दिये गये कुल 54 प्रवचनों में से प्रवचन 1 से 30 का संकलन

Darma Ke Param Vigyan Osho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ओशो विश्व का चिंतन बदल सकते हैं। मुझे पता है, कुछ लोग उन पर यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने नया क्या दिया ? बुद्ध, महावीर, नानक, मीरा इनके वचनों पर ही बोले हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। क्योंकि ओशो ने इन सूत्रों को वैसा का वैसा नहीं रखा है, उनका सार निचोड़ लिया है। कई दफा ऐसा लगता है कि इन वचनों की ओशो ने जो व्याख्या की है, वैसा उन लोगों ने भी नहीं सोचा होगा। और यह केवल बौद्धिक विश्लेषण नहीं है, यह उनके व्यक्तिगत अनुभव से निकली हुई बात है। ओशो के पास गहरी अनुभूति है और साथ-साथ अभिव्यक्ति की अपूर्व क्षमता भी।

-पंडित शिवकुमार शर्मा,
सुप्रसिद्ध संतूर वादक

प्रस्तावना


जैन धर्म की गिनती यद्यपि भारत के प्रमुख धर्मों में होती है तथापि इसको मानने वालों की संख्या उतनी नहीं है जितनी कि हिंदुओं तथा बौद्धों की है-और यह प्राचीनतम धर्म है।
इसका क्या कारण हो सकता है ? क्या इसमें कोई कमी है ? अथवा यह इतना ऊंचा है कि सामान्य व्यक्ति इसे नहीं समझ पाते ?
महावीर और बुद्ध समसामयिक थे। महावीर एक धारा के अंतिम शिखर थे, एक शीर्ष पुरुष थे। उसी समय बुद्ध एक नयी धारा के शुभारंभ थे। यह धारा कालांतर में एक महासागर बन गयी। वैसा विराट स्वरूप महावीर की धारा को क्यों उपलब्ध न हो सका ?

ये सर्वथा भिन्न स्थितियां निश्चित ही विचारणीय हैं।
सत्य की जो अनुभूति बुद्ध को हुई वही अनुभूति महावीर को भी हुई। लेकिन महावीर उतने प्रभावशाली न हो सके। उसका एक कारण जो समझ में आता है वह है सत्य की अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति की अपील। अभिव्यक्ति को आत्मसात करने में युग की पात्रता।

ऐसा प्रतीत होता है कि महावीर को समझने में उस समय तो पात्रता बहुत कम थी ही, इधर पच्चीस सौ वर्षों के दौरान भी पात्रता में कोई विशेष अंतर नहीं आया।
लेकिन आज एक परम सौभाग्य की घटना घटी है: महावीर की वाणी को ओशो की अभिव्यक्ति मिली है। इसलिए सत्य की जो अभिव्यक्ति कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित थी, आज वह ओशो के परम सशक्त माध्यम से जन-जन तक पहुंचने लगी है और आने वाले निकट भविष्य में यह वाणी जन जन तक पहुंचेगी। जो कार्य हजारों जैन मुनि मिलकर नहीं कर सके वह अकेले ओशो के माध्यम से पूरी जीवंतता के साथ हो रहा है। महावीर की वाणी को ओशो ने आज के युग की भाषा दी है और लोकप्रिय बनाया है। ऐसा लोकमंगल, ऐसे विराट पैमाने पर लोकमंगल पहले कभी घटित नहीं हुआ है। जिन हजारों-लाखों लोगों को महावीर वाणी के मर्म का बिलकुल पता नहीं था, वे लोग ओशो के चुंबकीय क्षेत्र में आने के बाद आज महावीर के प्रेम में पड़ गए हैं। और जैसे-जैसे ओशो के प्रेमियों की संख्या लाखों-करोड़ों में बढ़ रही है वैसे-वैसे महावीर भी उनके लिए प्रिय होते जा रहे हैं।

सत्य का एक और पहलू यह है कि जो जैनी लोग महावीर-वाणी के माध्यम से ओशो के करीब आए वे और भी समृद्ध हुए। वे आज अपने दायरे से बाहर निकल कर ओशो के माध्यम से कृष्ण, बुद्ध, नानक, दादू, मीरा, रैदास, गोरख, पतंजलि, तंत्र, सूफी, ताओ, हसीद, झेन-आदि सत्य की सभी अनूठी सरणियों से न केवल परिचित हुए हैं; बल्कि उनमें निमज्जित हुए हैं और सत्य के खुले आकाश में पंख फैला कर विचरण कर रहे हैं।
ओशो के इस विराट आकाश में, जहां आज तक हुए सभी संबुद्ध अपनी पूरी जीवंतता में जगमगा रहे हैं, आप भी उड़ने के लिए आमंत्रित हैं।

स्वामी चैतन्य कीर्ति
संपादक: ओशो टाइम्स इंटरनेशनल

पंच-मनोकार-सूत्र

नमो अरिहंताणं।
नमो सिद्धाणं।
नमो आयरियाणं।
नमो उवज्झायाणं।
  नमो लोए सव्वसाहूणं।

एसो पंच नमुक्कारो सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं न सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं।।

अरिहंतों (अर्हतों) को नमस्कार। सिद्धों को नमस्कार। आचार्यों को नमस्कार। उपाध्यायों को नमस्कार। लोक संसार में सर्व साधुओं को नमस्कार। ये पांच नमस्कार सर्व पापों के नाशक हैं और सर्व मंगलों में प्रथम मंगल रूप हैं।

जैसे सुबह सूरज निकले और कोई पक्षी आकाश में उड़ने के पहले अपने घोंसले के पास परों को तौले, सोचे, साहस जुटाये, या जैसे कोई नदी सागर में गिरने के करीब हो, स्वयं को खोने के निकट, पीछे लौटकर देखे, सोचे क्षण भर, ऐसा ही महावीर की वाणी में प्रवेश के पहले दो क्षण सोच लेना जरूरी है।

जैसे पर्वतों में हिमालय है या शिखरों में गौरीशंकर, वैसे ही व्यक्तियों में महावीर है। बड़ी है चढ़ाई। जमीन पर खड़े होकर भी गौरीशंकर के हिमाच्छादित शिखर को देखा जा सकता है। लेकिन जिन्हें चढ़ाई करनी हो और शिखर पर पहुंचकर ही शिखर को देखना हो, उन्हें बड़ी तैयारी की जरूरत है। दूर से भी देख सकते हैं महावीर को, लेकिन दूर से जो परिचय होता है वह वास्तविक परिचय नहीं है। महावीर में तो छलांग लगाकर ही वास्तविक परिचय पाया जा सकता है। उस छलांग के पहले जो जरूरी है वे कुछ बातें आपसे कहूं।

बहुत बार ऐसा होता है कि हमारे हाथ में निष्पत्तियां रह जाती हैं, कन्क्लूजंस रह जाते हैं-प्रक्रियाएं खो जाती हैं। मंजिल रह जाती है, रास्ते खो जाते हैं। शिखर तो दिखाई पड़ता है लेकिन वह पगदंडी दिखाई नहीं पड़ती जो वहां तक पहुंचा दे। ऐसा ही यह नमोकार मंत्र भी है। यह निष्पत्ति है। इसे पच्चीस सौ वर्ष से लोग दोहराते चले आ रहे हैं। यह शिखर है, लेकिन पगदंडी जो इस नमोकार मंत्र तक पहुंचा दे, वह न मालूम कब की खो गयी है।
इसके पहले कि हम मंत्र पर बात करें, उस पगदंडी पर थोड़ा-सा मार्ग साफ कर लेना उचित होगा। क्योंकि जब तक प्रक्रिया न दिखाई पड़े तब तक निष्पत्तियां व्यर्थ हैं।

और जब तक मार्ग न दिखाई पड़े, तब तक मंजिल बेबूझ होती है। और जब तक सीढ़ियां न दिखाई पडें, तब तक दूर दिखते हुए शिखरों का कोई भी मूल्य नहीं-वे स्वप्नवत हो जाते हैं। वे हैं भी या नहीं। इसका भी निर्णय नहीं किया जा सकता। कुछ दो-चार मार्गों से नमोकार के रास्ते को समझ लें।

1937 में तिब्बत और चीन के बीच बोकान पर्वत की एक गुफा में सात सौ सोलह पत्थर के रिकार्ड मिले हैं-पत्थर के। और वे रिकार्ड हैं महावीर से दस हजार साल पुराने यानी आज से कोई साढ़े बारह हजार साल पुराने। बड़े आश्चर्य के हैं, क्योंकि वे रिकार्ड ठीक वैसे ही हैं जैसे ग्रामोफोन का रिकार्ड पर होते हैं। अब तक राज नहीं खोला जा सका है कि वे किस यंत्र पर बजाये जा सकेंगे। लेकिन एक बात तय हो गयी है-रूस के एक बड़े वैज्ञानिक डा. सर्जिएव ने वर्षों तक मेहनत करके यह प्रमाणित किया है कि वे हैं तो रिकार्ड ही। किस यंत्र पर और किस सुई के माध्यम से वे पुनरुज्जीवित हो सकेंगे, यह अभी तय नहीं हो सका। अगर एकाध पत्थर का टुकड़ा होता तो संयोगिक भी हो सकता था। सात सौ सोलह हैं। सब एक जैसे जिनमें बीच में छेद हैं। सब पर ग्रूव्ज हैं और उनकी पूरी तरह सफाई धूल-धवांस जब अलग कर दी गयी और जब विद्युत यंत्रों से उनकी परीक्षा की गई तब बड़ी हैरानी हुई, उनसे प्रतिपल विद्युत की किरणें विकीर्णित हो रही हैं। लेकिन क्या आदमी के पास आज से बाहर हजार साल पहले ऐसी कोई व्यवस्था थी कि वह पत्थरों में कुछ रिकार्ड कर सके ? तब तो हमें सारा इतिहास और ढंग से लिखना पड़ेगा।

जापान के एक पर्वत शिखर पर पच्चीस हजार वर्ष पुरानी मूर्तियों का एक समूह है। वे मूर्तियां ‘डोबू’ कहलाती हैं। उन मूर्तियों ने बहुत हैरानी खड़ी कर दी, क्योंकि अब तक उन मूर्तियों को समझना संभव नहीं था-लेकिन अब संभव हुआ। जिस दिन हमारे यात्री अंतरिक्ष में गये उसी दिन डोबू मूर्तियों का रहस्य खुल गया; क्योंकि डोबू मूर्तियां उसी तरह के वस्त्र पहने हुए हैं जैसे अंतरिक्ष का यात्री पहनता है। अंतरिक्ष में यात्रियों ने, रूसी या अमरीकी एस्ट्रोनाट्स ने जिन वस्त्रों का उपयोग किया है, वे ही उन मूर्तियों के ऊपर हैं, पत्थर में खुदे हुए। वे मूर्तियां पच्चीस हजार साल पुरानी हैं। और अब इसके सिवाय कोई उपाय नहीं है मानने का कि पच्चीस हजार साल पहले आदमी ने अंतरिक्ष की यात्रा की है या अंतरिक्ष के किन्हीं और ग्रहों से आदमी जमीन पर आता रहा है।

आदमी जो आज जानता है, वह पहली बार जान रहा है, ऐसी भूल में पड़ने का अब कोई कारण नहीं है। आदमी बहुत बार जान लेता है और भूल जाता है। बहुत बार शिखर छू लिये गये हैं और खो गये हैं। सभ्यताएं उठती हैं और आकाश को छूती हैं लहरों की तरह और विलीन हो जाती हैं। जब भी कोई लहर आकाश को छूती है तो सोचती हैं उसके पहले किसी और लहर ने आकाश को नहीं छुआ होगा।

महावीर एक बहुत बड़ी संस्कृति के अंतिम व्यक्ति हैं, जिस संस्कृति का विस्तार कम से कम दस लाख वर्ष हैं। महावीर जैन विचार और परंपरा के अंतिम तीर्थकर हैं-चौबीसवें। शिखर की, लहर की आखिरी ऊंचाई। और महावीर के बाद वह लहर और वह सभ्यता और वह संस्कृति सब बिखर गई। आज उन सूत्रों को समझना इसीलिए कठिन हैं क्योंकि वह पूरा का पूरा ‘मिल्यू’ वह वातावरण जिसमें वे सूत्र सार्थक थे, आज कहीं भी नहीं है।
ऐसा समझें कि कल तीसरा महायुद्ध हो जाए, सारी सभ्यता बिखर जाए, फिर भी लोगों के पास याददाश्त रह जाएगी कि लोग हवाई जहाज में उड़ते थे। हवाई जहाज तो बिखर जाएंगे, याददाश्त रह जाएगी। वह याददाश्त हजारों साल तक चलेगी और बच्चे हंसेगे, वे कहेंगे कि कहां है हवाई जहाज, जिनकी तुम बात करते हो ? ऐसा मालूम होता है कहानियां हैं, पुराण-कथाएं हैं, ‘मिथ’ हैं।

जैन चौबीस तीर्थंकरों की ऊंचाई-शरीर की ऊंचाई- बहुत काल्पनिक मालूम पड़ती है। उनमें महावीर भर की ऊंचाई आदमी की ऊंचाई है, बाकी तेईस तीर्थंकर बहुत ऊंचे हैं। इतनी ऊंचाई नहीं हो सकती, ऐसा ही वैज्ञानिकों का अब तक का खयाल था, लेकिन अब नहीं है। क्योंकि वैज्ञानिक कहते हैं जैसे-जैसे जमीन सिकुड़ती गई है, वैसे-वैसे जमीन पर ग्रेवीटेशन, गुरुत्वाकर्षण भारी होता गया है। और जिस मात्रा में गुरुत्वाकर्षण भारी होता है, लोगों की ऊंचाई कम होती चली जाती है। आपकी दीवाल की छत पर छिपकली चलती है। आप कभी सोच नहीं सकते कि छिपकली आज से दस लाख साल पहले हाथी से बड़ा जानवर थी। वह अकेली बची है, उसकी जाति के सारे जानवर खो गये।
उतने बड़े जानवर अचानक क्यों खो गये ? अब वैज्ञानिक कहते हैं कि जमीन के गुरुत्वाकर्षण में कोई राज छिपा हुआ मालूम पड़ता है। अगर गुरुत्वाकर्षण और सघन होता गया तो आदमी और छोटा होता चला जाएगा। अगर आदमी चांद पर रहने लगे तो आदमी की ऊंचाई चौगुनी हो जाएगी, क्योंकि चांद पर चौगुना कम है गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से। अगर हमने कोई और तारे और ग्रह खोज लिये जहां गुरुत्वाकर्षण और कम हो तो ऊंचाई और बड़ी हो जाएगी। इसलिए आज एकदम कथा कह देनी बहुत कठिन है।

नमोकार को जैन परंपरा ने महामंत्र कहा है। पृथ्वी पर दस-पांच ऐसे मंत्र हैं जो नमोकार के हैसियत के हैं। असल में प्रत्येक धर्म के पास एक महामंत्र अनिवार्य है, क्योंकि उसके इर्द-गिर्द ही उसकी सारी व्यवस्था, सारा भवन निर्मित होता है।
ये महामंत्र करते क्या हैं इनका प्रयोजन क्या है, इनसे क्या फलित हो सकता है ? आज साउंड-इलेक्ट्रानिक्स, ध्वनि-विज्ञान बहुत से नये तथ्यों के करीब पहुंच रहा है। उसमें एक तथ्य यह है कि इस जगत में पैदा की गई कोई भी ध्वनि कभी भी नष्ट नहीं होती-इस अनंत आकाश में संगृहीत होती चली जाती है। ऐसा समझें कि जैसे आकाश भी रिकार्ड करता है, आकाश पर भी किसी सूक्ष्म तल पर ग्रूव्ज बन जाते हैं। इस पर रूस में इधर पंद्रह वर्षों में बहुत काम हुआ है। उस काम पर दो-तीन बातें खयाल में ले लेंगे तो आसानी हो जाएगी।

अगर एक सदभाव से भरा हुआ व्यक्ति, मंगल-कामना से भरा हुआ व्यक्ति आंख बंद करके अपने हाथ में जल से भरी हुई एक मटकी ले ले और कुछ क्षण सदभावों से भरा हुआ उस जल की मटकी को हाथ में लिए रहे-तो रूसी वैज्ञानिक कामेनिएव और अमरीकी वैज्ञानिक डा. रूडोल्फ किर, इन दो व्यक्तियों ने बहुत से प्रयोग करके यह प्रमाणित किया है कि वह जल गुणात्मक रूप से परिवर्तित हो जाता है। केमिकली कोई फर्क नहीं होता। उस भली भावनाओं से भरे हुए, मंगल-आकांक्षाओं से भरे हुए व्यक्ति के हाथ में जल का स्पर्श जल में कोई केमिकल, कोई रासायनिक परिवर्तन नहीं करता, लेकिन उस जल में फिर भी कोई गुणात्मक परिवर्तन हो जाता है। और वह जल अगर बीजों पर छिड़का जाए तो वे जल्दी अंकुरित होते हैं, साधारण जल की बजाय। उनमें बड़े फूल आते हैं, बड़े फल लगते हैं। वे पौधे ज्यादा स्वस्थ होते हैं, साधारण जल की बजाय।

कामेनिएव ने साधारण जल भी उन्हीं बीजों पर वैसी ही भूमि में छिड़का है और यह विशेष जल भी। और रुग्ण, विक्षिप्त, निगेटिव-इमोशंस से भरे हुए व्यक्ति, निषेधात्मक-भाव से भरे हुए व्यक्ति, हत्या का विचार करनेवाले, दूसरे को नुकसान पहुंचाने का विचार करनेवाले, अमंगल की भावनाओं से भरे हुए व्यक्ति के हाथ में दिया गया जल भी बीजों पर छिड़का है-या तो वे बीज अंकुरित ही नहीं होते, या अंकुरित होते हैं तो रुग्ण अंकुरित होते हैं।
पंद्रह वर्ष हजारों प्रयोगों के बाद यह निष्पति ली जा सकी कि जल में अब तक हम सोचते थे ‘केमिस्ट्री’ ही सब कुछ है, लेकिन ‘केमिकली’ तो कोई फर्क नहीं होता, रासायनिक रूप से तीनों जलों में कोई फर्क नहीं होता, फिर भी कोई फर्क होता है, वह फर्क क्या है ? और वह फर्क जल में कहां से प्रवेश करता है ? निश्चित ही वह फर्क, अब तक जो भी हमारे पास उपकरण है, उनसे नहीं जांचा जा सकता। लेकिन वह फर्क होता है, यह परिणाम से सिद्ध होता है।

क्योंकि तीनों जलों का आत्मिक रूप बदल जाता है। ‘केमिकल’ रूप तो नहीं बदलता, लेकिन तीनों जलों की आत्मा में कुछ रूपांतरण हो जाता है।
अगर जल में यह रूपांतरण हो सकता है तो हमारे चारों ओर फैले हुए आकाश में भी हो सकता है। मंत्र की प्राथमिक आधारशिला यही है। मंगल भावनाओं से भरा हुआ मंत्र, हमारे चारों ओर के आकाश में गुणात्मक अंतर पैदा करता है। क्वालिटेटिव ट्रांसफार्मेशन करता है। और उस मंत्र से भरा हुआ व्यक्ति जब आपके पास से भी गुजरता है, तब भी वह अलग तरह के आकाश से गुजरता है। उसके चारों तरफ शरीर के आसपास एक भिन्न तरह का आकाश, ‘ए डिफरेंट क्वालिटी ऑफ स्पेस’ पैदा हो जाती है।

एक दूसरे रूसी वैज्ञानिक किरलियान ने ‘हाई फ्रिक्वेंसी फोटोग्राफी’ विकसित की है। वह शायद आने वाले भविष्य में सबसे अनूठा प्रयोग सिद्ध होगा। अगर मेरे हाथ का चित्र लिया जाए, ‘हाई फ्रिक्वेंसी फोटोग्राफी’ से जो कि बहुत संवेदनशील प्लेट्स पर होती है, तो मेरे हाथ का ही चित्र सिर्फ नहीं आता, मेरे हाथ के आसपास जो किरणें मेरे हाथ से निकल रही हैं, उनका चित्र भी आता है और आर्श्चय की बात तो यह है कि अगर मैं निषेधात्मक विचारों से भरा हुआ हूं तो मेरे हाथ के आसपास जो विद्युत पैटर्न जो विद्युत के जाल का चित्र आता है, वह रुग्ण बीमार, अस्वस्थ और ‘केआटिक’, अराजक होता है-विक्षिप्त होता है जैसे किसी पागल आदमी ने लकीरें खींची हों। अगर मैं शुभ भावनाओं से मंगल-भावनाओं से भरा हुआ हूं। आनंदित हूं ‘पाजिटिव’ हूं, प्रफुल्लित हूं प्रभु के प्रति अनुग्रह से भरा हुआ हूं, तो मेरे हाथ के आसपास जो किरणों का चित्र आता है, किरलियान की फोटोग्राफी से, वह ‘रिदमिक, लयबद्ध, सुंदरतम, ‘सिमिट्रिकल’, सानुपातिक और एक और ही व्यवस्था में निर्मित होता है।

किरलियान का कहना है-और किरलियान का प्रयोग तीस वर्षों की मेहनत है-किरलियान का कहना है कि बीमारी के आने के छह महीने पहले शीघ्र ही हम बताने में समर्थ हो जायेंगे कि यह आदमी बीमार होने वाला है। क्योंकि इसके पहले कि शरीर पर बीमारी उतरे, वह जो विद्युत का वर्तुल है उस पर बीमारी उतर जाती है। मरने के पहले, इसके पहले कि आदमी मरे, वह विद्युत का वर्तुल सिकुड़ना शुरू हो जाता है और मरना शुरू हो जाता है। इसके पहले कि कोई आदमी हत्या करे किसी की, वह विद्युत के वर्तुल में हत्या के लक्षण शुरू हो जाते हैं।
इसके पहले कि कोई आदमी किसी के प्रति करुणा से भरे, उस विद्युत के वर्तुल में करुणा प्रवाहित होने के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं।

किरलियान का कहना है कि कैंसर पर हम तभी विजय पा सकेंगे जब शरीर को पकड़ने के पहले हम कैंसर को पकड़ लें। और यह पकड़ा जा सकेगा। इसमें कोई विधि की भूल अब नहीं रह गयी है। सिर्फ प्रयोगों के और फैलाव की जरूरत हैं। प्रत्येक मनुष्य अपने आसपास एक आभामंडल लेकर, एक ऑरा लेकर चलता है। आप अकेले ही नहीं चलते, आपके आसपास एक विद्युत वर्तुल एक इलेक्ट्रो-डायनेमिक-फील्ड प्रत्येक व्यक्ति के आसपास चलता है। व्यक्ति के आसपास ही नहीं, पशुओं के आसपास भी, पौधों के आसपास भी। असल में रूसी वैज्ञानिकों का कहना है कि जीव और अजीव में एक ही फर्क किया जा सकता है, जिसके आसपास आभामंडल है वह जीवित है और जिसके पास आभामंडल नहीं है, वह मृत है।

जब आदमी मरता है तो मरने के साथ ही आभामंडल क्षीण होना शुरू हो जाता है। बहुत संयोग की बात है कि जब भी कोई आदमी मरता है तो तीन दिन लगते हैं उसके आभामंडल के विसर्जित होने में। हजारों साल से सारी दुनिया में मरने के बाद तीसरे दिन का बड़ा मूल्य रहा है। जिन लोगों ने उस तीसरे दिन को-तीसरे को इतना मूल्य दिया था, उन्हें किसी न किसी तरह इस बात का अनुभव होना ही चाहिए, क्योंकि वास्तविक मृत्यु तीसरे दिन घटित होती है। इन तीन दिनों के बीच, किसी भी दिन वैज्ञानिक उपाय खोज लेंगे, तो आदमी को पुनरुज्जीवित किया जा सकता है। जब तक आभामंडल चारों तरफ है, तब तक व्यक्ति सूक्ष्म तल पर अभी भी जीवन में वापस लौट सकता है। अभी सेतु कायम है। अभी रास्ता बना है वापस लौटने का।

जो व्यक्ति जितना जीवंत होता है, उसके आसपास उतना बड़ा आभामंडल होता है। हम महावीर की मूर्ति के आसपास अगर एक आभामंडल निर्मित करते हैं-या कृष्ण, या राम, या क्राइस्ट के आसपास-तो वह सिर्फ कल्पना नहीं है। वह आभामंडल देखा जा सकता है। और अब तक तो केवल वे ही देख सकते थे जिनके पास थोड़ी गहरी और सूक्ष्म-दृष्टि हो-मिस्टिक्स, संत लेकिन 1930 में एक अंग्रेज वैज्ञानिक ने अब तो केमिकल, रासायनिक प्रक्रिया निर्मित कर दी है जिससे प्रत्येक व्यक्ति कोई भी उस माध्यम से, उस यंत्र के माध्यम से दूसरे के आभामंडल को देख सकता है।
आप सब यहां बैठे हैं। प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी आभामंडल है। जैसे आपके अंगूठे की छाप निजी-निजी है वैसे ही आपका आभामंडल भी निजी है। और आपका आभामंडल आपके संबंध में वह सब कुछ कहता है जो आप भी नहीं जानते। आपका आभामंडल आपके संबंध में वह बातें भी कहते हैं जो भविष्य में घटित होंगी। आपका आभामंडल वे बातें भी कहता है जो अभी आपके गहन अचेतन में निर्मित हो रही हैं, बीज की भांति कल खिलेंगी और प्रकट होंगी।

मंत्र आभामंडल को बदलने की आमूल प्रक्रिया है। आपके आसपास की स्पेस और आसपास का ‘इलेक्ट्रो-डायनेमिक-फील्ड’ बदलने की प्रक्रिया है। और प्रत्येक धर्म के पास एक महामंत्र है। जैन परंपरा के पास नमोकार है-आश्चर्यजनक घोषणा-ऐसा पंच नमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो। सब पाप का नाश कर दें, ऐसा महामंत्र है नमोकार। ठीक नहीं लगता। नमोकार से कैसे पाप नष्ट हो जाएगा ? नमोकार से सीधा पाप नष्ट नहीं होता, लेकिन नमोकार से आपके आसपास का ‘इलेक्ट्रो- डायनेमिक-फील्ड’ रूपांतरित होता है और पाप करना असंभव हो जाता है। क्योंकि पाप करने के लिए आपके पास एक खास तरह का आभामंडल चाहिए। अगर इस मंत्र को सीधा ही सुनेंगे तो लगेगा कैसे हो सकता है ? कैसे पाप नष्ट हो जाएगा ? पाप नष्ट होगा ? एक हत्यारा यह मंत्र पढ़ लेगा तो क्या होगा ? कैसे पाप नष्ट हो जाएगा ? पाप नष्ट होता है इसलिए, कि आप पाप करते हैं, उसके पहले आपके पास एक विशेष तरह का, पाप का आभामंडल चाहिए-उसके बिना आप पाप नहीं कर सकते-वह आभामंडल अगर रूपांतरित हो जाए तो असंभव हो जाएगी बात, पाप करना असंभव हो जाएगा।

यह नमोकार कैसे उस आभामंडल को बदलता होगा ? यह नमस्कार है, यह नमन का भाव है। नमन का अर्थ है समर्पण। यह शाब्दिक नहीं है। यह नमो अरिहंताणं, यह अरिहंतो को नमस्कार करता हूं, यह शाब्दिक नहीं है ये शब्द नहीं है, यह भाव है। अगर प्राणों में यह भाव सघन हो जाए कि अरिहंतो को नमस्कार करता हूं, तो इसका अर्थ क्या होता है ? इसका अर्थ होता है, जो जानते हैं उनके चरणों में सिर रखता हूं। जो पहुंच गए हैं, उनके चरणों में समर्पित करता हूं। जो पा गए हैं, उनके द्वार पर मैं भिखारी बनकर खड़ा होने को तैयार हूं।
किरलियान की फोटोग्राफी ने यह भी बताने की कोशिश की है कि आपके भीतर जब भाव बदलते हैं तो आपके आसपास का विद्युत-मंडल बदलता है। और अब तो ये फोटोग्राफ उपलब्ध हैं। अगर आप अपने भीतर विचार कर रहे हैं चोरी करने का, तो आपका आभामंडल और तरह का हो जाता है-उदास, रुग्ण, खूनी रंगों से भर जाता है। आप किसी को, गिर गये को उठाने जा रहे हैं-आपके आभामंडल के रंग तत्काल बदल जाते हैं।




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