भगति भजन हरिनाम - ओशो Bhagati Bhajan Hari Nam - Hindi book by - Osho
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भगति भजन हरिनाम

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :166
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3554
आईएसबीएन :81-7182-827-2

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कबीर वाणी पर ओशो द्वारा दिये गये प्रवचनों में से पाँच प्रवचनों का संकलन

Bhagati Bhajan Harinam a hindi book by Osho - भगति भजन हरिनाम - ओशो

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मधुशाला में निमंत्रण

संबुद्धों के अंतर्जगत में कबीर एक सर्वाधिक सम्मोहक संत हैं वे उलटबोलियों के अनूठे रहस्यदर्शी ऋषि हैं, लेकिन उनका जो सम्मोहन है, वह हमें संसार के सम्मोहन से मुक्त करता है और हमें जागरण की दिशा में गतिमान करता है। उन्मत्त कबीर हमें अपने गीतों से एक ऐसा अपूर्व नशा देते हैं, जो हमें और सभी नशों से मुक्ति देता है। यह नशा हमारे जीवन का नवोन्मेश है।

‘भगति भजन हरिनाम’ इसी पुस्तक के एक प्रवचन में उनका एक पद हैः ‘मन रे जागत रहिए भाई।’ यह सूत्र अध्यात्म के जगत की सर्वाधिक कारगर कुंजी है।
ओशो कहते हैं : समस्त योग एक ही कुंजी में भरोसा करता है और वह कुंजी है : जाग जाना। जिस दिन जागने की कुंजी तुम्हारी नींद के ताले पर लग जाती है, खुल गए द्वार।

जागरण के इस सूत्र के बाद कबीर इसी पद में भीतर के छः चक्रों की बात करते हैं-‘षटचक्र की कनक कोठरी’...। ओशो समझाते हैं: ये छः चक्र सक्रिय होने चाहिए। जितने सक्रिय होंगे, उतना ही भीतर ही भीतर प्रवेश होगा। और ठीक अंतरम में, ठीक मध्यबिन्दु पर, तुम्हारे होने के ठीक केन्द्र में परमात्मा छिपा है। वही है असली बसने वाला। शरीर घर है। मन घर है। और मन से भी गहरा घर षटचक्र है।
‘ताला कुंजी कुलफ के लागे, उघड़त बार न होई।’

बस, ठीक कुंजी तुम्हें मिल जाए, ताले में लग जाए, तो कुंडलिनी जाग्रत हो जाती है। ऊर्जा आ जाती है। उन छः चक्रों में एक ही ऊर्जा का प्रवाह हो जाता है। छः चक्रों को जोड़ने वाली ऊर्जा का नाम कुंडलिनी है। चक्र अलग-अलग चलते हैं तो तुम संसार के योग्य शक्ति पैदा कर पाते हो

जब छहों चक्र इकट्ठे एक सूत्र में आबद्ध हो जाते हैं, जैसे कि माला के मनके एक ही धागे में बँध जाते हैं अलग-अलग मनके भी मनके हैं, लेकिन माला नहीं। अलग-अलग चक्र भी हैं और उनसे शक्ति भी पैदा होती है लेकिन माला नहीं है अभी। जब छहों चक्र जुड़ जाते हैं एक धारा में, एक लयबद्धता में, छहों एक साथ सक्रिय होते हैं और उन छहों के बीच एक संगीत निर्मित हो जाता है, एक माला अनुस्यूत हो जाती है तो उसी का नाम कंडलिनी है। और जिस दिन कुंडलिनी जग जाती है-‘उघड़त बान न होई।’ फिर तुम्हारे परमात्मा-स्वरूप के उघड़ने में क्षण की भी देरी नहीं होती।

कबीर ऐसे जागरण के परम योगी हैं। कितने सरल एवं मधुर ढंग से उन्होंने अपने पद में परम योग के सूत्र दे दिए हैं। अगर आप इस संबंध में विस्तार से पढ़ना जानना चाहते हैं तो कुंडलिनी योग पर ओशो की एक पुस्तक है ‘जिन खोजा तिन पाइयां’, आप वह पढ़े। ओशो को कबीर बहुत प्रिय हैं।
इसलिए ओशो न केवल कबीर पर बहुत विस्तार से बोले हैं, बल्कि उन्होंने अपनी अनेक पुस्तकों के जो नाम दिए हैं, वे भी उन्होंने कबीर के गीतों से लिए हैं; जैसे—(1) मैं कहता आँखन देखी, (2) ढाई आखर प्रेम के, (3) ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया और (4) गहरे पानी पैठ इत्यादि।
कबीर के पदों पर ओशो के ये प्रवचन हमारी अंतर्यात्रा को रूखे-सूखेपन से मुक्त करके एक मस्ती-भरी रसमय यात्रा का आनंद देते हैं। अध्यात्म की ऐसी विलक्षण मधुशाला में ओशो आपको निमंत्रण दे रहे हैं।

स्वामी चैतन्य कीर्ति
संपादकः ओशो टाइम्स इंटरनेशनल



जब मैं भूला रे भाई, मेरे सत गुरु जुगत लखाई।
किरिया करम अचार मैं छाड़ा, छाड़ा तीरथ नहाना।
सगरी दुनिया भई सयानी, मैं ही एक बौराना।।
ना मैं जानू सेवा बंदगी, ना मैं घंट बजाई।
ना मैं मूरत धरि सिंहासन, ना मैं पहुप चढ़ाई।।
ना हरि रीझै जब तप कीन्हे, ना काया के जारे।
ना हरि रीझै धोति छाड़े, ना पाँचों के मारे।।
दाया रखि धरम को पाले, जगसूँ रहै उदासी।
अपना सा जिव सबको जाने, ताहि मिले अविनासी।।
सहे कुसबद बाद को त्यागे, छाड़े गरब गुमाना।
सत्यनाम ताहि को मिलिहै, कहे कबीर दिवाना।।


एक अँधेरी रात की भाँति है तुम्हारा जीवन, जहाँ सूरज की किरण तो आना असंभव है, मिट्टी के दिए की छोटी-सी लौ भी नहीं है। इतना ही होता तब भी
ठीक था, निरंतर अँधेरे में रहने के कारण तुमने अँधेरे को ही प्रकाश भी समझ लिया है। और जब कोई प्रकाश से दूर हो और अँधेरे को ही प्रकाश समझ ले तो सारी यात्रा अवरुद्ध हो जाती है। इतना भी होश बना रहे कि मैं अंधकार में हूँ, तो आदमी खोजता है, तड़पता है प्रकाश के लिए, प्यास जगती है, टटोलता है, गिरता है, उठता है, मार्ग खोजता है, गुरु खोजता है, लेकिन जब कोई प्रकाश को ही अंधकार समझ ले तो सारी यात्रा समाप्त हो जाती है। मृत्यु को ही कोई समझ ले जीवन, तो फिर जीवन का द्वार ही बंद हो गया।

एक बहुत पुरानी यूनानी कथा है। एक सम्राट को ज्योतिषियों ने कहा कि इस वर्ष पैदा होने वाले बच्चों में से कोई एक तेरे जीवन का घाती होगा।
ऐसी बहुत सी कहानियाँ हैं संसार के सभी देशों में। कृष्ण के साथ भी ऐसी कहानी जोड़ी है और जीजस के साथ भी ऐसी कहानी जोड़ी है, लेकिन यूनानी कहानी का कोई मुकाबला नहीं।

सम्राट ने, जितने बच्चे उस वर्ष पैदा हुए, सभी को कारागृह में डाल दिया मारा नहीं। क्योंकि सम्राट को लगा कि कोई एक इनमें से हत्या करेगा और सभी की हत्या मैं करूँ, यह महा-पातक हो जाएगा। छोटे-छोटे बच्चे बड़ी मजबूत जंजीरों में जीवन भर के लिए कोठरियों में डाल दिए गए। जंजीरों में बंधे-बंधे ही वे बड़े हुए। उन्हें याद भी नहीं रहा कि कभी ऐसा भी कोई क्षण था, जब जंजीरें उनके हाथ में न रही हों।

जंजीरों को उन्होंने जीवन के अंग की ही तरह पाया और जाना। उन्हें याद भी तो नहीं हो सकती थी कि कभी वे मुक्त थे। गुलामी ही जीवन था और इसीलिए उन्हें कभी गुलामी अखरी नहीं, क्योंकि तुलना हो तो तकलीफ होती है। तुलना का कोई उपाय ही न था। गुलाम ही वे पैदा हुए थे, गुलाम ही वे बड़े हुए थे। गुलामी ही उनका सार-सर्वस्व थी। तुलना न थी स्वतंत्रता की। और दीवारों से बँधे थे वे, भयंकर मजबूत दीवारों से।
और उनकी आँखें अंधकार के इतनी अधीन हो गई थीं कि वे पीछे लौटकर भी नहीं देख सकते थे, जहाँ प्रकाश का जगत था। प्रकाश को देखते ही उनकी आँखें बन्द हो जाती थीं।

तुमने भी देखा होगा, कभी घर के शांत स्थान से भरी दुपहरी में बाहर आ जाओ, आँखें तिलमिला जाती हैं। छोटे बच्चे पैदा होते हैं, नौ महीने अंधकार में रहते हैं—माँ के पेट में। प्रकाश की एक किरण भी वहाँ नहीं पहुँचती।

और जब बच्चा पैदा होता है, तब नासमझ डॉक्टरों का कोई अंत नहीं है। जहाँ बच्चा पैदा होता है अस्पताल में, वहाँ वे इतना प्रकाश रखते हैं कि बच्चे की आँखें तिलमिला जाती हैं और सदा के लिए आँखों को भयंकर चोट पहुँचा जाती है। बच्चे को पैदा होना चाहिए मोमबत्ती के प्रकाश में वहाँ हजार-हजार कैंडल के बल्ब लगाने की जरुरत नहीं है। दुनिया में जो इतनी कमजोर आँखें हैं, उनमें से पचास प्रतिशत के लिए अस्पताल का डॉक्टर जिम्मेवार है।


उसको सुविधा होती है ज्यादा प्रकाश में। वह देख पाता है क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है, क्या करना है, क्या नहीं करना है। लेकिन उसकी सुविधा का सवाल नहीं है, सुविधा तो बच्चे की है।

जो जीवन-भर रहे हों अंधकार में, नौ महीने नहीं, पूरे जीवन, वे पीछे लौटकर भी नहीं देख सकते थे। वे दीवाल की तरफ ही देखते थे। राह पर चलते लोगों, खिड़की-द्वार के पास से गुजरते लोगों की छायाएँ बनती थीं सामने दीवाल पर। वे समझते थे, वे छायाएँ सत्य हैं। यही असली लोग हैं। उस छाया को ही वे जगत समझते थे।
छाया के इस जगत को ही हिन्दुओं ने माया कहा है। असली तो दिखाई नहीं पड़ता, असली का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है।



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