रजनी - बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय Rajani - Hindi book by - Bankim Chandra Chattopadhyay
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नारी विमर्श >> रजनी

रजनी

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :132
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3558
आईएसबीएन :81-288-0310-7

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नारी की अंतर्वेदना व उसकी शक्तिमत्ता पर आधारित उपन्यास...

Rajani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगला के शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनकी लेखनी से बंगाल साहित्य तो समृद्ध हुआ ही है, हिन्दी भी अपकृत हुई है। उनकी लोकप्रियता का यह आलम है कि पिछले डेढ़ सौ सालों से उनके उपन्यास विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो रहे हैं और कई-कई संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। उनके उपन्यासों में नारी की अन्तर्वेदना व उसकी शक्तिमत्ता बेहद प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई है। उनके उपन्यासों में नारी की गरिमा को नयी पहचान मिली है और भारतीय इतिहास को समझने की नयी दृष्टि।
वे ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में सिद्धहस्त थे। वे भारत के एलेक्जेंडर ड्यूमा माने जाते हैं।

प्रथम खण्ड

पहला परिच्छेद

हमारे सुख-दुःख की समानता तुम लोगों के सुख-दुःख के समान नहीं हो सकती। हम दोनों अलग-अलग प्रकृति के हैं। तुम हमारे सुख में सुखी नहीं रह सकतीं। मैं सिर्फ एक जूही की सुगन्ध से ही प्रसन्न रह सकती हूँ। लेकिन सैकड़ों सितारों के मध्य भी मैं पूर्ण रूप बनकर प्रसन्न नहीं हो सकती। क्या तुम मेरी दास्तान ध्यान से सुनोगे ? मैं जन्म से अंधी हूँ।
समझोगे कैसे ? तुम लोग जीवन में सब कुछ देख सकते हो-पर मेरे जीवन में अंधेरा है। यही कष्ट है कि मैं इस अंधेरे नाम को जानती नहीं। मेरी अन्धी आँखों की रोशनी वही है। तुम लोगों की रोशनी कैसी होती हैं, मैं नहीं जानती ?
परन्तु मैं मात्र इतनी ही दुःखी हूँ ? ऐसी बात नहीं है। करीब एक जैसा ही दुःख है मेरा और तुम्हारा। तुम शक्ल देखकर प्रसन्न हो, मैं शब्द सुनकर।
देखो, ये छोटे-छोटे फूलों की डंडी कितनी छोटी और पतली है और मेरे हाथ में पकड़ी हुई सुई की नोंक इससे भी छोटी है। इसी सुई की नोंक से फूल पिरोती हूँ मैं-फूलों की मालाएं बचपन से गूंध रही हूँ-किसी ने भी कभी यह नहीं कहा कि यह माला किसी अंधी द्वारा बनाई गयी है।
मैं माला गूंधने का काम किया करती थी। मेरे पिता का बालीगंज में एक किनारे पर एक बाग लगाया हुआ था-उनकी आमदनी उसी से होती थी। फाल्गुन के महीने में जब तक फूल खिलते रहते, मेरे पिता रोज लाकर दे दिया करते थे और मैं माला गूंध दिया करती थी। पिताजी उसे घूम-घूम कर बेच दिया करते थे। घर का कामकाज माँ करती। समय मिलने पर मां-बाप दोनों माला बनाने में मेरी मदद करते थे।

पुष्पों का स्पर्श बहुत आनन्ददायक है-पहनने में तो और भी अच्छा लगता है-खुशबू में भी आनन्दमय होता ही है। पर केवल फूल बनाने से ही घर नहीं चल पाता-अनाज के पौधों में पुष्प नहीं होते, इसलिए पिता बहुत ही गरीब थे। हम लोग मिर्जापुर मुहल्ले में एक झुग्गी में रहते थे। मैं उसी में एक कोने में फूलों का ढेर लगाकर माला गूंधने बैठती थी। पिता बाहर चले जाते तो मैं गीत गुनगुनाती-
‘‘इतनी साध का हुआ सबेरा,
पर खिली न दिल की कली।’’
हे ईश्वर ! मेरी बात अभी पूरी भी नहीं हुई। मैं स्त्री हूँ या पुरुष ? जो अभी तक नहीं समझे हैं उन्हें न बताना ही ठीक है। अभी मैं कुछ नहीं बताऊंगी। अंधा औरत हो या पुरुष बहुत अड़चन होती है। मेरी भी शादी अंधी होने के कारण नहीं हुई। इसे दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य-वही समझ सकता है, जिसके आंखें न हों। मेरे चिरकौमार्य की बात सुनकर कई चंचल कटाक्षधारिणी कहतीं-हाय ! मैं भी अगर अंधी होती।

शादी न हो-मुझे इसका दुःख नहीं है। मैं स्वयंवरा हूँ। पिताजी से एक रोज मैंने कलकत्ता के बारे में सुना था कि मॉनूमेंट (विक्टोरिया की स्मृतिमूर्ति) बहुत भारी वस्तु है-बड़ी ऊंची, अटल, अचल-आंधी में टूटती नहीं, गले में चैन-अनोखे बाबू। बस मैंने मॉनूमेंट से मन-ही-मन शादी कर ली। मेरे पति से बड़ा कौन है ? मैं स्वयं मॉनूमेंट महारानी हूँ।
सिर्फ एक ही शादी नहीं। मैंने जब मॉनूमेंट से शादी की थी उस वक्त मेरी उम्र पन्द्रह वर्ष की थी। अब सत्रह वर्ष की उम्र में बताते शर्म आती है, सधवा उम्र में एक और शादी कर ली। हमारे घर के पास कालीचरण वसु नामक एक कायस्थ रहते थे। उनकी चीना बाजार में एक खिलौने की दुकान थी। वह भी कायस्थ थे, इसलिए कुछ घनिष्ठता हो गई। कालीचरण का चार साल का बच्चा था-वामाचरण। वामाचरण रोज हमारे घर में आता था। एक दिन हमारे घर के सामने से एक दूल्हा गाने-बाजे के साथ निकला। वामाचरण ने उसे देखकर पूछा-‘‘ए ‘ऊ’ का है।’’
मैंने बताया-‘‘वर’’ बस, वामाचरण जिद करने लगा-मैं वल बनूंगा।’’ वह किसी भी तरह नहीं समझा तो मैंने कह दिया। मत रो, मेरा वर तू है। कहकर मैंने उसके हाथ में एक संदेश दिया और पूछा-‘‘क्या तुम वर बनोगे ?’’ बालक ने संदेश हाथ में लेकर रोना बन्द कर दिया और बोला, ‘‘हां।’’
बच्चा कुछ देर चुप रहा फिर बोला-‘‘ए जी ! क्या करता है वल ?’’ लगता है उसे पूरा यकीन हो गया कि शायद वर संदेश ही खाता है। अगर ऐसा हो तो एक और खाने के लिए तैयार हो रहा था। मैंने उसके विचार को समझकर कहा-‘‘वर फूल बना देता है।’’ वामाचरण वर का फर्ज समझकर मुझे फूल उठा-उठाकर हाथों में देने लगा। उसी दिन से मैं उसे वर कहने लगी और वह मुझे फूल उठा-उठाकर देने लगा।
इस प्रकार मेरे दो विवाह हुए। अब मैं आजकल की जटिल-कुटिलताओं से मालूम करना चाहती हूं कि क्या मैं सती नहीं कहला पाती।

दूसरा परिच्छेद

बड़े घरों के लिए फूलों की व्यवस्था करना बहुत मुश्किल है। मालिन मौसी उस समय राजबाड़ी में फूलों की व्यवस्था करते-करते मसान पर चली गई। फूल बेचने पर फायदा हुआ विद्यासुन्दर को और हीरा मालिन ने चपत खायी-क्योंकि वह बड़े घर में फूल देती थी। विद्यासुन्दर के लिए बहुत फायदा रहा परन्तु मालिन घाटे में ही रही।
मेरे पिता फूलों के शौकीन घरों में, ‘बेला के फूल’ नाम से फूल बेचा करते थे, और माँ अशौकीन एक-दो घरों में रोज फूल देती थी-उनमें एक रामसदय मित्र का घर प्रमुख था। रामसदय मित्र के यहाँ साढ़े चार घोड़े थे। नातियों के लिए एक बछेड़ा,, और चार अदद घोड़े। डेढ़ गृहिणी थी।
एक पूरी गृहिणी-एक वृद्धा-उनका नाम भुवनेश्वरी है-पर मुझसे उनका नाम राममणि ही आता है क्योंकि उनके गले में सांय-सांय सुनती हूं तो और कोई नाम ही नहीं निकलता।
जो पूरी गृहिणी है-लवंगलता नाम है। लोग उन्हें लवंगलता कहते हैं परन्तु उनके पिता ने नाम ललित लंवगलता रखा था। उसे रामसदय बाबू ‘ललित लवंगलता-परिशीलन कोमलमलय समीरे, कहकर प्रेम से बुलाया करते थे। लंवगलता उन्नीस वर्ष की जवान थी। वह दूसरी शादी की पत्नी थी। रामसदय के लिए वह सन्दूक की चाबी, बिछौने की चादर, पान का चूना और गिलास का पानी थी। ज्वर की कुनैन, खांसी की इपिका, वायु में फ्लानेल और आरोग्य में शोरका थी।

मैंने लंवगलता को कभी नहीं देखा, पर वह बहुत सुन्दर है, ऐसा सुना था। उसके गुण के बारे में भी सुना था-गृहकार्य में निपुण, दान में मुक्तहाथ, मन की सच्ची, सिर्फ बोलने में कड़वी थी। लवंगलता में खासकर एक गुण यह भी है कि वह अपने दादा के समान उम्र के पति से प्यार करती थी, कोई नवयुवती शायद ही किसी नवयुवक से उतना प्रेम करती है। वह उसे प्यार करती थी, इसलिए उन्हें नवयुवक की तरह सजाती-संवारती थी। वह रोज उसके बालों में खिजाब लगाकर बालों को रंगीन बनाती थी। रामसदय अगर कभी मखमल की धोती बाँध लेते तो वह उसे खोलकर उसकी जगह कोकिलपाढ़, फीतापाढ़ कल्कापाढ़ की धोती पहनाती-और मलमल वाली धोती उसी समय किसी गरीब को दे देती। रामसदय को इत्र से नफरत थी पर वह सोते में उनके शरीर पर मल देती। उनका एनेक अक्सर वह तोड़ देती और उसमें से सोना निकालकर उसे दे देती जिसकी बेटी की शादी होने वाली होती। रामसदय की नींद में नाक बजती तो वह अपने पैरों में घुंघरू की पायजेब पहनकर घर को गुंजायमान कर देती।

लवंगलता हमसे फूल मंगवाती थी। हमें चार आने के फूल के दो रूपये देती थी। मैं अंधी थी इस कारण। माला लेकर लवंग गाली देकर कहती, ‘‘हमें ऐसी गन्दी माला क्यों देती हो।’’ परन्तु कीमत देते वक्त पैसे के साथ भूलकर रूपया दे देती। रूपया वापस देती तो कहती, ‘‘यह रूपया मेरा नहीं है।’’ दुबारा कहने पर गाली देकर भगा देती। दान की बात कहती तो मारने भागती। इस प्रकार रामसदय घर पर नहीं होते तो हमारे दिन बीतते। इसके बाद जो भी रहे, व सहती-मेरी मां यही समझकर लवंग से ज्यादा कुछ न लेती थी। दिन व्यतीत होते गए। हम लोग इतने में ही संतुष्ट थे। हमसे खूब सारे फूल लवंग खरीदती और रामसदय को सजाती, सजाकर कहती, ‘‘देखो कामरूप।’’ रामसदय कहते, ‘‘देखो अंजनीनन्दन’’ उस बूढ़ी युवती का मन अद्भुत था। शीशे की भांति एक-दूसरे का हृदय देख सकते थे। उनमें प्रेम का उदाहरण कुछ इस तरह था-
रामसदय कहते-‘‘ललित लंवगलता दरिशी ?’’
‘‘हुक्म, ठाकुर महाशय, दासी हाजिर है।’’
‘‘मैं अगर मर जाऊं तो ?’’
‘‘मैं तुम्हारा धन खा जाऊँ।’’ लवंग मन-ही-मन कहती, मैं जहर खा जाऊं। रामसदय मन ही मन समझ जाते।
‘‘सुनो। जब लवंग इतने पैसे देती तो बड़े घर में फूल देना दुःख कैसे हुआ ?’’

मां एक दिन बीमार हो गई। पिताजी अतःपुर नहीं जा पाए-फिर मेरे अलावा लवंगलता को फूल देने और कौन जाता ? मैं उसके लिए फूल लेकर गई। मैं अंधी हूँ फिर भी कलकत्ता का सारा रास्ता मेरे लिए जाना-पहचाना था। सारी जगह हाथ में छड़ी लेकर जा सकती हूँ। कभी किसी वाहन के सामने नहीं आयी। कभी-कभी राह चलते लोगों से अवश्य टकरा जाती हूँ। वह भी जानकर कोई अंधी जानकर सामने आ जाता और धक्का लगा जाता। धक्का लगने पर वे कहते-‘‘अरे ! देखती नहीं, अंधी है क्या ? मैं मन-ही-मन सोचती-अंधे हम दोनों हैं।’’
लवंग के पास मैं फूल लेकर गई। लवंग बोली-‘‘क्यों री अंधी ! फूल लेकर फिर आ मरी है ? मेरा शरीर जल उठता था अंधी नाम सुनकर। मैं उल्टा उत्तर देने वाली थी तभी किसी के पदचाप सुनाई पड़े। आने वाले ने पूछा, ‘‘कौन आया है ? छोटी मां, यह कौन है।’’
‘‘छोटी मां !’’ शायद यह तो रामसदय के बेटे थे। बड़े बेटे की आवाज एक दिन सुनी थी-इतनी मीठी आवाज नहीं थी-यह छोटे बेटे थे।
छोटी मां ने बड़े मीठे स्वर में उत्तर दिया-‘‘यह अंधी
फूल वाली है।’’
‘‘फूलवाली ! मैंने सोचा कोई और ही अच्छी औरत है।’’
लवंग बोली-‘‘क्यों ? क्या फूल वाली अच्छी महिला नहीं हो सकती ?’’
छोटे बाबू झेंप गए। कहा-‘‘क्यों नहीं हो सकती। यह तो एकदम भद्र महिला-सी लगती है। अंधी क्यों बन गई?’’
‘‘जन्म से अंधी है।’’
‘‘देखें।’’

छोटे बाबू को अपनी विद्या का गौरव है। उन्होंने सारी शिक्षा ली थी। धन उपार्जन के लिए ही नहीं चिकित्साशास्त्र भी पढ़ा था। शचीन्द्र बाबू (छोटे बाबू) ने दरिद्रों को दवा मुफ्त देने के लिए चिकित्साशास्त्र पढ़ा था-लोगों में ऐसी बातें फैली हुईं थीं। देखें कहकर वे मुझसे बोले, ‘‘सीधी खड़ी हो जाओ।’’
‘‘मैं हड़बड़ाकर खड़ी हुई।’’
छोटे बाबू ने कहा, ‘‘मेरी ओर देखो।’’
‘‘देखूं क्या सिर ?’’
अंधी आंखों से मैंने उधर देखा। पर छोटे बाबू के मन मुताबिक नहीं हुआ। मेरी ठोड़ी पकड़कर उन्होंने चेहरा घुमाया।
उस ठोड़ी स्पर्श से मेरी जान निकल गयी। सोचा डॉक्टरी के सिर में आग लगा दूं।
वह स्पर्श फूलों जैसा था। स्पर्श में जूही, चमेली, गुलाब, बेला आदि की अनेक सुगन्धों का अहसास हुआ-लगा जैसे मेरे आसपास फूल हैं, मेरे माथे पर फूल, पैरों में फूल-प्राणों में फूल और मन के भीतर फूल-राशि। हाय मरी। किस विधाता ने इस स्पर्श को बनाया था। मैं कह चुकी हूं-तुम अंधी के दुःख सुख को नहीं समझ सकते। मैं तो मर गई उस नवीन सुकोमल, पुष्पगन्धमय, वीणा-ध्वनित स्पर्श पर। जो देख सकता है ? वह कैसे समझ पाता है। मेरा सुख-दुःख मेरे पास ही रहे। मैं जब भी उस स्वर्गतुल्य स्पर्श की याद करती हूँ-मन-वीणा बज उठती है-तुम इसे चपल कटाक्ष-दक्ष क्या समझोगी ?
छोटे बाबू बोले, ‘‘यह अंधापन दूर नहीं होगा।’’

लवंग बोली, ‘‘दूर न हो। पर क्या रूपयों से अंधों की शादी नहीं हो सकती ?’’
‘‘क्या ? इसकी शादी हुई नहीं है।’’
‘‘नहीं। रूपये खर्च करने से हो सकेगी।’’
‘‘लवंग रुष्ट हो गयी। कहा-‘‘लड़का भी ऐसा नहीं देखा। क्या मेरे पास रुपये रखने का स्थान नहीं है। मैं तो सिर्फ यह पूछती हूं-क्या शादी हो सकती है-लड़की है, बातें समझ नहीं सकती-शादी क्या होती है ?’’
छोटे बाबू हंसकर बोले, ‘‘मां। तब तुम अपने रुपये बचाकर रखो-मैं रिश्ता कर लूंगा।’’
मैं मन-ही-मन लवंग के मुंह में आग लगाती हुई वहां से भाग आई।
अतः तभी कहती हूं कि बड़े लोगों के घर में फूल देना आसान नहीं है।
बहुप्रतिमामयी पृथ्वी। कैसी हो तुम देखने में ? तुमने जो असंख्य अविचारणीय शक्ति है, अनन्त चित्र-विचित्र जड़ पदार्थ हैं, वह सब देखने में कैसा है ? लोग जिसे सुन्दर कहते हैं देखने में वह कैसा है ? तुम पर असंख्य प्रकृति वाले जीव घूमते हैं, बताओं मां सब कैसे हैं ? दिखाओ मां। किसी का देखना भी कैसा होता है ? कैसा सुख मिलता है देखने में ? क्या मैं इस मीठे स्पर्श को एक पल भी दे सकूँगी ? मां दिखाओ ! एक बार मन के भीतर मन को छिपाकर रूप को मन भरकर देख सकूं इस नारी जीवन को सफल बना सकूं। सब तो देखते हैं-मैं क्यों नहीं देखूं ? कीट-पतंगे भी सभी देखते हैं-मैं किस पाप के कारण नहीं देख सकती हूँ-सिर्फ देखना किसी को नुकसान नहीं, किसी को दुःख नहीं, कोई अपराध नहीं, इस तरह सभी को देखते हैं,-मैं किस अपराध से नहीं देख पाती।
नहीं-नहीं, मेरी किस्मत में यह नहीं है। मन में झांका सिर्फ स्पर्श, शब्द, सुगंध। मेरे मन को भेदकर आवाज होने लगी दिखाएगी क्या अपना रूप दिखा न ! मैं सु्न्दरता का रूप देखूंगी। किसी ने भी मेरे दुःख को नहीं समझा-नहीं समझा।

तीसरा परिच्छेद

मैं उसी दिन से रोज रामसदय बाबू के घर फूल बेचने जाती पर क्यों जाती, नहीं जानती। जो देख नहीं पाती उसकी इतनी कोशिश क्यों ? देख सकूंगी नहीं सिर्फ बात सुनने के लिए ? शचीन्द्र बाबू क्या मेरे पास आकर बात करेंगे ? मैं जनानखाने में जाती हूं वे बाहर मर्दानाखाना में रहते हैं। अगर वहां उनकी पत्नी रहती तो भी आ जाते, पर वह एक वर्ष पहले मर गयी थी। उन्होंने दूसरी शादी नहीं की। करने की उम्मीद भी नहीं थी। मां के पास शायद किसी काम से आ सकते हैं, जिस समय मैं फूल लेकर जाऊं, उसी समय आये, इसकी भी सम्भावना नहीं थी। इसलिए जो उम्मीद एक शब्द सुनने की थी, वह भी सफल नहीं होती, तब यह अंधी रोज किस दुराशा से फूल लेकर जाती है, नहीं मालूम। लौटते समय निराश होकर सोचती क्यों आती है यहां ? रोज सोचती कि अब नहीं जाऊंगी, पर हमेशा यह सोचना व्यर्थ ही जाता। तब हमेशा जाती जैसे कोई पकड़कर खींच ले जाता है। पुनः निराशा ही लौट आती फिर प्रण करती कि अब नहीं जाऊँगी। लेकिन फिर भी जाती इसी प्रकार दिन बीतते रहे।
मैं मन-ही-मन बुराई करती, कि मैं क्यों जाती हूँ ? सुनती थी औरत जात पुरुष के रूप पर आकर्षित होकर प्यार करती है। मेरे आंख नहीं हैं। मैंने किसका रूप देखा है ? फिर मैं क्यों जाती हूं ? सिर्फ आवाज सुनने के लिए। एक बार सुना था कि कोई स्त्री सिर्फ बात सुनकर पागल हो गयी ? क्या मैं भी वैसी हो गयी हूं ? क्या ऐसा हो सकता है। अगर ऐसा होता तो बाजा सुनने के लिए क्यों किसी बाजे वाले के घर जाती ? शचीन्द्र की आवाज क्या सितार, सारंगी, हसरान, बेहाला से ज्यादा मधुर है। झूठ बात है यही।

फिर क्या उस स्पर्श के लिए ? दिन-रात मैं जो पुष्पों में रहती हूं-बिछौना बनाकर सोती हूं, मन में दबाकर रखती हूं इसके बजाये क्या वह स्पर्श ज्यादा कोमल है ? ऐसा तो नहीं है ? तब क्या है। क्या कोई इस अंधी को समझा सकता है।
तुम क्या समझाओगे-स्वयं भी नहीं समझते तो तुम देख सकते हो, चेहरा पहचानते हो, रूप भी समझते हो। मैं जानती हूं, रूप देखने वाले का विचार मात्र है, शब्द भी मानसिक विकार है। सुन्दरता रूप में नहीं होती रूप तो मन में रहता है, इसीलिए एक ही मनुष्य को सब लोग रूपवान क्यों नहीं देखते ? सब लोग एक ही व्यक्ति से आकर्षित क्यों नहीं होते ? शब्द भी इसी प्रकार है। रूप तो देखने वालों के लिए मात्र एक सुख है। शब्द भी सुनने वाले का सुख मात्र है। स्पर्श भी छूने वाले के मन का सुख मात्र है। यदि रूप सुख का रास्ता मेरे लिए बन्द है तो शब्द, स्पर्श, गन्ध क्यों रूप सुख की भांति मन में समाहित न होगी ?

सूखी जमीन पर पानी गिरने से उसमें उत्पादन क्षमता क्यों न आएगी ? अग्नि में सूखी लकड़ी डालने से वह क्यों न जलेगी ? रूप से हो, शब्द से हो, स्पर्श से हो-खाली मन में सद्पुरुष के स्पर्श से प्यार न उपजेगा ? देखो, अंधेरे में भी पुष्प खिलते हैं, चन्द्रमा बादलों में ढके रहने पर भी आकाश में विहार करते हैं, सूने बाग में कोयल कूकती ही है, जनशून्य सागर में भी रत्न पैदा होते हैं अंधे के हृदय में भी प्रेम उपजता है, नेत्र बन्द होने की वजह से हृदय प्रस्फुटित क्यों नहीं होता।
होगा क्यों नहीं, पर मुझे यह सब कष्ट देने के लिए। गूंगे की कवित्य क्षमता सिर्फ उसे कष्ट देती है, बहरे का संगीत प्रेम उसे दुःख देता है, वह अपना गीत खुद नहीं सुन पाता। मेरे मन में प्रेम-प्रवाह सिर्फ कष्टकर है। दूसरे का सौन्दर्य क्या देखूं अपना ही रूप मैंने नहीं देखा। रूप-रूप कैसा रूप है मेरा। इस धरती पर रजनी नाम का तुच्छ बिन्दु कैसा है देखने में ? क्या मुझे देखकर कोई फिर मुझे देखना चाहता है। ऐसा कोई नहीं जो मुझे खूबसूरत के रूप में देखे। आंखों की कमी से स्त्री सुन्दर नहीं मानी जाती मेरे नयन नहीं है। पर कलाकार प्रस्तर गढ़कर नेत्रशून्य प्रतिमा क्यों बनाता है ? क्या मैं इसी तरह पत्थर मात्र हूं ? फिर भगवान ने इस पत्थर में सुख-दुःख से व्याकुल प्रेम लालसा से आकुल मन क्यों बनाया। पत्थर का कष्ट मैंने पाया है। इस संसार में ऐसा क्यों है। ऐसा कौन सा पाप किया था मैंने कि नेत्रों से देख भी न सकूं। यहां तो बड़े-बड़े पापी देख सकते हैं। इस दुनिया में ईश्वर नहीं, विधान नहीं, पाप-पुण्य का दोष इनाम नहीं है-मैं मर जाऊंगी।
ऐसे जीवन के मेरे कई वर्ष बीत गये-कई वर्ष आयेंगे। वर्ष में कई दिन हैं, दिन में कई प्रहर, प्रहरों में कई मुहूर्त उसमें एक घड़ी के लिए क्षणमात्र भी क्या मैं आंखों से देख सकूंगी ? एक पल भी आंखों से देख पाऊं तो देख लूं-यह शब्द स्पर्शयुक्त संसार कैसा है, मैं कैसी हूं-शचीन्द्र कैसा है ?

चौथा परिच्छेद

रोज मैं फूल लेकर जाती लेकिन छोटे बाबू की आवाज नहीं सुन पाती। कभी-कभार कोई शब्द पड़ भी जाते थे। मैं उसके आनन्द का वर्णन नहीं कर पाती। ऐसा लगता जैसे पानी से भरा मेघ जब गरजकर बरसता है तो मेघों को जैसा आनन्द मिलता है वैसे ही गर्जन करने को मेरे मन होता है। हमेशा सोचती कि सुन्दर-सुन्दर फूलों का एक गुच्छा बनाकर छोटे बाबू को दे आऊं, पर ऐसा कभी न कर पायी। क्योंकि एक तो शर्म महसूस होती, दूसरे वे इसकी कीमत देना चाहेंगे। उनसे क्या कहकर कीमत न लूंगी। दुःखी मन से घर आकर छोटे बाबू की फूलों से प्रतिमा बनाती। बनाती क्या-यह तो जानती उन्हें कभी देखा न था।
मेरे उधर आने-जाने का एक संकल्पनीय परिणाम हो रहा था। मैं उससे अनभिज्ञ थी। मां-बाप की बातों से ही जान पायी। एक रोज शाम के बाद माला पिरोते-पिरोते सो गयी। अचानक कोई आवाज सुनकर नींद टूटी। जागते ही मां-बाप की आवाज सुनी। लगा कि दीया बुझ गया था। मां-बाप मेरे जागने की बात न जान सके। उनकी बात में मैं अपना नाम सुनकर चुपचाप सोयी रही। सुना, मां कह रह थी-‘‘तब एक तरह से पक्का ही हो गया न ?’’
पिता ने जबाव दिया-‘‘और क्या ? इतने बड़े लोग क्या वचन से मुकर सकते हैं ? फिर मेरी बेटी में क्या दोष है ? एक अंधी ही तो है-तपस्या करने पर ही कहां मिलती हैं ऐसी ?’’
मां-‘‘पर क्या वे लोग इतना कुछ करेंगे ?’’

‘‘तुम समझती नहीं हो। वे हमारी तरह दरिद्र नहीं हैं। हजार-दो हजार को वे पैसा नहीं मानते हैं। जब से रामसदय बाबू की पत्नी ने रजनी के आगे शादी की बात चलाई, रजनी उसी दिन से रोज फूल लेकर जाती है। रोज-रोज इसके जाने से लवंग ने भी समझ लिया कि लड़की शादी के लिए तैयार है। होगी भी तो क्यों नहीं ? उम्र जो हो गई। छोटे बाबू ने इसलिए हरनाथ वसु को मनाया है। गोपाल भी मान गया।
रामसदय बाबू के घर में हरनाथ वसु मैनेजर है, उनका बेटा है गोपाल। गोपाल के बारे में कुछ जानती थी। उसकी उम्र तीस वर्ष थी। एक शादी हुई पर कोई बाल-बच्चा नहीं हुआ। गृहस्थी के लिए उनकी स्त्री है-बच्चे के लिए उन्हें अंधी से शादी करने में क्या दिक्कत है ? फिर उन्हें लवंग रूपये देगी। मां-बाप की बातों से लगा कि मेरा सम्बन्ध गोपाल के साथ तय हुआ है। रुपयों के लालच में वह बीस साल की लड़की से विवाह करने को तैयार है। जाति रुपयों से खरीदेगा। मां-बाप ने सोचा कि जन्म की अंधी लड़की का कल्याण हो जाएगा। प्रसन्न हो गये हैं लोग। मेरे सिर पर आसमान टूट पड़ा।
अगले दिन मैंने तय किया कि अब लवंग के पास नहीं जाऊंगी। उसे सौ-बार ‘मुंहजली’ कहकर गाली दी। शर्म के मारे मर जाने को मन हुआ-गुस्से के कारण लवंग को मारने की इच्छा हुई। दुःख के कारण रोना आने लगा। क्या बिगाड़ा है मैंने लवंग का, कि वह मुझ पर अत्याचार करने की कोशिश में है। सोचा। अगर बड़े लोग अत्याचार करके ही प्रसन्न होते हैं तो क्या अत्याचार के कारण यह अंधी दुःखी है। मन को दृढ़ किया, कि एक दिन जाऊँगी और उनकी खूब बेइज्जती करके आऊंगी। इसके पश्चात कभी नहीं जाऊंगी। फूल भी अब नहीं बेचूंगी। उनके पैसे भी अब नहीं लूंगी, अगर मां उनके पैसे ले भी आये तो उसका अनाज नहीं लाऊंगी भूखे भले ही मर जाऊं। मन में सोचा कि कहूंगी-बड़े लोग बन जाने से क्या दूसरों को दुःख पहुंचाना चाहिए। कहूंगी क्या अंधी पर भी दया नहीं आती। कहूंगी कि धरती पर जिसके लिए कोई सुख नहीं है-उसे बिना गलती किये दुःख देने से आपको क्या फायदा मिलेगा ? जितना ही सोचती कि ये-ये बातें कहूंगी, आंखों से उतने ही आंसू निकल पड़े थे। डरने लगी कि वक्त पर सारी बातें कहना भूल न जाऊं।

मैं रामसदय बाबू के घर गयी। फूल न ले जाने की सोची, पर खाली हाथ शर्म आयेगी-क्या कहकर बैठूंगी, इसलिए कुछ फूल ले लिये। लेकिन आज मां से छिपकर गई।
फूल दे दिए। लवंग के पास बैठ गयी। अपमान करूंगी-क्या कहकर बात चलाऊं ? हे भगवान शुरू कैसे करूं ? चारों ओर लगी आग को पहले किधर से बुझाऊं बात शुरू भी न कर सकी कि रोने लगी।
स्वयं लवंग ने ही बात चलाई। ‘‘ अरी अंधी तेरी शादी होगी।’’
मैं भुन उठी, बोली, ‘‘आग होगी।’’
लवंग बोली-छोटे बाबू शादी करा रहे हैं-तब क्यों नहीं होगी ?
मैं और भी जल-भुन गई। कहा, ‘‘क्यों, तुम लोगों का मैंने क्या दोष किया है ?’’
लवंग गुस्से से बोली, ‘‘पर तू। क्या तेरी शादी करने की इच्छा नहीं पापिन कहीं की ! शादी क्यों नहीं करेगी।’’
मैं बोली मेरी इच्छा।
लवंग ने शायद सोचा कि मैं चरित्र-भ्रष्ट हूं-शादी से असहमति क्यों ?
वह बहुत कुद्र होकर बोली-‘‘तू मर। जा यहां से वरना झाडू मारकर बाहर निकाल दूंगी।’’

मेरी आंखों से आंसू गिर रहे थे। उठकर मैं लवंग से आंसू छिपाकर चल पड़ी। सीढ़ियों पर आकर सिसक रही थी। सोचा अपमान तो कुछ नहीं किया। सहसा किसी का पदचाप सुनाई पड़ा। अंधों की श्रवण-शक्ति में प्राकृतिक सतर्कता होती है-पदचाप सुनकर मैं समझ गयी कि किसकी पदचाप है। सीढ़ी पर बैठ गई। छोटे बाबू मेरे पास आकर खड़े हो गये। शायद उन्होंने आंसू देख लिये थे, ‘‘बोले तुम कौन, रजनी !’’
सुनकर सब कुछ भूल गई, गुस्सा, अपमान, कष्ट भूल गई, कानों में झंकार होने लगी, कौन रजनी, मैंने उत्तर नहीं दिया। सोचा एक-दो बार बोलें, कानों सुनकर मैं सुखी हुई।
‘‘रोती क्यों हो ?’’ छोटे बाबू ने पूछा।
मेरा मन प्रसन्न-प्रफुल्लित होने लगा। आंखों में और भी आंसू निकल पड़े। मैं बोली नहीं ताकि कुछ और पूछें। सोचा, मैं कितनी भाग्यशाली हूं। भगवान ने मुझे अंधी ही तो बनाया है, बहरी तो नहीं।
उन्होंने फिर पूछा, ‘‘रो क्यों रही हो ? किसी ने कुछ कह दिया ?’’
मैंने अब जवाब देना चाहा। यदि उनसे बोलने में सुख मिलता है तो क्यों इस अवसर को जाने दूं, मैंने कहा, ‘‘छोटी मां ने अपमान किया है।’’
वे हंसकर बोले, ‘‘छोटी मां की बातों का विचार मत किया करो। वह ऊपर से ही बक देती है पर मन में कुछ नहीं होता। मेरे साथ चलो, वह फिर तुम्हें मीठी-मीठी बातों से प्रसन्न कर देगी।’’
क्यों न उसके साथ जाऊं ? क्या उनके कहने पर मन रह सकता है। मैं उठकर उनके साथ चल पड़ी। वे आगे सीढ़ी चढ़ने लगे। उन्होंने कहा, तुम्हें दिखता नहीं फिर सीढ़ी कैसे चढ़ती हो। न चढ़ सको तो हाथ पकड़कर कर ले चलूं ?
मेरा बदन कांप उठा। शरीर सिहरकर रोमांचित हो गया। मेरा हाथ पकड़ लिया-पकड़ लें, लोग बुरा सोचेंगे, सोचें मेरा स्त्री जन्म सफल हो। मैं कलकत्ता की गली-गली में बिना मदद घूम सकती हूं। पर छोटे बाबू को इन्कार न कर सकी। छोटे बाबू को क्या कहकर बुलाऊं-उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

जैसे एक सुकोमल पुष्प किसी ने हाथ में दे दिया हो, जैसे किसी ने गुलाब की गूंथी माला हाथ में लपेट दी हो। मन में कुछ न रहा। उसी समय मन हुआ इसी वक्त क्यों न मर जाऊं। मैं उस समय पानी-पानी हो रही थी। मन हुआ, मैं और शचीन्द्र पुष्प बनकर एक साथ खिलें और डाली पर साथ झूलें। मन में और क्या-क्या सोचा, याद नहीं। सीढ़ी पर पहुंचते ही बाबू ने हाथ छोड़ दिया। ठंडी सांस ली, फिर दुनियादारी का विचार आया। मन में सोचा, ‘‘प्राणेश्वर, यह क्या किया, बिना समझे। तुमने मेरा हाथ पकड़ा है। अब तुम मुझे ग्रहण करो या न करो तुम मेरे स्वामी हो, मैं तुम्हारी स्त्री हूँ। मुझ अंधी का इस जीवन में और कोई स्वामी नहीं हो सकता।’’
तब क्या किसी मुंहजली की नजर लग गयी थी। लगता है-हुआ।


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