Kapal Kundala - Hindi book by - Bankim Chandra Chattopadhyay - कपाल कुण्डला - बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय
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कपाल कुण्डला

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :121
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3559
आईएसबीएन :81-288-0313-1

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पतिव्रता स्त्री पर आधारित उपन्यास...

Kapal Kundala

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगला के शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनकी लेखनी से बंगाल साहित्य तो समृद्ध हुआ ही है, हिन्दी भी अपकृत हुई है। उनकी लोकप्रियता का यह आलम है कि पिछले डेढ़ सौ सालों से उनके उपन्यास विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो रहे हैं और कई-कई संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। उनके उपन्यासों में नारी की अन्तर्वेदना व उसकी शक्तिमत्ता बेहद प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई है। उनके उपन्यासों में नारी की गरिमा को नयी पहचान मिली है और भारतीय इतिहास को समझने की नयी दृष्टि।
वे ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में सिद्धहस्त थे। वे भारत के एलेक्जेंडर ड्यूमा माने जाते हैं।

प्रथम खण्ड
प्रथम परिच्छेद
(सागर-संगम)


‘Floating straight obedient to be stream’ –Commdy of Errors
प्रायः दो सौ पचास साल पहले एक दिन माघ महीने के अन्तिम पहर में एक यात्री-नौका गंगासागर में आ रही थी। पुर्तगाली व अन्यान्य जल दस्युओं के डर से उन दिनों यह नियम था कि यात्री-नौकाएं दल बना कर ही यातायात करती थीं, मगर यह नौका अकेली थी। इसका कारण यह था कि रात के अन्तिम पहर में गहन कुहासे से सारा वातावरण भर गया था और नाविक पथ भूल कर काफिले से अलग पड़ गए थे। इस समय वे किस दिशा में कहां जा रहे थे, इसका कोई ठिकाना नहीं था। नौका में सवार अधिकांश लोग सो चुके थे। एक वृद्ध और एक युवा व्यक्ति, केवल यही दो लोग थे, जो जगे हुए थे। वृद्ध व्यक्ति व युवक आपस में बातचीत कर रहे थे। बीच में बातचीत रोक कर वृद्ध ने नाविकों से पूछा, ‘‘माझी, आज कितनी दूर तक चलोगे ?’’
माझी ने टालते हुए कहा, ‘‘क्या पता ?’’
वृद्ध क्रोधित होकर मांझी को भला-बुरा कहने लगा। युवक बोला, ‘‘महाशय जो भगवान के हाथ में है, उसके बारे में तो ज्ञानी भी नहीं बता सकता, फिर यह मूर्ख क्या बताएगा ? आप खामोखाह परेशान न हों।’’
वृद्ध आवेश में बोला, ‘‘परेशान न हूं, क्या कहते हो, उधर गांव से पाजी लोग बीस-पचीस बीघे का धान काट कर ले गए हैं, बाल-बच्चे अकाल में खाएंगे क्या ?’’

यह खबर उन्हें गंगासागर में नहा लेने के बाद गांव से आए अन्य नए यात्रियों से मिली थी। युवक बोला, ‘‘मैंने तो पहले ही कहा था महाशय के घर में अभिभावक नहीं, महाशय का आना उचित नहीं था।’’
वृद्ध उसी तरह तैश में बोला, ‘‘आता कैसे नहीं। पूरी जिन्दगी बीत गयी, अब जाकर तो मौका मिला था। अब भी परलोक के काम नहीं करूंगा तो कब करूंगा ?’’
युवक बोला, ‘‘अगर शास्त्रों को ठीक से समझा जाए तो तीर्थ-दर्शन से ही परलोक का काम सिद्ध नहीं होता, बल्कि घर बैठकर भी हो सकता है।’’
वृद्ध ने पूछा, ‘‘तो तुम क्यों आए ?’’
युवक ने जवाब दिया, ‘‘मैंने तो पहले ही बताया था समुद्र देखने की बड़ी इच्छा थी इसलिए आया था।’’ फिर धीमे स्वर में कहने लगा, ‘‘आह !....जो कुछ देखा, उसे जन्म-जन्मांतर तक भूल नहीं सकूंगा।’’

‘‘दूरादयश्चक्रनिभिश्य तन्वी
तमालतालीवनराजि नीला।
आभाति बेला लवण्याम्बुराशे
र्द्धारानिद्धेब कलंकरेखा।’’

वृद्ध का उसकी बातें सुनने की ओर ध्यान नहीं था, वह तो नाविकों की आपसी बातें सुनने में लीन था।
एक नाविक दूसरे से कह रहा था, ‘‘अरे भाई, यह तो बहुत बुरा हुआ। इस समय हम बाहरी समुद्र में आ पड़े हैं या किसी विदेश में, यही समझ में नहीं आ रहा है।’’
कहने वाले का स्वर भय से कांप रहा था। वृद्ध को लगा, कोई भारी विपदा जरूर आने वाली है। शंका से चित्त अस्थिर होने लगा तो पूछा, ‘‘मांझी, क्या हुआ ? क्या बात है ?’’
मांझी ने कोई उत्तर नहीं दिया, मगर युवक उत्तर की अपेक्षा किये बिना बाहर निकल आया। देखा लगभग सुबह हो आई थी। कुहासा घना हो गया था। आकाश, तारे, चांद और किनारे-किसी ओर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। उसे समझते देर नहीं लगी कि नाविक रास्ता भटक गए हैं। इस समय नौका कहां जा रही है। इसका भी उन्हें ज्ञान नहीं था। वे इसी आशंका से डरे जा रहे थे कि बाहरी समुद्र में पड़कर कहीं मर ही न जाएं।
नमी से बचने के लिए सामने पर्दा तना हुआ था, इसलिए नौका के अंदर पड़े यात्री इस बारे में कुछ भी जान नहीं पाये थे। किंतु युवक ने सारी स्थिति पलक झपकते भांप ली और वृद्ध को सूचित कर दिया। यह सुनते ही नौका में हाहाकार मच गया। जो थोड़ी-औरतें वहां थीं, उनमें अब तक न जाने कैसी-कैसी बातें चल रही थीं, मगर युवक की बात सुनते ही वे भी चीखने चिल्लाने लगीं।

वृद्ध घबराकर बोला, ‘‘किनारे चलो ! किनारे चलो ! किनारे चलो।’’
युवक जरा-सा हंसकर बोला, ‘‘किनारा कहां ? यही मालूम होता तो विपदा क्यों आती ?’’
इतना सुनते ही यात्रियों में और भी कोलाहल बढ़ गया। युवक ने किसी तरह उन्हें शांत किया और नाविकों से कहा, ‘‘इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं कि सुबह हो आयी है-चार-पांच दण्डों में ही सूर्योदय हो जाएगा। चार-पांच दण्डों में नौका डूबी नहीं जा रही है। तुम लोग इसी समय पतवार चलाना बंद कर दो, स्रोत के सहारे नौका जहां बहती है, बहने दो। बाद में जब धूप खिलेगी तो सलाह-मशवरा करेंगे।’’
नाविकों ने युवक की बात मान ली और नौका को स्रोत के सहारे छोड़ दिया।
काफी देर तक नाविक चुप बैठे रहे। यात्रियों का डर के मारे बुरा हाल था। हवा ज्यादा नहीं थी। सो लहरों की तरंगों का कम्पन किसी को महसूस नहीं हो रहा था। हां, सभी को यह जरूर लग रहा था कि मौत निकट ही है। निःशब्द भाव से दुर्गानाम का जाप कर रहे थे, औरतें ऊंचे सुर में विविध शब्दोच्चार करती हुई रो रही थीं। एक औरत गंगासागर में संतान विसर्जन करने आयी थी, बस, वही रो नहीं रही हैं।

इंतजार करते-करते अनुमानतः एक पहर बेला हो आयी। उसी समय अकस्मात नाविकों ने सागर के पांच पीरों का जयघोष करके खूब शोर मचा दिया। और यात्री पूछने लगे, ‘‘क्या हुआ क्या हुआ, माझियो।’’
माझी एक साथ बोल पड़े, ‘‘धूप निकल आई, धूप निकल आई। देखो कुहासा छंट गया।’’
सारे यात्री उत्सुकता से नौका से बाहर आकर देखने लगे कि बाहर का क्या हाल है और वे कहां पहुंचे हैं ? सूर्य निकल आया था। कुहासे के घने धुंधलके से सारा वातावरण मुक्त हो चुका था। लगभग एक पहर बीतने की बेला थी। नौका जिस स्थान पर आ पहुंची थी, वह प्रकृत महासमुद्र नहीं, बल्कि नदी का मुहाना मात्र था, किंतु उस नदी का जो विस्तार था, वैसा विस्तार कहीं और संभव नहीं था। नदी का एक किनारा जरूर नौका के पास ही था-लगभग पचास हाथ की दूरी पर-मगर दूसरे किनारे पर दूर-दूर पर चिह्न नहीं था। जिधर भी नजर जाती, उधर अनन्त जलराशि सूरज की रोशनी में चमकती हुई गगन से गगन तक जा मिली थी। पास वाले किनारे का पानी मटमैला था, जबकि दूसरे किनारे का पानी नीलवर्ण। यात्रियों की निश्चित धारणा यह बनी कि वे लोग महासमुद्र में जरूर जा पड़े थे, मगर उनका सौभाग्य कि किनारा पास ही है और विपदा की आशंका खत्म। सूर्य की ओर देखकर दिशा का अनुमान लगाया। पास ही जो किनारा नजर आ रहा था, उसे सबने समुद्र का पश्चिमी तट मान लिया। तट के बीचोंबीच नौका के कुछ ही दूर नदी के मुख से मंदगामी स्रोत निकलकर समुद्र में मिल रहा था। संगम-स्थल के दक्षिणी पार्श्व में विशाल रेतीला मैदान फैला हुआ था, वहां विभिन्न प्रकार के पक्षी नानाविध क्रीड़ाओं में मग्न थे। यह नदी अब ‘रसूलपुर की नदी’ कहलाती है।

द्वितीय परिच्छेद
(किनारा)


‘‘Ingratitude! thou marble hearted flend!’’ –King lear

यात्रियों की स्फूर्तिदायक बातें खत्म हुईं तो नाविकों ने प्रस्ताव रखा कि ज्वार आने में चूंकि अभी कुछ देर है, इसलिए इस अवधि में यात्री सामने वाली बालू भूमि पर खाना-पीना कर लें। यात्रियों ने यह सुझाव तत्काल मान लिया। नाविकों ने नौका किनारे से बांध दी। यात्री नीचे उतरकर स्नानादि प्रातः कृत्यों में लग गये।
स्नानादि के बाद जब खाना बनाने की तैयारी की जाने लगी तो एक नई मुसीबत आ खड़ी हुई। पता चला कि नौका में चूल्हा जलाने को लकड़ी नहीं। बाघ के डर से कोई भी ऊपर जाकर जंगल से लकड़ी तोड़ लाने को राजी नहीं हुआ। अन्त में सबको उपवास की तैयारी करते देख वृद्ध ने युवक से कहा, ‘‘भैया नवकुमार ! तुम्हीं कोई उपाय कर सकते हो, वरना हम सब मारे जाएंगे।’’
नवकुमार कुछ देर सोचने के बाद बोला, ‘‘ठीक है, मैं लकड़ी लेने जाऊंगा। कुल्हाड़ी दो, और एक आदमी दरांती लेकर मेरे साथ चले।’’
मगर नवकुमार के साथ जाने को कोई तैयार नहीं हुआ।
‘‘खाने के समय समझ लूंगा ?’’ इतना कहकर नवकुमार कमर कसकर अकेला ही हाथ में कुल्हाड़ी थामे लकड़ी लेने चल पड़ा।

रेतीली चढ़ाई पार कर नवकुमार ने देखा, जितनी दूर तक नजर जा रही है, बस्ती का कोई लक्षण नहीं। सिर्फ जंगल ही जंगल। जंगल भी ऐसा जो बड़े-बड़े पेड़ों से आच्छादित नहीं था, बल्कि कहीं-कहीं छोटे-छोटे पौधों के छुटपुट झुण्ड खड़े थे नवकुमार को उनमें चूल्हे जलाने लायक लकड़ियां नजर नहीं आयीं, सो उसे उपयुक्त लकड़ी की खोज में नदी तट से अधिक दूर जाना पड़ा। अन्त में उसे ऐसा एक पेड़ मिल गया, जिसे काटा जा सके। उसने आवश्यकतानुसार लकड़ियां काट लीं। लकड़ियों को ढो कर ले चलना भी कम समस्या नहीं थी। नवकुमार गरीब घराने का नहीं था। इन कामों का उसे बिल्कुल अभ्यास नहीं था। बिना भली-भांति सोच-विचार किए वह लकड़ी काटने आ गया था। मगर अब लकड़ी का भार उसे बेहद कष्टकारक लग रहा था। जो भी हो, जिस काम का उसने बीड़ा उठाया था, उससे पीछे हटने का उसका स्वभाव नहीं था। किसी तरह लकड़ियों का बोझा उठाए वह आगे बढ़ा। कुछ दूर आगे बढ़ता, फिर रुककर थोड़ा विश्राम करता। इसी तरह वह आगे बढ़ता रहा।
इससे हुआ यह कि नवकुमार को वापस लौटने में देर होने लगी। उधर उसके सह-यात्री इतना विलम्ब देखकर उद्विग्न हो उठे थे। उन्हें आशंका हो रही थी कि नवकुमार को बाघ ने मार डाला है। जब दोपहर हो गई तो उनकी यह आशंका विश्वास में बदल गयी। हां, यह साहस किसी को नहीं हुआ कि कुछ दूर जाकर उसकी खोज-खबर ले।

यात्रीगण इसी प्रकार की एक-दूसरे से बातें कर रहे थे कि समुद्र में तेज तरंगें उठने लगीं। नाविक समझ गये कि ज्वार आ रहा है। नाविक खुद जानते थे कि इन स्थानों में ज्वार का जब वेग उठता है तो तटों पर तरंगों का इस कदर आघात होता है कि तट से लगी नौकायें चूर-चूर हो जाती हैं। इसलिए उन्होंने जल्दी-जल्दी नौका के बंधन खोल दिये और नदी के बीचोंबीच जाने लगे। नौका के वहां से हटते ही अगले पल सारा रेतीला तट पानी से भर गया। यात्रियों को सिर्फ इतना ही मौका मिला था कि वे नौका में चढ़ सकें, उनका कुछ तट-भूमि पर रह गया था, सब समुद्र में जा पड़ा। दुर्भाग्यवश नाविक सुनिपुण नहीं थे, उनसे नौका सम्भाली नहीं गई, प्रबल जल प्रवाह के वेग में नौका रसूलपुर नदी के बीच जा पड़ी।
एक यात्री बोला, ‘‘नवकुमार तो रह गया।’’

जवाब में एक माझी बोला, ‘‘ओह तुम्हारा नवकुमार क्या अभी बचा होगा। उसे सियारों ने कब का खा लिया होगा।’’
वे नौका को जल-स्रोत के सहारे रसूलपुर नदी के बीचोंबीच आगे बढ़ाने लगे। वापसी में ज्यादा कष्ट होगा, इसलिये नाविक प्राणप्रय से नदी के भीतर भाग से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे। किंतु नौका जैसे ही बाहर आने लगी, वैसे ही वहां के प्रबलतर स्रोत के उत्तरमुखी होकर तीर के वेग से चल पड़ी। नाविक उसे जरा भी काबू में नहीं कर सके, नौका फिर वापस नहीं जा सकी।
जब पानी इतना मंद हो गया कि नौका की गति को सैंयत किया जा सके, तब यात्रीगण रसूलपुर का मुहाना पार करके काफी दूर तक आ चुके थे। अब नवकुमार के लिए वापस जाया जा सकता है कि नहीं, इस बारे में सोच-विचार हुआ। यहीं पर यह बताना आवश्यक है कि नवकुमार के सहयात्री उसके पड़ोसी मात्र थे, कोई भी आत्मीय या रिश्तेदार नहीं था। उन्होंने सोच-विचार करके तय पाया कि यहां से अब तट तक जाना मुमकिन नहीं। भाटा आने पर ही जाना संभव था। फिर वहीं रात हो जाएगी और रात को नौका चलाकर आना मुश्किल था, इसका मतलब यह हुआ कि अगले दिन के ज्वार की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इतने लंबे अरसे तक सबको भूखा-प्यासा रहना पड़ेगा। दो दिन की भूख-प्यास से तो सबके प्राण सूख जाएंगे। फिर नाविक भी वापस जाने को तैयार नहीं थे, वे किसी की बात ही नहीं सुन रहे थे, वे कह रहे थे कि नवकुमार को बाघ ने मार डाला होगा। यह संभव भी था, तो इतना कष्ट झेलने का क्या प्रयोजन।

इस तरह सोच-विचार करके यात्रियों ने आगे बढ़ना उचित समझा नवकुमार को उसी भीषण समुद्र तीर पर अकेला छोड़ दिया।
यह सुनकर अगर कोई प्रतिज्ञा करे कि कभी भी दूसरे की भूख मिटाने के लिए लकड़ी ढोने नहीं जाएगा तो यह उपहासजनक होगा। आत्मोपकारी को वनवास में अकेला छोड़ जाना जिनके लिए स्वाभाविक है, वे हमेशा आत्मोपकारी को वनवास में अकेला ही छोड़ आएंगे। मगर ऐसा करने वाले जितनी बार भी यह करें, दूसरों के लिए लकड़ी ढोकर लाना जिनका स्वभाव है, वह बार-बार दूसरों के लिए लकड़ी ढोकर लाएंगे। मान लिया कि भूमि अधम है, मगर इस कारण मैं उत्तम क्यों न हूंगा ?

तृतीय परिच्छेद
(जंगल में)


-‘‘Like a veil
Which if withrawn would but disclose thr frown of one who hates us, so the night shown and grimly darkled o’er there faces pale and hopeless eyes.’’ –Don Juan
जिस स्थान से नवकुमार को छोड़कर यात्री चले गये थे, वहां कुछ दूर दौलतपुर व दरियापुर नाम के दो छोटे गांव अब आबाद हैं, मगर जिस समय का वर्णन हम कर रहे हैं, उस समय वहां मानवों का वास नहीं था। बस, चारों ओर जंगल ही जंगल था। किंतु बांग्ला-देश की दीगर जमीनें जिस तरह हरी-भरी हैं, यह प्रदेश वैसा नहीं था। रसूलपुर के मुहाने से सुवर्णरेखा तक अबाध रूप से कई योजन तक सड़क की तरह बालू के ढूहों की श्रेणी फैली हुई थी। अगर ये ढूह कुछ ऊंचे होते तो बालू की छोटी-मोटी पहाड़ियां ही कहलाते। आजकल लोग उसे बालियाड़ि कहते हैं। इस सारी बालियाड़ि की धवल शिखर माला दोपहर की सूर्य किरणों में दूर से ही चम-चम कर जगमगाती है। उसके ऊपर ऊंचे पेड़ नहीं उगते थे। ढूहों के नीचे सामान्य-सा छोटा-मोटा जंगल उग आता है। हां, मध्य भाग में या ऊपरी हिस्से में प्रायः छाया-शून्य धवल-शोभा ही विराज करती। निचले हिस्से में घुमावदार वृक्षों के बीच झाड़ियां, लताएं और वन-फूल ही अधिक होते।

ऐसे ही नीरस स्थान पर नवयुवक संगी-साथियों द्वारा परित्यक्त हुआ था। लकड़ी ढोकर वह सबसे पहले नदी तट पहुंचा था, मगर वहां नौका नजर नहीं आयी तो उसे अचानक डर ने घेर लिया फिर भी यह खयाल नहीं आया कि संगी-साथी उसे एकदम छोड़कर चले गये हैं। सोचा जवार का पानी चढ़ने से तटीय भूमि जलमग्न हो गयी होगी, अतः कहीं आस-पास ही नौका ने आश्रय लिया होगा। जल्दी ही लोग उसे खोज लेंगे। इसी आशा में कुछ देर तक वहां बैठकर वह संगी-साथियों की प्रतीक्षा करने लगा। मगर नौका नहीं आयी, संगी-साथी भी नजर नहीं आये। भूख के मारे नवकुमार का बुरा हाल हो गया। अधिक प्रतीक्षा नहीं की जा सकी तो वह नौका की खोज में नदी के किनारे-किनारे घूमने लगा। कहीं भी नौका का पता न चल सका। वापस लौटकर वह पहले स्थान पर जा पहुंचा। नौका का दूर-दूर तक कोई चिह्न न पाकर उसे लगा, शायद ज्वार के वेग से नौका बहती हुई कहीं दूर निकल गयी है और अब प्रतिकूल स्रोत में वापस आने में संगी-साथियों को विलम्ब हो रहा है। मगर ज्वार भी खत्म हो गया तो सोचा, प्रतिकूल स्रोत के जोरदार वेग की वजह से नौका वापस नहीं आ पा रही है, भाटे में जरूर आएगी किंतु भाटा भी धीरे-धीरे बहुत बढ़ गया, यहां तक कि दिन ढल गया, सूर्यास्त हो गया, अगर नौका को वापस आना होता तो अब तक आ गयी होती।

अंत में नवकुमार को लगा, शायद ज्वार की तेज तरंगों में नौका डूब गयी है, अथवा इस विजन से कहीं दूर चली गयी है।
नवकुमार को समझ में नहीं आया कि अब क्या करे ? आसपास न कोई गांव था और न कोई आश्रय। न खाना, न पीना। नदी का पानी बेहद नमकीन था। भूख-प्यास से उसका हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा था। ठण्ड से बचने का कोई उपाय नहीं था। शरीर पर जो कपड़े थे, वे अपर्याप्त थे। क्या इस ठण्डी-बर्फीली हवा में नदी किनारे ओस टपकाते आकाश-तले निराश्रित-निरावरण सोना पड़ेगा ? आधी रात में बाघ और उल्लू आ गये तो....? प्राण-नाश तय है।
बेचैनी के कारण नवकुमार से अधिक देर तक बैठा भी नहीं गया। किनारा छोड़कर वह फिर ऊपर को चल पड़ा। इधर-उधर निरुद्देश्य घूमने लगा। क्रमशः अंधेरा बढ़ता गया। शिशिराकाश में तारे निःशब्द फूटने लगे, वैसे ही जैसे नवकुमार के स्वदेश में फूटते थे। अंधकार में चारों दिशाएं जनहीन थीं, आकाश, प्रांतर, समुद्र सब ओर नीरवता। बस सिर्फ समुद्र की लहरें गरज रही थीं और वन्य पशुओं का शोर....!

नवकुमार उसी अंधकार में ओस टपकाते आकाश-तले बालू के ढूहों के चारों ओर घूम-फिर रहा था। कभी ऊपर, कभी बीच में, कभी ढूहों के नीचे तो ढूहों के शिखर पर उसका टहलना जारी था। यों चलते-चलते दबे पांव किसी हिंस्र पशु द्वारा आक्रांत होने की संभावना थी, पर एक जगह बैठे रहने पर भी तो यही आशंका।
चलते-चलते नवकुमार थक गया। सारे दिन का भूखा था, थकान से अधिक आसन्न हुआ। एक जगह बलियाड़ी के पार्श्व में पीठ सीधी करने को बैठ गया। घर की आरामदायक शैया याद आ गयी। जब शारीरिक व मानसिक कष्ट के अवसाद से चिंता सताती है तो कभी-कभी नींद भी आ जाती है। नवकुमार सोचते-सोचते तन्द्राभिभूत हो गए। लगता है, अगर ऐसा न हो तो सांसारिक कष्टों का अप्रतिहत वेग सभी सब समय सह नहीं पाते।

चतुर्थ परिच्छेद
(स्तूप-शिखर पर)


-‘सविस्मय से देखा पास ही,
एक अत्यंत दर्शनीय मूर्ति।’ -मेघनाद-वध
जब नवकुमार की नींद टूटी, रात आधी से ज्यादा गुजर चुकी थी। अब तक बाघ ने उस पर हमला नहीं किया, यही उसे आश्चर्य हो रहा था। उसने इधर-उघर ताक कर देखा, बाघ आ रहा है कि नहीं। अकस्मात् सामने बहुत दूर रोशनी नजर आयी। कहीं भ्रम न हो, इसलिए नवकुमार ध्यान लगाकर उस तरफ देखने लगा। रोशनी का दायरा धीरे-धीरे बढ़ने लगा तथा अधिक उज्ज्वल होने लगा। लगा, आग की रोशनी है यह। नवकुमार की जीवन-आशा एक बार फिर उद्दीप्त हो उठी। मानव-समागम के बिना इस रोशनी का अस्तित्व संभव नहीं था। यह दावानल का समय भी नहीं था। नवकुमार उठ खड़ा हुआ। जिधर से रोशनी आ रही थी, उधर ही चल पड़ा। एक बार सोचा, ‘‘क्या यह रोशनी भौतिक है ?’’ हो भी सकती है। किंतु शंका में पड़े रहकर भला जीवन-रक्षा हो सकती है ? यह सोचकर वह निर्भीकता से रोशनी की दिशा की ओर बढ़ता गया। वृक्ष, लताएं व बालुका-स्तूप कदम-कदम पर उसे बाधा पहुंचा रहे थे। वृक्ष-लताओं को पद-दलित करता हुआ और बालुका स्तूपों को लांघता हुआ नवकुमार चलता रहा। रोशनी के नजदीक पहुंचकर उसने देखा, एक बहुत ऊंचे बालुका-स्तूप के शिखर पर आग जल रही है। उस रोशनी में शिखर पर बैठी एक मानव-मूर्ति आकाशपटस्थ चित्र की तरह नजर आ रही थी। नवकुमार ने तय किया कि वह शिखरासीन मानव के पास जाएगा, सो उसकी ओर तेज गति से बढ़ गया। अन्त में स्तूप पर चढ़ने लगा। तभी किंचित शंका होने लगी, फिर भी दबे पांव स्तूप की चढ़ायी जारी रखी।
आसीन व्यक्ति के सामने पहुंचकर उसने जो कुछ देखा, उससे रोमांचित हो उठा वहीं खड़ा रहे या चला जाए, यह एकाएक वह तय नहीं कर पाया।

शिखरासीन व्यक्ति आंखें मूंदे ध्यान मग्न था। नवकुमार ने पहले यह लक्ष्य नहीं किया था। उसने देखा, उसकी उम्र लगभग पचास साल होगी। शरीर पर एक भी सूती वस्त्र नजर नहीं आया, बस, कमर से घुटनों तक शार्दूल-चर्म आवृत था। गले में रुद्राक्ष माला, चौड़ा चेहरा सफेद जटाओं से घिरा हुआ। सामने लकड़ियां जल रही थीं, इस आग की रोशनी को देखकर नवकुमार इस स्थान पर आ पहुंचा था। नवकुमार को एक विकट दुर्गंध का अहसास हुआ। व्यक्ति के आसन की ओर नजर गई तो दुर्गंध के कारण का पता चला। जटाधारी व्यक्ति एक छिन्नशीर्ष सड़े-गले शव के ऊपर बैठा था। भयभीत होकर उसने यह भी देखा कि सामने नरकंकाल पड़ा था, जिसमें रक्तवर्ण द्रव-पदार्थ लगा था। चारों तरफ जगह-जगह हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। यही नहीं। योगाशीन व्यक्ति के कण्ठ में जो रुद्राक्ष माला थी, उसमें भी बीच-बीच में छोटी-छोटी हड्डियां गुथी हुई थीं। नवकुमार मंत्र-मुग्ध-सा खड़ा रहा। आगे बढ़े या यहां से चला जाए, यह समझ में ही नहीं आया। उसने कापालिकों के बारे में सुन रखा था। समझ गया कि यह व्यक्ति कापालिक है।
जब नवकुमार यहां पहुंचा था, कापालिक मंत्र-साधना में या जाप में या ध्यान में मग्न था। नवकुमार को देखकर उसने पलक भी नहीं झपकाई। काफी देर के बाद पूछा, ‘‘कौन हो ?’’
नवकुमार ने जवाब दिया, ‘‘ब्राह्मण।’’
कापालिक बोला, ‘‘खड़े रहो।’’ यह कहकर वह फिर ध्यान-मग्न हो गया।

नवकुमार खड़ा रहा।
इस तरह एक प्रहर गुजर गया। अन्त में कापालिक उठ खड़ा हुआ और नवकुमार से पहले कि तरह संस्कृत में बोला, ‘‘मेरा अनुसरण करो।’’
यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि कोई और समय होता तो नवकुमार उसका साथ कभी नहीं देता। मगर इस समय भूख-प्यास से उसका बुरा हाल था। सो बोला, ‘‘प्रभू की जैसी आज्ञा। मगर मैं भूख-प्यास से बेहद व्याकुल हूं। कृपया बताएं, कहां जाकर आहार मिलेगा।’’
कापालिक बोला, ‘‘भैरवी प्रेरतोहसि; मामनुसर, परितोषः ते भविष्यति।’’
नवकुमार कापालिक के पीछे-पीछे चल पड़ा। दोनों ने काफी लंबा रास्ता तय किया-रास्ते में कोई किसी से बोला नहीं। अन्त में एक पर्ण कुटी मिली। उसमें पहले कापालिक ने प्रवेश करके नवकुमार को अन्दर आने की अनुमति दी फिर न जाने किस उपाय से एक टुकड़ा काठ जलाया, जिसका पता नवकुमार को भी नहीं लगा। नवकुमार ने उस रोशनी में देखा, सारी कुटी केले के पत्तों से बनी थी। उसमें कई व्याघ्र-चर्म भी थे। एक कलसी में पानी और कुछ फल-मूल भी रखे थे।
कापालिक अग्नि जलाकर बोला, ‘‘फल-मूल जो कुछ रखा है, तुम खा सकते हो। पत्तों का पत्र बनाकर कलसी से पानी पी लेना। व्याघ्र-चर्म रखे हैं, इच्छा हो तो इनको बिछाकर सो जाना निश्चिंत होकर रहो, बाघ से डरना मत। वक्त आने पर मुझसे मुलाकात होगी। जब तक मुलाकात हो, यह कुटी छोड़कर चले मत जाना।’’
यह कहकर कापालिक ने प्रस्थान किया।
नवकुमार ने वही सामान्य फल-मूल खाकर तथा वही गर्म पानी पीकर परम तृप्ति का अनुभव किया। फिर व्याघ्र-चर्म पर लेट गया, दिन भर थका होने की वजह से शीघ्र ही नींद की गोद में सो गया।

पंचम परिच्छेद
(समुद्र-तट पर)


‘-योगप्रभावों न च लक्षते ते।
विभर्षि चाकारमनिर्ध्व तानाः मृणालिनी हैममिबो परायाम्।’ –रघुवंश
सुबह उठकर नवकुमार सहज ही कुटी छोड़कर जाने का उपाय सोचने में व्यस्त हो गया, यह जरूरी इसलिए भी था कि कापालिक के सान्निध्य में किसी तरह भी रहना उसे उचित नहीं प्रतीत हो रहा था। मगर इस पथहीन जंगल में से वह आखिर किस प्रकार बाहर निकले ? भला किस प्रकार पथ खोजकर वह यहां से जाए ? कापालिक अवश्य पथ से परिचित होगा, पूछने पर वह क्या बताएगा नहीं ? अब तक ऐसा कोई कारण नहीं नजर आ रहा था जिससे लगा हो कि कापालिक ने उसके प्रति कोई सन्देहजनक आचरण किया हो, फिर उससे डरने की क्या जरूरत ? उधर कापालिक ने उसे दुबारा मुलाकात करने तक कुटी छोड़कर जाने को मना कर रखा था, इसका उल्लंघन किया तो हो सकता है कि, वह क्रोधित हो जाए। नवकुमार ने सुन रखा था कि कापालिक लोग मंत्र-बल से असाध्य को साध लेने में सक्षम होते हैं। इस कारण उनके आदेश का उल्लंघन करना अनुचित होगा, यह सोचकर नवकुमार ने आखिरकार कुटी में ही बैठे रहना तय कर लिया। किन्तु धीरे-धीरे दोपहर का वक्त हो आया, फिर भी कापालिक वापस नहीं आया। पूरे दिन का उपवास और अब तक ढंग से कुछ खाया-पिया भी नहीं था, सो उसकी भूख अत्यन्त प्रबल हो उठी थी। कुटी में थोड़ी-सी मात्रा में जो फल-मूल रखे थे उन्हें वह रात को ही खा चुका था। अब कुटी से बाहर निकलकर फल-मूल की तलाश किए बगैर भूख से प्राण बचेंगे नहीं। थोड़ा दिन रहते भूख से व्याकुल होकर नवकुमार फलों की खोज में बाहर निकला।

नवकुमार फलों की खोज में पास के सारे बालूका-स्तूपों के चारों ओर घूमने लगा। जो दो-एक वृक्ष बालू में उगे हुए थे उनके फल तोड़कर देखा कि एक वृक्ष के फल बादाम की तरह अत्यन्त स्वादिष्ट थे, उन्हें ही खाकर वह भूख मिटाने लगा। वह बालूका स्तूप-श्रेणी छोटे-से इलाके में फैली हुई थी। अतएव नवकुमार ने थोड़ी देर में ही घूम-घामकर वह इलाका पार कर लिया। दूसरी तरफ वह बालूहीन घने जंगल में आ पड़ा। जिन लोगों ने थोड़ी देर के लिए अनजाने जंगलों में भ्रमण किया है, वे जानते हैं कि पथहीन जंगल में जरा-सी देर में ही इंसान रास्ता भूल जाता है। नवकुमार के साथ ऐसा ही हुआ। कुछ दूर आकर आश्रम किस रास्ते में छोड़ आया, वह उसकी समझ में नहीं आ रहा था।
एकाएक कानों में गंभीर जल-कल्लोल का स्वर सुनायी दिया। समझ गया कि यह समुद्र की लहरों की गर्जन है। थोड़ी देर के बाद अचानक वन से बाहर निकल कर देखा, सामने ही समुद्र है। अनन्त विस्तार में फैले नीले जल को सामने देखकर उसके आनंद का पारावार न रहा। बालू फैले तट पर जाकर वह बैठ गया। फेनिल, नीला, अनन्त समुद्र। दोनों तरफ जहां तक नजर जा रही थी, उतनी दूर तक लहजती-गरजती लहरों की रेखाएं मचल रही थीं। लहरें तटों तक आकर बालू में खो जाती थीं। नीले पानी में अनगिनत स्थानों पर भी फेनिल तरंगें मचल रही थीं। अगर कभी ऐसी प्रचण्ड हवा बहे कि उसके वेग से आकाश के तारे टूट-टूट कर सागर में डूबनें-उतराने लगें, तब जाकर लहरों के मचलने का दृश्य आँखों के आगे साकार हो सकता है।


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