सीताराम - बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय Sitaram - Hindi book by - Bankim Chandra Chattopadhyay
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सीताराम

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :118
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3562
आईएसबीएन :81-288-0319-0

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नारी जीवन पर आधारित उपन्यास.....

Sitaram

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगला के शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनकी लेखनी से बंगाल साहित्य तो समृद्ध हुआ ही है, हिन्दी भी उपकृत हुई है। उनकी लोकप्रियता का यह आलम है कि पिछले डेढ़ सौ सालों से उनके उपन्यास विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो रहे हैं और कई-कई संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। उनके उपन्यासों में नारी की अन्तर्वेदना व उसकी शक्तिमत्ता बेहद प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई है। उनके उपन्यासों में नारी की गरिमा को नयी पहचान मिली है और भारतीय इतिहास को समझने की नयी दृष्टि।

वे ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में सिद्धहस्त थे। वे भारत के एलेक्जेंडर ड्यूमा माने जाते हैं।

सीताराम
प्रथम खण्ड
1

बंगाल में भूषणा नाम की एक नगरी थी। आजकल इसे ‘भूसनो’ कहते हैं। भूषणा नगरी में एक सेनापति था। उस समय सेनापति ही शासक होता था। यह करीब एक सौ अस्सी वर्ष पहले की बात है। नगरी में एक फकीर रात के समय रास्ते पर सोया हुआ था फकीर इस तरह लेटा हुआ था कि सारा रास्ता ही रुका था। तभी उधर एक राहगीर आया। राहगीर बड़ी जल्दी में था। फकीर को रास्ता रोककर सोया देखकर वह क्रुद्ध हो उठा पर शांत हो गया।
राहगीर हिन्दू था और उत्तर राढी कायस्थ था। नाम था गंगाराम दास। वह जवान था। वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया था। वह चिकित्सक को बुलाने जा रहा था। क्योंकि उसकी मां बीमार पड़ी थी।

उस समय मुसलमान फकीरों का पड़ा सम्मान होता था। अकबर बादशाह स्वयं इस्लाम पर यकीन न रखने वाले एक फकीर की राय मानते थे। हिन्दू लोग भी फकीरों का बड़ा सम्मान करते थे। उन्हें जो नहीं मानते थे, उनसे वे भी डरते थे। गंगाराम सोते हुए फकीर के ऊपर से लांघकर जाने की हिम्मत न कर सका और कहा—‘‘शाह साहब सलाम ! जरा मुझे रास्ता दीजिये।’’
परन्तु शाह साहब ने न तो राह दिया और न ही कुछ बोले। गंगाराम ने हाथ जोड़कर कहा—‘‘अल्लाह आपको इस भले का बदला देगा। मैं मुश्किल में हूं, मुझे जाने दीजिए।’’
इस पर भी शाह चुप रहे। गंगाराम की विनती व्यर्थ ही रही। आखिर गंगाराम फकीर के ऊपर से लांघ गया। लांघते वक्त उसका पांव फकीर से छू गया। पर यह हरकत भी फकीर की ही थी। गंगाराम मुश्किल में था। वह चिकित्सक को बुलाने चला गया।

गंगाराम चिकित्सक को बुला लाया। चिकित्सक ने उसकी मां को देखा। मां की नब्ज टूटती जा रही थी और आवाज रूंध गई थी। दवा के लिए उसे दो-चार बार आवाज लगाई। आखिर में उसे तुलसी के नीचे लिटा दिया गया। तुलसी के नीचे भगवान-भगवान का स्मरण करती हुई वह स्वर्ग सिधार गई गंगाराम की मां का अंतिम संस्कार उसके पड़ोसियों ने मिल कर दिया।
गंगाराम अंतिम संस्कार करके अपने पड़ोसियों के साथ जब लौट रहा था तो अस्त्रों से लैस दो सिपाहियों ने गंगाराम को पकड़ लिया। सिपाही डोम जाति के थे, गंगाराम उनके स्पर्श से बड़ा दुःखी हुआ। सिपाहियों के साथ वही साह साहब भी थे।’’ मुझे क्यों पकड़ रहे हो ? कहां ले जा रहे हो ? क्या किया है मैंने ?’’ गंगाराम ने घबराकर पूछा।
शाह साहब ने कहा—‘‘बदमाश ! बदतमीज ! चल।’’ सिपाही धक्का देकर उसे ले चले।

एक सिपाही ने उसे धक्का देकर गिरा दिया। दूसरे ने मारते हुए उठाया। फिर एक उसे बांधने लगा। दूसरा उसकी बहन को पकड़ने के लिए दौड़ा। लेकिन वह बचकर भागी। गंगाराम के पड़ोसियों का अता-पता नहीं था। गंगाराम को मारते-पीटते काजी के पास लेकर पहुंचे। फकीर अपनी दाढ़ी खुजलाता हुआ हिन्दुओं को गाली बकता हुआ साथ गया।
गंगाराम को काजी के सामने ले जाया गया। फरियाद करने वाले शाह साहब और फैसला करने वाले भी शाह साहब थे। उसके लिए काजी ने गद्दी छोड़ दी। फकीर की तमाम बातें सुनने के बाद काजी ने गंगाराम को जीवित कब्र में दफन कर देने का हुक्म दिया। सभी यह सजा सुनकर कांप उठे। गंगाराम ने मन में सोचा-जो होना था सो तो हो चुका, अब क्यों न मन का बोझ हल्का कर लूं।

सोचकर गंगाराम ने शाह साहब के मुंह पर एक लात दे मारी। शाह-साहब ‘तोबा-तोबा’ करते जमीन पर गिर पड़े। उनके दो-चार दाँत बचे हुए थे वे बाहर आ पड़े। तभी सिपाहियों ने दौड़कर गंगाराम को पकड़ लिया और बेड़ियां डाल दीं। उसे गंदी-गंदी गालियां देते हुए जेल में डाल दिया। उस दिन शाम हो चुकी थी। अगले दिन जिन्दा दफना दिया जाएगा।


2



गंगाराम की बहन पेड़ के नीचे बैठी रो रही थी, उसे पता चला कि कल उसके भाई को जिन्दा जमीन में गाड़ दिया जायेगा तो वह खड़ी हुई। आंसू पोंछकर साड़ी कसकर बांधी।
गंगाराम की बहन उससे छोटी थी। उम्र करीब पच्चीस, वर्ष की थी। मां और बहन के सिवा परिवार में और कोई न था। मां के बीमार रहने के कारण घर का काम श्री ही करती थी। वह तो विवाहिता पर दुर्भाग्य से पति के साथ सान्निध्य से वंचित थी।

घर में शालिग्राम की एक प्रतिमा थी। जिसे श्री और उसकी मां साक्षात् भगवान मानती थीं। श्री ने आज जूड़ा कसा और शालिग्राम की मूर्ति के सामने खड़े होकर मन-ही-मन प्रणाम किया—‘‘हे नारायण ! हे दीनदयाल ! हे करुणा-निधान ! आज मैं जो कार्य करने जा रही हूं तुम उसमें मेरी मदद करना। मैं औरत के रूप में अत्यंत पापी हूं, मेरे करने से क्या होगा। भगवान ! तुम ही मेरी मदद करना।’’

श्री घर से चली। पांच कौड़ी बुढ़िया मां उसकी पड़ोसी थी। श्री मां का इस पड़ोसन से बड़ा प्रेम था। वह उसके कई काम-काज भी किया करती थी। श्री ने उसके पास जाकर उसके कान में कुछ कहा। तत्पश्चात दोनों राजपथ से निकलकर अंधियारी गलियां पार कर पैदल चली। उस समय नगरी में पक्के मकान अधिक न थे। पर भूषणा नगरी में ज्यादातर पक्के घर ही थे, कुल ऊंची इमारत भी थीं। दोनों एक बड़ी इमारत के सामने जाकर ठहरीं। सामने एक पक्की बावड़ी थी, जहां किनारे पर कई दरबान बैठे थे। उनमें से कोई भांग घोट रहा था, कोई टप्पा गा रहा था। कोई गांव की बात कह रहा था। पांच कौड़ी की मां ने उनमें एक को आवाज देकर कहा—‘‘पांडे महाराज ! जरा भंडारी को बुला दो।’’
दरबान ने कहा—‘‘हम पांडे नहीं, मिसिर हैं।’’

‘‘बेटा ! यह तो मुझे पता नहीं पांडे कैसा ब्राह्मण होता है। मिसिर जैसा ही तो होता है !’’
मिसिर प्रसन्न होकर बोला—‘‘भंडारी से क्या काम है ?’’
‘‘हमारे घर में सब्जी के लिए लौकी–कुम्हड़ा हुए हैं। उनसे कहना है, कल आकर तोड़ ले जायें।’’
‘‘ठीक है, मै कह दूंगा। तुम घर जाओ।’’
‘‘महाराज ! क्या कहते हो तुम ! वह कैसे जानेगा कि सब्जी कहां से लानी है।’’
‘‘तो अपना नाम बता दो।’’
‘‘चल अभागे बेटे ! एक लौकी तुम्हें ही दे देती पर वह तुम्हारे भाग्य में कहां ’’
मिसिर महाराज ड्योढ़ी के अंदर गये और भंडारी को बताया कि एक तरकारी वाली आई है, तुम्हें और मुझे कुछ मिलने की संभावना है।’’

जीवन भंडारी अधेड़ अवस्था का था। उसकी कमर में चाबियों का गुच्छा लटक रहा था। वह वैसे तो रूखे व्यवहार का था पर कुछ मिलने की आशा से जल्दी ही आया। उसने पूछा —‘‘किसने बुलाया है।’’
पांच कौड़ी की मां ने कहा—‘‘हमारे घर में कुछ सब्जी हुई है—यही कहने आयी हूं। थोड़ी इन मिसिर महाराज को दे देना, थोड़ा अंदर मालिक को पहुंचा देना।’’
‘‘कहां है तुम्हारा घर ? मैं कल आऊंगा ?’’
‘यह एक दुःखी लड़की है, इसकी भी जरा फरियाद सुन लो।’’
श्री घूंघट निकाले दीवार से सटी खड़ी थी। जीवन भंडारी ने उसकी तरफ देखकर रूखे स्वर में कहा, ‘‘मैं भीख-वीख की बात दरबार मैं न कह पाऊंगा।’’

तब पांच कौड़ी की मां विनती भरे स्वर में बोली—‘‘जो भीख में मिलेगा उसका आधा तुम्हारा।’’
तब भंडारी खुश होकर बोला—‘‘भीख के लिए तो हमारे सरकार का दरवाजा हमेशा खुला है।’’
भंडारी को श्री ने भीख का मतलब बताया तो वह उसे मालिक के पास ले गया।
श्री घूंघट निकाले दरवाजे पर कांपती हुई खड़ी हो गयी। भंडारी वहां से चला गया।
मालिक ने पूछा—‘‘कौन हो तुम।’’
‘‘मेरा नाम श्री है।’’

‘‘श्री ! तुम मुझे जानती नहीं और बिना जाने मेरे पास आ गयीं। मैं सीताराम राय हूं।’’
श्री ने तब घूंघट हटा दिया। सीताराम ने देखा, उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था और बड़ा सुन्दर लग रहा था। उसने कहा—‘‘तुम तो बड़ी सुन्दर हो।’’
वह रोते हुए बोली—‘‘मैं बड़ी दुःखी हूं। तुम्हारे व्यंग्य के लायक नहीं हूं।’’
‘‘इतने दिनों बाद आकर रो क्यों रही हो ?’’ फिर भी श्री रोती रही। बोली कुछ नहीं।
‘‘नजदीक आओ।’’
श्री बड़े मधुर स्वर में बोली—‘‘मैं आपका बिछौना न छुऊंगी, सूतक में जो हूं।’’
‘कैसे?’’
‘‘आज मेरी मां मर गई है।’’
‘‘फिर इसीलिए मेरे पास आई हो ?’’
‘‘नहीं। अपनी मां का क्रिया कर्म तो मैं स्वयं ही करूंगी। तुम्हें इसके लिए कष्ट न दूंगी पर मुझ पर एक और ही बड़ा संकट आ पड़ा है।
‘‘कौन-सा कष्ट आ पड़ा है ?’’
‘‘आज मेरा भाई मरने जा रहा है। वह इस समय कारागार में है। उसे काजी ने जिन्दा जमीन में गाड़ देने का हुक्म दिया है।’’

‘‘वह क्यों ? क्या किया था उसने ?’’
श्री ने जो कुछ देखा-सुना था, सारा वृत्तांत रोकर उसे सुना दिया। सुनकर दुःख भरे स्वर में सीताराम बोले—‘‘अब क्या यत्न है ?’’
‘‘तुम ही कोई उपाय कर सकते हो। इसलिए इतने दिनों बाद आई हूं।’’
‘‘मैं क्या कर सकता हूं’’
‘‘तुम नहीं तो फिर कौन करेगा मुझे पता है, तुम सब कुछ कर सकते हो ?’’
‘‘काजी दिल्ली के बादशाह का नौकर है और बादशाह से टकराने का साहस कौन कर सकता है।’’
‘‘फिर क्या अन्य कोई उपाय नहीं है ?’’

कुछ सोचकर सीताराम बोले—‘‘तुम्हारे भाई को बचाने का उपाय तो है लेकिन मैं नहीं बचूंगा।’’
‘‘अगर तुम एक गरीब दुःखी को बचा लोगे तो कुछ न बिगड़ेगा। एक हिन्दू की रक्षा ने हिन्दू करेगा तो फिर कौन करेगा।’’
‘‘मैं तुम्हारे भाई को हर कीमत पर बचाऊँगा। यह मेरा प्रण है।’’
श्री मन-ही-मन खुश होकर घूंघट निकालकर वहां से चल पड़ी।
सीताराम ने भीतर से दरवाजे की कुंडी चढाकर नौकर से कहा, उसे कोई न पुकारे। वह श्री के बारे में सोचने लगे। ऐसी सुन्दर है श्री, मुझे पता भी न था। मैं सब कुछ छोड़कर उसका काम पहले करूंगा। हिन्दू का काम हिन्दू न करेगा तो फिर कौन करेगा ?




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