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गजलें और शायरी >> दर्द चमकता है

दर्द चमकता है

सुरेश कुमार

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3568
आईएसबीएन :81-288-1226-2

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मुजफ्फर वारसी की गजलें

Dard Chamakta Hai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पाकिस्तानी शायरी में मुज़फ़्फ़र वारसी का एक नाम जगमगाते हुए नक्षत्र की तरह है। उन्होंने यद्यपि उर्दू शायरी की प्रायः सभी विद्याओं में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी है। किन्तु उनकी लोकप्रियता एक ग़ज़लगो शायर के रूप में ही अधिक है।

मिरी जिंदगी किसी और की,
मिरे नाम का कोई और है।
मिरा अक्स है सर-ए-आईना,
पस-ए-आईना कोई और है।

जैसा दिलकश और लोकप्रिय शेर कहने वाले मुज़फ़्फ़र वारसी ने साधारण बोलचाल के शब्दों को अपनी ग़ज़लों में प्रयोग करके उन्हें सोच-विचार की जो गहराइयाँ प्रदान की हैं, इसके लिए उन्हें विशेष रूप से उर्दू अदब में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
मुज़फ़्फ़र वारसी की हृदयस्पर्शी ग़ज़लों का यह हिंदी में पहला संकलन।

प्राक्कथन


पाकिस्तानी शायरी में मुज़फ़्फ़र वारसी का नाम एक जगमगाते हुए नक्षत्र की तरह है। उन्होंने यद्यपि उर्दू शायरी की प्रायः सभी विधाओं में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी है। किन्तु उनकी लोकप्रियता एक ग़ज़लगों शायर के रूप में ही अधिक है।

मिरी ज़िन्दगी किसी और की, मिरे नाम का कोई और है
मिरा अक्स है सर-ए-आईना, पस-ए-आईना कोई और है

जैसा दिलकश और लोकप्रिय शे’र कहने वाले मुज़फ़्फ़र वारसी ने साधारण बोलचाल के शब्दों को अपनी ग़ज़लों में प्रयोग करके उन्हें सोच-विचार की जो गहराइयाँ प्रदान की हैं, इसके लिए उन्हें विशेष रूप से उर्दू अदब में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

किया तवील सफ़र मैंने रास्तों के बग़ैर
मगर गुबार से सारा बदन अटा भी रहा

क़िस्मत को तारे से क्या मंसूब करूँ
तारा टूट के झोली में नहीं आ जाता

मुज़फ़्फ़र वारसी पाकिस्तान के उन चन्द शायरों में से एक हैं, जिनकी ख्याति सरहदों को लाँघ कर तमाम उर्दू संसार में प्रेम और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए खुशबू की तरह बिखरी हुई है। भारत और पाकिस्तान के अनेक विख्यात ग़ज़ल गायकों ने उनकी ग़ज़लों को अपना स्वर देकर उन्हें हिन्दी और उर्दू काव्य-प्रेमियों के बीच प्रतिष्ठित किया है। भारत से प्रकाशित होने वाली प्रायः सभी उर्दू पत्रिकाओं में कई दशकों से उनकी शायरी प्रकाशित हो रही है और वे भारत में भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने कि पाकिस्तान में।
मुज़फ़्फ़र वारसी के यहाँ हमें एक ऐसे संघर्षरत और संवेदनशील मनुष्य के दर्शन होते हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारता और उम्मीद का दामन थामे हुए अपने हालात से जूझता रहता है। प्यार और मोहब्बत की ओस में भीगी हुई उनकी ये ग़ज़लें सामाजिक और राजनीतिक चेतना से भी पूरी तरह सराबोर हैं। जिनमें हर पाठक को अपना खुद का अक्स नजर आता है।

सर से गुज़रा भी चला जाता है पानी की तरह
जानता भी है कि बर्दाश्त की हद होती है

साफ़गोई से अब आईना भी कतराता है
अब तो पहचानता हूँ खुद को भी अन्दाज़े से

तारों की तरह दर्द चमकता है मुज़फ़्फ़र
सीने में भी इक काहकशाँ हमने बना ली

‘बर्फ़ की नाव’, ‘खुले दरीचे बन्द हवा’, ‘कमन्द’ मुज़फ़्फ़र वारसी की ग़ज़लों के प्रसिद्ध उर्दू संग्रह हैं। दर्द चमकता है देवनागरी में उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है। प्रयास किया गया है कि इस संकलन में उनकी प्रायः सभी मशहूर ग़ज़लों को समाहित कर लिया जाए। हिन्दी के काव्य-प्रेमियों के लिए यह संकलन एक अभूतपूर्व उपलब्धि सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। पाकिस्तानी शायरी श्रृंखला के अंतर्गत दर्द चमकता है संकलन एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाएगा, इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है।

107, ज्वालापुरी
जी. टी. रोड, अलीगढ़-202001

सुरेश कुमार

(1)


मिरी ज़िन्दगी किसी और की  मिरे नाम का कोई और है
मिरा अक्स1 है सर-एक-आईना2,  पस-ए-आईना3 कोई और है

मिरी धड़कनों में है चाप-सी,  ये जुदाई भी है मिलाप-सी
मुझे क्या पता मिरे दिल बता,  मिरे साथ क्या कोई और है ?

न गये दिनों को ख़बर मिरी,  न शरीक-ए-हाल4 नज़र तिरी
तिरे देस में, मिरे भेस में  कोई और था, कोई और है

न मकाम का, न पड़ाव का,  ये हयात नाम बहाव का
मिरी आरजू न पुकार तू,  मिरा रास्ता कोई और है

सर-ए-कू-ए-ग़म5 जो निकल गया  तो मुज़फ़्फ़र इतना बदल गया
उसे देखकर कहे हर नज़र  ये वही है या कोई और है

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1. प्रतिबिम्ब 2. दर्पण में 3. दर्पण के पीछे 4. वर्तमान में सम्मिलित 5. पीड़ा की गली में
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(2)


फिर चाहे जितनी क़ामत1 लेकर आ जाना
पहले अपनी ज़ात2 से तुम बाहर आ जाना

तनहा तय कर लूँगा सारे मुश्किल रस्ते
शर्त ये है जब दूँ आवाज़ नज़र आ जाना

मैं दीवार पे रख आऊँगा दीप जलाकर
साया बनकर तुम दरवाज़े पर आ जाना

तुमने हमको ठुकराया ये ज़र्फ़3 तुम्हारा
जब तुमको ठुकरा दें लोग, इधर आ जाना

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1. लम्बा शरीर 2. अस्तित्व, स्वयं 3. योग्यता
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बातों का भी ज़ख़्म बहुत गहरा होता है
क़त्ल भी करना हो तो बेख़ंज़र आ जाना
तुम क्यों अपनी सतह पे हमको लाना चाहो
मुश्किल है गहराई का ऊपर आ जाना

जब थक जाये ज़ेहन् खुदाई1 करते-करते
बन्दों से मिलने बन्दापरवर आ जाना

हमने ये तहज़ीब परिन्दों से सीखी है
सुबह को घर से जाना, शाम को घर आ जाना

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1.सृष्टि
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(3)


लाख मैं खुद को छुपाता हूँ सुख़न1 से अपने
फ़ाश2 हो जाता हूँ बेसाख़्तापन से अपने

सिर्फ़ आँखें ही समझ सकती हैं लहजा उसका
काम लेता है ज़बाँ का जो बदन से अपने

अपने बेचेहरा हरीफ़ों3 में लुटा देता हूँ
अक्स चुनता हूँ जो पैराया-ए-फ़न4 से अपने

किसी का दरिया मिरी प्यास पे एहसान नहीं
अपने ही खून की बू आये ज़ेहन से अपने

सारी दुनिया से मुज़फ़्फ़र है तअल्लुक़ मेरा
ये अलग बात कि है प्यार वतन से अपने

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1. बातचीत 2. व्यक्त 3. प्रतिद्वंद्वियों 4. कला के आभूषण
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(4)


लिया जो उसकी निगाहों ने जायज़ा मेरा
तो टूट गया खुद से राब्ता1 मेरा

समाअतों2 में ये कैसी मिठास घुलती रही
तमाम उम्र रहा तल्ख़ ज़ायक़ा मेरा

चटख़ गया हूँ मैं अपने ही हाथ से गिरकर
मिरे ही अक्स ने तोड़ा है आईना मेरा

किया गया था कभी संगसार मुझको जहाँ
वहीं लगाया गया है मुजस्समा3 मेरा

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1. सम्बंध 2. श्रवणशक्तियों 3. मूर्ति
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जभी तो उम्र से अपनी ज़ियादा लगता हूँ
बड़ा है मुझसे कई साल तज्रबा1 मेरा

अदावतों2 ने मुझे ए‘तमाद’3 बख़्शा है
मोहब्बतों ने तो काटा है रास्ता मेरा

मैं अपने घर में हूँ घर से गये हुओं की तरह
मिरे ही सामने होता है तज़्किरा4 मेरा

मैं लुट गया हूँ मुज़फ़्फर हयात के हाथों
सुनेगी किसकी अदालत मुक़द्दमा मेरा

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1. अनुभव 2. शत्रुताओं 3. विश्वास 4. चर्चा
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(5)


दिल क्या बुझा धुएँ में अटा है जहान भी
सूरज के साथ डूब गया आसमान भी

सोचों को भी फ़ज़ा1 ने अपाहिज बना दिया
बैखासियाँ लगाये हुए हैं उड़ान भी

आवाज़ के चिराग़ जला तो दिए मगर
लौ की तरह भड़कने लगी है ज़बान भी

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1. वातावरण
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सदियों से फिर रहा हूँ मैं किसकी तलाश में
रस घोलने लगी है बदन में थकान भी

दो नाम तो नहीं हैं कहीं इक वजूद के
मुझसे जुदा भी है वो मिरे दरमियान भी

मैं पत्थरों में राह बनाता हुआ चलूँ
रहने न दें हवाएँ लहू के निशान भी

कितना है खुशनसीब मुज़फ़्फ़र मिरा हुनर
दुनिया मिरी हरीफ़1 भी है क़द्रदान भी

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1. प्रतिद्वंद्वी
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(6)


शिकस्त दिल की हुई तार ज़ेहन1 के टूटे
हयात तो रही, नाते हयात से टूटे

ये किरचियाँ हैं कि बिखरी हुई है बीनाई2
ख़राश चेहरों पे आई कि आईने टूटे

पड़ा जो फ़र्क़ तिरे ज़र्फ़ पर पड़ा होगा
हमारा क्या है खिलौना थे हम बने, टूटे

ये किसके हाथ में था डोर-सा वजूद अपना
कभी सिरे से, कभी दरमियान से टूटे

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1. स्मरण शक्ति 2. दृष्टि
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मैं नींद में ही सही जाग तो रहा था मगर
खुली जो आँख तो ख़्वाबों के सिलसिले टूटे

वो एक बात भी कितने रूख़ों से करता है
कि बारहा मिरी नज़रों के ज़ाविए1 टूटे

बुझा गया मिरी सांसें, मिरी रगों का लहू
खुद अपनी रोशनियों से ये कुमकुमे2 टूटे

सही न जाए मुज़फ़्फर से ज़र्ब-ए-तनहाई3
अजब नहीं कि ये शीशा पड़े-पड़े टूटे

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1. कोण 2. बल्ब 3. अकेलेपन का आघात
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