अलिफ लैला उर्फ हजार दास्तान - गिरिराजशरण अग्रवाल Alif Laila Urph Hajar Dastan - Hindi book by - Girirajsharan Agarwal
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अलिफ लैला उर्फ हजार दास्तान

गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3606
आईएसबीएन :81-284-0047-9

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बच्चों के लिए श्रेष्ठ कहानी संग्रह

Aksharo Ke Saye a hindi book by Girirajsharan Agarwal - अलिफ लैला उर्फ हजार दास्तान - गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बादशाह मोतियों की खीर देखकर हैरान रह गया। बोला, ‘क्या मोतियों की खीर खाई जाती है ?’ पिंजरे में बंद चिड़िया ने कहा, ‘आप मोतियों की खीर देखकर हैरान हो रहे हैं। लेकिन आप उस दिन हैरान क्यों नहीं हुए थे जब मलिका की बहनों ने कहा था कि मलिका ने बिल्ली के बच्चे व कुत्तों के बच्चों को जन्म दिया था। तब आपने क्यों नहीं सोचा कि क्या इंसान जानवर पैदा कर सकता है ?

अलिफ लैला उर्फ़ हजा़र दास्तान

अरब के सामाँ राजवंश में एक ऐसा शहंशाह था, जिसे अन्य शहंशाहों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त हुआ। वह इतना शक्तिशाली था कि उसके राज्य की सीमाएँ दूर-दूर तक फैल गई थीं। उसके दो बेटे थे। जिनमें बड़े का नाम शहरयार था और छोटे का नाम शाहजमाँ था। दोनों शहजादे अपनी वीरता और बुद्धिमत्ता के लिए दूर-दूर तक विख्यात थे।

पिता के देहांत के बाद बड़ा शहजादा शहरयार पिता के राजसिंहासन पर बैठा। उसने अपने छोटे भाई शाहजमाँ को समरकंद प्रांत का शासक बना दिया। बीस वर्ष तक दोनों सुख-शांति से राज्य करते रहे।

एक बार शहरयार ने अपने छोटे भाई समरकंद के शासक शाहजमाँ को मिलने के लिए बुलाया। शाहजमाँ ने शासन की व्यवस्था अपने प्रधानमंत्री को सौंप दी और बड़े भाई से मिलने के लिए चल दिया। रात को जब एक स्थान पर ठहरा तो उसे याद आया कि जो बहुमूल्य मोती बड़े भाई को भेंट में देने के लिए निकाले थे, वे महल में ही रह गए हैं। उसने उसी समय अपने दो गुलामों को साथ लिया और शहर लौट आया। वह सोचता था कि मेरे वापस आने से लोगों को परेशानी न हो इसलिए चुपचाप अपने महल में चला गया।

महल में पहुँचकर वह यह देखकर हैरान रह गया कि उसकी मलिका एक हब्शी गुलाम के साथ शयनकक्ष में उसके पलंग पर सो रही है। दुख और क्रोध से उसने अपनी तलवार निकाल ली और उन दोनों को सोई हुई दशा में ही कत्ल करके चुपचाप महल से निकल गया। अपनी बेगम की चरित्रहीनता और विश्वासघात से उसे इतना सदमा पहुँचा कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक न रही। एक स्थायी दुख और उदासी उसके तन-मन पर छा गई। यात्रा में वह कोशिश करता रहा कि अपनी पत्नी की दुश्चरित्रता और विश्वासघात को भूल जाए लेकिन उस दुखदायी घटना को भुला पाने में वह सफल नहीं हो सका।
अंत में यात्रा समाप्त हो गई। वह अपने बड़े भाई के पास पहुँच गया। बड़े भाई शहरयार ने बड़े हर्ष और उल्लास के साथ उसका स्वागत किया और अपने विशेष महल में लाकर उसे ठहराया। महल में राजसी सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। सामान्य स्थिति में शायद शाहजमाँ को अत्यधिक प्रसन्नता होती लेकिन उस हादसे के कारण उसे सुख के समस्त साधन फीके दिखाई देते थे। समस्त सुख-सुविधाओं और बड़े भाई के अत्यधिक स्नेह के बावजूद वह हर समय उदास रहने लगा। उसकी यह हालत देखकर बड़ा भाई शहरयार भी दुखी रहने लगा। उसका ख़याल था कि वह अपने बच्चों से दूर होने के कारण परेशान रहता है। शायद कुछ दिनों में उसका दिल बहल जाएगा।

एक दिन शहरयार ने शाहजमाँ से शिकार पर चलने के लिए कहा लेकिन तबियत ठीक न होने का बहाना करके उसने जाने से मना कर दिया। विवश होकर शहरयार अकेला ही शिकार खेलने चला गया।

शाहजमाँ अपने कमरे में बैठा बाग़ की ओर देख रहा था लेकिन पिछली घटना के कारण वह बेहद परेशान था। अचानक सामने महल का दरवाजा़ खुला, जो बाग़ की ओर था। शहरयार की मलिका उस दरवाजे से अपनी बीस दासियों के साथ निकली और बाग़ के उस हिस्से में चली गई, जहाँ आम लोगों की नज़रें नहीं पहुँच पाती थीं। वहाँ पहुँचकर उन दासियों ने अपने कपड़े उतारे तो शाहजमाँ आश्चर्यचकित रह गया। सभी दासियों को एक-एक हब्शी ने अपनी बगल में ले लिया। शहरयार की मलिका अलेकी रह गई। कुछ देर बाद मलिका ने ‘मसूद-मसूद’ कहकर आवाज़ दी। थोड़ी देर में ही एक हब्शी गुलाम आ गया और मलिका के साथ संभोग करने लगा। अन्य हब्शी गुलाम भी दासियों के साथ संभोग करने लगे। कुछ देर तक वे सब काम-क्रीड़ा में निमग्न रहे। फिर उन्होंने स्नान किया और जिस तरह आए थे, उसी तरह वापस चले गए।
इस घटना को देखकर शाहजमाँ को विश्वास हो गया कि विश्वासघात करना स्त्री का स्वभाव ही है और हर स्त्री अपने पति के साथ विश्वासघात करती है। उसने अपने आपको समझाया कि अपनी पत्नी के विश्वासघात से वह हर वक्त दुखी रहता है। संसार में जितने भी पुरुष हैं, सभी इस संकट से ग्रस्त हैं। यह सोचते ही वह सारा दुख भूल गया और प्रसन्न रहने लगा। कुछ दिनों बाद शहरयार शिकार से वापस आया तो छोटे भाई को प्रसन्न देखकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने शाहजमाँ से कहा कि अब उसका दिल बहल गया है। अब वह प्रसन्न दिखाई दे रहा है, इस बात से उसे बड़ी खु़शी हुई।
उसने शाहजमाँ से पूछा कि आखिर इस परिवर्तन का कारण क्या है ? जब शहरयार ने छोटे भाई पर अधिक जो़र डाला तो शाहजमाँ ने विवश होकर सारी घटना सुना दी।

यह सुनकर शहरयार परेशान हो उठा। बोला, जब तक मैं अपनी आँखों से नहीं देख लूँगा, इस बात पर विश्वास नहीं करूँगा। शाहजमाँ ने कहा कि अगर आप खुद अपनी आँखों से देखना चाहते हैं तो इस बात की घोषणा कर दीजिए कि आप कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं। यहाँ से चल पड़िए लेकिन रात को चुपचाप आकर यहाँ छिप जाइए और आप सब-कुछ अपनी आँखों से देख लीजिए।
शहरयार ने छोटे भाई के स्वस्थ हो जाने की खु़शी में शिकार पर जाने की घोषणा कर दी। दूसरे दिन दोनों भाई शहर से चल दिए लेकिन रात को छिपकर महल में आ गए और शाहजमाँ वाले महल में बाग़ की ओर खुलने वाली उसी खिड़की के पास आ बैठे।

थोड़ी देर बाद पहले की तरह ही बीस दासियों के साथ शहरयार की मलिका महल से निकलकर बाग़ के उसी कोने में आ गई, शहरयार बड़े ध्यान से उन सबको देखने लगा।
दस दासियों ने अपने कपड़े उतारे। बाकी दस दासियाँ नहीं थीं, वे हब्शी नौजवान थे। वे हब्शी दसों दासियों को लेकर एकांत में चले गए। मलिका ने उस दिन की तरह मसूद को आवाज़ दी और उसके आने पर उसे बाँहों में लेकर प्यार करने लगी। सुबह तक यह जश्न चलता रहा। उसके बाद सबने स्नान किया। हब्शी नौजवानों ने फिर दासियों के कपड़े पहन लिए और मलिका उन सबको साथ लेकर अपने महल में वापस चली गई।

इस दृश्य को देखकर शहरयार की आँखों के सामने दुनिया अँधेरी हो गई। वह छोटे भाई से कहने लगा कि अब उसका दुनिया में रहने को जी नहीं चाहता। हम दोनों बहुत ही अभागे हैं। चलो, राजपाट छोड़कर जंगल में चलें। वहाँ फ़की़रों, साधु-संन्यासियों के साथ रहेंगे। शाहजमाँ ने बड़े भाई को समझाया लेकिन बड़ा भाई शहरयार किसी तरह राजी नहीं हुआ। खामोश होकर शाहजमाँ उसके साथ चलने पर सहमत हो गया। लेकिन उसने एक शर्त रखी कि अगर हम लोगों को अपने से भी बढ़कर कोई अभागा दिखाई दिया तो हम दोनों वापस लौट आएँगे और पहले की तरह अपना राजपाट सँभाल लेंगे। शहरयार ने उसकी यह शर्त मान ली और एक रात जब चारों ओर अँधेरा छाया हुआ था, दोनों भाई महल से निकलकर जंगल की ओर चल दिए। कुछ दिन यात्रा करने के बाद वे अमान सागर के तट पर पहुँच गए। यात्रा की थकान मिटाने के लिए दोनों एक छायादार पेड़ के नीचे जा बैठे अभी अधिक देर नहीं हुई थी कि अचानक समुद्र में भीषण तूफान आ गया और फिर एक स्थान पर पानी फट गया। उस स्थान से एक देव सिर पर एक संदूक़ रखे हुए निकला। उस देव को देखते ही दोनों भाई भयभीत होकर उस पेड़ पर चढ़ गए। देव ने संदूक़ उसी पेड़ के नीचे लाकर रख दिया। फिर उसे खोलकर एक बहुत ही सुंदर युवती को बाहर निकाल लिया। वह हाथ बाँधकर उसके सामने खड़ा हो गया। बोला, ‘मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। दूसरा कोई व्यक्ति तुम्हें देखने न पाए इसलिए मैंने तुम्हें इस सन्दूक़ में बन्द कर रखा है। मैं इस सन्दूक़ को हर समय अपने साथ समुद्र में रखता हूँ।’

देव कुछ देर तक उस सुन्दर युवती से बातें करता रहा और फिर उसकी गोद में सिर रखकर सो गया।
इस बीच उस युवती की नज़र पेड़ पर पड़ी, जहाँ वे दोनों भाई छिपे हुए थे। उसने उन्हें नीचे उतरने का इशारा किया। वे दोनों भयभीत हो उठे। लेकिन यह सोचकर कि शायद यह युवती किसी मुसीबत में फँसी है और हमसे सहायता माँग रही है, वे दोनों पेड़ से उतर आए।
उस स्त्री ने धीरे से देव का सिर अपनी जाँघ पर से हटाया और मिट्टी के एक ढेर पर रख दिया। फिर उन लोगों को साथ लेकर कुछ दूर चली गई।
उसने दोनों भाइयों से कहा कि मैं चाहती हूँ कि तुम दोनों मेरे साथ संभोग करो।
दोनों भाई यह सुनकर घबरा गए और उन्होंने इंकार कर दिया।
उस स्त्री ने कहा कि अगर तुमने मेरा कहना नहीं माना तो मैं देव को जगा दुँगी और वह तुम दोनों को खा जाएगा। विवश होकर दोनों भाइयों ने उसके साथ संभोग किया।
अपनी इच्छा पूरी हो जाने के बाद उस स्त्री ने अपनी जेब से अँगूठियों का एक गुच्छा निकाला और उन दोनों भाइयों से एक-एक अँगूठी लेकर उस गुच्छे में डाल दी।

‘यह देव अपनी व्यवस्था पर बहुत खुश है। इस बेवकूफ को पता नहीं कि इसकी इतनी हिफाजत करने पर भी मैं साढ़े पाँच सौ नौजवानों से मिल चुकी हूँ। मैंने उनकी अँगूठियाँ उनकी निशानी के रूप में पास रख ली हैं।’ उस स्त्री ने कहा और अपने स्थान पर जा बैठी।
उसने दोनों भाइयों को इशारा किया कि वे यहाँ से फौरन भाग जाएँ। यह देखकर दोनों भाई आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने देखा कि यह देव हम दोनों भाइयों से भी बढ़कर अभागा है। वे दोनों अपनी-अपनी राजधानी की ओर चल दिए।
राजधानी में पहुँचते ही शहरयार ने अपनी मलिका, उसकी दासियों और हब्शी गुलामों को अपने हाथ से कत्ल कर दिया और प्रतिज्ञा की कि रोजाना एक स्त्री के साथ विवाह करूँगा और उसके साथ एक रात बिताकर सुबह उसे कत्ल कर दिया करूँगा।

उसने यही करना शुरू किया। कुछ दिनों में ही उसने अपने राज्य के अमीर और सम्मानित व्यक्तियों की लड़कियों के साथ विवाह किया और फिर उन्हें मार डाला। इसके बाद निर्धन परिवार की लड़कियों का नंबर आ गया। उसने एक-एक कर उनके साथ भी विवाह किया और फिर उन्हें मार डाला। पूरे देश में तहलका मच गया। राज्य की प्रजा देश छोड़कर भागने लगी।
शहरयार के एक मंत्री की दो पुत्रियाँ थीं। वे दोनों जितनी सुन्दर थीं, उतनी ही बुद्धिमान थीं। शहरयार ने अभी तक उन्हें क्षमा कर रखा था।
बड़ी बहन का नाम शहरजाद और छोटी बहन का नाम दुनियाजाद था। शहरजाद अपने पिता को काफी़ दिनों से परेशान देख रही थी। एक दिन उसने पिता से उनकी परेशानी का कारण पूछा। पिता ने बेटी को टालने की बहुत कोशिश की लेकिन जब बेटी ने अत्यधिक आग्रह किया तो उसे बादशाह के बारे में सब कुछ बताना पड़ा।
शहरजाद ने पिता से कहा कि वह उसका विवाह शहरयार से कर दे। उसे विश्वास है कि वह बादशाह के इस अत्याचार को रोक देगी।
पिता ने समझाया, ‘बेटी, तुम पागल हो गई हो। शहरयार कभी नहीं मानेगा। वह सुबह होते ही तुझे मार डालेगा। फिर तेरा भी वही हाल होगा, जो जानवरों की बोली समझने वाले सौदागर के गधों का हुआ था।
पिता द्वारा गधे और सौदागर की बात सुनकर बेटी उसकी कहानी सुनने की जिद करने लगी।

गधे और बैल की कहानी

बेटी के कहानी सुनने की जिद करने पर पिता ने कहा—एक सौदागर को खुदा ने धन-दौलत के साथ जानवरों की बोली समझने की शक्ति प्रदान कर दी थी। एक दिन वह अपने मवेशीखाने में गया तो उसने एक गधे और एक बैल को आपस में बातें करते हुए देखा।

बैल ने गधे से कहा, ‘गधे भाई, तुम बड़े आराम में हो। तुम्हें मेहनत कम करनी पड़ती है और खुराक बढ़िया मिलती है। लेकिन मैं सारा दिन हल चलाता हूँ और शाम को रूखा-सूखा खाने को मिलता है।’ गधे ने कहा, ‘ग़लती तुम्हारी है कि तुम रोजाना मेहनत करते हो। आज मेरा कहना मानो। कल काम के समय से पहले बीमार बन जाना और भूसा खाना छोड़ देना। मजबूर होकर नौकर तुमको काम पर नहीं ले जाएगा।’

बैल ने खुश होकर गधे को धन्यवाद दिया और उसकी योजना के अनुसार काम करने का वायदा कर लिया।
सौदागर उन दोनों की बातें सुन रहा था। उस समय तो वह चुपचाप चला आया। अगले दिन नौकर ने आकर बताया कि आज बैल बीमार पड़ गया है। सौदागर ने हँसकर कहा, ‘उसकी जगह गधे को ले जाओ।’ नौकर गधे को ले गया और शाम तक उसे हल में जोतता रहा। शाम को जब गधा वापस लौटा तो बैल ने उसे धन्यवाद देते हुए कहा, ‘उसका बताया उपाय बहुत की कारगार सिद्ध हुआ। मुझे आराम करने का मौका मिल गया।’
दिन भर की कड़ी मेहनत से गधा थककर चूर-चूर हो गया था। उस समय तो चुप रहा लेकिन मन-ही-मन सोचता रहा कि अच्छी सीख दी कि खुद मुसीबत में फँस गया।

मंत्री ने यह कहानी सुनाकर शहरजाद से कहा, ‘बेटी, तू भी उस मूर्ख की तरह अपने आपको मुसीबत में डालना चाहती है ?’
‘नहीं अब्बा हुजूर, मैंने जो निश्चय कर लिया है, उसे मैं जरूर पूरा करुँगी।’ शहरजाद ने दृढ़ता भरे स्वर में कहा।
‘बेटी, तू जिद कर रही है। मुझे डर है कि कहीं मुझे तेरे साथ वही व्यवहार न करना पड़े, जो उस सौदागर को अपनी पत्नी के साथ करना पड़ा था।’ पिता ने दुखी मन से कहा।
‘कौन सौदागर ? क्या किया था, उसने अपनी पत्नी के साथ ?’ शहरजाद ने उत्सुकता से पूछा, लेकिन उससे पहले उस गधे के बारे में बताइए कि अगले दिन उस पर कैसी बीती ?’
वजी़र ने कहा, ‘बेटह, अगले दिन सुबह होते ही सौदागर फिर मवेशीखाने में गया ताकि गधे और बैल के बारे में जान सके। संयोग से उसकी पत्नी भी उसके साथ थी।
गधे ने बैल से पूछा, ‘आज क्या करोगे ?’
‘मैं तो आज भी बीमार बना रहूँगा’ बैल ने उत्तर दिया।
‘नहीं, नहीं, ऐसा गजब मत करो। मालिक रात कह रहे थे कि बैल बीमार है। अगर जल्द ठीक न हुआ तो मैं कसाइयों को दे दूँगा। अगर कसाइयों के हाथ मरना नहीं चाहते तो ठीक ढंग से काम पर चले जाओ।’ गधे ने समझाया। उन दोनों की बातें सुनकर सौदागर को हँसी आ गई। उसकी पत्नी ने हैरान होकर पति से हँसने का कारण पूछा। सौदागर ने कहा, ‘यह एक रहस्य है। अगर मैंने बता दिया तो मेरे प्राण संकट में पड़ जाएँगे। मैं मर जाऊँगा।’ ‘तुम बहाना कर रहे हो। अगर तुमने मुझे सच-सच नहीं बताया तो मैं आत्महत्या कर लूँगी।’

सौदागर ने पत्नी को बहुत समझाया। लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही।
जब सौदागर ने उसकी जिद पर कोई ध्यान नहीं दिया तो उसने रोना-पीटना शुरू कर दिया। सौदागर पत्नी की जिद और उसके रोने-पीटने से परेशान हो उठा और सोचने लगा कि अगर मैं इसे सच्ची बात बता दूँ तो मेरी मृत्यु हो जाएगी। अगर नहीं बताया तो यह आत्महत्या कर लेगी। वह इसी सोच में डूबा था कि कुत्ते ने मुर्गे से कहा, ‘तू आज भी अपनी मुर्गियों के साथ अठखेलियाँ कर रहा है। आज तो ऐसा मत कर।’
‘क्यों भाई, आज ऐसी क्या बात है ?’ मुर्गे ने हैरानी से पूछा।

‘मुर्गे, आज हमारी मालकिन मालिक से एक ऐसा रहस्य उगलवाने की जिद कर रही है कि अगर मालिक ने बता दिया तो उनकी मृत्यु होना निश्चित है। और अगर मालिक ने वह रहस्य नहीं बताया तो मालकिन आत्महत्या कर लेगी।’ कुत्ते ने बताया। ‘मालिक बेवकूफ है’, मुर्गा बोला, ‘वह एक पत्नी को अपने वश में नहीं रख सकता। जबकि मैंने पचास मुर्गियों को अपने वश में कर रखा है। मजाल है कि जो मेरी मर्जी के खिलाफ कोई बात कर सके। मार-मार कर सीधा कर दूँगा। मालिक जितनी ढील देंगे, मालकिन उतनी ही सिर चढ़ती जाएगी।’ मालिक कुत्ते और मुर्गे की बात सुन रहा था। उसने हंटर उठाया और लगा अपनी पत्नी को पीटने। पत्नी को लगा कि वह हंटर की मार से मर जाएगी। वह पति के पैरों पर गिरकर माफी़ माँगने लगी कि भविष्य में तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं करूँगी। यह कहानी सुनाने के बाद वजी़र ने कहा, ‘बेटी, अगर तू जिद नहीं छोड़ेगी तो मुझे तेरे साथ भी ऐसा ही करना पड़ेगा।’
‘अब्बा हुजूर, मेरी बात मान लीजिए। मुझे आशा है कि मैं अपनी हजा़रों बहिनों की जान बचा लूँगी। इस नेक काम में अगर मेरी जान चली भी जाए तो कोई चिन्ता नहीं।’ शहरजाद बोली।
विवश होकर वजी़र ने बेटी की बात मान ली। उसने बादशाह के पास जाकर कहा कि अगली रात को मेरी बेटी आपके साथ शादी करेगी।’

‘तुम्हें मेरा नियम मालूम है ?’ बादशाह ने आश्चर्य से पूछा।
‘हाँ, बादशाह सलामत, मुझे मालूम है।
‘क्या तुम्हें यह आशा है कि इस मामले में तुम्हारे साथ मैं रियायत करूँगा ? मेरी यह प्रतिज्ञा एसी नहीं है कि किसी के लिए मैं इसे भंग कर दूँ।’
‘आप मालिक हैं। जो भी चाहे, कर सकते हैं।’ वजी़र ने बड़ी विनम्रता से कहा।
घर लौटकर उसने बेटी को ये बातें बताईं तो उसने कहा, ‘आप अल्लाह पर भरोसा कीजिए। वह हर पल मेरी हिफाजत और मदद करेगा।’

पिता को तसल्ली देने के बाद उसने अपनी छोटी बहिन से कहा, ‘आज किसी बहाने तुम्हें बादशाह के महल में बुलाऊँगी। तुम आ जाना और जब थोड़ी रात रह जाए तब तुम मुझे कहानी सुनाने की जिद कर बैठना। मैं कोई कहानी सुनानी शुरू कर दूँगी। उम्मीद है, इस तरह मेरी और हजा़रों दूसरी लड़कियों की जान बच जाएगी।’ छोटी बहिन ने अपनी सहमति दे दी। वायदे के अनुसार बादशाह ने शहरजाद के साथ शादी कर ली। जब उसने शहरजाद को देखा तो उसका सौन्दर्य देखकर पागलों की तरह प्यार करने पर उतारू हो गया। लेकिन शहरजाद ने उसे इतना मौका़ ही नहीं दिया कि वह अपनी वासना की प्यास बुझा सके और फूट-फूटकर रोने लगी। बादशाह ने शहरजाद से उससे रोने का कारण पूछा तो वह कहने लगी, ‘मैं जानती हूँ कि सुबह होते ही आप मुझे मार डालेंगे। इसलिए मैं चाहती हूँ कि अपनी छोटी बहिन को अपने पास बुला लूँ और मरने से पहले जी भरकर देख लूँ।’ शहरजाद उसे वास्तव में चाहने लगा था। उसने अनुमति दे दी कि वह अपनी छोटी बहिन को बुलवा सकती है।

शहरजाद ने अपनी योजना के अनुसार छोटी बहिन दुनियाजाद को बुला लिया। बादशाह वास्तव में शहरजाद को प्यार करने लगा था इसलिए उन दोनों के साथ बातें करने लगा कि अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार शहरजाद को कत्ल न करना पड़े। इसलिए उसने शहरजाद के साथ सुहागरात मनाने का विचार स्थगित कर दिया। जब आधी रात बीत गई तो दुनियाजाद ने अपनी बहिन से कहा, ‘बहिन, खुदा जाने सुबह को क्या हो ? अंतिम बार आप एक कहानी सुना दीजिए। परेशानी की वजह से नींद नहीं आ रही है।’
‘अगर शंहशाह इजाज़त दे दें तो मैं तुम्हें कहानी सुना सकती हूँ।’ शहरजाद ने कहा।
बादशाह शहरयार को भी कहानियाँ सुनने का बेहद शौक़ था। उसने बड़ी खु़शी से इजाज़त दे दी। शहरजाद कहानी सुनाने लगी।

जिन और सौदागर की कहानी

प्राचीनकाल में एक नौजवान सौदागर अपने कारोबार के सिलसिले में यात्रा कर रहा था। रास्ते में एक छायादार पेड़ देखकर धूप से बचने के लिए उसकी छाया में बैठ गया और खाना खाने लगा। अभी वह खाना खा नहीं पाया था कि भयानक चेहरेवाला एक जिन हाथ में तलवार लिए उसके सामने आ खड़ा हुआ। क्रोध और उत्तेजना से उसका बुरा हाल था। उसने क्रोध भरी आवाज़ में कहा, ‘तूने अभी खजूर की जो गुठलियाँ फेंकी थीं, एक गुठली मेरे बेटे को जा लगी और वह मर गया। उसकी मौत का बदला मैं तुझसे लूँगा। मैं तुझे मार डालूँगा।’ जिन की बातें सुनकर सौदागर बहुत परेशान हुआ। बोला, ‘आप मुझे एक साल का समय दीजिए ताकि मैं अपनी ज़मीन-जायदाद की व्यवस्था कर दूँ। जिन लोगों का मुझ पर ऋण है, उसे चुका दूँ। एक साल बाद मैं यहीं आ जाऊँगा। फिर आप जो चाहें मुझे सजा़ दे सकते हैं।’

जिन ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। सौदागर अपने घर लौट गया। सारा क़र्ज़ चुकाने के बाद उसने अपने बाल-बच्चों को समझाया और उन्हें रोता-बिलखता छोड़ ठीक एक साल के बाद उसी पेड़ के नीचे आ गया। उसे आए अभी अधिक देर नहीं हुई थी कि एक बूढ़ा व्यक्ति एक हिरनी के गले में रस्सी डाले वहीं पहुँच गया।

उसने सौदागर से पूछा, ‘भई ! तुम कौन हो ? और इस भयानक जंगल में अकेले बैठे क्या कर रहे हो ?’
सौदागर ने अपनी मुसीबत की गाथा उसे सुनाई।
‘जब तक तुम्हारे मामले का अंत नहीं देख लूँगा, मैं आगे नहीं जाऊँगा।’ बूढ़े ने कहा।
कुछ देर बाद एक आदमी दो कुत्तों के गले में बँधी जंजीरें पकड़े वहाँ पहुँचा और सौदागर के बारे में पूछने लगा। सौदागर की दुखद कहानी सुनकर वह भी रुक गया। उसके बाद एक आदमी और आया। उसके साथ एक मादा खच्चर था। वह भी उन सबको देखकर वहाँ रुक गया।
अभी उन लोगों में ठीक ढंग से बातचीत भी नहीं हुई थी कि सामने धूल उड़ती दिखाई दी और कुछ देर बाद जिन हाथ में तलवार लिए उसके सामने आ खड़ा हुआ।

‘तुम्हारा समय खत्म हो गया, ‘जिन ने सौदागर से कहा, ‘अब मैं तुम्हें क़त्ल करता हूँ।’ सौदागर यह सुनकर रोने लगा।
जब जिन सौदागर की गर्दन काटने के लिये तैयार हुआ तो हिरनी वाला बूढ़ा आगे बढ़ा और जिन के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, ‘ऐ जिनों के बादशाह ! पहले आप मेरी और इस हिरनी की विचित्र कहानी सुन लीजिए। अगर आपको पसन्द आ जाए तो सौदागर को क्षमा कर देना।
कुछ देर सोचने के बाद जिन ने उसकी बात मान ली।

हिरनी वाले बूढ़े ने अपनी हिरनी की कहानी सुनाते हुए कहा, ‘यह हिरनी मेरे चाचा की बेटी और मेरी पत्नी है। आज से तीस-चालीस साल पहले इसके साथ मेरा विवाह हुआ था। लेकिन कई वर्ष बीत जाने के बाद इसको कोई संतान नहीं हुई। निराश होकर मैंने एक दासी ख़रीद ली। उसने एक बेटे को जन्म दिया। पन्द्रह वर्ष तक हम सब बड़े आराम से रहते रहे। अचानक किसी ज़रूरी काम से मुझे बाहर जाना पड़ा। मैंने उस दासी और उसके बेटे को अपनी पत्नी को सौंप दिया और बाहर चला गया। लेकिन इस ईर्ष्यालू औरत ने मेरे जाते ही मेरी दासी को गाय और बेटे को बछड़ा बनाकर धोबियों के हाथ बेच डाला।

जब मैं अपना काम ख़त्म करके घर पहुँचा और उन दोनों के बारे में पूछा तो इसने बताया कि दासी की तो मृत्यु हो गई और उसका बेटा पता नहीं कहाँ चला गया ? दासी की मृत्यु और बेटे के गुम हो जाने से मुझे बहुत अधिक दुख हुआ था। लेकिन धीरज के सिवा और कोई चारा नहीं था। कुछ दिनों बाद कुर्बानी की ईद आ गई। मैंने एक बुढ़िया गाय कुर्बानी के लिए ख़रीदी। संयोग से यह गाय मेरी वही दासी थी, जिसे जादू के जो़र से मेरी पत्नी ने गाय बना दिया था। जब मैं कुर्बानी देने लगा तो उस गाय की आँखों में आँसू बहने लगे। मुझे उस पर बड़ी दया आई। मैंने नौकरों से कहा कि इसे छोड़ दो, कोई दूसरा जानवर ले आओ।

लेकिन मेरी पत्नी इस रहस्य को जानती थी। वह मुझ पर जोर डालने लगी कि अच्छी मोटी-ताजी गाय है, इसी की कुर्बानी दो। मैंने नौकरों से उसकी कुर्बानी दिलवा दी। लेकिन जब कसाई ने उसे साफ किया तो उसमें गोश्त बिलकुल नहीं निकला। सिर्फ़ हड्डियाँ-ही-हड्डियाँ थीं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन मैं चुप था।

फिर मैंने दूसरा जानवर मँगाया। इस बार नौकर एक बछड़े को ले आए। जब मैंने उसे अपने पास खींचा तो उसने अपना मुँह पैरों पर रख दिया और भरी नज़रों से मुझे देखने लगा। मैंने उसे छोड़ दिया और दूसरा बैल मँगवाया और उसकी कुर्बानी दे दी। हालाँकि मेरी अभागिन पत्नी ने उस बछड़े की भी कुर्बानी देने की जिद की थी। लेकिन मैंने उसकी जिद की कोई परवाह नहीं की।

कुछ दिन बाद एक धोबी मेरे पास आया और कहने लगा कि उसकी बेटी जादू जानती है। आपने बछड़े को छोड़ दिया था। जब मैं उसे लेकर अपने घर पहुँचा तो मेरी बेटी ने कहा, ‘यह वास्तव में पशु नहीं है बल्कि फलाँ सौदागर का बेटा है। उस सौदागर की पत्नी ने जादू के जो़र से उसे बछड़ा बना दिया था और उसकी माँ को गाय बना दिया था। ईद के दिन जिसकी कुर्बानी दे दी गई।’

यह सुनकर मेरा दिल बैठ गया और मेरे दिल को इतना गहरा सदमा पहुँचा कि मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता। मैं धोबी के साथ उसके घर चला गया। मैंने उसकी बेटी से कहा कि तुम अगर किसी तरह इस बछड़े को फिर इसके वास्तविक रूप में ला दो तो मैं तुम्हें इतना धन दूँगा कि जीवन भर कुछ करने की जरूरत नहीं रहेगी।
धोबी की बेटी ने कहा, ‘मुझे धन-दौलत की चाह नहीं है। लेकिन मेरी दो शर्तें हैं।’

‘कौन-सी शर्तें ?’ मैंने पूछा।
‘पहली शर्त तो यह है कि जब मैं आपके बेटे को बछड़े से फिर इंसान बना दूँ तो आप मेरी शादी उसके साथ कर देंगे, और दूसरी शर्त यह कि जिस स्त्री ने इसे इंसान से बछड़ा बनाया है, उसे दंड देने की अनुमति दे देंगे।’
मैंने दोनों शर्तें मान लीं।
लड़की एक बर्तन में पानी भर लाई। फिर उस पर कुछ पढ़ा और वह पानी बछड़े पर छिड़क दिया। पानी छिड़कते ही बछड़ा इंसान बन गया।

मैंने अपने बेटे को छाती से लगा लिया और उसी समय धोबी की बेटी के साथ उसका विवाह कर दिया।
उस लड़की ने जादू के जो़र से मेरी पत्नी को हिरनी बना दिया। यह हिरनी मेरी वही पत्नी है, जो इस समय मेरे साथ है। संयोग से आज मैं इधर से गुजर रहा था। सौदागर को अकेला बैठा देखकर यहाँ चला आया। इसकी कहानी सुनने के बाद इसका अंतिम परिणाम देखने के लिए ठहर गया। आपको मेरी कहानी विचित्र भी लगी होगी और दद्र-भरी भी। मुझे आशा है कि इसका अपराध क्षमा कर देंगे।

जिन ने कहा, ‘सचमुच तुम्हारी कहानी दद्र और आश्चर्य से भरी कहानी है। मैं इस नौजवान का तिहाई अपराध क्षमा करता हूँ।’
जिन की बात सुनकर वह आदमी आगे बढ़ा, जिसके साथ दो कुत्ते थे। उसने कहा, ‘ऐ जिनों के बादशाह ! मेरी कहानी इस आदमी की कहानी से भी अधिक आश्चर्यजनक है। अगर आप इस सौदागर का तिहाई अपराध और क्षमा करने का वचन दें तो मैं अपनी कहानी सुना दूँ।’
‘ठीक है, अगर तुम्हारी कहानी सचमुच आश्चर्यजनक हुई तो इसका एक तिहाई अपराध और क्षमा कर दूँगा।


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