जब रहा न कोई चारा - अशोक चक्रधर Jab Raha Na Koi Chara - Hindi book by - Ashok Chakradhar
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जब रहा न कोई चारा

अशोक चक्रधर

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3623
आईएसबीएन :81-7182-960-0

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प्रस्तुत है हास्य नाटक ‘जब रहा न कोई चारा’

Jab Raha N aKoi Chara

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जब रहा न कोई चारा रे, अंगूठी बनी अंगारा रे, अंगारा रे अंगारा रे ! सपनों को कुचलने आए, हाए रब्बा कौन बचाए ? अपनों ने मिलकर मारा रे। अंगूठी बनी अंगारा रे ! पर हो मज़बूत इरादा, हट जाती हैं सब बाधा। बस हिम्मत एक सहारा रे। अंगूठी बनी अंगारा रे !


जहाँ खूब सारे
तजुर्बेकार बुज़ुर्गों की छांव है,
तहसील के नाम पर ब्रज में
‘इगलास’ एक बड़ा सा गांव है।
इसी इगलास नामक छोटी-सी खिड़की से
देखा मैंने पूरा संसार,
इसी इगलास के एक
तत्कालीन कर्णधार
की सुपुत्री—‘बिरमा’
अपनी प्यारी मां
श्रीमती कुसुम ‘प्रगल्भ’ को
समर्पित है यह किताब

टेलीफ़ोन


पात्र
पति
पत्नी
नौकर
प्रेमी
प्रेमिका
(जैसे ही श्रीमती की नज़र टिफ़िन पर पड़ी, उनका जी धक्क से रह गया।)

प्रश्न : कैसे रह गया ?
उत्तर : धक्क से।
(ठीक ! उनके मुँह से बेसाख़्ता निकला—‘हाय राम ! लंच भूल गए आज तो।’ उन्होंने सोचा अब तक तो दफ़्तर पहुँच गए होंगे, चलो फ़ोन करती हूं। रिसीवर कान से लगाते ही उन्हें कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। श्रीमती जी का मुंह थोड़ा सा खुल गया और आंखें कुछ ख़ूफ़िया अंदाज़ में चौड़ी हो गईं....और इसी मुद्रा में वे अचक से कुर्सी पर बैठ गईं। सावधानी के लिए उन्होंने अपनी दाईं हथेली रिसीवर के माउथपीस पर रख दी और तल्लीनता से सुनने लगीं। बातचीत किसी प्रेमी युगल में हो रही थी।)
प्रेमिका : चुप क्यों हो गए...तुम चुप भी रहते हो न ! तो लगता है कुछ बोल रहे हो।....ज़्यादा देर चुप्पी नईं भई ! कुछ बोलो न !

प्रेमी : हम इतनी बातें कर चुके हैं कि लगता है कि कोई बात बाक़ी नहीं रही।
प्रेमिका : तो फिर फ़ोन रख दो।
प्रेमी : वो भी तो नहीं कर सकता। टेलीफ़ोन रखना है तो तुम रखो।
(श्रीमती जी का मन था कि ये लोग टेलीफ़ोन रख दें ताकि श्रीमान जी को टिफ़िन के बारे में बताया जा सके, लेकिन मन के अंदर जो दूसरा मन था वो चाहता था कि बातचीत चलती रहे। श्रीमान जी ने तो मुहब्बत भरी बातचीत करना बंद कर दिया, चलो दूसरों की ही सुनें।)

प्रेमिका : अच्छा अपने दिल से पूछो, क्या मैं तुमसे पहले रख सकती हूं !
प्रेमी : और तुम्हारा दिल क्या कहता है इस मामले में....(नाटकीयता से) हम क़यामत तक नहीं रखेंगे। लोग कहेंगे कि मरने वाले का एक हाथ दिल पर था, दूसरे में टेलीफ़ोन था....जो कान पर ऐसे लगा था जो हटाए नहीं हट रहा था।
प्रेमिका : ऐसे नहीं बोलो !
प्रेमी : सचमुच, लाश जब अकड़ जाती है तो यू कांट मूव दैट।
प्रेमिका : भई कैसा कैसा बोलते हो, कुट्टी !
प्रेमी : सॉरी !
प्रेमिका : अपने वर्ड्स वापस लो।
प्रेमी : ले लिए।

प्रेमिका : गुड बॉय...अच्छा फ़ोन रख दो।
प्रेमिका : सुनो कल आंटी मेरे लिए एक शिफॉन की साड़ी लाई थीं, ज़री का काम है....सिर्फ़ बार्डर पर। बीच में बुंदकियां होतीं तो अच्छा रहता।
प्रेमी : प्रिया !
प्रेमिका : हुं....!
प्रेमी : आंटी कब तक हैं दिल्ली में ?
(मन के तीसरे कोने में श्रीमती जी के भी दर्द उठा कि सभी मर्द एक जैसे होते हैं—साड़ी की बात चली नहीं कि कन्नी काटी।)
प्रेमिका : आंटी से तुम्हें क्या ? शादी से पहले ही तुम्हें साड़ी की बात अच्छी नहीं लगती तो बाद में क्या करोगे....चलो फ़ोन रख दो फिर !

प्रेमी : हम कह चुके हैं नहीं रखेंगे....प्रिया, साड़ियां तुम हज़ार ख़रीद लो, लेकिन उनके डिटेल्ज़....यु नो....
(श्रीमती जी मन के चौथे कोने में अब प्रेमी की पक्षधर हो गईं। अगला जब साड़ियां दिलवाने को राज़ी है तो डिटेल में क्यों बताती है ? और हर बार फ़ोन रख दो, फ़ोन रख दो ये भी कोई बात हुई !)
प्रेमिका : तो क्या अपनी सहेलियों के बारे में बात करूं ?
प्रेमी : वो भी नहीं...बस अपने बारे में करो।
प्रेमिका : लगता है, तुमने फिर सिगरेट जलाई है।
प्रेमी : जलाई नहीं, सुलगाई है....पिछली सिगरेट से !
प्रेमिका : मैं नईं बोलती ! अच्छा अब तुम फ़ोन रख दो।
प्रेमी:  कैसे रख दें कि सुनो राख हुए जाते हैं, सिगरटें जलाते हैं, धुआं सा उठाते हैं। ऐशट्रे में टोंटे ये, दिल के ही तो टुकड़े हैं।
प्रेमिका : (हंसते हुए) कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा !
प्रेमी : सुनो प्रिया, कोई कहीं गिरे, ये कहके मरे थे अंकल जॉन इश्क में मारे जाओगे बच्चू, मत रख देना टेलीफ़ोन।
(उधर श्रीमान जी दफ़्तर से दनादन फ़ोन घुमा रहे थे और एक रिकार्डेड वॉइस पा रहे थे—‘इस रूट की सभी लाइने व्यस्त हैं, कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें।’)

(टिफ़िन के बारे में तो उन्हें अभी तक कोई बोध नहीं हुआ था। अलबत्ता वे श्रीमती जी को बताना चाह रहे थे कि घर के लिए नौकर मिल गया है। दरअसल, चपरासी ने अपने गांव से एक लड़का बुलवाया था जो इस समय उनके पास ही ज़मीन पर बैठा हुआ था। श्रीमान जी ने सोचा, मैं कब तक घुमाता रहूंगा, नए नौकर को फ़ोन करना सिखाया जाए।...और उन्होंने सिखा दिया। अब लड़का फ़ोन घुमाने लगा। घर का नंबर लगातार एंगेज्ड। दो घंटे बाद श्रीमान जी ने लड़के को एक पी.पी नंबर दिया।)
(कॉलबैल बजी, दरवाज़ा खुला ही हुआ था। पड़ोसन दनदनाती हुई अंदर आई—‘अपका फ़ोन खराब है क्या ?’ श्रीमती जी ने घबराकर फ़ोन रख दिया।)
(उधर दफ़्तर में लड़के ने श्रीमान् जी से कहा—‘बुलाने गई हैं...क्या बोलूं ? श्रीमान् जी उत्तर दिया—‘तुम ही बात करो, कहना—मैं अपका नया नौकर बोल रहा हूँ, साहब ने मुझे फ़ोन करना सिखा दिया है।’)
(लड़के के कान में श्रीमती जी की ‘हैलो’ सुनाई दी तो सकपकाकर बोला—‘मैं आपका नया नौकर हूं जी, साहब ने मुझे ख़ून करना सिखा दिया है।’ श्रीमती जी ने हैरान होकर कहा- ‘फोन साहब को दो।’)
-ए जी सुनिए ! आपने नौकर को क्या सिखाया है ?
-वही जो उसने बताया है।
प्रश्न : श्रीमती जी का जी कैसे रह गया ?
उत्तर : धक्क से !
दूसरा प्रश्न : क्या श्रीमती जी घर जाकर फिर से फ़ोन उठाएंगी ?
उत्तर : ज़रूर !
तीसरा प्रश्न : उन्हें क्या सुनाई देगा ?
उत्तर : पहले तुम रखो।

साड़ी


पात्र
श्रीमती जी
श्रीमान जी
(श्रीमान जी दफ़्तर से निकलने को थे कि किचिन से एक (मधुर बनाया जाता हुआ- सा) स्वर आया—)

ए जी सुनिए, कम्युनिटी सेंटर में कल एक बेबी शो हो रहा है, और देखिए तो, मेरे पास एक भी ढंग की साड़ी नहीं है !
(श्रीमान जी ने अपनी तत्काल बुद्धि का गर्वीला परिचय देते हुए कहा-)
डार्लिंग, बेबी शो हो रहा है, कोई बीवी शो तो नहीं हो रहा है। मांग ही करनी थी तो बेबी के फ़्रॉक की करतीं, ये साड़ी का आइडिया अचानक कहां से आ टपका ?

(श्रीमान जी ने दिखाया वाक्चातुर्य, लेकिन दूसरी तरफ़ का जाता रहा सारा माधुर्य—)

कुछ जानते भी हो, बेबी को जो मर्क्स मिलेंगे उसमें मम्मी की पर्सनैलिटी के नंबर भी शामिल हैं।...देखिए इस बार आपने चरका दिया तो अच्छा नहीं होगा, हांऽऽऽ।...पहले से ही बता रही हूं। मिसेज़ ढोलकिया कल पांच साड़ियां लाई हैं, दो आरगैन्ज़ा, एक शिफ़ॉन, एक कोटा, एक कांजीवरम् सिल्क। मैंने तो सिर्फ़ एक की डिमांड रखी है।
(कठिन परिस्थितियों में हास्य-रस काम आता है, सो श्रीमान जी ने हास्य-रस का सहारा लेने की एक खिसियानी सी कारुणिक कोशिश की—)
पांचों साड़ी एक साथ लपेट कर जाएंगी मिसेज ढोकलिया ?

(अब स्वर मधुरता से कठोरता की ओर यात्रा करता हुआ सशरीर किचिन से बाहर आ गया। सर्वनामों और संबोधनों में भी अचानकवादी बदलाव आ गया था। उदाहरण के लिए ‘आप’ की जगह ‘तुम’ और ‘सुनिये’ की जगह ‘सुनो’। तो सुनिए किचिन से निकले उस रूपाभ शरीर से क्या स्वर निकले। स्वर के शब्दार्थ आपकी समझ में आसानी से आ जाएं, इसलिए हम पहले ही बता दें कि अखिलेश का ज़िक्र आएगा। अखिलेश बाय द वे उनका देवर है। अब स्वर का तेवर देखिए—)
सुनो, अखिलेश को तुम कब तक बच्चा समझते रहोगे ? कुछ मालूम भी है कि आज-कल वो पार्ट-टाइम जॉब करने लगा है। अपने जेब ख़र्च और गुज़ारे लायक अच्छा कमाने लगा है। दो सौ रुपया महीना तुम कब तक देते रहोगे उसे ?

(अब विचारणीय बात ये है कि इस संवाद के बाद श्रीमान जी में किस प्रकार के भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन हुए होंगे ! उनकी आत्मा के खीरे पर कितना नमक लगा होगा ! वह कितनी अधीरा हो गयी होगी ! चीरा लगा होगा उनकी चेतना पर या हीरा चाटने की तबीयत हुई होगी ! फकीरा हो गए होंगे अपनी अदृश्य दुम के साथ दिमाग़ की कढ़ाई में छोंकने के लिए डाला गया जीरा हो गए होंगे। इस प्रश्न को लेकर हमारी खोपड़ी में मजीरा बज रहा है। चलिए इस स्थिति को लेकर अपनी-अपनी एक-एक अदद श्रीमती के साथ विभिन्न श्रीमानजियों की कल्पना करते हैं कि अखिलेश से जुड़े हुए संवाद के बाद क्या-क्या प्रतिक्रियाएं संभव हैं ? संभव तो बहुत कुछ हो सकता है, फिर भी !

प्रतिक्रिया श्रीमान जी नंबर-1 की


शादी से पहले ही मैंने तुमसे साफ़ साफ़ कहा था कि अखिलेश को मां का प्यार देना होगा। तुम्हें रह-रह के उसके दो सौ रुपये काटते हैं, शर्म नहीं आती।

(ऐसा कहकर श्रीमान जी नंबर-1 डाइनिंग टेबल के एक किनारे अपना ब्रीफ़केस ज़ोर से मारते, जिससे (सीसौ खेल प्रकृति का पालन करती हुई) दूसरे किनारे पर रखी अचार की शीशी एक स्वाभाविक धमाके के साथ नीचे गिर पड़ती है। तदनंतर (अर्थात् उसके पश्चात् यानी कि उसके बाद) एक भीतरी-बाहरी सन्नाटा-सा छा जाता है। उस सन्नाटे में अचार की कांच की शीशी से अलग हुआ गोल ढक्कन लुढ़कता-लुढ़कता ड्राइंगरूम की ओर चला जाता है और गिर पड़ता है। और कोई अवसर रहा होता तो ढक्कन के लुढ़कने की आवाज़ सुनाई नहीं देती, लेकिन, चूंकि श्रीमान जी के ब्रीफ़केस के योगदान से एक अनौपचारिक, अत्याचारिक, अशिष्टाचारिक, अनाचारिक, दुराचारिक, अविचारिक, स्वेच्छाचारिक और अचारिक (माने अचार की) स्तब्धता छा चुकी थी इसीलिए ढक्कन की लुढ़कन-ध्वनि सुनाई दे सकी। यों भी इस ध्वनि को सुनना दोनों के लिए लाचारिक हो गया। लेकिन समझने की बात ये है कि इस अदना से ढक्कन की तुलना में श्रीमती जी के अन्दर जो रोड रोलर और मोर्टार टैंक लुढ़क रहे थे, उनकी ध्वनि कतई बाहर नहीं आ रही थी।)

प्रतिक्रिया श्रीमान जी नंबर -2 की


तुम जानती हो मैडम, इस तरह बार-बार अखिलेश के जेब ख़र्च को एग़्ज़ाम्पिल बनाना मेरे को अच्छा नईं लगता। ऑफ़िस के लिए देर हो रही है। लैट मी गो। साड़ी नैक्स्ट मंथ ड्यू। प्रामिस !
(श्रीमती जी ने मायूस लेकिन भविष्योन्मुखी आशा भरी नज़रों से श्रीमान जी को देखा और एक अर्जित मुस्कान के साथ विदा कर दिया। मन में भले ही कोई तत्व अटका हो पर ओठों से कुछ नहीं कहा। दरवाज़ा बन्द हो गया, इसलिए हमारे पास भी वर्णन करने को कुछ नहीं रहा।)

प्रतिक्रिया श्रीमान जी नंबर-3 की


डार्लिंग, सोच रहा था कि आज ओवरटाइम करूंगा, पर साड़ी लानी है तो चलो जल्दी आ जाऊंगा।...और माफ़ करना, मैंने तुम्हें बताया नहीं कि कि पिछले चार महीने से मैंने अखिलेश का जेबख़र्च बन्द कर दिया। सो, मनी इज़ नो प्रॉब्लम। आरगैन्ज़ा ख़रीदो, पटोला ख़रीदो या नायलौन, कांजीवरम् ख़रीदो, चाहे शिफ़ॉन। शिल्क की आ तो जाएगी पर भारी बनारसी नहीं मिलेगी।

(लगातार घूरने की अपनी विशिष्ट शैली में श्रीमती जी अपने श्रीमान जी का लंबा संवाद सुनती रही। अचानक उन्होंने पलटा खाया और किचिन में लौट गईं। अब पूर्वानुमान की हथेली की रेखाओं के अनुसार ही घटित हुआ अर्थात् एक ज़ोरदार धमाका। कुकर की किस्मत में गड्ढा लिखा था, सो पड़ गया। सब्ज़ी के भाग्य में बिखरना लिखा था, सो बिखर गई। कुकर की सीटी के भाग्य में लुढ़कना लिखा था, सो लुढ़कते-लुढ़कते श्रीमान जी के चरणों तक आ गई। वे उसे उठाने को ही थे कि परशुराम के फरसे की धार के समान, भीम की गदा के प्रहार के समान, शिवाजी की तलवार के वार के समान और अर्जुन के गांडीव की टंकार के समान एक स्वर भूचाल आया।)

छूना मत इसे ! तुम्हारी ये हिम्मत कि अखिलेश की इतनी बड़ी बात मुझसे छिपाई।
(इस रण-रौरव में एक मेमना सहमकर बोलता है-)
छिपाने की क्या बात है इसमें, तुम्हारी साड़ी के लिए ही तो बचाए हैं।
चुपसंहार
(हमारे देश के श्रीमानजियों के अनेक प्रकार हैं और श्रीमतीजियां भी अनेक प्रकार की पाई जाती हैं। हमारे देश में बहुत सारे अखिलेश भी हैं और उनसे जुड़े क्लेश भी हैं।)
परंतु
बात लौटकर वहीं से शुरू होती है-
ए जी, सुनिए कल बेबी शो है, मुझे एक साड़ी चाहिए।
(श्रीमान जी को विदा किया जा रहा है। सर्वनाम और संबोधन भी नहीं बदले हैं- )
ए जी, सुन रहे हैं ! मार्केट जाने के लिए टाइम से आ जाइएगा। मैं वेट करूंगी, हां !
(अखिलेश प्रसंग को ‘फ़ॉर द टाइम बींग’ छोड़ा जा सकता है और हम देख रहे हैं कि बाल्कनी में खड़ी हुई श्रीमती जी अर्द्ध पाश्चात्य और अर्द्ध भारतीय शैली में, साड़ी के पल्लू की ओट में अपने हाथ को अर्द्ध उठाकर धीरे से हिला रही हैं और कह रही हैं-)
बाई बाई !

सेल लगी !


पात्र
श्रीमती जी
श्रीमान जी

ए जी सुनिए ! बी-ट्वैंटी नाइन में सेल लगी है। मिसेज़ खन्ना बहुत अच्छा स्टीरियो ख़रीदकर लाई हैं। बिट्टू की मम्मी ने चाइनीज़ डिनर सैट खरीदा है। इम्पोर्टेड चीज़ें सस्ते दामों पर मिल जाएं ऐसा मौक़ा हर बार नहीं आता।
(श्रीमान जी बार-बार घड़ी देखकर ये महसूस कर और करा रहे थे कि अदालत को देर हो रही है। इस समय वे एक उठाईगीरे की पैरी के लिए क़लमघिसाई कर रहे थे। लिखते समय उनके चेहरे पर कुछ इस तरह के सौम्य और निरपेक्ष गांभीर्य के भाव आ रहे थे गोया वे कामायनी के स्तर का कोई महाकाव्य लिख रहे हों। किसी भी प्रकार के डिस्टर्बीकरण की वे उम्मीद नहीं कर रहे थे। श्रीमती जी के श्रीवचनों को उन्होंने सुनकर भी नहीं सुना और तल्लीनता के साथ उथले गड्ढे में गहरा गोता लगाए रहे।)

(इस बार जो ‘ए जी सुनिए’ स्वर आया उसमें वैल्यूम के साथ ट्रैविल और बास दोनों ही ज़्यादा थे। मतलब कि उसमें एक पैनापन (कर्कश कहने का साहस तो नहीं करना चाहिए) भी था और एक गूंज भी। ऐसे स्वर का निनाद सुनकर तपस्यालीन ऋषि भी ध्यानावस्थित नहीं रह सकते, मतलब कि न सुनने का अभिनय नहीं कर सकते। बोले-क्या है ?)
-मैंने कहा बी-ट्वैंटी नाइन में सेल लगी है।

(बात को घुमाने का अपना वकीलाना पैंतरा दिखाते हुए श्रीमान जी बोले-)
-ये सेल लगी है क्या होता है मी लार्ड। सेल या तो होती है या की जाती है। इसे लगी या लगती कहना तो भाषा के क़ानून का सरासर अपमान है। लगती है पेड़ पर इमली। लगती है बाज़ार में बोली। लगती है पौधों पर मटर। लगती है सुंदरी को नज़र। लगती है कलेजे में चिंगारी। लगती है आंगन में बुहारी। ये सेल कब से लगने लगी प्यारी ?
 
 
 
 


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