श्री शिरडी साई बाबा - सत्यपाल रुहेला Shri Sirdi Sai Baba - Hindi book by - Satyapal Ruhela
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श्री शिरडी साई बाबा

सत्यपाल रुहेला

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :199
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3630
आईएसबीएन :81-288-0331-x

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श्रीशिरडी साई बाबा पर आधारित पुस्तक...

Shri Shirdi Sai Baba

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तावना

इस कलियुग के महानतम अवतार श्री शिरडी साई बाबा (1838-1918) के दैविक जीवनचरित, कार्यकलापों और शिक्षाओं पर इस पुस्तक ‘हमारे प्यारे श्री शिरडी साई बाबा’’ को हमने संकलित किया है। विभिन्न श्रोतों से इसकी अमूल्य सामग्री चुन-चुनकर जनकल्याणार्थ प्रस्तुत की गई है।

अधिकतर लोग तो यही जानते हैं कि श्री शिरडी साई बाबा 19वीं शताब्दी में शिरडी में रहनेवाले परम दयालु, चमत्कारी अवतार पुरुष थे। लेकिन वास्तव में वे दत्तात्रेय अवतार थे—विशेषकर शिवअवतार थे। अपने एक पूर्व जन्म में वे ही कबीर थे। 15 अक्तूबर, 1918 को महासमाधि प्राप्त करने पर वे सम्पूर्ण विश्व की ‘‘नियंत्रक आत्मा’’ (Spirit Guide of the world) बन गए थे और 1941 में वे साक्षात् भगवान ही बन गये थे और आज वे सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर हैं। पारसी योगी मनोचर के, स्पेन्सर की दुर्लभ पुस्तक ‘‘How I Found God’’ (1957) में यह सविस्तार रहस्योद्घाटन किया गया है कि किस प्रकार श्री साई बाबा ने, जो कि सर्वशक्तिमान भगवान हैं, उसकी आत्मा को भगवान अर्थात साई बाबा के साक्षात् दर्शन करवाये थे।

आज विश्व भर में श्री शिरडी साई बाबा के  नाम की धूम मची हुई है। विश्व भर में उनके मंदिर, भक्त व संस्थाएँ हैं। उनको सच्चे मन से याद करने पर किसी को भी उनकी दैवी कृपा प्राप्त हो जाती है। ऐसे परम दयालु भगवान का गुणगान इस पुस्तक में किया गया है। आशा है पाठकों को इससे प्रसन्नता व लाभ होगा। विभिन्न पाठकों व पत्र-पत्रिकाओं से संकलित सामग्री को इसमें प्रस्तुत किया गया है। उन सभी के प्रति हम आभार प्रकट करते हैं। ओम श्री साई।

डॉ. सत्यपाल रूहेला
श्रीमती सुशीला देवी रूहेला


1
श्री साई गणेश स्तुति


(-अनु.प्रो.जे.पी. श्रीवास्तव)

ओंकार रूप ! भगवान गणेश के रूप में बाबा। श्री गणेश की जय हो आप प्रच्छन रूप से मूलाधार, मानव-शरीर के मुख्य केन्द्र, में निवास करते हैं। बाबा, आप शब्दों तथा तालबद्ध संगीत में व्यक्त ब्रह्म हैं।
हे साई गणेश, मैं आपके समक्ष साष्टांग प्रणत होता हूँ। देवी सरस्वती की वीणा से अनुनादित होने वाली तानें संगीत-सम्बन्धी प्रतिभा की अभिव्यक्ति हैं। इस निरन्तर स्पन्दनशील कलाकारिता के माध्यम से आपके द्वारा हमारे लिये दिव्य अनुभूति उद्घाटित की जाती है।

हे साई गणेश, आप वाणी, आनन्द तथा परम तत्त्व हैं।
आप ईश्वर के अवतार हैं। अपार गुणों, शक्तियों तथा काल के त्रय से परे हैं।
आप इस विश्व से परे अमेय मूल्य कारण हैं।

आप शुभ वस्तुओं के उद्गम हैं। आप समस्त अनिष्टों के कारक हैं। आप ओंकार प्रणव के रूप में सभी सिद्धियों के स्रोत हैं।


बाबा, मैं आपका चकोर हूँ



हे बाबा आप प्रेम के चन्द्रमा हैं और मैं आपका चकोर हूँ।
अपनी अनुकम्पा की चन्द्रकिरणों से मुझे प्लावित कर दीजिए।
आप आनन्द के मेघ हैं। मैं आपका चातक हूँ, आपकी कृपादृष्टि का पिपासु।
हे बाबा : क्या आप मेरी भक्ति में अपने दिव्य अनुग्रह के प्रस्ताव की घोर वृष्टि नहीं करेंगे ?

आप ऊर्जा के महासागर हैं। मैं आपकी तरंग-महासागर अपनी बूँद को पहचनाता है किन्तु, बूँद अथाह जल के विस्तार को विस्मृत कर देती है।
बाबा, आप जीवन के अभिप्राय हैं, ज्ञान तथा भक्ति के सार हैं, आप मुक्ति, आत्म-तृप्ति तथा शान्ति हैं।
आप सम्पूर्णता तथा एकमात्र अवलम्ब हैं।

आप मेरी जीवनदायक श्वांस (प्राणवायु), ऊर्जा तथा विस्तीर्ण विश्व हैं। आप अज्ञान के अन्धकार को ज्ञान के देदीप्यमान प्रकाश में निमज्जित करने के लिए सक्षम हैं। संसार केवल एक रंगमंच है। हम सब उसमें अपनी-अपनी भूमिका का अभिनय कर रहे हैं, चाहे वह छोटी हो अथवा बड़ी।
मैं निश्चित रूप में जानता हूँ कि इस नाटक में आप अदृश्य निर्देशक हैं।
बाबा, आपने अपने अनुयायियों के भार को वहन करने के लिए गोदावरी तट पर निवास किया है। पार्थिव सांसारिक जीवन निस्सार है, तथापि बाबा आपने इस संसार को अर्थ तथा उद्देश्य प्रदान किया है।

हे भगवन ! आपकी अमेय कृपा का न आदि है न अन्त। जीवन में इससे बड़ा हित और कुछ नहीं हो सकता कि प्रत्येक जन्म में आपकी कोटि का साथी मिल जाये। मैं आपके पावन चरणों में अपने सांसारिक अस्तित्व सहित अपनी खिलती हुई भावनाओं को समर्पित करता हूँ। मेरी इस अकिंचन आत्मा का उद्धार करना, रक्षा करना अथवा पराभूत करना (अब) आपके हाथों में है।

ज्योति को ज्योति से मिलने दीजिये। प्रेम को प्रेम में विलीन होने दीजिये। इस प्राणधारी कोश को आपके श्री चरणों में अर्पित होने दीजिये। आप रुद्र, विष्णु तथा ब्रह्म हैं। आप अकलुषित ब्रह्म हैं। मेरी जीवन-नौका की पतवार आपके हाथों में है। आप मेरे गुरु तथा मार्गदर्शक हैं। क्या आप इस नौका को संसार के विप्लवों से परे खींचकर नहीं ले जायेंगे ?


‘‘जो रहीम मन आपनो, कीन्हों चारु चकोर।
निस दिन लाग्यो ही रहे, कृष्ण-चंद्र की ओर।।’’

    (-श्री साई लीला, अगस्त 1989 से साभार)


2
श्री शिरडी साई बाबा : अवतार के रूप में



(-डॉ. सत्यपाल रूहेला)


श्री दासगणू महाराज 1917 में रचित अपनी ‘‘साई नाथ स्तवन मंजरी’’ में, जो श्री साई बाबा संस्थान द्वारा मराठी, हिन्दी एवं गुजराती में प्रकाशित, और जिसे हजारों भक्तों द्वारा नित्य प्रार्थना में (श्रद्धा से गाया जाता है, ने साई महिमा में गया है :


‘‘अमाचे आद्य कारणं। जे का विमल चैतन्य।
ते तुम्हीय आहा दयाधन।
विश्व का विलास तुमचाचि।।7।।
आमण जन्मरहित। मृत्यु ही जा आपणाप्रत।
तेंचे अखेर कबून येत।
पूर्ण विचारें शोभिता।।।8।।


‘‘हे साई ! आप इस सृष्टि के सर्वोच्च कारण हो। आप ही पवित्र चेतना हो, आप ही दया की साक्षात मूर्ति हो। यह जगत आपकी एक अभिव्यक्ति है, आप अजन्में हैं, मृत्यु भी आपको प्रभावित नहीं करती। गहरे चिन्तन के पश्चात् यही अंतिम निर्णय है जिस पर पहुँचा जा सकता है।
श्री शिरडी साई बाबा अवतार के दिव्य नाम से आज कौन भारतीय परिचित नहीं है। वे कलियुग के महानतम अवतार थे। वे भगवान शंकर के पूर्ण अवतार थे। उनके जीवन-रहस्य का उद्घाटन भगवान श्री साई बाबा ने विस्तारपूर्वक 6 जुलाई, 1963 को गुरु पूर्णिमा के उत्सव के दिन किया था।

‘‘शिव और पार्वती ने ऋषि भरद्वाज को और अधिक वरदान दिये। शिव ने कहा कि वे भरद्वाज गोत्र में तीन बार अवतार लेंगे—केवल शिव के रूप में वे शिरडी के साई बाबा होंगे, शिव और शक्ति के सम्मिलित रूप में पुट्टपर्ती में श्री सत्य साई बाबा के रूप में और केवल शक्ति के रूप में श्री प्रेम साई का अवतार होगा।’’

ऋषि भरद्वाज को भगवान शंकर का यह वरदान लगभग 5600 वर्ष पूर्व प्राप्त हुआ था। शिरडी साई बाबा के रूप में आविर्भाव के पूर्व उन्होंने अनेक अवतार लिये थे। और उनमें से एक अवतार में वे ही सन्त कबीर थे जिन्होंने 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में और 16 शताब्दी के पूर्वार्ध तक जीवन धारण किया। उन्होंने अपने जीवन-काल में धार्मिक कर्म-काण्ड और बाह्य-आडम्बरों का खण्डन किया था और हिन्दू और मुसलमान—दोनों धर्मों के लोगों को आध्यात्मिक शिक्षा देने का प्रयास किया था। शिरडी के साई बाबा ने अपने कुछ भक्तों को बताया था कि वे पिछले 62 जन्मों में उनके साथ थे। शिरडी साई बाबा को प्रायः सभी भक्तों के द्वारा दत्तात्रेय का भी अवतार माना जाता है।

सन् 1990 में भगवान श्री सत्य साई बाबा ने शिरडी साई बाबा अवतार से संबंधित इन तथ्यों को उद्घाटित किया था। उसके पश्चात् 1992 में भी बाबा ने अपने दिव्य प्रवचन में कुछ और तथ्यों को प्रकट किया था।

जब देवगिरिअम्मा और गंगा भवडिया पथरी नाम ग्राम में निवास कर रहे थे। वे दोनों लम्बी अवधि तक निःसन्तान रहे और इसलिए उन लोगों ने ईश्वर से अपनी प्रार्थना को गहनतर बना दिया। गंगा भावडिया जीवन-यापन के लिए पथरी ग्राम के निकट की नदी में नाव चलाने का व्यवसाय करते थे। एक रात को जब मूसलाधार जलवृष्टि हो रही थी, गंगा भावडिया रात में वापस न लौटने की बात अपनी पत्नी से कहकर नाम की रखवाली और सुरक्षा के लिए नदी के तट पर चले गये। जब गंगा भावडिया खाना खाकर चले गये, तब देवगिरिअम्मा ने खाना खाया और सोने के लिए बिस्तर पर चली गयीं। रात के नौ बजे उन्हें अपने दरवाजे को खटखटाये जाने का आभास हुआ। देवगिरिअम्मा ने इस संभावना में दरवाजा खोला कि शायद उनके पति वापस आ गये हैं। दरवाजा खुलने पर एक बहुत वृद्ध व्यक्ति ने घर में प्रवेश किया। उसने अनुरोध किया, ‘‘बाहर बहुत तेज सर्दी है। माँ, मुझे ठण्डक से बचने के लिए अन्दर सोने की अनुमति दो।’’ एक धार्मिक महिला होने के नाते देवगिरिअम्मा ने उस वृद्ध को बरामदे में विश्राम की अनुमति दे दी और अन्दर का दरवाजा बन्द करके भीतर चली गयीं उसके थोड़ी ही देर बाद भीतर के दरवाजे से खटखटाने की आवाज उन्होंने सुनी। उन्होंने दरवाजा खोल दिया। तब वृद्ध व्यक्ति ने कहा—‘‘मुझे भूख लगी है। मुझे कुछ खाने को दो।’’ घर में खाने को कुछ न बचा होने के कारण देवगिरिअम्मा ने दही के साथ बेसन की कढ़ी बनाकर उसे खाने के लिए दे दिया। थोड़ी देर बाद फिर दरवाजा खटखटाया गया।


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