मुक्त गगन के पंछी - ओशो Mukt Gagan Ke Panchhi - Hindi book by - Osho
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मुक्त गगन के पंछी

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :89
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3631
आईएसबीएन :81-7182-229-0

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ओशो द्वारा सूफी,झेन एवं उपनिषद् की कहानियों एवं बोध-कथाओं पर दिये गये सुबोधगम्य 19 अमृत प्रवचनों की श्रृंखला बिन बाती बिन तेल में से संकलित चार (16 से 19) प्रवचनों का संकलन...

Mukt gagan ke panchhi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

चैतन्य के इतिहास में एक महान घटना घटी है। ऐसी घटना न तो बुद्ध के पास घटी है, न ही महावीर के, न कबीर के।
100 से अधिक देशों के सत्य के खोजी किसी अज्ञात आकर्षण से एक शून्य के पास खिंचे चले आए हों, इसे संयोग कहना कठिन है। जन्मों-जन्मों के प्यासे अगर एक निश्चित समय के भीतर जलस्रोत के पास पहुँच जायें, और तृप्त हो जायें, तो इसे अकारण मानना कठिन है। सदियों-सदियों बाद जब कभी ऐसा कुछ घटता है, तब उस महाघटना को ‘ओशो’ कहते हैं। वह जो न कभी जन्मता है न कभी मरता है, उसका नाम ‘ओशो’ है।
ओशो की अनुपस्थिति उपस्थिति में, उनके ऊर्जा-क्षेत्र में जीवन-रूपांतरण की क्रमबद्ध घटना घट रही है, बुद्धत्व की नयी धारा बह रही है।
ओशो बुद्धत्व की नयी परिभाषा है, नवीनतम प्रारम्भ हैं। और उनके कारण, मात्र उनके कारण नये मनुष्य का जन्म है, नये युग का प्रारम्भ है।

मुक्त गगन के पंछी

अगर बुद्धों के पास तुम पंख फड़फड़ाना न सीखो तो और कुछ सीखने को वहां है भी नहीं।
यही तो प्रवचन है : यही उनका संदेश है, कि तुम उड़ सकते हो मुक्त आकाश में। तुम मुक्त गगन के पक्षी हो। तुम व्यर्थ ही डरे हो। तुम भूल ही गये हो कि तुम्हारे पास पंख हैं। तुम पैरों से चल रहे हो। तुम आकाश में उड़ सकते थे। थोड़ा फड़फड़ाओ ताकि तुम्हें भरोसा आ जाए।

ध्यान फड़फड़ाहट है पंखों की; उन पंखों की जो उड़ सकते हैं, दूर आकाश में जा सकते हैं।
ध्यान सिर्फ भरोसा पैदा करने के लिए है ताकि विस्मृति मिट जाए; स्मृति आ जाए। संतों ने, कबीर ने, नानक ने शब्द का उपयोग किया है-सुरति। सुरति का अर्थ है, स्मरण आ जाए। जो भूला है, उसका ख्याल आ जाए। तुमने कुछ खोया नहीं है, तुम सिर्फ भूले हो। खो तो तुम सकते भी नहीं। पक्षी भूल सकता है कि उसके पास पंख हैं, खो कैसे सकेगा ? और कितने ही जन्मों तक न उड़े, तो भी अगर उड़ने का ख्याल आ जाए, तो पुनः उड़ सकता है।

-ओशो

पहला प्रवचन

साधु, आसाधु और संत

भगवान !
एक धनाढ्य बुढ़िया बीस वर्षों से एक साधु को आश्रय दिये थी।
उसके लिये एक झोपड़ा बनवा दिया था और भोजन देती थी।
एक दिन उसने साधु की जांच लेने की सोची।
इसके लिये एक वेश्या की मदद ली।
उससे उसने कहा, ‘जाओ और साधु का आलिंगन करो।’ और फिर पूछो, ‘अब क्या हो ?’
वेश्या साधु के पास गयी, उस पर प्रेम प्रगट किया
और फिर पूछा कि अब क्या होना चाहिये ?
साधु ने उत्तर दिया, ‘जाड़े में ठंड़ी चट्टान पर जैसे पुराना वृक्ष लगा हो;
कहीं कोई गरमी नहीं।
वेश्या ने लौटकर सारी बात बुढ़िया को बताई।
बुढ़िया बहुत नाराज हुई
और उसने जाकर झट साधु का झोपड़ा जला डाला।
भगवान ! इस बुढ़िया के व्यवहार को आप क्या कहेंगे ?’

धर्म को देखने के दो ढंग हैं। एक ढंग तो है, धर्म को संसार के विरोध में, शत्रुता में देखने का; जैसे धर्म संसार से उल्टा है। जो हम यहां करते हैं उससे विपरीत करेंगे तो धर्म होगा। अगर भोजन में रस है, तो उपवास में धर्म होगा। अगर शरीर के सौंदर्य में रस है, तो शरीर की विकृति और कुरूपता में धर्म होगा। अगर धन को इकट्ठा करने में मन लगता है तो धन के त्याग में धर्म होगा। संसार की तरफ पीठ कर लेने में धर्म होगा।

यह एक दृष्टि है। यह दृष्टि बड़ी साधारण है। इस दृष्टि का कोई गहरा अनुभव नहीं है। यह मन का साधारण गणित है। मन का नियम एक अति से दूसरी अति पर चले जाना। जब तुम देखते हो कि धन से सुख न मिला, तो तत्क्षण मन में खयाल उठता है, धन छोड़ने से मिलेगा। विवाह किया और सुख न मिला, तत्क्षण मन कहता है, तलाक करने से सुख मिलेगा।
तुम्हारा मन कहता है, सुख तो मिलेगा ही। तुमने जैसा अभी किया उससे उल्टा करो। लेकिन सुख मिलेगा, इस संबंध में मन को संदेह पैदा नहीं होता। सिर्फ अपनी दिशा बदल लो। पूरब जाते थे, नहीं मिला तो पश्चिम जाओ; पर सुख मिलेगा। दिशा बदल लेने की जरूरत है। अभी दुकान पर बैठते थे, अब मन्दिर और मस्जिद में बैठो। अभी तक अश्लील पोरनोग्राफी का साहित्य पढ़ते थे, अब शास्त्र पढ़ो, धर्मग्रन्थ पढ़ो, लेकिन पढ़ने से मिलेगा। दिशा भर बदल लेनी है। उल्टा कर लेना है। यह मन का स्वाभाविक नियम है।
तुम बच्चे को प्रेम करते हो, समझाते हो, नहीं मानता; तत्क्षण डंडा उठा लेते हो। प्रेम से नहीं माना तो कठोरता से मानेगा। पुरस्कार से नहीं माना तो दंड से मानेगा। पहले तुम स्वर्ग का प्रलोभन देते हो, नहीं कोई राजी होता तो फिर नर्क का भय बताते हो। मन तत्क्षण विपरीत में खोजता है।

मन के लिये दो ही हैं : या तो यह, या इससे उल्टा; तीसरे का कोई उपाय नहीं। और अगर इससे नहीं मिला तो आधी संभावना समाप्त हो गयी; आधी बची है, उसमें खोज लो। यह धर्म मन से ऊपर नहीं जाता। यह मन के द्वंद्व के भीतर है।
और धर्म तभी शुरू होता है, जब तुम मन के पार जाओ। जब तुम दो के बीच न चुनो, दोनों को छोड़ दो। जब धन तो छूटे ही, निर्धनता का मोह भी छूट जाये। जब स्त्री तो छूटे ही, पुरुष तो छूटे ही, लेकिन विपरीत न पकड़ ले। कुएं से बचे और खाई में गिर गए, ऐसा जब न हो। बड़ा कठिन है। मन के लिये द्वंद्व में बदल लेना बहुत आसान है, निर्द्वंद हो जाना कठिन है।
धर्म का जो गहनतम रूप है, वह निर्द्वंद्वता है। यह कथा उसी की तरफ इशारा है।

साधु पहले तरह के धर्म को मानता होगा। अक्सर साधु पहले तरह का धर्म मानते है। इसलिये साधु ही रह जाते हैं, संत नहीं हो पाते। बुढ़िया दूसरे तरह के धर्म की तलाश में थी; संतत्व की तलाश में थी, इस भेद को ठीक से समझ लो।
संसार में दो तरह के लोग है; असाधु हैं और साधु हैं। लेकिन दोनों संसार में हैं। संत संसार के पार है। इसलिये संत को समझना बड़ा कठिन है। साधु को समझना बिलकुल आसान है, क्योंकि गणित तुम्हारा ही है वह। तुम भोग समझते हो; त्याग भी समझ लोगे। वह कुछ दूर की बात नहीं, तुम्हारे करीब है, तुम लोभ समझते हो, तुम दान भी समझ लोगे। क्योंकि दान की भाषा, लोभी की भाषा के विपरीत हो; लेकिन दूर नहीं है, बहुत करीब है। तुम अहंकार समझते हो, विनम्रता भी समझ लोगे; क्योंकि विनम्रता अहंकार का ही सूक्ष्मतम रूप है।

जब कोई आदमी विनम्रता से तुम्हें मिलता है, तुम कितने प्रसन्न होते हो ! तुम कहते हो, यह आदमी कितना विनम्र है ! तुम समझ लेते हो। लेकिन तुम समझ कैसे पाते हो विनम्रता को ? जब दूसरा आदमी विनम्र होता है, तब तुम्हारे अहंकार की तृप्ति होती है। कोई झुककर तुम्हारे चरण छूता है, तुम कहते हो कितना विनम्र ! लेकिन उसकी विनम्रता का क्या अर्थ है ?  उसकी विनम्रता तुम्हारे अहंकार को भर रही है। तुम्हारा अहंकार विनम्रता को ठीक से समझ पाता है। तुम किसी से मांगने जाते हो दो पैसे, वह तुम्हें चार पैसे दे देता है। तुम्हारा लोभ उसके दान को भली-भांति समझ पाता है। लोभ को दान के समझने में जरा भी कठिनाई नहीं है। भाषा एक ही है।

एक आदमी स्त्रियों के पीछे भाग रहा है और दीवाना है। फिर एक आदमी छोड़ देता है स्त्रियों को, उनकी तरफ पीठ करके जंगल की तरफ भागता है। तुम बिलकुल समझ पाते हो। यह भाषा कामवासना की ही है। यह ब्रह्मचर्य कोई कामवासना के बाहर नहीं है, उसके भीतर है। लेकिन तुम कृष्ण के ब्रह्मचर्य को न समझ पाओगे। क्योंकि वह तुम्हारी कामवासना के बिलकुल बाहर है; विपरीत नहीं, बाहर। इस बात को ठीक से समझ लो।
विपरीत तो द्वंद्व के भीतर ही होता है। मोक्ष संसार के विपरीत नहीं हैं, संसार के पार है। संतत्व असाधु के विपरीत नहीं है, साधु-असाधु दोनों के पार है। अगम असाधु सीधा ख़डा है, तो साधु शीर्षासन कर रहा है। आदमियों में कोई भी फर्क नहीं है, वे दोनों एक जैसे हैं। तुम किसी साधु के पास जाओ, तुम हजार स्वर्ण-मुद्राएं उसके चरणों में रखो और वह फेंक दे और कहे, ‘हटाओ, इस कचरे को यहाँ क्यों लाए ?’ तुम बिलकुल समझ जाओगे कि यह है साधु। लेकिन अगर वह कुछ भी न कहे, तुम हजार-स्वर्ण-मुद्राएं उसके चरणों में रखो, वह चुपचाप बैठा रहे, तब तुम्हें संदेह पैदा होगा। समझ मुश्किल में पड़ी।

ऐसा हुआ, कबीर का बेटा था कमाल। और कबीर अगर साधु हैं तो कमाल संत है। बेटा बाप से एक कदम आगे था। और कबीर को तो लोग समझ पाते थे, कमल को नहीं समझ पाते थे। काशी के नरेश ने कबीर से पूछा कि कई लोग कमाल को भी पूजते हैं, उसके पास भी जाते हैं। लेकिन मुझे कमाल समझ में नहीं आता। नरेश को भिखारी समझ में आ सकता है। कबीर समझ में आते थे। सब छोड़े हैं।
नरेश ने कहा, ‘इस कमाल को तो अलग ही कर दो यहां से। यह एक उपद्रव है। यह लोभी मालूम पड़ता है।’
कबीर ने पूछा, ‘कैसे तुमने पता लगाया ?’
तो नरेश ने कहा, ‘एक दिन मैं गया एक बहुमूल्य हीरा लेकर। और मैंने कमाल को कहा कि यह बहुमूल्य हीरा भेट लाया हूँ, तुम कहते हो, पत्थर है, हृदय मेरा गदगद हो जाता है। व्यर्थ है, मैं समझता हूँ।’
कमाल ने कहा, ‘ले ही आये हो तो अब बोझ को कहां वापिस ले जाओगे ? रख जाओ।’ यह बात जरा कठिन हो गयी। तो मैंने पूछा कि ‘कहां रख दूं ?’ तो कमाल ने कहा कि ‘अब पूछते हो, कहां रख दूं ? समझे नहीं; लेकिन ठीक है-’ झोपड़े में जहां कमाल बैठा था, सनोरियों का झोपड़ा था- ‘छप्पर में खोंस दो।’

तो सम्राट ने कहा, ‘मैं छप्पर में खोंस आया हूं। लेकिन मैं जानता हूं कि मैं बाहर नहीं निकला होऊंगा कि हीरा निकाल लिया गया होगा। अब तक तो बिक चुका होगा।’ कबीर ने कहा, ‘तुम एक बार और जाकर पता तो लगाओ कि हीरे का क्या हुआ ?’
सम्राट गया और उसने कमाल से पूछा कि कोई छह महीने हुए एक हीरा मैं लाया था, बड़ा बहुमूल्य था। तुमने कहा, ‘छोड़ जाओ’, मैं झोपड़े में खोस गया था। वह हीरा कहां है ?’

कमाल हंसने लगा और उसने कहा, ‘उस दिन भी मैंने कहा था वह हीरा नहीं है, पत्थर है। और इसलिये तो कहा था कि छोड़ जाओ, क्योंकि अब ले ही आये हो, इतनी नासमझी की यहां तक ढ़ोने की, अब वापिस कहां वजन को ले जाओगे ? फिर तुम झोपड़ में खोस गये थे। अब मुझे पता नहीं। अगर किसी ने निकाल न लिया हो तो वहीं होगा। और किसी ने निकाल लिया हो तो हम कोई उसकी रक्षा करने यहां नहीं बैठे हैं !’ संदेह पक्का हो गया कि हीरा निकाल लिया गया है। लेकिन फिर भी चलते-चलते सम्राट ने आँख उठाकर देखा, हैरान हुआ। हीरा वहीं था। वह निकाला नहीं गया था।


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