तेनालीराम की सूझबूझ - बिस्वरूप रॉय चौधरी Tenaliram Ki Sujhbujh - Hindi book by - Bishwaroop Roy Chaudhury
लोगों की राय

बाल एवं युवा साहित्य >> तेनालीराम की सूझबूझ

तेनालीराम की सूझबूझ

बिस्वरूप रॉय चौधरी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :141
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3632
आईएसबीएन :81-288-0148-1

Like this Hindi book 1 पाठकों को प्रिय

56 पाठक हैं

तेनालीराम की कहानियों का संग्रह....

Tenaliram Ki sujhabujha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विवाह की रस्में पूरी हो चुकी थीं। राजा खुशी-खुशी अपनी दुल्हन को घर ले जाने की तैयारी कर रहे थे। अचानक दुल्हन ने पांव से मखमल की जूती उतारी और मुस्कराते हुए राजा पर फेंकी। तेनाली राम राजा के पास ही था। उसने धीरे से राजा के कान में कहा-‘‘महाराज उन्हें क्षमा कर दीजिए, यह सब मेरा किया धरा है।’’
राजा हंस पड़े और जूती उठाकर दुल्हन के हाथ में दे दी। उस बेचारी ने क्षमा मांगते हुए कहा-‘‘रस्म पूरी करने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा।’’

अपने महल में पहुंचने पर राजा कृष्णदेव राय को तेनाली राम से सारी कहानी मालूम हो गई। वह बोले-‘‘तुम्हारा कहना ही ठीक था। लोग किसी भी बात पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं।

दो शब्द


तेनाली राम विजयनगर के यशस्वी राजा कृष्णदेव राय का राज्य-विदूषक था। गंभीर-से-गंभीर को भी मात्र अपने परिहास द्वारा हल कर देना इसका विशिष्ट गुण था। उत्तर भारत में महान मुगल सम्राट अकबर के राज्य-विदूषक बीरबल को हास-परिहास में जो स्थान मिला हुआ है दक्षिण भारत में उससे भी कहीं अधिक हास-परिहास वार्ताएं तेनाली राम के बारे में प्रचलित हैं। कुछ किस्से तो तेनाली राम और बीरबल के संपूर्ण भारतवर्ष में ही इतने अधिक लोकप्रिय हो चुके हैं कि पहचान करनी मुश्किल पड़ जाती है कि यह किस्सा तेनाली राम का है या बीरबल का।

इस विषय में निश्चित ही तेनाली राम को प्रमुखता देनी होगी, क्योंकि उसका कार्यकाल बीरबल के कार्यकाल से कहीं अधिक पहले का था। तेनाली राम मुगल सम्राट बाबर का समकालीन था जबकि बीरबल उसके बहुत बाद सम्राट अकबर का समकालीन हुआ। कुछ भी हो-तेनाली राम था अपूर्व बुद्धि कौशल का स्वामी। वह एक गरीब ब्राह्मण ‘ईश्वर प्रसाद रमैया’ का पुत्र था। उसका वास्तविक नाम था ‘रामलिंग’। उसका जन्म गुन्टूर जिले के गलीपाडु नामक कस्बे में हुआ, लेकिन जन्म के तीसरे ही दिन उसके पिता का साया उसके सिर से उठ गया था। परवरिश हुई उसके मामा के यहाँ, जो तेनाली कस्बे में रहता था। ननिहाल में रहने के कारण लोग उसके वास्तविक नाम को भूल गये, और उसे तेनाली राम कहकर सम्बोधित करने लगे। बाद में आगे चलकर यही नाम प्रचलित हो गया।

विजयनगर के राजदरबार में विदूषक का स्थान प्राप्त करने में तेनाली राम को अत्यधिक संघर्ष करना पड़ा। एक समय तो ऐसी हालत पैदा हो गई थी कि उसे तथा उसके परिवार (स्वयं माता तथा पत्नी) को फाकाकशी करने पर भी मजबूर होना पड़ा था। लेकिन आशावादी तथा परिश्रमी तेनाली ने हिम्मत नहीं हारी और अन्ततः हर विपत्ति का सामना करता हुआ एक दिन विजयनगर नरेश कृष्णदेव राय के दरबार में स्थान पा गया। तेनाली की गणना महाराज कृष्णदेव राय के अष्ट दिग्गजों में की जाती है।

तेनाली राम द्वारा कही गई अनेकानेक परिहास कथाएं प्रचलित हैं। जिनमें से कुछ कथाएं हम इस पुस्तक द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा ही नहीं विश्वास भी है कि ये रुचिकर कथाएं हमारे पाठकवृन्द को अवश्य पसन्द आएंगी। हम विश्वास दिलाते हैं कि भविष्य में इससे भी रुचिकर कथाएं आपके लिए प्रस्तुत करते रहेंगे।

-प्रकाशक

महामूर्ख


राजा कृष्णदेव राय होली का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाते थे। होली के दिन मनोविनोद के अनेक कार्यक्रम विजयनगर में होते थे। प्रत्येक कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार देने की व्यवस्था भी होती थी। सबसे बड़ा तथा सबसे मूल्यवान पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था।
तेनाली राम को हर साल सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार का पुरस्कार तो मिलता ही था। अपनी चतुराई और बुद्धिमानी के बल पर प्रतिवर्ष ‘महामूर्ख’ भी वही चुना जाता था।
इस तरह तेनाली राम हर वर्ष दो-दो पुरस्कार अकेले हड़प लेता था।
इसी कारण अन्य दरबारियों को प्रतिवर्ष ईर्ष्या की आग में झुलसना पड़ता था।
इस साल अन्य दरबारियों ने फैसला कर लिया था कि इस बार होली के उत्सव पर तेनाली राम का पत्ता ही साफ कर दिया जाए। उसके लिए उन्होंने एक तरकीब भी खोज ली थी।

तेनाली राम के प्रमुख सेवक को पढ़ा-सिखाकर उसके द्वारा तेनाली राम को छककर भंग पिलवा दी गई। होली के दिन इसी कारण तेनाली भंग के नशे की तरंग में घर पर ही पड़ा रहा।

दोपहर बाद जब तेनाली राम की नींद खुली तो वह घबरा गया और इसी घबराहट में भागता-भागता दरबार में पहुंच गया।

जब वह दरबार में पहुंचा, तब तक उत्सव में आधे से अधिक कार्यक्रम सम्पन्न हो चुके थे।
राजा कृष्णदेव राय उसे देखते ही डपटकर बोले-‘‘अरे मूर्ख तेनाली राम जी, आज के दिन भी भंग छानकर सो गये ?’’
राजा ने तेनाली राम को मूर्ख कहा तो सारे दरबारी प्रसन्न हो उठे। उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और बोले, ‘‘आपने बिल्कुल सत्य ही कहा महाराज। तेनाली राम मूर्ख ही नहीं बल्कि महामूर्ख है।’’

जब तेनाली राम ने सब लोगों के मुंह से यह सुना तो मुस्कराता हुआ महाराज से बोला, ‘धन्यवाद महाराज, आपने अपने श्रीमुख से मुझे महामूर्ख घोषित करके आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार तो मेरे लिए सुरक्षित कर ही दिया है।’’

तेनाली राम के मुख से यह सुनते ही दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया।
किन्तु वे अब कर भी क्या सकते थे ? क्योंकि वे स्वयं ही अपने मुख से तेनाली राम को महामूर्ख बता चुके थे।
होली के अवसर पर ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार तेनाली राम हर साल की तरह फिर झपट ले गया।

लाल मोर


विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय को अद्भुत व विलक्षण चीजें संग्रह करने का बहुत शौक था।

हर दरबारी उन्हें खुश रखने के लिए ऐसी ही दुर्लभ वस्तुओं की खोज में रहता था ताकि वह चीज महाराज को देकर उनका शुभचिंतक बन सके तथा रुपये भी ऐंठ सके।

एक बार एक दरबारी ने एक अनोखी चाल चली। उसने एक मोर को रंगों के एक विशेषज्ञ से लाल रंगवा लिया और उस लाल मोर को लेकर वह सीधा राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुंचा और राजा से बोला-‘‘महाराज ! मैंने मध्य प्रदेश के घने जंगलों से आपके लिए एक अद्भुत व अनोखा मोर मंगाया है।’’

राजा कृष्णदेव राय ने उस मोर को बड़े गौर से देखा। उन्हें बड़ा ताज्जुब हो रहा था...‘‘लाल मोर...वास्तव में आपने हमारे लिए अद्भुत चीज मंगाई है। हम इसे राष्ट्रीय उद्यान में बड़ी हिफाजत से रखवाएंगे। अच्छा...यह तो बताओ कि इस मोर को मंगाने में तुम्हें कितना रुपया खर्च करना पड़ा ?’’

दरबारी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो वह प्रसन्न हो उठा। बड़े ही विनम्र भाव से वह राजा से बोला, ‘‘महाराज, आपके लिए यह अनोखी वस्तु लाने के लिए मैंने अपने दो सेवक पूरे देश की यात्रा पर भेज रखे थे। वे वर्षों तक किसी अद्भुत वस्तु की खोज में लगे रहे। तब कहीं जाकर, मध्य प्रदेश के जंगलों में यह अनोखा लाल रंग का मोर मिला। मैंने अपने उन सेवकों पर करीब पच्चीस हजार रुपये खर्च किये हैं।’’

उस दरबारी की बात सुनकर राजा कृष्णदेव राय ने तुरन्त मंत्री को आज्ञा दी, ‘‘मंत्री जी, इन सज्जन को पच्चीस हजार रुपये राज-कोश से दे दिए जाएं।’’

मंत्री को यह आज्ञा देकर राजा ने दोबारा उस दरबारी से कहा, ‘‘यह तो आपको वह रुपया दिया जाता है, जो आपने खर्च किया है। इसके अलावा एक सप्ताह बाद आपको उचित पुरस्कार भी दिया जाएगा।’’
दरबारी को भला और क्या चाहिए था ? वह तेनाली राम की ओर कुटिल भाव से देखकर मुस्कराने लगा।

तेनाली राम उसके मुस्कराने का मतलब समझ गया, लेकिन समय को देखते हुए उसने चुप रहना ही उचित समझा।
तेनाली राम यह भी समझ गया कि लाल रंग का मोर किसी भी देश में नहीं होता। कहीं भी नहीं पाया जाता।
उसे लगा, यह सब अवश्य ही इस दरबारी की कोई चाल है।
बस फिर क्या था। तेनाली राम ने दूसरे ही दिन उस रंग विशेषज्ञ को खोज निकाला जिसने लाल मोर तैयार किया था।
तेनाली राम चार और मोर लेकर उस चित्रकार के पास पहुँचा। उसने उन्हें लाल रंग से रंगवा कर तैयार कराया और उसी दिन उन्हें दरबार में ले जाकर राजा से कहा, ‘‘महाराज हमारे मित्र दरबारी ने पच्चीस हजार से केवल एक लाल मोर ही मंगवाया था और मैं सिर्फ पचास हजार में उससे भी अधिक सुन्दर चार लाल मोर ले आया हूं।’’
राजा ने देखा। सचमुच तेनाली राम के चारों मोर उस दरबारी वाले मोर से कहीं अधिक सुन्दर और सुर्ख लाल रंग के थे।
राजा को आज्ञा देनी पड़ी, ‘‘तेनाली राम को राजकोष से पचास हजार रुपये फौरन दे दिए जाएं।’’
राजा कृष्णदेव राय की यह आज्ञा सुनते ही तेनाली राम ने एक आदमी की ओर इशारा करते हुए राजा से कहा, ‘‘महाराज, पुरस्कार का सही अधिकारी यही कलाकार है, मैं नहीं हूं। यह आदमी एक अनोखा चित्रकार है। यह किसी भी वस्तु का रंग बदलने की कला में निपुण है। इसी ने नीले मोरों का रंग लाल करने की कला दिखाई है।’’
अब राजा को सारा गोरखधन्धा समझते देर नहीं लगी। वह समझ गए कि पहले दिन दरबारी ने उन्हें मूर्ख बनाकर रुपये ठगे थे।
राजा ने फौरन ही उस दरबारी पर पच्चीस हजार लौटाने के साथ ही पांच हजार रुपये जुर्माने का आदेश दिया और चित्रकार को पुरस्कृत किया।

दरबारी बेचारा क्या करता ! वह अपना-सा मुंह लेकर रह गया।
राजा कृष्णदेव राय को खुश करने की सनक के चक्कर में पांच हजार रुपये भी गंवाने पड़े।

पड़ोसी राजा


विजयनगर राज्य का अपने पड़ोसी राज्य से मनमुटाव चल रहा था। तेनाली राम के विरोधियों को तेनाली राम के खिलाफ राजा कृष्णदेव राय को भड़काने का यह बड़ा ही सुन्दर अवसर जान पड़ा।

एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने बगीचे में अकेले बैठे पड़ोसी राज्य की समस्या के बारे में ही सोच रहे थे कि तभी एक दरबारी उनके पास पहुंचा और बड़ी होशियारी से इधर उधर झांकता हुआ राजा के कान के पास मुंह ले जाकर बोला, ‘‘महाराज, कुछ सुना आपने ?’’
‘‘नहीं तो..क्या हुआ ?’’ राजा चौंके।
‘‘महाराज, क्षमा करें। पहले जान बख्श देने का वचन दें तो कुछ कहूं।’’
‘‘जो भी कहना हो, निस्संकोच कहो, डरने की कोई बात नहीं है।’’ राजा ने दरबारी को अभय दान देते हुए कहा।
‘‘महाराज, तेनाली राम पड़ोसी राजा से मिले हुए हैं। वे हमारे पड़ोसी राजा के साथ हमारे सम्बन्ध बिगाड़ना चाहते हैं।’’
‘‘क्या बकते हो ?’’ राजा गरज कर बोले।
मैं तो पहले ही समझ गया था महाराज। तेनाली राम ने आप के ऊपर ऐसा जादू किया हुआ है कि आप उसकी शिकायत सुन ही नहीं सकते, या यूं कहिए कि तेनाली राम की शिकायत आपके कानों को सहन नहीं होती।’’
‘‘तेनाली राम राज्य का सच्चा वफादार है। वह कभी राजद्रोह नहीं कर सकता। तुम्हें कहीं से अवश्य ही गलत सूचना मिली है।’’ राजा कृष्णदेव राय ने उस दरबारी से कहा।
‘‘महाराज, आपको जितना विश्वास तेनाली राम की सच्चाई पर है, उससे कहीं अधिक विश्वास मुझे अपनी इस सूचना पर है। पूरी तरह जांच व परख करके ही मैंने आप तक यह सूचना पहुंचाई।’’

जब उस दरबारी ने खूब जोर देकर अपनी बात कही तो राजा को सोचने पर मजबूर होना पड़ा।

राजा ने कहा, ‘‘ठीक है। मैं इस बात की जांच करूंगा और अगर तेनाली राम दोषी पाया गया तो उसे अवश्य ही कठोर दण्ड दिया जाएगा।’’
राजा की इस बात से प्रसन्न होकर दरबारी अपने घर चला गया।
दूसरे दिन कृष्णदेव राय ने तेनाली राम को एकान्त में बुलवाया और बोले, ‘‘तेनाली राम, हमें सूचना मिली है कि तुम हमारे शत्रु राजा से मिलकर हमारे विजयनगर राज्य को दूसरे के अधीन कराना चाहते हो ?’’
तेनाली राम ने जब अपने ऊपर लगाया गया यह आरोप सुना तो वह सिर से पैर तक कांप गया। वह राजा को इस बात का क्या उत्तर दे, उसे एकाएक यह भी सुझाई नहीं पड़ रहा था।
राजा ने जब तेनाली राम को चुप देखा तो वह क्रोध से भभक उठे और बोले, ‘‘तो तुम्हारे चुप रहने का यही अर्थ लगाया जाए कि तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो ?’’
यह सुनकर तेनाली राम की आंखों में आंसू आ गए। वह बोला, ‘‘महाराज की बात काटने का साहस न तो मैंने अब तक किया है और न ही कभी भविष्य में कर सकूंगा।’’
राजा तो क्रोध से भरे हुए थे। तेनाली राम के इस उत्तर से वे और भी भड़क उठे। बोले, ‘‘तुमने जिस पड़ोसी राजा से सांठ-गांठ की है अब उसी के राज्य में जाकर रहो, मेरा राज्य कल ही छोड़ दो।’’
‘‘इतने बड़े अपराध की इतना मामूली सजा ?’’ तेनाली राम ने राजा से कहा।
‘‘तुम्हारी अब तक की सेवा को देखते हुए, मेरे तुम्हारे मित्रतापूर्ण सम्बन्धों को देखते हुए तथा तुम्हारे पद की गरिमा को देखते हुए मैं तुम्हें इतना ही दण्ड देना उचित समझता हूं। यदि कहीं अपराध किसी और ने किया होता तो मैं उसकी बोटी-बोटी नुचवा लेता।’’ राजा ने क्रोध में बिफरते हुए कहा।

तेनाली राम ने राजा का फैसला सुना और अपनी सफाई में एक भी शब्द नहीं कहा। बेचारा चुपचाप सिर झुकाकर राजा के सामने से चला गया।

दूसरे दिन जब तेनाली राम के विरोधियों ने यह सुना कि तेनाली राम राज्य छोड़कर चला गया है तो उनकी खुशी की सीमा न रही। वह सब राजा पर अपना प्रभाव बढ़ाने के उपाय सोचने लगे और अपनी पदोन्नति के मंसूबे बांधने लगे।
तेनाली राम विजयनगर राज्य के शत्रु राज्य की राजधानी पहुंचा और वहां के राजा से मिला। उसने उस राजा के गुणों का वर्णन छन्दबद्ध करके उसे सुनाया।
राजा अपनी प्रशंसा सुनकर खुशी से झूम उठा। उसने तेनाली राम से उसका परिचय पूछा।
तेनाली राम ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय का निजी सचिव तेनाली राम हूं।’’
उस राजा ने तेनाली राम की बहुत प्रशंसा पहले ही सुन रखी थी लेकिन तेनाली राम से भेंट का यह पहला अवसर था। उस राजा ने तेनाली राम का भरपूर स्वागत किया।
तेनाली राम ने इस स्वागत के लिए राजा को धन्यवाद दिया।
राजा बोला, ‘‘तेनाली राम, राजा कृष्णदेव राय हमें अपना शत्रु मानते हैं, फिर भी तुम हमारे दरबार में निडर होकर कैसे चले आए ? तुम तो राजा कृष्णदेव राय के निजी सचिव हो। यहां शत्रु के राज्य में तुम्हारा कोई भी अनिष्ट हो सकता है ?’’

राजा ने हालांकि सच कहा था। फिर भी तेनाली राम ने मुस्करा कर कहा, ‘‘राजन् ! आप विद्वान हैं, आपके पास अपार शक्ति है। आप सुयोग्य प्रशासक हैं और प्रजा की भलाई चाहने वाले हैं। बिल्कुल ऐसे ही गुण हमारे महाराज में भी हैं। वे आपको अपना शत्रु नहीं, मित्र मानते हैं। आपकी इसी भ्रान्ति के निवारण के लिए महाराज ने मुझे आपके पास भेजा है।’’

‘‘हैं ! महाराज हमारे दुश्मन नहीं, दोस्त हैं।’ आश्चर्य से चौंकता हुआ राजा बोला, ‘‘लेकिन हमारे जासूसों ने तो हमें यह खबर दी थी कि राजा कृष्णदेव राय हमारे राज्य पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं।’’

‘‘हां राजन, हमारे गुप्तचरों ने हमारे महाराज से यही बात आपके लिए भी कही थी। तभी हमारे महाराज ने मुझे आपके पास भेजा है। युद्ध कभी किसी के लिए लाभकारी हुआ है, जो आप जैसे दो विद्वान् राजाओं को लाभकारी होगा ?’’ तेनाली राम ने कहा।

उस राजा पर तेनाली राम की बातों का असर हुआ। वह बोला, ‘‘लड़ाई तो मैं भी नहीं चाहता लेकिन यह बात साबित कैसे हो कि राजा कृष्णदेव राय सच्चे दिल से सुलह के इच्छुक हैं ?’’
‘‘आप कल ही कुछ उपहार व सन्धि पत्र देकर अपना एक दूत विजयनगर भेज दें। उस दूत को मैं भी अपना एक पत्र दूंगा। यदि महाराज कृष्णदेव राय आपका उपहार स्वीकार कर लें तो मित्रता समझी जाए और यदि वे उपहार लौटा दें तो आप मुझे जो चाहें दण्ड दे दें।’’
‘‘लेकिन यह तो मेरी तरफ से सुलह का पैगाम हुआ। यह तो मेरी हेठी मानी जाएगी।’’ राजा ने कहा।
‘‘लेकिन सन्धि प्रस्ताव लेकर तो मैं स्वयं आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूं। पहल तो हमारे राज्य की ओर से है।’’
राजा की समझ में यह बात आ गई।
उसने दूसरे ही दिन अपना एक विशेष दूत कुछ उपहार साथ देकर विजयनगर भेज दिया।
उधर राजा कृष्णदेव राय को भी यह पता चल चुका था कि तेनाली राम बेकसूर था। उसके विरुद्ध दरबारियों ने आपस में मिलकर झूठी चाल चली थी।
इधर जैसे ही शत्रु राजा का दूत बहुमूल्य उपहार लेकर राजा कृष्णदेव राय के पास पहुंचा तो राजा प्रसन्नता से भर उठे।
उन्होंने मन ही मन तेनाली राम की बुद्धिमानी की प्रशंसा की और उस दूत के साथ ही, अपना मंत्री भी उस राजा के लिए उपहार देकर भेज दिया। राजा कृष्णदेव राय ने अपना एक विशेष पत्र भी उस राजा के नाम लिखा कि तेनाली राम को तुरन्त वापस भेज दिया जाए।
और जब तेनाली राम वापस विजयनगर पहुंचा तो राजा कृष्णदेव राय ने उसका विशेष स्वागत किया और उसे ढेरों पुरस्कार दिए।
जिन दरबारियों ने तेनाली राम के विरुद्ध षड्यंत्र रचा था, वे दरबारी शर्म से पानी-पानी हो गए।

अन्तिम इच्छा


विजयनगर के ब्राह्मण बड़े ही लालची थे। वे हमेशा किसी न किसी बहाने राजा से धन वसूल करते थे। राजा की उदारता का अनुचित लाभ उठाना उनका परम कर्तव्य था। एक दिन राजा कृष्णदेव राय ने उनसे कहा, ‘‘मरते समय मेरी मां ने आम खाने की इच्छा व्यक्त की थी जो उस समय पूरी नहीं की जा सकी थी। क्या अब ऐसा कुछ हो सकता है, जिससे उसकी आत्मा को शांति मिले ?’’

‘‘महाराज, यदि आप एक सौ आठ ब्राह्मणों को सोने का एक-एक आम भेंट कर दें तो आपकी मां की आत्मा को अवश्य शांति मिल जाएगी। ब्राह्मणों को दिया दान मृतात्मा तक अपने आप पहुंच जाता है।’’ ब्राह्मणों ने कहा।
राजा कृष्णदेव राय ने सोने के एक सौ आठ आम दान कर दिए। ब्राह्मणों की मौज हो गई उन आमों को पाकर।
तेनाली राम को ब्राह्मणों के इस लालच पर बहुत क्रोध आया। वह उन्हें सबक सिखाने की ताक में रहने लगा।
जब तेनाली राम की मां की मृत्यु हुई तो एक महीने के बाद उसने ब्राह्मणों को अपने घर आने का न्योता दिया कि वह भी मां की आत्मा की शान्ति के लिए कुछ करना चाहता है।

खाने-पीने और बढ़िया माल पाने के लोभ में एक सौ आठ ब्राह्मण तेनाली राम के घर जमा हुए। जब सब आसनों पर बैठ गए तो तेनाली राम ने दरवाजे बन्द कर लिए और अपने नौकरों से कहा, ‘‘जाओ, लोहे की गरम-गरम सलाखें लेकर आओ और इन ब्राह्मणों के शरीर पर दागो।’’
ब्राह्मणों ने सुना तो उनमें चीख पुकार मच गई। सब उठकर दरवाजों की ओर भागे। लेकिन नौकरों ने उन्हें पकड़ लिया और एक-एक बार सभी को गरम सलाखें दागी गईं। बात राजा तक पहुंची। वह स्वयं आए और ब्राह्मणों को बचाया।
क्रोध में उन्होंने पूछा, ‘‘यह क्या हरकत है, तेनाली राम ?’’
तेनाली राम ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज मेरी मां को जोड़ों के दर्द की बीमारी थी। मरते समय उनको बहुत तेज दर्द था। उन्होंने अंतिम समय में यह इच्छा प्रकट की थी कि दर्द के स्थान पर लोहे की गरम सलाखें दागी जाएं ताकि वह दर्द से मुक्तिपाकर चैन से प्राण त्याग सकें। उस समय उनकी यह इच्छा पूरी नहीं की जा सकी। इसीलिए ब्राह्मणों को सलाखें दागनी पड़ीं।’’
राजा हंस पड़े। ब्राह्मणों के सिर शर्म से झुक गए।

कीमती उपहार


एक लड़ाई जीतकर राजा कृष्णदेव राय ने विजय उत्सव मनाया। उत्सव की समाप्ति पर राजा ने कहा-‘‘लड़ाई की जीत अकेले मेरी जीत नहीं है-मेरे सभी साथियों और सहयोगियों की जीत है। मैं चाहता हूं कि मेरे मंत्रिमंडल के सभी सदस्य इस अवसर पर पुरस्कार प्राप्त करें। आप सभी लोग अपनी-अपनी पसन्द का पुरस्कार लें। परन्तु एक शर्त है, और वह है कि सभी को अलग-अलग पुरस्कार लेने होंगे। एक ही चीज का उपहार दो आदमी नहीं ले सकेंगे।’’

यह घोषणा करने के बाद राजा ने उस मंडप का पर्दा खिंचवा दिया...जिस मंडप में सारे पुरस्कार सजाकर रखे गए थे।
फिर क्या था...सभी लोग अच्छे से अच्छा पुरस्कार पाने के लिए पहल करने लगे। पुरस्कार सभी लोगों की गिनती के हिसाब से ही रखे गए थे। अतः थोड़ी देर की धक्का-मुक्की और छीना-झपटी के बाद सबको एक एक पुरस्कार मिल गया। सभी पुरस्कार कीमती थे। अपना-अपना पुरस्कार पाकर सभी सन्तुष्ट हो गए।
अन्त में बचा सबसे कम मूल्य का पुरस्कार...एक चादी की थाली।
यह पुरस्कार उस आदमी को मिलना था, जो दरबार में सबके बाद पहुंचे। यानी लेट तलीफ होने की सजा।
सब लोगों ने जब हिसाब लगाया तो पता चला कि श्रीमान तेनाली राम अभी तक नहीं पहुंचे।
यह जानकर तो सब खुश थे। सभी ने सोचा कि इस बेतुके, बेढंगे व सस्ते पुरस्कार को देते हुए हम सब तेनाली राम को खूब चिढ़ाएंगे। बड़ा मजा आएगा।

तभी अचानक श्रीमान तेनाली राम आ गए। सारे लोग एक स्वर से चिल्ला पड़े....‘‘आइए, तेनालीराम जी, आपका अनोखा पुरस्कार इन्तजार कर रहा है।’’



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book