राम नाम रस पीजै - ओशो Ram Nam Ras Peejai - Hindi book by - Osho
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राम नाम रस पीजै

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3660
आईएसबीएन :81-7182-215-0

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ओशो के द्वारा लिखी हुई पुस्तक राम नाम रस पीजै (मीरा की वाणी में)

Ram Nam Ras Pijai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘उनके शब्द निपट जादू हैं।’

--अमृता प्रीतम


‘‘भारत ने अब तक जितने भी विचारक पैदा किये हैं, वे उनमें सबसे मौलिक, सबसे उर्वर, सबसे स्पष्ट और सर्वाधिक सृजनशील विचारक थे। उनके जैसा कोई व्यक्ति हम सदियों तक न देख पाएँगे। ओशो के जाने से भारत ने अपने महानतम सपूतों में से एक खो दिया है। विश्वभर में जो भी खुले दिमाग वाले लोग हैं, वे भारत की इस हानि के भागीदार होंगे।’’


खुशवंत सिंह


राम नाम रस पीजै



‘राम नाम रस पीजै मनुआं, राम नाम रस पीजै।’’

रस तो एक ही है, अमृत तो एक ही है, पीने योग्य शराब तो एक ही है-वह ‘राम’ है।
जिसमें रम जाओ-वही राम। राम का और क्या अर्थ है ? जिसमें रम गए-वही राम। कृष्ण मीरा के राम हैं। हर एक को अपना-अपना राम खोजना पड़ता है। उधार राम मत लेना। उधार राम काम नहीं पड़ते। अपना राम खोजना पड़ता है। अपने ढंग से खोजना पड़ता है। अपनी ही आंख से खोजना पड़ता है। निश्चित ही तुम्हारा प्यारा ‘तुम्हारा प्यारा’ होगा।

राम तो प्रतीक है परमात्मा का। राम प्यारा नाम है। इसे तुम ऐतिहासिक राम से बांधकर छोटा मत कर देना; यह बड़ा नाम है। इसका अर्थ-अल्लाह, भगवान, ईश्वर। और इसका वही अर्थ जिसमें तुम्हारा प्रेम है, वही तुम्हारे लिए राम।


पहला प्रश्न श्रद्धा क्या है ?


श्रद्धा है एक प्रकार का पागलपन; लेकिन सिर्फ धन्यभागियों को ही ऐसा पागलपन मिलता है। अभागे हैं वे, जो श्रद्धा के पागलपन से अपरिचित हैं। श्रद्धा का पागलपन जीवन की सबसे बड़ी संपदा है, क्योंकि उसी के आधार पर, जो नहीं दिखाई पड़ता उसकी खोज शुरू होती है।

जिसके जीवन में श्रद्धा का सूत्र नहीं है, वह इंद्रियों पर अटका रह जाता है; उसका यथार्थ आंख से जितना दिखाई पड़े, हाथ से जितना छूने में आ जाए, कान से जितना सुनाई पड़े-इसी पर अटक जाता है। और इंद्रियों की सीमा है। इंद्रियां बड़ी छोटी हैं; अस्तित्व विराट है।

इंद्रियां ऐसी हैं जैसे चाय की चम्मच; और अस्तित्व ऐसे है जैसे महासागर। चाय की चम्मच से जो सागर को नापने चलता है, कब नाप पाएगा ! कैसे नाप पाएगा। चाय के चम्मच में सागर का कोई दर्शन नहीं हो सकता; यद्यपि चाय की चम्मच में जो भर जाता है, वह भी सागर है। पर बड़ा गुणभेद हो गया। कहां सागर के तूफान, कहां सागर की मौज, कहां सागर की मस्ती, कहां सागर की उत्तुंग लहरें, कहां सागर की गहराइयां-जिनमें हिमालय जैसा पहाड़ खो जाए तो पता भी न चले कि कहां गया ! उस चाय की चम्मच में न तो गहराई होगी सागर की, न सागर की तरंगों की मौज मस्ती होगी, न नृत्य होगा, न तूफान- आंधी होंगे; हालांकि चम्मच में जो भर गया है, वह सागर का ही एक छोटा-सा हिस्सा है। लेकिन गुणात्मक परिवर्तन भी हो गया। परिणाम तो कम हुआ ही हुआ, गुण का भी अंतर हो गया। सागर में डूब सकते हो; चाय की चम्मच में कैसे डूबोगे !

ऐसी ही इंद्रियों की स्थिति है। इनसे जो हमें दिखाई पड़ता है, वह विराट का ही हिस्सा है, पर अति क्षुद्र इतना क्षुद्र कि परिमाण का भेद तो पड़ता ही है, गुण का भेद भी पड़ जाता है। अदृश्य न मिलेगा तो सागर न मिलेगा।

मगर अदृश्य को खोजने के लिए तो पहला सूत्र है-वह है; श्रद्धा। श्रद्धा का मतलब होता है-जो नहीं देखा, उस पर भी भरोसा ? जो नहीं सुना, उस पर भी भरोसा। श्रद्धा का अर्थ होता है-अनजान में उतरने का साहस।

इसलिए मैं कहता हूं-श्रद्धा एक पागलपन है। जो तथाकथित समझदार हैं, वे ऐसी झंझट में नहीं पड़ते। वे जाने-माने की सीमा में रहते हैं। जहां तक जाना-माना है वहीं तक जाते हैं, उससे आगे नहीं जाते। उससे आगे विराट का जंगल हैं भटक जाने का डर है। भटक जाने की जोखिम उठाने का नाम श्रद्धा है।

जोखिम तो है। कोई गारंटी हो नहीं सकती। कौन देगा गारंटी ? कोई इंशोरेंस भी नहीं हो सकता। अज्ञात की तरफ जो चला है उसने एक जोखिम तो ली है। हो सकता है, खो जाए। हो सकता है, भटक जाए, हो सकता है, लौटने की संभावना न रहे। क्योंकि विराट से संबंध जोड़ना खतरनाक तो है ही। जब नदी सागर से संबंध जोड़ती है तो खतरा तो लेती ही है। खतरा यही है कि खो जाएगी। और सौभाग्य यह है कि खोकर ही नदी सागर हो जाती है।
इसलिए मैं कहता हूं-श्रद्धा एक तरह का पागलपन है। और इसलिए जो थोड़े-बहुत श्रद्धा से पागल हैं, उनको ही मैं स्वस्थ कहता हूं, क्योंकि उनके जीवन में झरोखा खुला है। वे आकाश को बाहर छोड़ नहीं दिए है; आकाश उनके भीतर आता जाता है। उनके पंख अभी भी फड़फड़ाते हैं। वे अभी उड़ने को तत्पर हैं। वे अभी भी दूर चांद-तारों से मिलने की तैयारी कर रहे हैं। छोटी है क्षमता; छोटी है शक्ति—लेकिन आकांक्षा विराट की है। यही श्रद्धा का अर्थ है।

जब एक किसान बीज बोता है तो श्रद्धा है-क्योंकि कौन जाने बीज पनपेंगे न पनपेंगे। सभी बीज पनपते तो नहीं। सभी बीज सदा नहीं पनपते। फिर कौन जाने वर्षा आएगी कि नहीं आएगी, मेघ घिरेंगे कि नहीं घिरेंगे। सदा मेघ घिरते भी नहीं। सूखा भी पड़ता है। और कौन जाने, जैसे कल तक हुआ है वैसा आगे भी कल होगा कि नहीं ! आज तक सूरज उगा है, सच; लेकिन कल आगे न उगे। कल के बाबत क्या कहोगे ? कोई निश्चय से उत्तर नहीं दे सकता।
एक दिन तो ऐसा जरूर आएगा जब सूरज नहीं उगेगा। वैज्ञानिक कहते हैं कि कभी न कभी वह दिन आएगा, जब सूरज का ईंधन चक्र चुक जाएगा। आखिर तेल का छोटा सा दीया जलाते हो वह भी उतनी ही देर तक जलता है, जितनी देर तक तेल है। सूरज का भी तेल एक दिन चुक जाएगा। उसकी क्षमता भी रोज कम होती जा रही है, प्रतिदिन कम होती जा रही है; क्योंकि जितनी रोशनी देता जाता है, उतना कम होता जाता है। एक न एक दिन ठंडा हो जाएगा। हो सकता है वह दिन कल ही हो। कल का क्या भरोसा-सूरज निकलेगा कि नहीं; बादल घिरेंगे कि नहीं और क्या भरोसा कि बीज अब तक तो धोखा नहीं दिए, कल भी अपनी पुरानी प्रतिष्ठा कायम रखेंगे कि नहीं रखेंगे। बीज सड़ भी जा सकते हैं।

सब डर है; फिर भी किसान बीज बोता है। हाथ में जो है उनको गंवाता है-उसकी आशा में, जो अभी हाथ में नहीं है। हालांकि बुद्धिमानों का तर्क है यह कि हाथ की आधी रोटी, आकांक्षा और आशा की पूरी रोटी से बेहतर है। यह बुद्धिमानों का कहना है। श्रद्धालु का कहना यह है कि हाथ में कितना ही हो, वह उसके लिए गंवाने की तैयारी रखनी चाहिए, जो हाथ के अभी बाहर है, तो विकास होता है।
बुद्धिमानों की बात मानो तो जड़ हो जाओगे। पागलों की सुनो।

श्रद्धा का सूत्र जीवन की सारी संभावनाओं को अपने में लिए है। आमतौर से लोग सोचते हैं कि श्रद्धालु व्यक्ति कमजोर होता है। बिलकुल ही गलत बात है। श्रद्धालु ही शक्तिशाली है। अश्रद्धालु कमजोर होता है। वह अपनी कमजोरी को बड़े तर्क देता है। वह कहता है: जब तक मुझे प्रमाण न मिल जाएं, मैं मानूं कैसे ?’ लेकिन श्रद्धालु कहता है: कुछ चीजें जीवन में ऐसी भी हैं कि मानो तो प्रमाण मिलते हैं; अगर मानो ही न तो प्रमाण मिलते ही नहीं।

जैसे कोई कहे कि प्रेम मैं तब करूंगा, जब प्रेम का पहले मुझे प्रमाण मिल जाए कि होता है। कोई बच्चा यह कहे कि मैं प्रेम तभी करूंगा, जब मुझे प्रेम का प्रमाण मिल जाए कि यह रहा प्रेम, ऐसा रहा प्रेम ; जब मैं प्रेम का पूरा शास्त्र समझ लूं, सब तरफ से जांच परख कर लूं, भूल-चूक की कोई संभावना न रहे-तब करूंगा प्रेम। तो फिर इस जगत् में प्रेम विदा हो जाएगा। यह तो श्रद्धालु के कारण प्रेम चल रहा है। क्योंकि श्रद्धालु कहता है: कर लेंगे पहले, फिर जांच-परख हो लेगी; जांच-परख पीछे हो लेगी।

श्रद्धा बड़ी दुस्साहस की बात है; कमजोर के बस की बात नहीं है। यह बलवान की बात है।


मैं पा-ब-गिल हूं, सितारों की बात करता हूं,
खिजा जदां हूं, बहारों की बात करता हूं।


श्रद्धा ऐसा पागलपन है कि जब चारों तरफ मरुस्थल हो और कहीं हरियाली का नाम न दिखाई पड़ता हो, तब भी श्रद्धा भरोसा रखती है कि हरियाली है, फूल खिलने हैं। जब जल का कहीं कण भी दिखाई पड़ता हो, कब भी श्रद्धा मानती है कि जल के झरने हैं; प्यासतृप्त होती है। जब चारों तरफ पतझड़ हो, तब भी श्रद्धा में वसंत ही होता है। श्रद्धा में वसंत का मौसम सदा ही होता है। श्रद्धा एक ही मौसम जानती है।–वह है वसंत। बाहर होता रहे पतझड़, पतझड़ के सारे प्रमाण मिलते रहें; लेकिन श्रद्धा वसंत को मानती है।

संन्यास के लिए इस देश में हमने गैरिक वस्त्र चुना है। गैरिक का एक दूसरा नाम है वासंती रंग। यह वसंत का रंग है। वसंत के सौदर्य की इसमें झलक है-वसंत की जवानी की; वसंत की आशा की; वसंत की श्रद्धा की। यह फूलों का रंग है। यह सूरज का रंग है। यह सुबह का रंग है। इसको वासंती बाना कहा जाता है। यह शहीदों का रंग है। जो इतनी दूर तक राजी हो जाते हैं कि अनजान अपरिचित परमात्मा के लिए अपना जाना-माना प्राण भी चढ़ा देते हैं।


मैं पा-ब गिल हूं, सितारों की बात करता हूं,
खिजां जदां हूं, बहारों की बात करता हूं।
दबी हुई है जहां-सोज़ आग सीने में,
मैं राख हूं पै शरारों की बात करता हूं।


श्रद्धा में राख भी अंगारों की बात करती है; अंगारों को खोजती है। जहां मृत्य-ही-मृत्य है, जहां मरघट ही मरघट फैला है-वहां श्रद्धा अमृत का राज़ खोजती है।
 
यहां है क्या मृत्य के सिवा ? कुछ मर गए हैं; कुछ मरने वाले हैं; कुछ जो अभी पैदा नहीं हुए हैं वे भी मरेंगे। यहां मृत्यु के सिवा और कुछ भी निश्चित नहीं है। अगर श्रद्धा के अतिरिक्त सोचो तो मृत्यु भर एकमात्र यथार्थ है; बाकी तो सब श्रद्धा है। जन्म के बाद एक ही बात निश्चित है जो होगी-वह मृत्यु है, बाकी सब अनिश्चित बाकी होगा, नहीं होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।

जीवन में एक ही बात पूर्ण रूप से निश्चित है-वह मृत्यु है। अगर कोई ठीक-ठीक तर्कवादी हो तो मृत्यु के अतिरिक्त और किसी में उसको विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि और बाकी सब चीजें अनिश्चित हैं।
इसलिए पश्चिम में, जहां तर्क का खूब विस्तार हुआ है, फैलाव हुआ है-वहां लोगों का जीवन में कोई भरोसा नहीं रहा है। लोग कहते हैं-जीवन अर्थहीन है। वहां मृत्यु एकमात्र तथ्य मालूम होने लगी है। बड़ी संख्या में लोग आत्मघात करते हैं, क्योंकि जीवन अर्थहीन है। मृत्यु में ही शरण लेते मालूम पड़ते हैं।


दबी हुई है, जहां सोज, आग सीने में,
मैं राख हूं, पै शरारों की बात करता हूं।
भंवर है मेरा सफ़ीना है बादबां मौजें,
तलातुमों में किनारों की बात करता हूं।


श्रद्धा का अर्थ है-जब तूफान उठें हों और नाव डोलती हो, अब डूबी, तब डूबी होती हो, तब भी श्रद्धा किनारों की बात करती है। तब भी श्रद्धा किनारों को मानती है। तब श्रद्धा किनारों को जानती है। डूबते हुए भी सागर में, श्रद्धा में किनारे ही होते हैं। तुम श्रद्धालु को डुबा नहीं सकते, क्योंकि वह डूबने में भी किनारा पा लेगा।


भंवर है मेरा सफ़ीना
नाव उलझ गई भंवर में, नाव बन गई भंवर खुद।
हैं बादवां मोजें...
और सागर की लहरें, कि बड़ी दुश्मन ! मिटाने को तत्पर।
तलातुमों में किनारों की बात करता हूं।

 
और तूफान उठा है जोर से, बाढ़ आई है भयंकर—
कहीं कोई किनारा दिखाई नहीं पड़ता, कहीं कोई आशा की किरण नहीं है; अंधेरा भयंकर और पूर्ण है, अमावस है-लेकिन फिर भी श्रद्धा किनारों की बात करती है। अंधेरी-से-अंधेरी रात में भी श्रद्धा चमकते तारे खोज लेती है। अमावस की रात भी श्रद्धा में पूर्णिमा ही रहती है।


सबू-ओ जाम गुलो नसतरन महो अंजुम,
गरीब दिल के सहारों की बात करता हूं।
हुई थी जिनसे मुहब्बत की इब्तदाए हंसीं,
मैं उन लतीफ़ इशारों की बात करता हूं।

 

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