गुरु गोविन्द दोऊ खड़े - ओशो Guru Govind Dou Khade - Hindi book by - Osho
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गुरु गोविन्द दोऊ खड़े

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3665
आईएसबीएन :81-7182-840-X

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ओशो के द्वारा कबीर वाणी में लिखी गई पुस्तक गुरु दोविन्द दोऊ खड़े

guru govind dou khade

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।


इस सूत्र के दो अर्थ हो सकते हैं-दोनों प्रीतिकर हैं।
पहला अर्थ-‘बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।’ तो कबीर कहते हैं कि बलिहारी गुरु तुम्हारी कि जब मैं दुविधा में था, तुमने तत्क्षण इशारा कर दिया कि गोविन्द के पैर छुओ। ‘बलिहारी गुरु जिन गोविन्द दियो बताय।’ जैसे ही मैं दुविधा में था आपने इशारा कर दिया कि गोविन्द के पैर छुओ, क्योंकि मैं तो यहाँ तक था। मैं तो राह पर लगे हुए मील के पत्थर की तरह था, जिसका इशारा थाः आ गया, मंजिल आ गई। अब मेरा कोई काम नहीं। अब तुम गुरु को छोड़ो, गोविन्द के पैर छू लो।

दूसरा अर्थ है-‘गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं। बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।’ दुविधा में हूँ, किसके पैर लगूं। गुरु गोविन्द दोनो खड़े हैं। फिर मैंने गोविन्द को छोड़ा, गुरु के ही पैर छुए ; क्योंकि उसकी ही बलिहारी है, उसी ने गोविन्द को बताया है।


माया महाठगिनी हम जानी।
निरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
केसव के कमला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत होइ बैठी, तीरथ हू में पानी।
जोगि के जोगिन होइ बैठी, राजा के घर रानी।
काहू के हीरा होइ बैठी, काहू के कौड़ी कानी।
भक्तन के भक्ति होउ बैठी, ब्रह्मा के बह्मानी।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, वह सब अकथ कहानी।


माया महाठगिनी हम जानी


कबीर अनूठे हैं। और प्रत्येक के लिए उनके द्वारा आशा का द्वार खुलता है। क्योंकि कबीर से ज़्यादा साधारण आदमी खोजना कठिन है। और अगर कबीर पहुँच सकते हैं, कबीर निपट गंवार है, इसलिए गंवार के लिए भी आशा है; बे पढ़े-लिखे हैं, इसलिए पढ़-लिखे होने से सत्य का कोई भी संबंध नहीं है। जाति-जाति का कुछ ठिकाना नहीं कबीर की-शायद मुसलमान के घर पैदा हुए, हिंदू के घर बड़े हुए। इसलिए जाति-पांति से परमात्मा का कुछ लेना-देना नहीं है।
कबीर जीवन-भर गृहस्थ रहे-जुलाहे-बुनते रहे कपड़े और बेचते रहे; घर छोड़ हिमालय नहीं गए। इसलिए घर पर ही परमात्मा आ सकता है। हिमालय जाना आवश्यक नहीं। कबीर ने कुछ न छोड़ा और सभी कुछ पा लिया। इसलिए छोड़ना पाने की शर्त नहीं हो सकती।

और कबीर के जीवन में कोई भी विशिष्टता नहीं है। इसलिए विशिष्टता अहंकार का आभूषण होगी; आत्मा का सौंदर्य नहीं।
कबीर न धनी हैं, न ज्ञानी हैं, न समादृत है, न शिक्षित हैं, न सुसंस्कृत हैं। कबीर जैसा व्यक्ति अगर परमज्ञान को उपलब्ध हो गया, तो तुम्हें भी निराश होने की कोई भी ज़रूरत नहीं। इसलिए कबीर में बड़ी आशा है।
बुद्ध अगर पाते हैं तो पक्का नहीं कि तुम पा सकोगे। बुद्ध को ठीक से समझोगे तो निराशा पकड़ेगी; क्योंकि बुद्धि की बड़ी उपलब्धियां हैं पाने के पहले। बुद्ध सम्राट् हैं। इसलिए सम्राट अगर धन से छूट जाए, आश्चर्य नहीं। क्योंकि जिसके पास सब है, उसे उस सब की व्यर्थता का बोध हो जाता है। ग़रीब के लिए बड़ी कठिनाई है-धन से छूटना। जिसके पास है ही नहीं, उसे व्यर्थता का कैसे पता चलेगा ? कोई चीज़ व्यर्थ है, इसे जानने के पहले, कम-से-कम अनुभव तो होना चाहिए। तुम कैसे कह सकोगे कि धन व्यर्थ है ? धन है कहां ? तुम हमेशा अभाव में जिए हो, तुम सदा झोंपड़े में रहे हो-तो महलों में आनंद नहीं है, यह तुम कैसे कहोगे ? और तुम कहते भी रहो, तो भी यह आवाज़ तुम्हारे हृदय की आवाज़ न हो सकेगी; यह दूसरों से सुना हुआ सत्य होगा। और गहरे में धन तुम्हें पकड़े ही रहेगा।
बुद्ध को समझोगे, तो हाथ-पैर ढीले पड़ जाएंगे।

बुद्ध कहते हैं, स्त्रियों में सिवाय हड्डी, मांस-मज्जा के और कुछ भी नहीं है; क्योंकि बुद्ध को सुंदरतम स्त्रियां उपलब्ध थीं, तुमने उन्हें केवल फ़िल्म के परदे पर देखा है। तुम्हारे और उन सुंदरतम स्त्रियों के बीच बड़ा फ़ासला है। वे सुंदरतम स्त्रियां तुम्हारे लिए अति मनमोहक हैं। तुम सब छोड़कर उन्हें पाना चाहोगे। क्योंकि जिसे पाया नहीं है वह व्यर्थ है, इस जानने के लिए बड़ी चेतना चाहिए।
कबीर ग़रीब हैं, और जान गए यह सत्य कि धन व्यर्थ है। कबीर के पास एक साधारण-सी पत्नी है, और जान गए कि सब राग-रंग, सब वैभव-विलास, सब सौंदर्य मन की ही कल्पना है।
कबीर के पास गहरी समझ चाहिए। बुद्ध के पास तो अनुभव से आ जाती है, बात; कबीर को तो समझ से ही लानी पड़ेगी।
गरीब का मुक्त होना अति कठिन है। कठिन इस लिहाज़ से कि उसे अनुभव की कमी बोध से पूरी करनी पड़ेगी; उसे अनुभव की कमी ध्यान से पूरी करनी पड़ेगी। अगर तुम्हारे पास भी सब हो, जैसा बुद्ध के पास था, तो तुम भी महल छोड़ के भाग जाओगे; क्योंकि कुछ और पाने को बचा नहीं; आशा टूटी, वासना गिरी, भविष्य में कुछ और है नहीं वहां-महल सूना हो गया !

आदमी महत्वाकांक्षा में जीता है। महत्वाकांक्षा कल की-और बड़ा होगा, और बड़ा होगा और बड़ा होगा....दौड़ता रहता है। लेकिन आखिर पड़ाव आ गया, अब कोई गति न रही-छोड़ोगे नहीं तो क्या करोगे ? तो महल या तो आत्मघात पड़ाव आ गया, अब कोई गति न रही-छोड़ोगे नहीं तो क्या करोगे ? तो महल या तो आत्मघात बन जाता है या आत्मक्रांति। पर कबीर के पास कोई महल नहीं है।
बुद्ध बड़े प्रतिभाशाली व्यक्ति है। जो भी श्रेष्ठतम ज्ञान था उपलब्ध, उसमें दीक्षित किए गए थे। शास्त्रों के ज्ञाता थे। शब्द के धनी थे। बुद्धि बड़ी प्रखर थी। सम्राट् के बेटे थे। और सब तरह से सुशिक्षा हुई थी।

कबीर सड़क पर बड़े हुए। कबीर के मां-बाप का कोई पता नहीं। शायद कबीर नाजायज संतान हों। तो मां ने उसे रास्ते के किनारे छोड़ दिया था-बच्चे को-पैदा होते ही। इसलिए मां का कोई पता नहीं। कोई कुलीन घर से कबीर आए नहीं। सड़क पर ही पैदा हुए जैसे, सड़क पर ही बड़े हुए जैसे। जैसे भिखारी होना पहले दिन से ही भाग्य में लिखा था। यह भिखारी भी जान गया कि धन व्यर्थ है, तो तुम भी जान सकोगे। बुद्ध से आशा नहीं बंधती। बुद्ध की तुम पूजा कर सकते हो। फासला बड़ा है; लेकिन बुद्धि-जैसा होना तुम्हें मुश्किल मालूम पड़ेगा। जन्मों-जन्मों की यात्रा लगेगी। लेकिन कबीर और तुम में फ़ासला ज़रा भी नहीं है। कबीर जिस सड़क पर खड़े हैं-शायद तुमसे पीछे खड़े होकर पहुंच गए, तो तुम भी पहुंच सकते हो।
कबीर जीवन के लिए बड़ा गहरा सूत्र हो सकते हैं। इसे तो पहले स्मरण में ले लें। इसलिए कबीर को मैं अनुठा कहता हूं। महावीर सम्राट् के बेटे हैं; कृष्ण भी, राम भी, बुद्धि भी; वे सब महलों से आए हैं।

 कबीर बिलकुल सड़क से आए हैं; महलों से उनका कोई भी नाता नहीं है। कहा है कबीर ने कि कभी हाथ से काग़ज़ और स्याही छुई नहीं-‘मसी कागद छुओ न हाथ।’
ऐसा अपढ़ आदमी, जिसे दस्तख़त करने भी नहीं आते, इसने परमात्मा के परम ज्ञान को पा लिया-बड़ा भरोसा बढ़ता है। तब इस दुनिया में अगर तुम वंचित हो तो अपने ही कारण वंचित हो, परिस्थिति को दोष मत देना। जब भी परिस्थितियों को दोष देने का मन में भाव उठे, कबीर का ध्यान करना। कम-से-कम मां-बाप का तो तुम्हें पता है, घर-द्वार तो है, सड़क पर तो पैदा नहीं हुए। हस्ताक्षर तो कर ही लेते हो। थोड़ी-बहुत शिक्षा हुई, हिसाब-हिसाब कर लेते हो। वेद कुरान गीता भी थोड़ी पढ़ी है। न सही बहुत पंडित, छोटे-मोटे पंडित तो तुम भी हो, तो जब भी मन होने लगे परिस्थिति को दोष देने का, कि पहुंच गए होंगे बुद्ध, सारी सुविधा थी उन्हें, मैं कैसे पहुंचूं, तब कबीर का ध्यान करना। बुद्ध के कारण जो असंतुलन पैदा हो जाता है कि लगता है हम न पहुंच सकेंगे-कबीर तराजू के पलड़े को जगह पर ले आते हैं। बुद्ध से ज़्यादा कारगर हैं कबीर। बुद्ध थोड़े-से लोगों के काम के हो सकते हैं। कबीर राजपथ हैं। बुद्ध का मार्ग बड़ा संकीर्ण है; उसमें थोड़े ही लोग पा सकेंगे, पहुंच सकेंगे।

बुद्ध की भाषा भी उन्हीं की है-चुने हुए लोगों की। एक-एक शब्द बहुमूल्य है; लेकिन एक-एक शब्द सूक्ष्म है। कबीर की भाषा सबकी भाषा है-वे पढ़े-लिखे आदमी की भाषा है। अगर तुम कबीर को न समझ पाए, तो तुम कुछ भी न समझ पाओगे। कबीर को समझ लिया, तो कुछ समझने को बचता नहीं। और तुम कबीर को जितना समझोगे, उतना ही तुम पाओगे कि बुद्धत्व का कोई भी संबंध परिस्थिति से नहीं। बुद्धत्व तुम्हारी भीतर की अभीप्सा पर निर्भर है-और कहीं भी घट सकता है; झोपड़े में, महल में, बाज़ार में, हिमालय पर; पढ़ी लिखी बुद्धि में, गैर-पढ़ी लिखी बुद्धि में; गरीब को, अमीर को; अपढ़ को; कोई परिस्थिति का संबंध नहीं है।

ये जो वचन इस समाधि शिविर में हम कबीर के लेने जा रहे हैं, इनका शीर्षक है:‘सुनो भाई साधो’। और कबीर अपने हर वचन में हम कबीर को लेने जा रहे हैं, इनका शीर्षक है: ‘सुनो भाई साधो’। और कबीर अपने हर वचन में कहीं-न-कहीं साधु को ही संबोधित करते हैं। इस संबोधन को थोड़ा समझ लें, फिर हम उनके वचनों में उतरने की कोशिश करें।
मनुष्य तीन तरह से पूछ सकता है। एक कुतूहल होता है-बच्चों जैसा। पूछने के लिए पूछ लिया, कोई ज़रूरत न थी, कोई प्यास, भी न थी, कोई प्रयोजन भी न था। ऐसे ही मन की खुजली थी। उठ गया प्रश्न, पूछ लिया। उत्तर मिले तो ठीक दुबारा पूछने का भी खयाल नहीं आता-छोटे बच्चे जैसा पूछते हैं। रास्तें से गुज़र रहे हैं, पूछते हैं, यह क्या है ? वृक्ष क्या हैं ? हरे क्यों हैं ? सूरज सुबह क्यों निकलता है, रात को क्यों नहीं निकलता ?

 अगर तुमने उत्तर नहीं दिया तो कोई उत्तर सुनने के लिए उनकी प्रतीक्षा नहीं है। जब तुम उत्तर दे रहे हो, तब तक वे दूसरे प्रश्न पूछने चले गए। तुम उत्तर भी न दो, तो भी कुछ ज़ोर न डालेंगे कि उत्तर दो। तुम दो या न दो, यह असंगत है, प्रसंग के बाहर है। बच्चा पूछने के लिए पूछ रहा है। बच्चा केवल बुद्धि का अभ्यास कर रहा है; जैसा पहली दफ़े बच्चा चलता है, तो बार-बार चलने की कोशिश करता है-कहीं पहुंचने के लिए नहीं, क्योंकि अभी बच्चे की क्या मंजिल है ! अभी तो चलने में ही मज़ा लेता है। अभी तो पैर चला लेता है इससे ही बड़ा प्रसन्न मंजिल है ! अभी तो चलने में ही मज़ा लेता है। अभी तो पैर चला लेता है, इससे ही बड़ा प्रसन्न होता है; नाचता है कि मैं भी चलने लगा। अभी चलने का कोई संबंध मंज़िल से नहीं है, अभी चलना अपने-आप में ही अभ्यास है। ऐसे ही बच्चा जब बोलने लगता है तो सिर्फ़ बोलने के लिए बोलता है। अभ्यास करता है। उसके बोलने में कोई अर्थ नहीं है। पूछना जब सीख लेता है, तो पूछने के लिए पूछता है। पूछने में कोई प्रश्न नहीं है, सिर्फ कुतूहल है। से पूछते हैं। मिले उत्तर ठीक, न मिले उत्तर ठीक। और कोई भी उत्तर मिले, उनके जीवन में उस उत्तर से कोई फर्क न होगा। तुम ईश्वर को मानते रहो, तो तुम वैसे ही जिओगे; तुम ईश्वर को न मानो, तो भी तुम वैसे ही जिओगे।

यह बड़ी हैरानी की बात है कि नास्तिक और आस्तिक के जीवन में कोई फ़र्क नहीं होता। तुम जीवन को देख के बता सकते हो कि यह आदमी आस्तित्व है या नास्तिक है। नहीं, तुम्हें पूछना पड़ता है कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक ! आस्तिक और नास्तिक के व्यवहार में रत्तीभर का कोई फ़र्क नहीं होता। वैसा ही बेईमान यह, वैसा ही दूसरा। वे सब चचेरे-मौसेरे भाई हैं। कोई अंतर नहीं है। इस ईश्वर को मानता है, एक ईश्वर को नहीं मानता है। इतनी बड़ी मान्यता और जीवन में रत्ती-भर भी छाया नहीं लाती ! कहीं कोई रेखा नहीं खिंचती ! दुकानदारी में वह उतना ही बेईमान है जितना दूसरा; बोलने में उतना ही झूठा है जितना दूसरा। न इसका भरोसा किया जा सकता है न उसका। क्या जीवन में कोई अंतर नहीं आता आस्था से ? तो आस्था दो कौड़ी की है। तो आस्था कुतूहल से पैदा हुई होगी; वह बचकानी है। ऐसी बचकानी आस्था को छोड़ देना चाहिए।

सबसे सतह पर कुतूहल है।
दूसरे, थोड़ी गहराई बढ़े, तो जिज्ञासा पैदा होती है। जिज्ञासा सिर्फ़ पूछने के लिए नहीं है-उत्तर की तलाश है; लेकिन तलाश बौद्धिक है, आत्मिक नहीं है। तलाश विचार की है, जीवन की नहीं है। जिज्ञासा से भरा हुआ आदमी, निश्चित ही उत्सुक है, और चाहता है कि उत्तर मिले; लेकिन उत्तर बुद्धि में संजो लिया जाएगा, स्मृति का अंग बनेगा, जानकारी बढ़ेगी ज्ञान बढ़ेगा-आचारण नहीं, जीवन नहीं। उस आदमी को बदलेगा नहीं। वह आदमी वैसा ही रहेगा-ज़्यादा जानकार हो जाएगा।
जिज्ञासा पैदा होती है बुद्धि से।

फिर एक तीसरा तल है, जिसको मुमुक्षा कहा है। मुमुक्षा का अर्थ है; जिज्ञासा सिर्फ़ बुद्धि की नहीं है, जीवन की है। इसलिए नहीं पूछ रहे हैं कि थोड़ा और जान लें; इसलिए पूछ रहे है कि जीवन दांव पर लगा है। इसलिए पूछ रहे हैं कि उत्तर पर निर्भर होगा कि हम कहां जाएं, क्या करें, कैसे जिएं। एक प्यासा आदमी पूछता है, पानी कहां है ? यह कोई जिज्ञासा नहीं है। मरुस्थल में तुम पड़े हो, प्यास जगती है और तुम पूछते हो, पानी कहां है ? उस क्षण तुम्हारा रोआं-रोआं पूछता है, बुद्धि नहीं पूछती। उस क्षण तुम यह नहीं जानना चाहते कि पानी की वैज्ञानिक परिभाषा क्या है। उस समय कोई तुमसे कहे कि पानी-पानी क्या लगा रखा है, ‘एच टू ओ’ विज्ञान का उपयोग करो, फार्मूला ज़ाहिर है कि उद्जन, एक मात्रा ऑक्सीजन-‘एच टू ओ’। लेकिन जो आदमी प्यासा है, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पानी कैसे बनता है। यह सवाल नहीं है, पानी क्या है, यह भी सवाल नहीं है। यह कोई जिज्ञासा नहीं है पानी के संबंध में जानकारी बढ़ाने के लिए। जानकारी बढ़ाने के लिए यहां जीवन दांव पर लगा है; अगर पानी नहीं मिलता घड़ी-भर और तो मृत्यु होगी। पानी पर ही जीवन निर्भर है। मृत्यु और जीवन का सवाल है।

मुमुझा का अर्थ है: जिज्ञासा केंद्र पर पहुंच गई। अब हमारे लिए यह सवाल ऐसा नहीं है कि ईश्वर है या नहीं, पूछ लिया बच्चों-जैसा या पूछ लिया दार्शनिकों-जैसा एक बुद्धिगत सवाल, बुद्धिगत उत्तर देखने में लग गए, शास्त्रों में गए। जिसको प्यास लगी है, वह शास्त्रों में नहीं खोजेगा कि पानी का स्वरूप क्या है ! जिसको प्यास लगी है, वह सरोवर चाहता है जिसको प्यास लगी है, वह ऐसा ज्ञानी चाहता है, जिसको पी के वह अपनी प्यास को बुझा ले। ज्ञान नहीं चाहता, ज्ञानी को चाहता है।
मुमुक्ष गुरु को खोजता है। जिज्ञासु शास्त्र को खोजता है। कुतूहली किसी से भी पूछ लेता है।
कबीर उसको साधु कहते हैं, जो मुमुक्षु है। इसलिए उनका हर वचन इस बात को ध्यान में रख के कहा गया है: ‘सुनो भाई साधो’! साधु का मतलब है, जो साधना के लिए उत्सुक है; जो साधक है। साधु का अर्थ है: जो अपने को बदलने के लिए, शुभ करने के लिए, सत्य करने के लिए आतुर है-जो साधु होने को उत्सुक है।

‘साधु’ शब्द बड़ा अद्भुत है। विकृत हो गया बहुत उपयोग से। साधु का अर्थ है : सीधा-सादा, सरल-सहज। ‘साधु’ शब्द की बड़ी भाव-भंगिमाएं हैं। और सीधा-सादा, सरल-सहज-वही साधना है।
इसलिए कबीर कहते हैं: साधो, सहज समाधि भली ! सहज हो रहो, सरल हो जाओ।
थोड़ा समझ लेना ज़रूरी है। क्योंकि हम बहुत से लोगों को जानते हैं, जो सरल होने की चेष्टा में ही बड़े जटिल हो गए हैं; सरल होने की ही चेष्टा में चले थे, और उलझ गए हैं।

मेरे एक मित्र हैं। लोग उन्हें साधु कहते हैं। मैं उन्हें असाधु कहता हूं, क्योंकि वे सीधे-सादे ज़रा भी नहीं हैं। अगर सुबह उन्हें दूध दो, तो वे पहले पूछते हैं कि गाय का है कि भैंस, का ! क्योंकि भैंस का दूध वे नहीं पीते। शुद्ध हिंदू हैं; गाय का ही पीते हैं। और गाय का ही नहीं पीते, सफ़ेद गाय का पीते हैं। किसी शास्त्र से उन्होंने खोज लिया है कि सफेद गाय का दूध शुद्घतम होता है। वह भी कुछ घड़ी पहले लगा हो तो पीते हैं। क्योंकि इतनी घड़ी देर तक दूध रह जाए, तो उसमें विकृति का समावेश हो जाता है। कुछ घड़ी पहले का तैयार घी ही लेते हैं; क्योंकि इतनी देर ज़्यादा रह जाए तो शास्त्रों में उल्लेख है कि घी विकृत हो जाता है। इस तरह का पानी पीते हैं कि जो भी भर के लाए, वह गीले वस्त्र पहने हुए भर के लाए, ताकि बिलकुल शुद्ध हो। क्योंकि सूखे वस्त्रों का क्या भरोसा, किसी ने छुए हों, धोबी धोके लाया हो, लाण्ड्री में गए हों-तो ठीक नहीं। वहीं कुएं पर स्नान करो, वस्त्र पहने हुए, ताकि वस्त्र भी धुल जाएं, तुम भी धुल जाओ, फिर पानी भर के ले आओ। ब्राह्मण ने भोजन बनाया हो तो ही लेते हैं। यह सब चेष्टा में वे चौबीस घंटे व्यस्त हैं, चौबीस घंटे में उन्हें भगवान के लिए एक क्षण बचता नहीं, भोजन सारा समय ले लेता है। निकले थे सरल होने, वे इतने जटिल हो गए हैं कि बड़ी कठिनाई है। जीना ही मुश्किल हो गया है। और जिसके घर में पहुँच जाएं, वह भी प्रार्थना करने लगता है परमात्मा से-उसने कभी प्रार्थना न की हो भला-कि कब इनसे छुटकारा हो।

अगर साधु आपके घर रुक जाए तो आप एक ही प्रार्थना करते हैं कि अब ये जल्दी जाएं, क्योंकि तीन बजे रात वे उठ आते हैं। और वे नहीं उठते, पूरे घर को उठा देते हैं। क्योंकि ऐसा शुभ कार्य ब्रह्ममुहूर्त में उठने का, वे खुद तो करते ही हैं, लेकिन इतने ज़ोर से ओंकार का पाठ करते हैं कि आप सो नहीं सकते। और आप उनसे यह भी नहीं कह सकते कि आप ग़लत कर रहे हैं, क्योंकि कुछ ग़लत भी नहीं कह रहे हैं। ब्रह्ममुहूर्त में ओंकार की ध्वनि कर रहे हैं। तो एक उपकार ही कर रहे हैं आपके ऊपर !
सरलता की खोज में निकला हुआ आदमी भी जटिल हो जाता है। कहीं कुछ भूल हो रही है। सरलता को समझा नहीं गया।


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