108 उपनिषद - भवान सिंह राणा 108 Upanishad - Hindi book by - Bhavan Singh Rana
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108 उपनिषद

भवान सिंह राणा

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :377
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3673
आईएसबीएन :81-284-0073-8

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108 Upnishad by Bhavan Singh Rana - 108 उपनिषद्, भवान सिंह राणा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय संस्कृति में जितना महत्वपूर्ण स्थान वेदों, पुराणों, रामायण, गीता, महाभारत आदि ग्रंथों का है, उतना ही महत्व उपनिषदों का भी है। उपनिषदों में हिंदू धर्म के हर विषय का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। उपनिषद कुल संख्या में 108 हैं। हमने उन 108 उपनिषदों को अपने पाठकों के लिए अत्यन्त सरल और सुगम भाषा में इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है।

ईशोपनिषद
शांति पाठ


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।


वह ब्रह्म पूर्ण है, यह कार्य जगत भी पूर्ण है। उसी पूर्ण से इस पूर्ण की उत्पत्ति हुई है, अतः उस पूर्ण से इस पूर्ण को निकाल देने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
(1) इस परिवर्तनशील जगत में यह जो कुछ भी चराचर दिखाई पड़नेवाली वस्तुएं हैं, ईश्वर उन सब में व्याप्त है। अतः उसका त्यागभाव से उपभोग करना चाहिए। जो वस्तु आपके पास नहीं है, उसका लोभ मत करो। भला यह धन किसका है ?
(2) इस विश्व में जन्म लेकर श्रेष्ठ पुरुषार्थ करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार (पूर्व श्लोक तथा इस श्लोक में वर्णित) सभी उपदेशों के अनुसार आचरण करो। इससे अतिरिक्त उत्थान के लिए कोई मार्ग नहीं है। जो मनुष्य सांसारिक भोगों को भोगते हुए भी कर्म का परित्याग नहीं करता, उसे कर्म से उत्पन्न दोष नहीं छूते।
(3) जो लोग केवल शारीरिक बल प्रदर्शन अर्थात परपीड़न के लिए प्रसिद्ध हैं; जिनमें आदर्श मानवीय मार्ग को समझने की शक्ति नहीं है, वे वस्तुतः आत्मघाती हैं। प्राण त्याग करने के बाद भी वे आसुरी लोकों को प्राप्त होते हैं।
(4) वह ब्रह्म एक है, चंचलता रहित है, सबसे प्राचीन है, स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है और मन से भी तेज चलनेवाला है। आंख, जिह्वा, कान आदि इंद्रियां उस तक नहीं पहुंच सकतीं। वह स्थिर रहने पर भी अन्य दौड़ते हुए लोगों से आगे बढ़ जाता है। मां के गर्भ में रहनेवाला जीव उसी ब्रह्म के आधार से अपने पूर्व में किए हुए कर्म फल को प्राप्त करता है।
(5) वह पूर्ण ब्रह्म समस्त सृष्टि को गति देते हुए भी स्वयं चंचलता रहित है। वह दूर भी है (अज्ञानियों के लिए) और पास भी है (ज्ञानियों के लिए)। वह इस चराचर जगत में प्रत्येक के अंदर भी है और बाहर भी है। क्योंकि ज्ञानी लोग उसे अपने अंदर देखते हैं और अज्ञानी नहीं देखते।
(6) जो मनुष्य सभी प्राणियों की आत्मा के अंदर आत्मा है, ऐसा अनुभव करता है और समस्त प्राणियों में उसी एक आत्मा का विश्वासपूर्वक अनुभव करता है, उसे किसी प्राणी के प्रति घृणा नहीं रहती।
(7) इस प्रकार की अवस्था में पहुंचने पर ज्ञानी मनुष्य को आत्मा सर्वभूतमय है—ऐसा अनुभव होता है। इस प्रकार का अनुभव होने पर उसे मोह बांध नहीं सकते।
(8) वह आत्मा सर्वत्र व्यापक है, शरीर रहित है, स्नायु एवं व्रण हीन है, शुद्ध, निष्पाप और तेजोमय है। इंद्रिय ज्ञान से परे हैं, मनीषी है, विजयी और स्वयंजन्मा है। उसने अनादिकाल से सभी इंद्रियों (जीभ, आंख, नाक, कान और त्वचा) तथा उसके विषयों (रस, देखना, सूंघना सुनना और स्पर्श) की व्यवस्था की है।
(9) जो—आत्मा नहीं है—इस प्रकार की अविद्या के अनुयायी हैं, वे अज्ञान के प्रगाढ़ अंधकार में प्रवेश करते हैं। साथ ही जो केवल आत्मज्ञान में ही डूब जाते हैं, वे अविद्या1 के उपासक से भी अधिक गहन अंधकार में जाते हैं, क्योंकि सांसारिक सुखसाधन भी जीवन-यात्रा के निर्वाह हेतु आवश्यक हैं।
(10) विद्या अर्थात् आत्मज्ञान से आत्मा की उन्नति होती है। अविद्या से सांसारिकता प्राप्त होती है। अतः इन दोनों का फल भिन्न-भिन्न है। ऐसा हमने धीरोदात्त मनीषियों से सुना है, जिन्होंने हमें इस विषय का उपदेश दिया था।
(11) विद्या से आत्मबल बढ़ता है और अविद्या से सांसारिक उन्नति प्राप्त होती है। जो इन दोनों को समान रूप से जानता है, वह अविद्या से अकाल मृत्यु को दूर करता है तथा विद्या से अमरत्व प्राप्त करता है।
(12) जो असंभूति (पृथकतावाद) की बात करते हैं, वे गहन अंधकार में प्रवेश करते हैं, और जो केवल संघवाद के ही उपासक हैं (व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरोधी हैं), वे असंभूतिवादियों से भी प्रगाढ़ अंधकार को प्राप्त करते हैं2 अतः संघवाद और वैयक्तिक स्वतंत्रता—(संभूति एवं असंभूति) दोनों की अतिवादिता उचित नहीं है।
(13) संघवाद और असंभूतिवाद, इन दोनों के फल भिन्न-भिन्न हैं—ऐसा कहा गया है। ऐसा हमने धीरे पुरुषों से सुना है, जिन्होंने हमें यह उपदेश दिया था।
(14) जो संघवाद और असंघवाद दोनों के समुचित प्रयोग को जानता है, वह असंघवाद से अपनी अकाल मृत्यु (रोग आदि) को दूर करके संघवाद से अमरता प्राप्त करता है।
(15) स्वर्णमय पान से सत्य का मुख बंद पड़ा है। भौतिकता सत्य को ढक देती है। हे परमात्मा ! सत्यधर्म का पालन करने के लिए तू उसे खोल दे। सत्यधर्म का पालन करने के लिए स्वर्ण अर्थात् धन-संपत्ति का लोभत्याग करना अनिवार्य है। तात्पर्य यह है कि धन संपत्ति का लालच व्यक्ति को सत्य से विमुख कर देता है। अतः हे परमात्मा तू हमें लोभ से बचा ले।
1. उपनिषदों में अविद्या शब्द का अर्थ वैद्यक, रसायन तंत्र आदि भौतिक विज्ञानों से है तथा विद्या शब्द का अर्थ अध्यात्म विद्या है।
2. संघवाद की चरमवादिता व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है। इस चरमवादिता के कारण ही हिटलर जैसे अधिनायकों का अभ्युदय हुआ था, जो विश्वयुद्ध का कारण बना। कांट, हीगल आदि पाश्चात्य विचारक इसी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे।
16. हे पोषक दृष्टा। नियामक, तेज स्वरूप, प्रजापालक ईश्वर ! अपनी किरणों को एक ओर समेट लो (इनकी चकाचौंध मुझे देखने नहीं देती); और जो तेरा परम कल्याणकारक तेजस्वी स्वरूप है, उसे में देखता हूं। यह जो इस शरीर में प्राणों को धारण करनेवाला भक्त है, वह मैं ही हूं।
17. हमारा यह आत्मा अपार्थिव और अमृतरूपी शक्तिवाला है, और यह शरीर अंत में भस्म होनेवाला है। अतः हे कर्म करने वाले पुरुष अपने द्वारा किए जानेवाले कर्मों का ध्यान कर। सर्वरक्षक आत्मा का ध्यान कर हे कर्म करनेवाले पुरुष किए हुए कर्मों का ध्यान कर।
18. हे अग्निस्वरूप ईश्वर हमें उत्तम मार्ग से अभ्युदय की ओर ले चल। हे देव ! तू हमारे सभी कर्मों को जानता है। हमारे पास के कुटिल पापों को दूर कर। हम तुझे विशेष रूप से नमन करते हुए तेरी स्तुति करते हैं।

केनोपनिषद
शांतिपाठ


ॐ अप्यायंतु ममांगानि वाक्प्राणचक्षुषः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद निराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तुतदात्मानि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि संतु।


ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।
मेरे अंग पुष्ट हों तथा मेरे वाक, प्राण चक्षु, श्रोत्र, बल और संपूर्ण इंद्रियां पुष्ट हों। यह सब उपनिषद विद्या ब्रह्म है। मैं ब्रह्म का निराकरण न करूं, ब्रह्म मेरा निराकरण न करे। इस प्रकार हमारा परस्पर अनिराकरण हो। उपनिषदों में जो धर्म है, वह आत्मज्ञान में लगे हुए मुझ में निहित हो, वह मुझ में निहित हो। त्रिविध तापों की शांति हो।
प्रथम खंड
(1) यह मन किसकी इच्छा से प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है ? यह प्राण किसके द्वारा प्रयुक्त होने पर चलता है ? यह वाणी किसके द्वारा इच्छा किये जाने पर बोलती है ? कौन देव नेत्रों तथा कानों को प्रेरित करता है ?
(2) जो कानों का भी कान, मन का भी मन और वाणी की भी वाणी है, वही प्राणों का भी प्राण और चक्षु का भी चक्षु है। इस तथ्य को जानकर धीर पुरुष मृत्यु के पश्चात मुक्त होकर अमर हो जाते हैं।
(3) उस ब्रह्म तक आंखें, वाणी और मन पहुंच ही नहीं सकते। अतः उस ब्रह्म के विषय में शिष्य को किस प्रकार उपदेश देना चाहिए, यह हम नहीं जानते; यह हमारी बुद्धि में नहीं आता। वह विदित एवं अविदित से अन्य ही है, ऐसा हमने अपने पूर्व पुरुषों से सुना है, जिन्होंने हमें उसका उपदेश दिया था।
(4) जो वाणी से प्रकाशित नहीं हो सकता, किंतु जिससे वाणी प्रकाशित होती है उसी को ब्रह्म समझना चाहिए। यह जिस विशेष नाम युक्त ईश्वर (जैसे इंद्र, अग्नि, वायु, विष्णु, रुद्र आदि) की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।
(5) जिसके विषय में मन मनन नहीं कर सकता, परंतु जिसकी सत्ता से मन मनन करने की सामर्थ्य रखता है, ऐसा कहा जाता है, उसी को ब्रह्म समझो। जिस विशेष नामयुक्त ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।
(6) जिसे कोई नेत्र नहीं देखता, किंतु जिसकी सहायता से नेत्र अपने विषय को देखते हैं, उसी को ब्रह्म समझो, जिस विशेष नाम युक्त ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।
(7) जिसे कोई कान नहीं सुनता, परंतु जिसकी सहायता से कान सुनने का कार्य करते हैं, उसी को ब्रह्म समझो। जिस विशेष नामधारी ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।
(8) जो नासिका में स्थित प्राण, वायु का विषय नहीं बन सकता, अपितु जिससे प्राण अपने विषय (सूंघना) कार्य करते हैं, उसी को ब्रह्म समझो। जिस विशेष नामधारी ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

द्वितीय खंड


(1) यदि तुम यह समझते हो कि तुम ईश्वर को अच्छी तरह जानते हो, तो निश्चय ही तुम ब्रह्म का अल्प रूप ही जानते हो। इसका जो रूप तुम जानते हो और जो रूप देवताओं में जाना जाता है, वह भी अल्प ही है। अतः तुम्हारे लिए ब्रह्म विचार करने योग्य है।’ इस पर एकांत में विचार करने के अनंतर शिष्य ने कहा कि, ‘वह अब ईश्वर को जान गया है।’
(2) मैं न तो यह मानता हूं कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जान गया हूं और न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता हूं। इसलिए मैं उसे जानता भी हूं और नहीं भी जानता हूं। हम शिष्यों में ब्रह्म के विषय में जिसकी यह धारणा है कि मैं उसे जानता भी हूं और नहीं भी जानता हूं, वही ब्रह्म को जानता है।
(3) ब्रह्म जिसे ज्ञात नहीं है, उसी को ज्ञात है। जिसको ज्ञात है, वह उसे नहीं जानता, क्योंकि वह जाननेवालों को बिना जाना हुआ और न जाननेवालों का जाना हुआ है। अन्य वस्तुओं के समान दिखाई न पड़ने के कारण वह इंद्रियों का विषय नहीं बन सकता।
(4) सभी इंद्रियां ब्रह्म की सत्ता से ही कार्य करती हैं, अतः प्रत्येक इंद्रिय के विषय से उसका ही बोध होता है, इसी से वह जाना जाता है, यही उसका ज्ञान है। इसी ब्रह्मज्ञान से अमरता प्राप्त होती है। अमरता स्वयं से ही प्राप्त होती है; विद्या तो केवल अज्ञान के अंधकार को दूर करने में सहायक सिद्ध होती है।
(5) यदि इसी जन्म में ब्रह्म को जान लिया जाए, तब तो ठीक है। यदि ऐसा न हो पाए तो यह प्राणी के लिए सर्वाधिक हानि की बात है। ज्ञानी लोग प्रत्येक प्राणी में ब्रह्म की सत्ता को देखकर, मृत्यु के पश्चात् अमर हो जाते हैं।

तृतीय खंड


(1) यह प्रसिद्ध है कि पूर्व कथित लक्षणोंवाले परब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की थी। कहते हैं कि उस ब्रह्म की विजय से देवताओं ने विजय प्राप्त की थी।
(2) तब देवताओं ने सोचा यह विजय उनके निजी प्रयत्नों से मिली है। कहते हैं—वह ब्रह्म देवताओं के मनोभावों को जान गया और उनके सामने यक्ष के रूप में प्रादुर्भूत हुआ। यक्ष के रूप में आए हुए उस ब्रह्म को लोग नहीं पहचान सके कि यह कौन है ?
(3) वे देवता अग्नि से बोले, ‘हे अग्नि यह ज्ञात करो कि यह यक्ष कौन है ?’ अग्नि ने स्वीकृति दे दी।
(4) अग्नि यक्ष रूपी ब्रह्म के पास गया, यक्ष ने अग्नि से पूछा, ‘तुम कौन हो।’ इस पर अग्नि ने उत्तर दिया, ‘मैं अग्नि हूं। मेरा नाम जातवेदास भी है।’
(5) इस पर यक्ष ने पूछा, ‘हे जातवेदास, तेरे नाम के अनुरूप तुझमें कौन-सी शक्ति है ?’ अग्नि ने उत्तर दिया, ‘पृथ्वी में दिखाई देनेवाले इस समस्त चराचर को मैं जला सकता हूं। आकाश में स्थित वस्तुएं भी मुझसे जल सकती हैं।’
(6) यक्ष ने अग्नि को एक तिनका दिया और कहा, ‘इसे जलाकर दिखाओ।’ अग्नि उस तिनके में प्रविष्ट हुआ, किंतु अपनी संपूर्ण शक्ति से भी उसे न जला सका और लौटकर देवताओं के पास चला आया तथा उनसे बोला, ‘यह यक्ष कौन है ? मैं इस तथ्य का पता न लगा पाया।’
(7) तदनंतर देवताओं ने वायुदेव को आज्ञा दी, ‘हे वायु, अब तुम मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ?’ वायु ‘बहुत अच्छा’ कहते हुए चल पड़ा।
(8) वायु यक्ष के पास गया। इस पर यक्ष ने प्रश्न किया, ‘तुम कौन हो ?’ यह पूछे जाने पर वायु ने कहा, ‘मैं वायु हूं, मुझे मातरिश्वा भी कहते हैं।’
(9) तब यक्ष ने पूछा, ‘हे वायु ! तुझमें क्या शक्ति है ?’ वायु ने कहा, ‘पृथ्वी में जो कुछ भी है, उसे मैं उड़ा सकता हूं।’
(10) तब यक्ष ने एक तिनका देते हुए वायु से कहा, ‘इसे उड़ाओ’ इस पर वायु तिनके के पास गया, किंतु अपनी पूरी शक्ति से भी उसे उड़ा नहीं सका। तब वह भी देवताओं के पास लौट आया और बोला, मैं इस बात को नहीं जान पाया कि यह यक्ष कौन है ?’
(11) तब देवताओं ने इंद्र से कहा, ‘हे मेघवन ! अब तुम इस बात का पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है ?’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर इंद्र यक्ष के पास गया, किंतु यक्ष इंद्र के सामने से अंतर्धान हो गया।
(12) जिस आकाश में वह यक्ष अंतर्धान हुआ था, इंद्र भी वहीं गया। वहीं उसने उस शोभामयी स्त्री हिमालय की पुत्री उमा (ब्रह्म विद्या) से पूछा, यह यक्ष कौन है ?’

चतुर्थ खंड


(1) उस विद्या देवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘यह ब्रह्म है, इसकी विजय से ही तुम महिमामय हुए हो।’ ऐसा कहते हैं कि तभी इंद्र ने जाना कि वह ब्रह्म था।
(2) अग्नि, वायु और इंद्र इन तीनों देवताओं ने ही सबसे पहले यह जाना कि ‘यह ब्रह्म है तथा इन तीनों ने ही सर्वप्रथम उसका स्पर्श किया था। वे अन्य देवताओं से श्रेष्ठ माने गए।
(3) इंद्र ने सर्वप्रथम समीपस्थ ब्रह्म का स्पर्श किया और जाना कि यह ब्रह्म है, अतः वह सभी देवताओं में प्रमुख माना गया।
(4) यह उस ब्रह्म का उपासना-संबंधी उपदेश है, जो पलक झपकने अथवा विद्युत चमकने के समान उत्पन्न हुआ। यह उस ब्रह्म का अधिदेवता रूप है।
(5) अब अध्यात्म उपासना का उपदेश इस प्रकार है—मन को गतिमान कहा जाता है। यह ब्रह्म इस प्रकार मन से ही बार-बार ब्रह्म का स्मरण होता है तथा निरंतर संकल्प किया जाता है।
(6) उस ब्रह्म ही वन अर्थात् भजन करने योग्य है, अतः उसकी वन नाम से उपासना करनी चाहिए। जो उसे इस तरह जानता है, उसी को सभी प्राणी अच्छी तरह चाहने लगते हैं।
(7) शिष्य द्वारा गुरु से उपनिषद् शिक्षा के विषय में अनुरोध किया गया। अतः इस शिक्षा को देने के बाद गुरु ने कहा—‘मैं तुम्हें ब्रह्म विषयक उपनिषद् का ज्ञान दे चुका हूं। अब तुम्हें ब्रह्म जाति संबंधी उपनिषद् का ज्ञान दूंगा।
(8) उस ब्राह्मी उपनिषद् की तप, दम, कर्म, वेद, और संपूर्ण वेदांग (व्याकरण, ज्योतिष, छंद आदि) यह सब प्रतिष्ठा है तथा सत्य उसका घर है।
(9) जो निश्चयपूर्वक इस उपनिषद को इस प्रकार जानता है, वह अपने पापों को नष्ट करके अनंत और महान स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।

कठोपनिषद
शांतिपाठः


ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहे।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।


परमात्मा हम दोनों (गुरु एवं शिष्य) की एक साथ रक्षा करें, एक साथ हमें उपभोग प्रदान करें। हम साथ ही पराक्रम करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम द्वेष न करें।

प्रथम अध्याय
प्रथम वल्ली


(1) वाजश्रवा के पुत्र उद्यालक ने यज्ञ में प्रबल फल की कामना से अपना सब कुछ दान कर दिया। उनका नचिकेता नाम का एक पुत्र था।
(2) ब्राह्मण दान में मिली बूढ़ी गायों को ले जा रहे थे, तब बालक नचिकेता के मन में इन गायों के प्रति दयाभावना उत्पन्न हुई। अतः उसने विचार किया।
(3) ये गायें अपने जीवन का पानी पी चुकी हैं, घास चर चुकी हैं, इनका दूध दुहा जा चुका है तथा अब ये अत्यंत दुर्बल एवं प्रजनन शक्ति रहित हो चुकी हैं। इस प्रकार की गायें ब्राह्मणों को दान में देने से उन्हें क्या सुख मिलेगा ?
(4) पिता के इस व्यवहार को देखकर बालक नचिकेता ने पूछा, ‘पिताजी ! जब आप इन बूढ़ी गायों को ब्राह्मणों को दान में दे रहे हैं, तो मुझे किसे देंगे ? बालक के बार-बार यही प्रश्न पूछे जाने पर खिन्न होकर पिता ने कहा, ‘मैं तुझे मृत्यु को दूंगा।’
(5) अपने प्रिय पुत्र के प्रति ऐसे वचन कहे जाने पर बालक ने मन में सोचा कि पिता के ये शब्द मिथ्या सिद्ध न हों। अतः उसने कहा—
(6) आप अपने पूर्वजों और अन्य साधु-महात्माओं के जीवन का अवलोकन कीजिए तथा उन्हीं के अनुसार अपने वचन को मिथ्या सिद्ध न होने दीजिए, क्योंकि मनुष्य फसलों के समान ही जीर्ण होकर मृत्यु को प्राप्त होता है तथा पुनः जन्म लेता है। अतः अपने वचन का पालन कीजिए।
(7) अपने वचन को पूर्ण करने के लिए पिता ने पुत्र को यम के पास भेज दिया। यम के सभासदों ने उससे कहा, ‘अपने तेज से घरों को जलाता हुआ जिस तरह साक्षात अग्नि के समान यह ब्राह्मण आपके यहां आया है, अतः आप पांव धोने हेतु जल देकर अर्थात् समुचित साक्षात्कार करके उसे शांत कीजिए।
(8) जिसके घर में ब्राह्मण भूखा रहता है, उसकी सभी इच्छाएं, प्रतीक्षाएं, सत्संग से प्राप्त फल, सत्य वाणी बोलने का फल, यज्ञ आदि करने से प्राप्त फल, पुत्र, पशु आदि सब नष्ट हो जाते हैं।
(9) तब यम ने कहा, ‘हे ब्राह्मण अतिथि ! आपने मेरे यहां अनशन करते हुए तीन रात्रियां व्यतीत की हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूं। आप कुपित न हों। मेरा कोई अमंगल न हो। अतः आप मुझसे कोई तीन वर मांग लीजिए।’
(10) नचिकेता ने कहा, ‘हे मृत्यु ! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो प्रथम वर यह दीजिए कि मेरे पिता का मेरे प्रति क्रोध शांत हो जाए और वह मुझसे प्रसन्न हो जाएं। यहां से घर लौटने पर वह मुझे पहचान लें। तीनों वरों में यही प्रथम वर मुझे दीजिए।
(11) यम ने कहा, ‘हे नचिकेता मुझे मृत्यु के पास लौटे हुए तुमको सामने देखकर तुम्हारे पिता पहले की तरह ही प्रसन्न हो जाएंगे।’
(12) नचिकेता ने पुनः कहा स्वर्गलोक में न तो हे मृत्यु तुम्हारा भय है और न वृद्धावस्था का। वहां भूख और प्यास का बंधन भी नहीं है। अतः वहां मनुष्य सदा प्रसन्न रहता है।’
(13) हे मृत्यु स्वर्गलोक को प्राप्त करने की साधनभूत उस अग्नि के ज्ञान को मुझे दीजिए जिससे देवपद की प्राप्ति होती है। यह अग्नि विज्ञान को वर ही मेरा द्वितीय वर है।
(14) यम ने कहा, ‘नचिकेता ! उस स्वर्गप्रद अग्नि का मैं तुम्हें उपदेश देता हूं। तुम उसे एकाग्र मन होकर जान लो। अनंत लोक में प्रतिष्ठा देनेवाली, विद्वानों द्वारा गुप्त रखी हुई और मेरे द्वारा कही गई इस अग्नि को जानो।’
(15) मृत्यु ने जगत की उत्पत्ति के प्रथम कारण उस अग्नि का उससे सभी नियमों और प्रयोगों की विधि सहित नचिकेता को उपदेश दिया।। नचिकेता ने उस समस्त उपदेश को फिर यम के समक्ष दोहराया तब यम संतुष्ट हुआ।
(16) इस पर संतुष्ट होते हुए यम ने कहा, ‘मैं तुम्हें यह आशीर्वाद देता हूं कि जिस अग्नि विद्या का मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, वह तुम्हारे ही नाम से (नाचिकेता अग्नि) जानी जाएगी और विविध वर्णोंवाली तथा शब्द करनेवाली इस माला को भी ग्रहण करो।
(17) इस नाचिकेता अग्नि का तीन बार स्तवन करनेवाला माता-पिता और गुरु तीनों से ज्ञान प्राप्त करनेवाला जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाता है। ब्रह्म से उत्पन्न इस प्रशंसनीय ज्ञान का साक्षात्कार करनेवाला मनुष्य परमशक्ति को प्राप्त करता है।
(18) जो तीन नाचिकेता अग्नि की उपासना करता है और इसे ठीक-ठीक जानकर यज्ञ करता है, वह मृत्यु के बंधन और शोक से मुक्त होकर स्वर्गलोक में आनंद प्राप्त करता है।
(19) यम बोले, ‘हे नचिकेता स्वर्ग प्राप्त करने की साधन और इस अग्नि का वरदान मैंने तुम्हारे कहने पर दिया तथा यह अग्नि तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगी, यह वर मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें दिया है। अब तुम अपना तीसरा वर मांगो।’
(20) नचिकेता ने पूछा, ‘कुछ लोग कहते हैं कि मृत्यु के उपरांत आत्मा इस शरीर को छोड़कर दूसरी देह धारण कर लेती है तथा कुछ लोग इसे नहीं मानते, अतः यहां इस विषय में मुझे संदेह जैसा हो रहा है। कृपया आप मुझे अपना शिष्य मानते हुए, तृतीय वर के रूप में इसी विद्या का ज्ञान दीजिए।’


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लोगों की राय

Vikas  Chauhan

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