शिरडी के साईं बाबा - प्रकाश नगायच Shirdi ke Sai Baba - Hindi book by - Prakash Nagayach
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शिरडी के साईं बाबा

प्रकाश नगायच

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :125
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3687
आईएसबीएन :81-288-0335-2

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शिरडी के साईं बाबा के जीवन से सम्बन्धित पुस्तक...

Shirdi ke sai baba

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


आज भारत में जितने योगी, साधु-संन्यासी और सन्त तथा सिद्ध पुरुष हैं उनमें शिरडी के साईं बाबा का नाम सर्वोपरि है। उनके भक्तों और अनुयायियों की इतनी बड़ी संख्या का प्रमुख कारण है साईं बाबा में उनका अटूट विश्वास।

प्रस्तुत पुस्तक साईं बाबा के जीवन की उन झलकियों को प्रस्तुत करती है, जिन्होंने उन्हें एक महान् और सिद्ध सन्त के पद पर लाकर प्रतिष्ठित किया है।

भूमिका


दक्षिण भारत के महान सन्त साईं बाबा का अभ्युदय उस काल में हुआ जब प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम की असफलता के पश्चात भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना हो चुकी थी।
अंग्रेजों की फूट डालो और राज्य करो की नीति ने भारत में सांप्रदायिता का ऐसा जहर भर दिया था। जिसने केवल विभिन्न धर्मावलम्बियों के मन में ही नहीं बल्कि एक भाई के प्रति दूसरे भाई के मन में द्वेष के बीज बो दिए थे।

साईं बाबा ने भारत के उस संक्रान्ति काल में हिन्दू-मुस्मिल एकता के लिए जो प्रयास किए उनका केवल धार्मिक ही नहीं राजनैतिक महत्त्व भी है। सन् 1858 में जबकि प्रथम स्वाधीनता संग्राम की ज्वाला भारत के कोने-कोने में भड़क रही थी। चांदी के चन्द टुकड़ों पर धर्म और देश की स्वाधीनता बिक रही थी। शिरडी जैसे छोटे से गाँव में साईं बाबा ने अपने स्नेह, त्याग, निस्प्रहता, और अपनी आध्यात्मिक शक्ति का सहारा लेकर हिन्दू-मुस्मिल एकता का विगुल फूंका। हिन्दू-मुस्लिम भाई-चारे का एक ऐसा दीप प्रज्जलित किया जिसका प्रकाश आज भी मानव जाति का पथ-प्रदर्शन कर रहा है।

साईं बाबा के सम्बन्ध में अनेक कहानियां दक्षिण भारत में आज भी लोगों के मस्तिष्क में सुरक्षित हैं जो धीरे-धीरे लोक कथाओं का रूप लेती चली जा रही हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में उनके जीवन से सम्बन्धित कुछ ऐसी घटनाओं को संग्रहीत करने का प्रयास किया है जो युग-युगान्तर तक मानव जाति को त्याग, स्नेह, निस्पृहता और भाईचारे की प्रेरणा देती रहेगी।


-प्रकाश नगायच


शिव का अवतार



समूचे विश्व में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसके जन जीवन पर राजनैतिक या धार्मिक नेताओं की अपेक्षा उन लोगों के जीवन और विचारधाराओं का अधिक प्रवाह पड़ा है जिसका न तो कभी राजनीति से सम्बन्ध रहा था और न किसी धर्म विशेष से। वास्तव में धार्मिक सहिष्णुता विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन है। उसका कारण रहा है भारतीय जीवन में किसी-न-किसी अंश में वे आध्यात्मिक विचार जिन्हें अनादिकाल से न तो कोई धार्मिक विचारधारा अपने आप में बांध पाई और न देश की राजनैतिक परिस्थितियां ही उसे मोड़ देने में समर्थ हो सकीं।

भारतीय सत्ता परम्परा भारत की पुरातन परम्परा है। अनादिकाल से ही सम्राटों, राजा-महाराजाओं और धन कुबेरों की अपेक्षा ऋषि, मुनियों, ज्ञानियों, संन्यासियों और सन्तों को अधिक सम्मान प्राप्त रहा है। क्योंकि वे सांसारिक माया-मोह-लालच और सांसारिक कामनाओं से मुक्त होते थे। उनका सम्पूर्ण जीवन, मानव प्रेम, मानव कल्याण और समस्त विश्व को विश्वबन्धुत्व के एक सूत्र में बांधने के लिए समर्पित होता था।

भारत में चौदहवीं शताब्दी के आसपास मुस्लिम सन्तों के आगमन का आरम्भ हुआ। यद्यपि ये मुस्लिम सन्त धर्म को तलवार की शक्ति के फैलाने वाले आक्रान्तों के साथ भारत में आए थे, लेकिन उनका सम्बन्ध न तो उन आक्रमणों से था न इस्लाम से। सन्त की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, राजनीति ही संसार से भी उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता। उसकी केवल एक ही जाति है, एक ही धर्म होता है मानव धर्म संसार और राजनीति से उसका इतना ही सम्बन्ध होता है कि वह उनमें निष्पक्षता निःस्वार्थ, दया, करुणा, स्नेह, शान्ति, बन्धुत्व, समता और कल्याण की भावनाएँ भर सकें।
 
चौदहवीं शताब्दी के बाद भारतीय सन्त परम्परा पर इन मुस्लिम सन्तों के योगदान को नकारा जा सकता है।
कुछ ऐसे मुस्लिम सन्त हुए हैं जिन्हें मुसलमान भी पूजते हैं और हिन्दु भी। और कुछ ऐसे हिन्दू सन्त भी हुए जिनके अनुयायी हिन्दू-मुसलमान दोनों ही हैं हिन्दू और मुसलमानों अतिरिक्त अन्य धर्मावलम्बी भी उन्हें मान्यता देते हैं।
 
लेकिन इस प्रकार के जितने भी हिन्दू और मुसलमान सन्त हुए हैं उनमें शिरडी के साईं बाबा का स्थान उन सबसे भिन्न है। वह इसलिए कि उन्होंने हिन्दू परिवार में जन्म लेकर भी अपनी साधना का केन्द्र शिरड़ी के टूटी–फूटी मस्जिद को बनाया, जिसके कारण लोगों को आज भी यह संदेह है कि वह हिन्दू नहीं मुसलमान थे। वह मन्दिर में जाकर हिन्दुओं की तरह मूर्ति पूजा भी करते थे और मस्जिद में जाकर नमाज भी पढ़ते थे वह हिन्दू त्यौहारों और पर्वों को भी इसी धूमधाम से मनाते थे जिस जोश-ओ-खरोश के साथ वह मुस्लिम त्यौहारों को मनाया करते थे। उनके निकट हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों मिलकर एक हो गए थे। वह दोनों धर्मों का ऐसा पावन संगम थे, जिसमें डूबकी लगाने पर हिन्दुओं और मुसलमानों को ही नहीं बल्कि और भी धर्मावलम्बियों को उतना ही सुख, शान्ति और आनन्द मिलता था।

शिरडी के साईं बाबा का जन्म कब हुआ और कहाँ हुआ ? उनके माता-पिता कौन थे ? किस जाति और धर्म के थे ? इस सम्बन्ध में आज तक कोई प्रमाणित विवरण नहीं मिल सका है। साईं बाबा के भक्तों ने उनके सम्बन्ध में काफी खोज की है, लेकिन आज तक ये प्रश्न, प्रश्न ही बने हुए हैं।

साईं बाबा के ऐसे कई भक्त थे जिन्होंने उनके संबंध में काफी कुछ लिखा है। लेकिन किसी ने यह नहीं लिखा कि वह कौन थे ? उनका जन्म और जन्मकाल, धर्म, जाति और परिवार सभी कुछ अज्ञात  के आवरण में छिपा हुआ जिसे अभी तक हटाया नहीं जा सका है।

दक्षिण भारत के विख्यात सन्त सत्य साईं बाबा को शिरडी के साईं बाबा का अवतार माना जाता हैं। शिरडी के साईं बाबा का देहावसान सन् 1918 में हुआ था और सत्य साईं बाबा का जन्म उनके देहावसान के आठ वर्ष बाद सन् 1926 में हुआ था, सत्य साई बाबा ने 23 मई 1940 को यह घोषणा की थी कि वह शिरडी से साईं का अवतार हैं और फिर उन्होंने साईं बाबा के सम्बन्ध में उनके जन्म की पूरी कहानी सुनाई थी। यों तो यह कहानी परम्परागत लोक कथाओं जैसी लगती है किन्तु सत्य साईं बाबा के अतिरिक्त उनके कुछ भक्तों ने, जिनका साईं बाबा से तभी से निकट सम्पर्क रहा था जब वह पहले दिन शिरडी में आये थे, साईं बाबा के सम्बन्ध में कुछ इसी तरह की कहानी सुनायी है। इससे लगता है कि इस कहानी में थोड़ी बहुत सत्यता अवश्य है।

सत्य साईं बाबा की बताई हुई कहानी के अनुसार दिल्ली से भोपाल होकर जाने वाली रेलवे लाइन के स्टेशन मनमाड के निकट पन्नी गांव में साईं बाबा का जन्म हुआ था।
पन्नी गांव एक नदी के किनारे बसा हुआ है। इस गांव में गंगा भावड़िया नाम का एक मल्लाह रहता था। गंगा भावाड़िया की पत्नी का नाम देवगिरी यम्मा था। गंगा भावड़िया और देवगिरी यम्मा बहुत ही सीधे-साधे और धार्मिक विचारों के थे। उनकी जीविका का एक मात्र साधन था उनकी नाव, जिससे दिन में गंगा भावड़िया नदी पार आने-जाने वाले यात्रियों को नाव द्वारा नदी पार कराकर इतना पैसा पैदा कर लेता था पति-पत्नी दोनों का बड़े आराम से गुजारा हो जाता था। पति-पत्नी दोनों ही सन्तोषी और धर्मपरायण थे। जो कुछ रूखा-सूखा मिल जाता था उसी को खाकर सन्तोष कर लेते थे जो भी फुर्सत का समय मिलता था भगवान की आराधना में बिता देते थे।

उनके विवाह को कई वर्ष बीत चुके थे लेकिन देवगिरी यम्मा की गोद अभी तक सूनी थी। पति-पत्नी रात-दिन भगवान से यही प्रार्थना करते रहते थे उन्हें एक सन्तान दे दे ताकि उसका वंश चल सके।
घर पर समय असमय जो भी साधु-संन्यासी या भिखारी आ जाता था उसकी यथा शक्ति सेवा और सत्कार करना वे अपना प्रमुख धर्म समझते थे। उसका विश्वास था कि प्रत्येक प्राणी में भगवान का वास है और फिर अतिथि तो भगवान का साक्षात् स्वरूप होता है, उसकी सेवा भगवान की सेवा है। उसका सत्कार भगवान का सत्कार है। इसके अतिरिक्त वे यह भी सोचा करते थे कि न जाने कौन साधु-संन्यासी और भिखारी उन्हें आशीर्वाद दे बैठे और उनके जीवन की एक मात्र साध पूरी हो जाए।

लेकिन कई वर्ष बीत गए। उनकी कामना अधूरी-की-अधूरी ही रही।
उस दिन शाम से ही आकाश पर काले-काले दैत्याकार बादल धुमड़ने लगे थे। वर्षा के डर से नदी पार आने-जाने वाले यात्रियों ने अपनी यात्रा स्थगित करके आप-पास के गाँवों में शरण ले ली थी। घाट सूना हो  गया था। इसलिए गंगा भावड़िया अपनी नाव नदी के किनारे खड़े पीपल के एक विशाल वृक्ष के तने से बाँधकर शाम होने से पहले ही घर चला गया। क्योंकि सूने घाट पर अकारण बैठे रहने से कोई लाभ नहीं था।

दिन ढल जाने के बाद पति-पत्नी दोनों ने भगवान की पूजा की और फिर खाकर अपने-अपने बिस्तर पर जा लेटे। थोड़ी देर तक गंगा भावड़िया घाट पर आने  वाले साधु-सन्तों से सुनी हुई भगवान और उनके भक्तों की कहानियाँ अपनी पत्नी को सुनाता रहा और फिर दिन-भर के थके-हारे पति-पत्नी को नींद ने अपनी बाँहों में समेट लिया।
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। अचानक बादल जोर से गरजने लगे। बिजली चमकने-कड़कने लगी। हवा में तेजी आ गयी और फिर मूसलाधार बारिश होने लगी।

बादलों की गरज और बिजली की कड़क तथा हवा के शोर से गंगा भावड़िया और उसकी पत्नी देवगिरी यम्मा की आँख खुल गई। देवगिरी यम्मा दौड़कर आगन में चली गयी और वहां बिखरी चीजें समेटने लगी।
अचानक गंगा भावड़िया को अपनी नाव की याद आ, गई जिसे वह नदी के घाट पर एक पीपल के पेड़ के तने से बाँध आया था। उसने जिस रस्सी से नाव बांधी थी वह पुरानी और जगह-जगह, से टूटी हुई बहुत ही कमजोर थी। उसे यह आशा न थी कि वर्षा इतने जोर से होगी। जब भी वर्षा होती थी, गांव के पास वाली वह छोटी-सी पहाड़ी नदी उफन उठती थी और अगर वर्षा घंटे तक होती थी तो विकराल रूप धारण कर लेती थी और उसकी कुद्ध नागिन-सी फुंफकारती लहरें किनारें के पेड़-पौधों, खेत-खलिहानों और गाँवों को अपनी विनाशकारी बांहों में समेटकर उनका नामों-निशान ही मिटा देती थीं।

गंगा भावड़िया सोचने लगा कि यदि सारी रात बारिश होती रही तो नदी की तूफानी लहरें उसकी जीर्ण-शीर्ण नाव को भी बहा ले जायेंगी, जो उसकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

इस आशंका से वह कांप उठा। अगर नाव बह गई या डूब गई तो क्या होगा। वर्षां पहले किसी महाजन से कर्ज लेकर यह नाव बनवाई थी। एक वक्त भूखे पेट रहकर उसने न जाने कितनी कठिनाइयों से कर्ज निपटाया था। और अब उसमें इतनी सामर्थ्य न थी कि दोबारा कर्ज लेता और नाव बनवा लेता।

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