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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आकृति देखकर मनुष्य की पहिचान

आकृति देखकर मनुष्य की पहिचान

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :41
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 372
आईएसबीएन :00-000-00

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लोगो की आकृति देखकर उनका स्वभाव पहचानना मनोरंजक तो होता ही है, परंतु इससे अधिक यह अनुभव आपको अन्य लोगों से सही व्यवहार करने में काम आता है।


रहन-सहन


जोर-जोर कदम पटक कर सड़क पर खटपट करता हुआ चलने वाला मनुष्य अभिमानी, चुस्त और फुर्तीला होता है। पैरों को हाथी की तरह गाढ़-गाढ़ कर चलने वाले स्वावलम्बी, शान्त स्वभाव, धैर्यवान और न्यायप्रिय होते हैं। अपने सिद्धान्तों की रक्षा के लिए ऐसे लोग बड़ी-बड़ी आपत्तियों का मुकाबिला भी खुशी-खुशी करते हैं।

रास्ता चलते समय दो आदमियों की जगह घेरने वाले ऐसे लोग जो हाथों को इधर-उधर हिलाते चलते हैं, हिलते और झूमते हुए आगे बढ़ते हैं, दूसरों के लिए रास्ता नहीं छोड़ते पर अपने सामने आने वाले को हटा देते हैं इस प्रकार के लोग बदमिजाज, घमण्डी, अन्यायी, पर-पीड़क और शैतानी नशे में मस्त होते हैं। कमर झुकाकर और कन्धों केा आगे लटका कर चलने वाले कमजोर और निराश देखे जाते हैं।

साँप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी रीढ़ वाले विश्वासघाती, धोखेबाज और बेईमान होते हैं। उनकी मीठी बातों के पीछे कपट का पुट लगा रहता है।

जो बहुत अकड़ कर बातें करता है, जरा-जरा सी बात में लाल-पीला हो जाता है, हाथ पटकने और गरजने लगता है ऐसे मनुष्य को "मिट्टी का शेर" से अधिक और कुछ नहीं समझना चाहिए। एक लताड़ में उनकी सारी हेकड़ी काफूर हो जाती है। परले सिरे के कायर और बुजदिल आदमी इस तरह की अकड़बाजी दिखाते हैं वे किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते। बहादुर और खूंखार आदमी देर से गरम होते हैं और जब गरम होते हैं तो कुछ करके दिखाए बिना चुप नहीं होते।

जिनके पैर छितराये हुए शराबियों की तरह इधर-उधर पड़ते हैं और चलने में पैर एक-दूसरे से लड़ते जाते हैं ऐसे लोग आलसी, असफल और अन्ध विश्वासी होते हैं।

जिनके कपड़े मैले, फटे, बेरततीव तथा बिखरे हुए हों उन्हें सुस्त, काहिल, लापरवाह और आत्म गौरव से रहित समझा जा सकता है, किंतु स्वाभिमानी और स्वच्छ तबियत वाले गरीब होने पर भी तरतीव और सफाई के साथ कपड़े पहिनेंगे भले ही वे सस्ते या फटजाने पर मरम्मत किए हुए हों।

बिखरे हुए बाल, मैले हाथ, बढ़े हुए बाल, पीले दाँत, टूटे बटन, फटे जूते, बढ़े हुए नाखून, जहाँ-तहाँ लगे हुए दाग प्रकट करते हैं कि इस व्यक्ति की आदते ऐसी हैं जो दरिद्रता के दु:ख में ढकेल कर छोड़ेगी। लापरवाह लोग धन नहीं कमा सकते और न उसकी रक्षा ही कर सकते हैं।

हाथी, सिंह, हंस की गम्भीर गति में स्थिरता पूर्वक जिनके पैर पड़ते हैं वे विश्वासी, स्थिर मति और मजबूत स्वभाव के होते हैं। उनके विचार और कार्यों में बहुत कम अन्तर देखा जाता है।

जिनके चेहरे पर अनेक भाव क्षण-क्षण में नहीं बदलते वे प्रतिष्ठित महापुरुष होते हैं। चेहरे को एकरस, गंभीर, स्थिर एवं निराकुल देखकर यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि यह मनुष्य अपने वचन और कर्तव्य को पूरा करने की जिम्मेदारी हो समझता है। जिनके चेहरे पर क्षण-क्षण में भाव बदलते हैं ऐसे लोगों की बात का भरोसा करना अपने को खतरे में डालना है।

जो बेढंगे तरीके पर पैर फैला कर उकडू होकर औधे पड़कर सभ्य समाज में बैठते हैं उन्हें बेवकूफ कहना चाहिए। नाक, कान या दाँत का प्रकार के निरर्थक काम जिनकी आदत में होते हैं, उन्हें पथ भ्रष्ट कहते हैं। उनके मस्तिष्क में अनेकों समस्याएँ गूंजती रहती हैं, पर किसी प्रश्र का ठीक निर्णय नहीं कर पाते। ऐसे किंकर्तव्य विमूढ़ व्यक्तियों को इठला-इठला कर, लड़कपन जैसी बातें करने या चेष्टाएँ करने की आदत पड़ जाती है।

सामुद्रिक शास्त्र साक्षी है कि यदि शरीर और मन की दशा अस्वस्थ होगी तो चेहरे पर ऐसे चिह्न प्रकट होंगे, जो देखने में बुरे लगते हैं, खटकते हैं, कुरूप मालूम पड़ते हैं और अनायास ही एक प्रकार का भय, आतंक तथा सन्देह उत्पन्न करते हैं। बकरी के बच्चे ने अपने छोटे से जीवन में पहले कभी भेड़िये का दर्शन भले न किया हो और न किसी ने उसे भेड़िये के स्वभाव के बारे में कुछ बताया हो, तो भी वह भेड़िये के प्रथम बार दर्शन करते ही क्षण भर में यह जान लेता है कि भेड़िया किस प्रकार के स्वभाव का है और वह मेरे ऊपर क्या कहर बरसा सकता है। प्रकृति ने यह सहज ज्ञान मनुष्यों को भी दे रखा है ताकि किसी के सम्पर्क में जाते ही यह जान लिया करें कि सामने वाले व्यक्ति में क्या भले बुरे गुण हैं और उससे क्या लाभ-हानि हो सकता है?

यह बात ध्यान में रखने की है कि किसी के शुभ लक्षणों को तो निस्संकोच प्रकट कर देना चाहिए परन्तु कुछ लक्षणों सम्बन्धी धारणा प्रकाशित करने में बहुत संयम से काम लेना चाहिए। क्योंकि कदाचित किसी भूल के कारण वे लक्षण ठीक न निकले तो अकारण ही घृणा, कलह, विद्वेष तथा दुर्भाव बढ़ेगा, दूसरे वह व्यक्ति यह विश्वास कर बैठा है कि-मेरे तो लक्षण ईश्वर ने ही दुर्गुणी होने के बनाये हैं तो वह निराश होकर अपनी बुराईयाँ छोडने का प्रयल न करेगा। अतएव जहाँ तक हो सके दूसरों को प्रोत्साहित करने, उनके सद्गुण प्रकाशित करने तथा आत्म गौरव एवं महानता की भावनाऐं जगाने के लिए ही इस विद्या का उपयोग करना चाहिए। किसी व्यक्ति के बुरे चिहों केा देखकर स्वयं सावधान रहना तो ठीक है, पर उसे बदनाम तथा हतोत्साहित करके निराश, निलज तथा शत्रु बनाना उचित नहीं। आकृति विद्या के अभ्यासियों को इन सब आवश्यक बातों की चेतावनी देते हुए, इस पुस्तक को समाप्त करते हैं।

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    अनुक्रम

  1. चेहरा, आन्तरिक स्थिति का दर्पण है
  2. आकृति विज्ञान का यही आधार है
  3. बाल
  4. नेत्र
  5. भौंहें
  6. नाक
  7. दाँत
  8. होंठ
  9. गर्दन
  10. कान
  11. मस्तक
  12. गाल
  13. कंधे
  14. पीठ
  15. छाती
  16. पेट
  17. बाहें
  18. रहन-सहन

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