दहलीज के उस पार - रश्मि कुमार Dahleej ke Us Par - Hindi book by - Rashmi Kumar
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दहलीज के उस पार

रश्मि कुमार

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 373
आईएसबीएन :81-263-0532-0

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रोचक कहानियों का संग्रह

Dahleej ke Us Par - A Hindi Book by - Rashmi Kumar दहलीज के उस पार - रश्मि कुमार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पिछले कुछ वर्षों के दौरान नये हिन्दी कथाकारों के बीच रश्मि कुमार ने अपनी एक महत्त्वपूर्ण पहचान बनायी है। ‘दहलीज के उस पार’ उनकी दूसरा कहानी संग्रह है। ‘दहलीज के उस पार’ संग्रह में अपने समकालीन समय और समाज के प्रति सजग आज की भारतीय नारी के अन्तर्मन के अभिव्यक्त करती कहानियाँ हैं। नारी-मन, उसके सुख-दुःख और राग-विराग को कई-कई कोणों से देखती दिखाती इस संग्रह की कहानियाँ स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों के दायरे में घरबारी परिस्थितियों और समस्याओं के बीच चुनी गयी हैं। दरअसल जीवन के तमाम ऊँच नीच और दबावों-तनावों के साथ अपने जीवन्त पात्रों के संघर्ष और आक्रोश को रश्मि कुमार ने अपनी इन कहानियों में बेबाकी के साथ प्रस्तुत किया है। अनोखे ढंग की सीधी-सहज कथा-शैली और समृद्ध कथानकों वाली यह कहानियाँ अपने पात्रों के अन्तर की आस्था और ईमानदारी को अभिव्यक्त करती हैं।

जल-जल उठीं लकड़ियाँ

अस्पताल के गहन चिकित्सा-कक्ष के बाहर मैं बड़ी देर से चिन्ताग्रस्त बैठी थी, दीपा को सुबह ऐडमिट कराया था। फ़ोन पर जैसे ही दीपा की माँ ने मुझे सूचना दी, मैं घबराकर चली आयी थी। मेरे साथ उसकी माँ तथा छोटा भाई, दोनों चुपचाप बैठे थे। भाई के सूखे हुए चेहरे को देखकर मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ, बीमार को देखने अस्पताल आ रही थी, खाने-पीने के लिए कुछ लेकर आना चाहिए था। दीपा की जो हालत थी उसमें उसके घरवालों को खाने-पीने का होश ही कहाँ होगा, किन्तु जल्दबाजी़ में मैं कुछ लेकर आना बिलकुल ही भूल गयी थी। वैसे दीपा के पति, उमेश भी वहीं थे। दीपा की सास की गोद में दीपा का नवजात शिशु अपने दोनों हाथ कान पर धरकर निश्चिन्त सो रहा था। उस बच्चे को देखकर मेरा जी भर आया। पता नहीं बेचारा कैसी क़िस्मत लेकर आया था, उसे तो ख़बर भी नहीं होगी कि उसे उसकी माँ ने अभी जी भरकर देखा भी नहीं है, ऑपरेशन के बाद से अभी तक उसे होश नहीं आया था।

अधिक दिन नहीं हुए थे जब दीपा ने आवेश में आकर मुझसे कहा था, ‘‘मेरा क्या अपराध है नैना, बोलो, यही न कि मैं अपने घर में सबसे छोटी हूँ, इन सबके पहले मैं चाहकर भी मर नहीं सकती।’’
उस वक़्त मैंने उसे टोक दिया था, ‘‘ऐसा नहीं कहते दीपा, जब-तब मरने-जीने की बातें नहीं किया करते।’’
‘‘तो क्या करूँ मैं बोलों बचपन से ही मरना-मरना सुनकर मेरे कान पक गये हैं, अरे जो संसार में आया है उसे तो एक-न-एक दिन जाना ही है न, फिर जब-तब अपने मरने की धमकी क्यों देते हैं सब, मैं क्या अमरबूटी खाकर आयी हूँ।’’ गुस्से और आवेश के मारे गला रुँध गया था उसका। मैं उसकी मानसिक अवस्था समझ रही थी। उसके घर में भयंकर तनाव था दीपा का अपने पति उमेश से किसी बात पर झगड़ा हुआ था और वह मारे ग़ुस्से के घर से बाहर निकल गया था। वैसे यह कोई नई बात नहीं थी, वह अक्सर करता था। ग़ुस्सा ठण्डा होने पर वापस लौट आता  था।

दीपा की ससुरालवाले मेरी जान-पहचान के ही नहीं थे, मेरे दूर के रिश्तेदार भी थे। उनके घर में झगड़ा-झंझट होना कोई नयी बात नहीं थी, जब तक घर में दो-चार बातें नहीं होतीं उनका खाना हज़म नहीं होता था। मेरी अक्सर कोशिश रहती थी उनसे पर्याप्त दूरी बनाकर रखूँ। किन्तु दीपा की शादी के बाद मैं यह दूरी क़ायम नहीं रख पायी। दीपा मेरे बचपन की अभिन्न सहेली थी। हम दोनों ने बचपन में मिलकर इक्कट-दुक्कट खेला था, रस्सी कूदी थी। मिल-जुलकर गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाया था, शरारतन एक-दूसरी की कच्ची अमियाँ और इमलियाँ चुराकर खायी थीं और फिर जमकर झगड़ा भी किया था।
 
यह संयोग की बात थी कि इतने दिनों के बाद दीपा से फिर मेरा सम्पर्क स्थापित हो गया था। दीपा की शादी लखनऊ में ही हुई थी यहाँ मेरे पति की पोस्टिंग थी। यही नहीं उमेश की पत्नी होने के नाते वह दूर के रिश्ते से मेरी देवरानी थी। किन्तु हम दोनों में से किसी ने भी इस नये रिश्ते को महत्त्व नहीं दिया था। पहले की तरह ही एक-दूसरे के नाम लेकर बेहिचक बुलाती थीं। उस दिन भी जब उसका फोन आया तो मैं हड़बड़ाकर चली आई थी। उमेश की माँ बाहर ही मिल गयीं। मुझे देखकर बोल उठी, ‘‘अपनी सहेली की करतूत सुनी कि नहीं ?’’
‘‘क्या हुआ हुआ ?’’ किसी आशंका से मेरा दिल धड़क उठा।
‘‘होगा क्या, उसकी वजह से मेरा बेटा किसी दिन मेरे हाथ से निकल जाएगा।’’
‘‘ऐसी क्या बात हो गई है ?’’
‘‘अरे हर वक्त महारानी का गुस्सा उसकी नाक पर रखा रहता है। जाने इसने क्या कह दिया है उससे, सुबह से जो निकला है बिना खाये-पीये, सो अब शाम होने को आयी, जाने कहाँ भूखा-प्यासा भटक रहा होगा !’’

‘‘आ जाएगा बुआजी, आप परेशान मत होइए। उधर से ही दफ़्तर चला गया होगा।’’
‘‘अरे नहीं है, अपने दफ़्तर में नहीं है वो, मैंने फोन करके पूछा था। पता नहीं मेरा तो दिल बैठा जा रहा है, गु़स्से में आकर कहीं कुछ कर न बैठे। सुना नहीं नन्दकिशोर बाबू के बेटे ने बहू की वजह से ही अपनी जान दे दी। स्वयं मैंने देखी है यह घटना। कहीं यह भी वैसा ही कुछ कर न बैठे।’’
सुनकर एक पल को तो मेरा दिमाग़ चकरा गया, ऐसी कौन-सी भयंकर बात कह दी थी दीपा ने। अन्दर आकर दीपा से मिली तो वह अलग ही भरी बैठी थी। आँखें लाल, सूजी हुईं, लगता था रोकर उठी है। मुझे देखकर एक बार उसने अपनी आँखें पोंछ लीं। मैंने नरमी से ही पूछा, ‘‘क्या बात हो गयी दीपा ?’’
‘‘क्या होगा कोई नई बात नहीं है, इन लोगों को तो कलह का कोई-न-कोई बहाना चाहिए।’’
‘‘फिर भी क्या हुआ ?’’
‘‘यहीं के गर्ल्स इण्टर कॉलेज में संगीत की शिक्षिका की वैकेन्सी निकली थी और मैंने आवेदन कर दिया, बस इसी बात को लेकर हंगामा हो गया।’’
‘‘लेकिन क्यों ?’’
‘‘उमेश चाहते है कि मैं यह नौकरी न करूँ, इससे इनकी नाक कटती है।’’
‘‘क्या मतलब, मैं कुछ समझी नहीं। इसमें नाक कटने की कौन-सी बात हो गयी।’’
‘‘इनका कहना है कि इनके ख़ानदान में आज तक किसी औरत ने नौकरी नहीं की। मैं अगर करूँगी तो वे बिरादरी में क्या मुँह दिखाएँगे। लोग कहेंगे कि बीवी की कमाई खाता है सो इनके लिए शर्म से डूब मरने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा।’’

अजीब बात बेतुकी बात थी। मुझे भी बुरा लगा। ये लोग जाने अभी भी किस ज़माने की बातें कर रहे हैं। फिर भी उसे समझाते हुए ही बोली, ‘‘ठीक है, मैं बुआजी से कहूँगी कि वे उमेश को समझाएँ।’’
‘‘वो समझाएँगी बेटे को, हरगिज नहीं। उनके लिए तो बेटा रात को दिन कह दे तो दिन और दिन को रात कहे तो रात। बेटे के मोह ने आँखों पर पट्टी बाँध रखी है। इसके बावजूद मुझे उन पर तरस ही आता है। औरत के ज़िन्दगी की यह कैसी अजीब विडम्बना है कि जिस सन्तान को जन्म देती है, हज़ार कष्ट उठाकर पालती है, बुढ़ापे में अपनी उसी सन्तान की वजह से डरकर रहना पड़ता है। माँ बेचारी दिन-रात डरती रहती है कि बेटा कुछ कर न बैठे, घर छोड़कर चला न जाए। ऐसी डरी हुई माँ पर तरस ही खाया जा सकता है।’’
उस तनाव में भी मुझे हँसी आ गयी। ‘‘जब समझती है इन सबके स्वभाव को तो उलझती ही क्यों है ?’’ मैंने कहा तो वह बिफर उठी।
‘‘मैं उलझती हूँ ? तुम भी मुझे ही दोष दे रही हो। मैं अगर नौकरी करना चाहती हूँ तो क्या मैं ग़लत हूँ ? यह कहते हैं कि मुझे कमी किस बात की है, किसी को मेरे पैसे की गरज़ नहीं है। तुम्हीं बताओ नैना, क्या हर काम सिर्फ़ पैसे के लिए किया जाता है ?’’

‘‘नहीं, पर हो सकता है कि इन्हें ऐसा लगता हो, अपना-अपना दृष्टिकोण है।’’
‘‘लेकिन तुम तो जानती हो, संगीत मेरा एकमात्र शौक़ है, और सच कहूँ तो यह शौक़ भी नहीं है, इससे मुझे शान्ति मिलती है। अपनी इस साधना के लिए मैंने बचपन से ही क्या कुछ नहीं सहा है। यह डिग्री क्या सिर्फ़ देखने के लिए ली थी ?’’
दीपा का कहना भी सही था। मेरी कुछ समझ में नहीं आया कि उसे क्या कहकर समझाऊँ। खैर, तभी उमेश आ गया और मैंने बात वहीं ख़त्म कर दी। सबने राहत की सांस ली। दीपा के चेहरे पर तनाव भी कुछ ढीला हो गया, जैसे डूबते-डूबते बच जाने का अहसास हुआ हो।

उमेश की माँ भी कमरे में आ गयीं। दीपा से बोलीं, ‘‘चलो-चलो, उठो, खाना गरम कर दो, जाओ तुम भी खा लो।’’ दीपा को चुपचाप देखकर फिर बोलीं, ‘‘अरे अब उठो भी, बात को ख़त्म करो, किसी  बात को इतना नहीं खींचना चाहिए।’’
मैं हैरान थी। उनके इस भाव-परिवर्तन को देखकर। अभी थोड़ी देर पहले के आक्रोश का कोई चिह्न नहीं था चेहरे पर। देखकर कोई नहीं कह सकता था कि अभी थोड़ी देर पहले ही यह आग-बबूला हो रही थीं। कमाल है ! इन लोगों में आत्मविश्वास की तो कमी नहीं है। दिनभर औरत कितनी ही बातें सुनें रोये-धोये गुस्सा करे, पर अगर समय से खाना बनाकर थाली भर खा-पी ले तो सोचते हैं कि बात खत्म हो गयी मैं उठकर खड़ी हो गयी, और बोली, ‘‘चलती हूँ दीपा, मन को छोटा मत करो, हो सके तो कल समय निकालकर आना थोड़ी देर के लिए, थोड़ा मन बहल जाएगा। जाओ, तुम भी जाकर खा-पी लो’’

‘‘खाऊँगी क्यों नहीं, खाना तो पड़ेगा ही न, खाऊँगी नहीं तो काम कैसे करूँगी।’’ उसके स्वर में तल्खी अब भी बरक़रार थी।
घर लौटकर आई तो ये दफ़्तर से आ चुके थे। मुझे देखकर बोले, ‘‘उमेश के यहाँ गई थीं, बुआ जी ठीक हैं न ? आज उमेश आया था दफ्तर में ।’’
मैं बेतरह चौंक उठी, ‘‘उमेश आपके पास आया था ?’’
‘‘हाँ वही तो था सारा दिन, अपने दफ़्तर से आज उसने छुट्टी मार दी। मैंने तो अपना लंच भी उसे ही खिला दिया, जल्दी से खाना लगा दो, बड़ी भूख लगी है।’’
गुस्से से मेरा दिमाग़ गरम हो गया। लापरवाही की भी हद है। जनाब दिनभर बड़े भाई के एयरकण्डीशण्ड केबिन में आराम फ़रमाते रहे, फ़र्स्ट क्लास लंच खाय़ा और उधर घर में बूढ़ी माँ और बीवी दिनभर भूखी-प्यासी बैठी ईश्वर को याद करती रहीं। खाना लगवाना भूल-भुलाकर मैंने सारी बातें इन्हें बता दीं। सुनकर ये बोले, ‘‘अरे मुझे तो मालूम भी नहीं था कि घर से झगड़ा करके आया है, नहीं तो मैं ही फ़ोन कर देता।’’

‘‘यानि कि जनाब के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी ?’’
‘‘अरे नहीं वह तो मस्ती से बैठा कोल्डड्रिंक और काफ़ी पीता रहा। और फिर बुआ तो बेकार ही  परेशान होती हैं, जानती तो हैं वह हमेशा का ग़ैरज़िम्मेदार लड़का है, पर वह हैं कि उमेश की झूठी तकलीफ़ देखकर भी भाव-विह्नल हो जाती हैं।’’
 
 मैं जानती थी। शायद इसके लिए उमेश की माँ भी दोषी नहीं थी। उमेश उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था। पिता का साया तो उमेश के सिर से तभी उठ गया था जब साल भर का था। इसी बच्चे का मुँह देखकर उमेश की माँ ने अपने सीने पर पत्थर रख लिया था। पुत्र को उन्होंने अत्यधिक लाड़-प्यार से पाला था। पर कभी उस पर शासन नहीं कर पायी थीं। उमेश जैसे-जैसे बड़ा होता गया, लापरवाह होता गया। अपने प्रति माँ की कमजो़री वह अच्छी तरह समझता था और उसे वक़्त पर कैस करना भी  जानता था। बड़ी-से-बड़ी गलती को भी माँ हँसकर टाल देती। किसी तरह से  बी. ए. करने के बाद बड़ी दौड़-भाग कर उसके लिए एक ढंग की नौकरी का  प्रबन्ध हो पाया था और उसकी शादी भी हो गयी थी। माँ ने राहत की साँस ली थी कि बेटे का घर बस गया। किंतु मुसीबत यह थी कि दीपा से उमेश की हमेशा खटकती रहती। उमेश बात-बात में थाली छोड़कर उठ जाता, सामान उठाकर पटक देता। मामूली-सी बात पर बुरा-भला कह देता और शक्की़ तो अव्वल दरजे का था। माँ अपने बेटे की रग-रग से वाक़िफ़ थी, उसकी इन हरक़तों को सामान्य रूप से लेती किंतु दीपा ऐसे नहीं कर पाती। वैसे भी पचास साल की बुजु़र्ग-सी औरत और बाइस वर्षीय नव-विवाहिता युवती की सहनशीलता में फ़र्क़ तो होता ही है। और यही बात उमेश की माँ स्वीकार नहीं कर पातीं। उनका कहना था कि जैसे वे बेटे की बातों का बुरा नहीं मानतीं, वैसे ही दीपा को भी नहीं मानना चाहिए।

दोष शायद दीपा का भी नहीं था। बचपन से मैं देखती आयी थी कि कभी किसी की ग़लत बात मान लेना दीपा के लिए असम्भव ही था। घर की तीसरी लड़की और ऊपर से घोर कृष्ण वर्ण रंग। नाक-नक़्श अवश्य साँचे में ढले थे। किन्तु उससे क्या होता है। एक भाई और दो गोरी-चिट्टी सुन्दर-सी लड़कियों के बाद जो यह लड़की आसमान से टपक पड़ी थी उसके लिए क्या किसी ने मन्नत माँगी थी। नहीं, मन्नत तो माँगी थी एक और बेटे के लिए ताकि बेटे का जोड़ा पूरा हो सके। लेकिन वह इच्छा तो माँ-बाप की पूरी नहीं हुई, ऊपर से इस कन्या की जन्मकुण्डली ने पिता को चिन्ता में डाल दिया था, लड़की घोर मंगली थी। मंगली लड़की के लिए वर खोजना क्या हथेली पर सरसों उगाने से कम कठिन था ! सो केवल छह दिन की इस नवजात बच्ची के विवाह के बारे में सोचकर पिता की नींद हराम हो गयी थी। वैसे इस छह दिन की नवजात कन्या-रत्न को देखकर किसी को भरोसा नहीं था कि यह मात्र चार पौण्ड की लड़की सचमुच बच जाएगी
लेकिन वो कहते हैं न कि-
अन्न में मडुआ,
पक्षी में कउआ,
और औलाद में बेटी

 ये तीनों जल्दी नहीं मरते। यह कहावत दीपा को देखकर चरितार्थ होती थी। उसके लिए आया नहीं रखी गयी, गैया नहीं बाँधी गयी, हाथों-हाथ गोद में नहीं सुलायी गयी। फिर भी साल बीतते-न-बीतते एकदम गोल-मटोल-सी गुड़िया की तरह हो गयी। बड़ी बहन की पायल पहनकर उसकी रुनझुन के साथ ही वह अपने पैरों पर खड़ी हो गयी और माँ उसकी तरफ़ से पूरी तरह से निश्चिन्त हो गयी। तब तक माँ का ध्यान बँटाने के लिए दीपा से छोटा उसका नन्हा भाई पृथ्वी पर जन्म लेकर अपनी माँ की कोख को धन्य कर चुका था।
दीपा के पिता की मामूली नौकरी में घर का ख़र्च मुश्किल से ही चलता। दीपा पढ़ने में कुशाग्र बुद्धि थी, गला भी मीठा था। पूरे घर से लड़-झगड़कर ही उसने संगीत सीखा था, संगीत में ही प्रभाकर की डिग्री ली थी। जिस घर में बच्चों की स्कूल की फी़स जुटाना ही मुश्किल हो, उस घर की लड़की का संगीत सीखना किसी रईस से कम नहीं था। डिग्री लेने के बाद उसने नौकरी करने की उच्छा ज़ाहिर की तो बड़े भाई की त्योरियाँ चढ़ गयी थीं, बोले, ‘‘कोई ज़रूरत नहीं, है, बहुत कर ली मनमानी, अब घर बैठो।’’

नौकरी करने की इच्छा त्यागकर उसने रेडियो पर ऑडिशन देना चाहा तो पिता की भौंहों पर बल पड़ गये।
‘‘भले घर की लड़कियाँ ये सब काम नहीं करतीं। मैं यहाँ तेरे विवाह की फिक्र में मरा जा रहा हूँ और तुझे रेड़ियो में ऑडिशन देने की पड़ी है !’’

दोनों बड़ी बहनों का विवाह हो चुका था। सारी जमा-पूँजी ख़र्च हो चुकी थी। बड़े भाई के लिए रिश्ते आने लगे थे। वह लॉ करके किसी कम्पनी में लॉ-ऑफ़िसर हो गया था। दिल्ली में एक कामचलाऊ फ़्लैट लेकर अकेला रहता था और कई बार विवाह की इच्छा ज़ाहिर कर चुका था कि अकेले खाने-पीने की तकलीफ़ होती है। किन्तु दीपा के विवाह से पहले यह सम्भव नहीं था। पिता तीन-चार साल से भटक रहे थे, कहीं दीपा का श्यामवर्ण आड़े आता तो कहीं मंगली होना। अगर ये दोनों बातें नहीं होतीं तो पैसे की समस्या मुँह बाये खड़ी हो जाती। माँ बेटे का विवाह कर बहू लाने को उतावली हो उठीं। जब-तब अपना सर ठोंककर कहतीं, ‘‘लगता है इस जन्म में तो बहू का मुँह देखे बिना ही मरना पड़ेगा।’’

यानि कि यहाँ भी मरने की ही समस्या। घर में दीपा उन्हें कुछ नहीं कहती, वैसे उसे घर के काम से कम ही फुरसत मिलती। दोनों बहनों का विवाह हो जाने के बाद पूरे घर की रसोई बनाने की जिम्मेदारी दीपा पर थी। इसके अलावा साफ़-सफा़ई कपड़े धोना, वक़्त-बेवक़्त चाय, नाश्ता, खाना बनाने के बाद भी वह घर में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर पाने में असमर्थ थी। जैसे मंगली होना उसका अपराध हो। कभी-कभी मेरे सामने मन का गुबार निकालती, कहती, ‘‘अब अगर मेरा विवाह नहीं हो पा रहा है तो इसमें मेरा क्या क़सूर है, बताओ। हर वक़्त मुझे देखकर ये दुखी होते रहते हैं। नौकरी करना चाहती हूँ तो इनको पसन्द नहीं है। हमेशा रोक-टोक, भले घर की लड़कियाँ नहीं करतीं, भले घर की लड़कियाँ रेडियों में गाना नहीं गातीं, भले घर की लड़कियाँ घर पर भी ट्यूशन नहीं ले सकतीं तो आख़िर भले घर की लड़कियाँ करती क्या हैं ? विवाह होने तक माँ-बाप की छापी पर मूँग दलती हैं और विवाह होने के बाद आँखों पर पट्टी बाँधकर, हाथ भर का घूँघट निकालकर बनावटी आँसू बहाती हुई ससुराल चली जाती हैं, यही न !’’

 मुझे हँसी गयी, बोली, ‘‘बनावटी आँसू, लड़की की विदाई में लोग बनावटी आँसू बहाते हैं ?’’
‘‘हाँ, मुझ जैसी लड़की कि विदाई पर ऐसा ही होता है। मैं औरों की बात नहीं कर रही हूँ। सर से भारी बोझ उतर जाए तो माँ-बाप दुःखी होंगे कि छुटकारे की साँस लेंगे ? रही मेरी बात, तो मैं भी अब इस घुटन से छुटकारा ही चाहती हूँ, अपने घरवालों का दुःख अब मुझसे नहीं देखा जाता।’’
‘‘लेकिन लड़के भी तो मंगली होते हैं, उनकी क्या शादी नहीं होती ?’’
‘‘क्यों नहीं होती, लेकिन सिर्फ़ मंगली होने से क्या होगा, नियम यह है कि मंगली लड़के के ग्रह मंगली लड़की से अधिक से भारी होने चाहिए। शास्त्र यह कहता है कि लड़की के ग्रह भारी होने से लड़के की जान को ख़तरा रहता है।’’
‘‘कमाल है, लड़के के भारी ग्रह से लड़की का कोई अनिष्ट नहीं होता ?’’
‘‘नहीं होता है, अगर हो भी तो लड़कियाँ जल्दी नहीं मरती।’’ दीपा ने फिर अपनी वही बात दोहरा दी थी।
मैंने ग़ौर किया था कि बाद में यह वाक्य दीपा का तकिया कलाम बन गया था। खैर, उसी साल दीपा की शादी उमेश से तय हो गयी, पटना में उमेश के रिश्ते के ताऊ से उनका पता लेकर दीपा के माँ-बाप दीपा को लेकर आये और रिश्ता तय कर गये। पटना से सीधे आकर मेरे पास ही ठहरे, दीपा की माँ तो मुझे देखते ही उलाहना दे बैठीं, ‘‘अच्छी सखी हो तुम तो नैना धीया, तुम्हारे घर में लड़का और तुमने हमें बतायी ना ये बात !’’

कभी चाची की इस मिली-जुली भाषा को सुनकर मुझे हँसी आ जाती क्योंकि वे अक़्सर अपनी सुविधानुसार हिन्दी में कभी मगही, कभी भोजपुरी तो कभी मैथली मिलाकर बोलती थीं। किंतु उस दिन मैं उनकी बात सुनकर चौंक उठी, बोली, ‘‘ मेरे घर में लड़का ! ....कौन चाची ?’’
‘‘अरी, वही उमेश...तेरा चचेरा-फुफेरा देवर है कि नहीं ?’’
बात तो सही थी। उमेश की माँ मेरे पति की चचेरी बुआ थीं, सम्बन्ध खू़न का था काटने वाला नहीं। फिर भी मैंने बात सँभाली, कहा, ‘‘अब मुझे कहाँ मालूम था चाची, कि उमेश भी मंगली है। ’’
‘‘हाँ, जेई तो बात है, दूनू की कुण्डली मिलाकर आयी हैं हम। भला हो लड़के के ताऊ का, देवता आदमी हैं, उन्होंने यह सम्बन्ध तय कराय दिया।’’

सुनकर मुझे खुश होना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। उमेश में अभी भी बचपना अधिक था, अपनी जिम्मेदारी का कोई अहसास नहीं था। आधी तनख़्वाह तो उसकी बेवजह छुट्टी लेने की वजह से ही कट जाती थी, बाक़ी की पान-सिगरेट में भी। घर अभी भी पुस्तैनी खेती-बाड़ी की आमदनी से ही चल रहा था। ग़ुस्सैल अव्वल दरजे का था, किसी के समझाने-बुझाने का कोई असर नहीं होता था। हर बात में कहता था, ‘‘मैं किसी से नहीं डरता, जायज बात मुँह पर कहता हूँ। किसी को अच्छा लगे या बुरा, मेरी बला से।’’
किंतु चाची से मैं यह सब नहीं कह पायी। वह आख़िरी बेटी का रिश्ता कमाऊ लड़के से हो जाने की वजह से तृप्त थीं। हाँ, मौका देखकर मैंने एकान्त में यह बत दीपा से जरूर कही, ‘‘वैसे उमेश दिल का बुरा नहीं है, इकलौता है न, थोड़ा ज़िद्दी हो गया है। पर शादी के बाद ठीक हो जाएगा।’’
मैंने दीपा से स्पष्ट कर देना ही ठीक समझा, नहीं तो बाद में मुझे ही दोष दोती कि तुमने जानबूझकर सारी बातें छुपा लीं। किंतु मेरी बात सुनकर वह बिना कोई उत्सुकता दिखाए ही बोली, ‘‘न भी ठीक हुआ तो क्या फ़र्क पड़ता है, मुझ जैसी मंगली लड़की का उद्धार कर रहा है, यह क्या कम है।’’

मुझे बड़ा अटपटा लगा, दीपा में अपने विवाह को लेकर कोई उत्साह नहीं था। मैंने पूछ लिया, ‘‘क्यों दीपा, तुम खुश नहीं हो। चाची बता रही थीं कि उन्होंने उसकी सारी माँगें मान ली हैं, नक़द भी दिया है शायद।’’
‘‘अच्छा तो है, बिना ख़र्चा किये सन्तोष भी तो नहीं होता। बिरादरी में नाम कैसे होता कि बेटी के ब्याह में दिल खोलकर ख़र्चा किया है।’’
‘‘अरी क्या कह रही है, इन्होंने ये सब अपने नाम के लिए किया है, तुम्हारी खुशी के लिए नहीं ?’’
‘‘मेरी खुशी जिस तिश्ते में थी वह इन्हें स्वीकार नहीं था।’’
कौन-सा रिश्ता ?’’
‘‘आया था, एक छोटी चाची लेकर आई थीं, उनके मायके का था। लड़का अच्छा-ख़ासा बैंक में नौकरी करता था, और उन लोगों की दहेज की भी कोई माँग भी नहीं थी।’’
‘‘फिर ’’

‘‘तुम तो जानती हो कि मेरी माँ की अपनी किसी भी देवरानी और जिठानी से कभी नहीं पटी। और छोटी को लेकर तो वह हमेशा ही व्यर्थ के कॉम्प्लैक्स से ग्रस्त रहती थीं, उनकी कोई भी बात उन्हें पसन्द नहीं आती थी। उनका रहन-सहन उनका सलीका, उनकी पढाई-लिखाई, हर चीज़ की वे आलोचना ही करती रहती थीं। फिर उनके द्वारा लाये गये रिश्ते को वे क्यों महत्त्व देतीं ? ऊपर से किसी शुभचिन्तक ने उन्हें यह भी खबर दे दी कि लड़के की दादी किसी ज़माने में मेरी नानी के घर उपले पाथती थीं। बस, फिर क्या था, मेरी माँजी अड़ गयीं कि ‘मैं मर जाऊँगी पर उपले पाथनेवाली के पोते से अपनी बेटी नहीं ब्याहूँगी।’ छोटी चाची अपना-सा मुँह लेकर चली गयीं और मेरी माँ भी मरने से बच गयीं।’’
सुनकर मुझे अजीब लगा कब-जाने कौन किसी ज़माने में तो लड़के की दादी उपले पाथती थीं,  इसलिए लड़के के पिता के शिक्षक होने पर स्वयं लड़के के पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित नौकरी पाने के बावजूद वे दीपा के उच्च खानदान में रिश्ता करने योग्य नहीं थे क्योंकि दीपा के ख़ानदान की सात पीढ़ियों में किसी ने चोरी भले ही की हो पर उपले नहीं पाथे थे। फिर भी मैंने दीपा से पूछ लिया, ‘‘तुम्हारे पिता और भाई क्या राय थी ?’’

‘‘पिता की अपनी स्वतन्त्र राय होती ही कब है, वे वही कहते हैं जो माँ चाहती है, नहीं तो घर में भूख-हड़ताल हो जाती है। और भाई ने तो दो क़दम आगे बढ़कर यहाँ तक कह दिया कि ‘आज के ज़माने में बिना दहेज शादी कौन करता है, ज़रूर लड़के में कोई खोट होगा।’ जबकि बात ऐसी नहीं थी चाची के मायके वाले निहायत ही सज्जन और खुले दिमाग़ के हैं इसलिए वे बिना शर्त अपनी बेटी की ससुराल में रिश्ता करने को राज़ी हो गये थे। किंतु मेरी वजह से बेचारी चाची को भी शर्मिन्दा होना पड़ा ?’’
‘‘क्यों ? शर्मिन्दा क्यों होना पड़ा ?’’

‘‘मेरी माँ ने दो टूक कह दिया कि, ‘‘नहीं करनी हमें ऐसे घर में बेटी की शादी, हमें तुम्हारी मदद भी नहीं चाहिए, बड़ी दोनों लड़कियों की तरह इसकी शादी में तुम पैसे मत दो किसी तरह से क़र्ज-वर्ज लेकर हम व्यवस्था कर लेंगे।’ सुनकर बेचारी चाची का मुँह लटक गया मेरे घरवालों ने उनके द्वारा लाया गया रिश्ता तो लौटा ही दिया, आज तक उनके द्वारा की गयी हर मदद पर भी पानी फेर दिया।’’
सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि दीपा के घरवाले इसी क़िस्म के इन्सान थे जो अपने हर रिश्तेदार से मदद लेते तो हक़ के साथ और उसके बाद यह कहकर एहसान भी जताते कि ‘फलाँ काम तो वैसे भी  हो जाता, अगर आप नहीं करते तो भी किसी-न-किसी तरह से हम भी तो कर ही लेते। किसी के बिना कोई काम रुका थोड़े ही रहता है। और फिर मेरे बच्चों की जिम्मेदारी क्या आपकी नहीं है ?’’

    
         

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