मायापुरी - शिवानी Mayapuri - Hindi book by - Shivani
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स्त्री-पुरुष संबंध >> मायापुरी

मायापुरी

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3738
आईएसबीएन :81-8361-071-4

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स्त्री-पुरुष के चिरन्तन आकर्षण की मरीचिकामय मायापुरी....

Mayapuri

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


लखनऊ की मायापुरी और उसमें पालतू बिल्ली-सी घुरघुराती नरमायी लिए प्रतिवेशी प्रवासी परिवार में पहाड़ के सुदूर ग्रामीण अंचल से आई शर्मीली सुन्दरी शोभा का आना बड़े उत्साह का कारण बना, विशेषकर घर की बेटी मंजरी के लिए। पर पिता के बाल्यकालीन मित्र के उस परिवार में घर के बेटे सतीश के विदेश से लौटने पर लहरें उठने लगीं। शोभा और सतीश, अविनाश और मंजरी, युवा जोड़ों के बीच आकर्षण-विकर्षण की रोचक घुमेरियों से भरी मायापुरी की कहानी में नकचढ़ी मंत्री दुहिता एक झंझा की तरह प्रवेश करती है, और देखते-देखते सतीश उसकी दुनिया का भाग बनने लगता है। पर क्या नेह-छोह के बन्धन सहज टूटते हैं नैनीताल वापस लौटी शोभा के जीवन को रुक्की, रामी, रानी साहिबा और उनके रहस्यमय जीवन की परछाइयाँ कैसे घेरने लगती हैं।

स्त्री-पुरुष के चिरन्तन आकर्षण की मरीचिकामय मायापुरी तथा जीवन की कठोर वास्तविकता के टकराव से भरा यह उपन्यास आज भी अपनी अलग पहचान रखता है।

मायापुरी

श्रावण की वर्षा से पहाड़ के मकानों की छतें धुलकर चमक रही थीं। पेड़ों के बीच से झाँकती गोल-गोलाकार सर्पिणी-सी पगडंडियाँ लोगों के चलने से मुखर हो उठीं। ग्राम के बालक हाथ में लकड़ी की पाटियाँ और दावात में सफेद घोली खड़िया लेकर स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे। देवीदत्त का प्रांगण भी बाल-कल-कंठ से मुखरित हो उठा : ‘दीदी, मेरी चोटी बाँध दो’, ‘दीदी, बासी रोटियों का कटोरदान निकालो न जल्दी से’, ‘मेरी टोपी कहाँ है ?-हाय, अब मैं नंगे सिर स्कूल कैसे जाऊँगा ?’ पहाड के स्कूल में नंगे सिर जाने का अर्थ हो होता अध्यापक द्वारा कठोर चपेटघात और कर्णमर्दन।

तीनों भाइयों से अकेली निकटती शान्त शोभा भी धैर्य खो बैठती : ‘मर क्यों नहीं जाते तीनों छोकरे, देखते नहीं हो चाय बना रही हूँ !’ वह झुँझलाकर कहती। दीदी की एक डाट से तीनों थोड़ी देर के लिए सहमकर चुप हो जाते और अपने हिस्से की चाय कलई के गिलास में घुटकने लगते। शोभा ने कटोरदान से रोटियाँ निकाल गुड़ की डली रख भाइयों को दे दी; फिर कपड़ों की गठरी लेकर आँगन में धोने चली गई। तीनों भाई कोट की बाँहों से मुँह पोंछते हुए स्कूल को चले गए और क्षण-भर पहले का कोलाहल एकाएक शान्त हो गया।

शोभा ने माँ की मोटी धोती धोकर धूप में डाल दी। आज माँ खेत से देर में आएगी और फिर तभी उसे स्मरण हो आया, आज माँ का एकादशी का व्रत भी तो है। तीन-चार दाने आलू के उसने छिपी आग में भूँजने को डाल दिए और उधड़े ऊन का मोजा बुनने बैठ गई।
शोभा के पिता की मृत्यु को डेढ़ वर्ष बीत चुका था। वे लखनऊ सेक्रेटेरियट में क्लर्क थे और वर्षों से वहीं एक किराए के छोटे-से मकान में परिवार सहित रहते थे। कई वर्षों के प्रवास से बच्चे अपनी भाषा प्राय: भूल चुके थे। शोभा बी.ए. कर चुकी थी, दो पुत्र स्कूल जाते थे। गृहस्थी की गाड़ी मन्द-मंथर गति से चल रही थी। एक दिन जब लखनऊ आग उगल रहा था, ऑफिस से साइकिल पर घर लौटते क्षीणकाय देवीदत्त लू की लपेट में आ गए और कुछ ही क्षणों में विधवा पत्नी और चार बच्चों को बिलखता छोड़कर चल बसे। बार-बार विलाप करती, पिता के मृत शरीर पर पछाड़े खाती माता को और तीन बिलबिलाते अबोध भाइयों को देखकर शोभा की आँखों के आँसू आँखों में ही सूख गए। पास-पड़ोस के पर्वतीय समाज ने किसी तरह चन्दा करके संतप्त परिवार को पहाड़ भेज दिया। विधवा का कोई अवलम्ब न होने पर भी गाँव में अपनी जमीन थी, बाप-दादों का बनाया छोटा-सा एक घर भी था। पहाड़ी गाँव के लोगों ने बड़े प्रेम से प्रवासी परिवार को अपना लिया।

शोभी की माँ अत्यन्त निरीह स्वभाव की थी। धीरे-धीरे उसने गहने बेचकर एक जोड़ी बैल खरीद लिए और वर्षों से बंजर जमीन को जोतकर ठीक बना लिया। तीनों लड़के स्कूल जाने लगे किन्तु विवाह योग्य शोभा उसके हृदय में शूल समान पीड़ा देती, उसके कोमल कुम्हलाए मुख को देखकर उसे बड़ा दुख होता। एकमात्र कन्या को देवीदत्त ने सर्वदा अच्छी संस्थाओं में पढ़ाया था। कुशाग्र बुद्धि की शोभा ने जब अठारह वर्ष में ही बी.ए. कर लिया तो वे बोले, ‘‘देखना दुर्गा, किसी दिन यह मेरा ही नहीं, पूरे कुल का नाम रौशन करेगी।’’ दुर्गा ने कई बार कहा कि अब तो आप उसके लिए कोई लड़का देखिए पर वे कहते, ‘‘शोभा एम.ए. करेगी, अभी क्या शादी, अभी तो बच्ची है।’’ इसी तरह विवाह योग्य बच्ची को स्वयंवरा रूप में ही विधवा पत्नी पर छोड़े वे जब चल बसे तो दुर्गा पागल-सी हो गई। वह जानती थी कि एम.ए. न करने से पुत्री के हृदय में मन ही मन एक संघर्ष चल रहा है। वह दिन-रात खेत के काम में जुटी रहती, ग्राम की बड़ी-बूढ़ियाँ तक कभी-कभी कहतीं, ‘‘दुलहिन, अब इसके हाथ पीले कर दो, इतना पढ़ा-लिखाकर क्या लड़की से हल भी जुतवाओगी ?’’

शोभा के रूप और गुणों की प्रशंसा सुनकर आसपास के ग्रामों से कई संबंध भी आए। एक हवलदार था, खूब ज़मीन थी, पक्का मकान और एक दुकान भी थी, किन्तु मिडिल पास था। एक उन्हीं के गाँव से संबंध आया, लड़का दुहेलू था पर पढ़ा-लिखा था और ग्राम की पाठशाला में अध्यापक भी। पहली पत्नी एक ही वर्ष पूर्व मर चुकी थी, एक दो वर्ष का लड़का था। शोभा की माँ को गाँव की औरतों ने बहुत समझाया, ‘‘ऐसा पढ़ा-लिखा लड़का अब और नहीं मिलेगा, वह तीस ही वर्ष का तो है।’’ ‘‘नहीं बहिन।’’ शोभा की माँ कहती, ‘‘सौतेली सन्तान पालना और हथेली का मांस खाना बराबर है। आँखों पर पट्टी बाँधकर कैसे लड़की कुएँ में धकेल दूँ। प्राण देकर भी वह लड़का पालेगी तो भी सौतेली माँ ही कहलाएगी। न-न, मुझसे नहीं होगा यह, मेरी शोभा को उसके बाप पढ़ा गए हैं, कहीं न कहीं पेट भर ही लेगी।’’ इसके बाद शोभा के विवाह का प्रसंग एक प्रकार से दब ही-सा गया।

एक दिन शोभा और माँ खेत से धान देखकर लौटीं तो देखा, आँगन में एक नीला लिफाफा पड़ा है। शोभा ने बड़ी उत्सुकता से लपककर लिफाफा उठा लिया, क्या जाने उसकी सहेली सरला का हो या उसकी अध्यापिका मिस देव का। किन्तु लिफाफा खोलते ही उसे बड़ी निराशा हुई। पत्र गोदावरी मौसी का था। गोदावरी उसकी माँ की बचपन की सहेली है। दोनों का मायका एक ही ग्राम में है। गोदावरी का विवाह एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ, उसके पति इंजीनियर हैं; दुर्गा का भी विवाह एक उच्च कुलोत्पन्न ब्राह्मण पुत्र से ही हुआ, पर पति क्लर्क थे। वर्षों से दोनों सखियाँ मिल भी न पाई थीं पर जब दुर्गा पर पति की मृत्यु का वज्रपात हुआ तब उससे पहले गोदावरी ने ही सखी की सुध ली थी। आज भी उसने यही लिखा है कि शोभा ने लखनऊ से बी.ए. किया था और अब वे लोग भी अपने लखनऊ के नए मकान में रहने आ गए हैं, शोभा यदि उनके पास ही रहकर पढ़ ले तो उन्हें बड़ा संतोष होगा। गोदावरी के स्नेहमय निमन्त्रण को पाकर दुर्गा गद्गगद हो गई, बोली, ‘‘शोभा बेटी, तू आज ही एक कार्ड मँगवाकर लिख दो कि तू शीघ्र ही पहुँच रही है। आहा, बेचारी तुझे पलकों में बिठाकर रखेगी, जैसा ही धन दिया है ईश्वर ने, वैसा ही दिल भी दिया है !’’

गोदावरी के पति इंजीनियर थे, पर ईमान के पक्के । कभी हराम का पैसा नहीं छुआ। उनके नीचे के ओवरसियर कार में घूमते; वे अपनी बग्घी में ही संतुष्ट थे। सीधा-साधा वेश, कभी जूते में फीता है, कभी नहीं; घंटों संध्या-पूजन में डूबे रहते। दो बच्चे हैं-एक लड़का सतीश और एक लड़की मंजरी। लड़के की सगाई होने के पश्चात् सीधे-सादे जनार्दन न जाने कब एकाएक महिमामय हो उठे। वे बाज़ार से होकर जाते तो अँगुलियाँ उठने लगतीं : ‘यही हैं तिवारी जी के समधी। सुना है, तिवारी जी ने भावी जामाता को अपने ही खर्च से विलायत भेजा है और फैजाबाद रोड पर आलीशान हवेली खड़ी करवा दी है।’’ बात कहाँ तक सत्य थी, कहना कठिन था, किन्तु हवेली वास्तव में आलीशान है और सतीश डॉक्टरी पढ़ने के पश्चात् एडिनबरा में एम.डी. कर रहा है।

गोदावरी ने शोभा के मार्ग के खर्चे के लिए रुपए भी भेज दिए थे पर शोभा मन ही मन उदास हो उठी। वह सोचने लगी, वह जाएगी भी तो क्या लेकर ? एक काली मराठी साड़ी, वह भी चार वर्ष पूर्व पिता ने ले दी थी; उसका रंग अब काले से उतरकर फीका नीला हो चला है। एक सरला की दी हुई नारंगी चँदेरी, जिसे बड़े यत्न से उसने दो नेफ्थिलीन की गोलियों से सुवासित कर, टीन के बक्स में रख छोड़ा है। एक-दो अति साधारण इकलाई धोतियाँ। मौसी के यहाँ वह एक बार बहुत पहले जा चुकी थी। मौसी की लड़की मंजरी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ती थी। उसने उसे अपने ढेर से खिलौने खेलने को दिए। मौसी ने कई नई फ्राकें सिलवा दीं और उसके घुँघराले बालों को रीठे से धोकर उसमें चोटी बना काला रेशमी फीता भी बाँध दिया पर वह एक ही दिन में घर आने को व्याकुल हो उठी। मौसी के वैभव में उसे अपना दारिद्र्य शत-सहस्त्र डंक-सा दे उठा था और वह तीसरे ही दिन लौट आई थी।

किन्तु अब माँ के बार-बार कहने से उसने अपने जाने का निश्चय स्थिर कर लिया। माँ ठीक ही तो कह रही हैं, मौसी के पास रहकर वह अपनी शिक्षा का अधूरा स्वप्न पूरा कर सकेगी, उनकी दिन-रात सेवा करके वह मूल्य चुका देगी। एक छोटे-से बक्स में उसने अपनी तीन-चार धोतियाँ रख लीं, एक गद्दा, एक पहाड़ी थुल्मा और घर की एकमात्र चादर धोकर उसके बिस्तरबन्द में बाँध दी गई। तीनों भाइयों ने मिलकर बक्स उठा लिया और रमिया दुकानदार बिस्तर उठाकर साथ में चला।
मोटर स्टैंड पर तीनों भाइयों के साथ खड़ी माँ का उदास मुहँ देखकर शोभा की आँखें
भर आईं, वह बोली, ‘‘अम्माँ, न जाने क्यों मेरा मन कह रहा है, उतर जा। तुम अकेली क्या कर लोगी ?’’
दुर्गा बोली, ‘‘देख तो, रमिया, इसका पागलपन ! इतनी बड़ी हो गई है और अभी भी मुझे छोड़कर कहीं जाने में यह हाल है ! अरे पगली, मन न लगे लौट आना। पर शहर में रहने वाली लड़की का इस गाँव में क्या हमेशा मन लग सकता है ? फिर इतने प्रेम से बुलाया है, कोई तू बिना बुलाए थोड़े ही जा रही है।’’
रमिया दुकानदार शोभा के पिता का सहपाठी रह चुका था, शोभा से बोला, ‘‘ठीक ही तो कह रही हैं भाभी। शोभा, तू पढ़ी-लिखी है, और पढ़ लोगी तो भाइयों को सँभाल लेगी, इस गाँव में क्या खाक-पत्थर पढ़ाएँगी भाभी।’’ शोभा चुप हो गई।

तीनों भाई बस चलने की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे; उसी सुखद प्रतीक्षा में वे बहिन के जाने का दु:ख भूल-सा गए। केवल सबसे छोटा मिट्ठू गोल-गोल आँखों से दीदी को देख रहा था। अब कौन उसकी चोटी करेगी, दोनों बड़े भाई तो अपने हाथों से भी चोटी कर लेते हैं। अम्माँ कंघा खींच-खींचकर बड़ा दर्द करती है। दीदी मुलायम हाथों से कहानी कहते-कहते उसका एक-एक बाल सुलझा देती है, जनेऊ होने तक वह बाल कटवा भी तो नहीं सकता और दीदी के लौट आने तक क्या जनेऊ हो जाएगा ?

मोटर में घर्र-घर्र आरम्भ हुई। मिट्ठू को दोनों भाइयों का उछलना-कूदना ज़रा-सा भी अच्छा नहीं लग रहा था, उसके पेट में अजब घुटन-सी हो रही है और गले में कुछ अटका-सा रहा है। इतने में ही दीदी बोली, ‘‘अम्माँ का कहना मानना मिट्ठू !’’ तो मिट्ठू अपने को रोक न सका, ‘‘दीदी री, ओ दीदी, मैं भी चलूँगा’’, कहके चलती बस के पीछे दौड़ने लगा। बस पेट्रोल का बादल उड़ाती चली गई, रमिया ने दौड़कर मिट्ठू को पकड़ लिया, दुर्गा ने आँखें पोंछकर उसे गोदी में उठा लिया, बोली, ‘‘बेटा, दीदी लखनऊ गई है, तेरे लिए अच्छा-सा बस्ता लाएगी, अच्छी-अच्छी चीजें लाएगी।’’
आँखों में आँसू आँखों में ही पीकर मिट्ठू बोला, ‘‘तो मेरे बाल कटवा दो।’’ दीदी के जाने के साथ बाल कटवाने का क्या संबंध है, माँ समझ न पाई, बोली, ‘‘छि:छि: ! जो जनेऊ के पहले बाल कटवाता है, वह अगले जन्म में लड़की बनता है !’’ लड़की बनने के भय से सहमकर मिट्ठू ने माँ के कन्धे में मुँह छिपा लिया।

 
 

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