चल खुसरो घर आपने (सजिल्द) - शिवानी Chal Khusro Ghar Aapne (hard cover) - Hindi book by - Shivani
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चल खुसरो घर आपने (सजिल्द)

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :131
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3751
आईएसबीएन :9788183612876

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अन्य सभी उपन्यासों की भाँति शिवानी का यह उपन्यास भी पाठक को मंत्र-मुग्ध कर देने में समर्थ है

Chal Khusro Ghar Aapne a hindi book by Shivani - चल खुसरो घर आपने - शिवानी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

...‘कैसी विचित्र पुतलियाँ लग रही थीं मालती की। जैसे दगदगाती हीरे की दो कनियाँ हों, बार-बार वह अपनी पतली जिह्वा को अपने रक्तवर्णी अधरों पर फेर रही थी, यह तो नित्य की सौम्य-शान्त स्वामिनी नहीं, जैसे भयंकर अग्निशिखा लपटें ले रही थीं...।’ यह कहानी है कुमुद की, जिसे बिगड़ैल भाई-बहनों और आर्थिक, पारिवारिक परिस्थितियों ने सुदूर बंगाल जाकर एक राजासाहब की मानसिक रूप से बीमार पत्नी की परिचर्या का दुरूह भार थमा दिया है।

मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों का मनोसंसार, निम्नमध्यवर्गीय परिवार की कमासुत अनब्याही बेटी और उसकी ग्लानि से दबी जाती माँ का मनोविज्ञान, ‘शिवानी’ के पारस स्पर्श से समृद्ध होकर इस उपन्यास को एक अद्भुत नाटकीय कलेवर और पठनीयता देते हैं।

शिवानी का ‘विवर्त्त’ मानव जीवन की रहस्यमयता का एक विलक्षण पहलू प्रस्तुत करता है। चरित्र-नायिका ललिता गरीब माता-पिता की सात पुत्रियों में सबसे छोटी होने पर भी स्वतंत्र-मेधा और तेजस्विनी है और डबल एम.ए. करके हेडमिस्ट्रेस बन जाती है। वह विवाह नहीं करना चाहती और आने वाले सभी रिश्तों को ठुकरा देती है परन्तु प्रारब्ध उसके साथ ऐसा खेल खेलता है कि वह स्तब्ध रह जाती है।
अपने अन्य सभी उपन्यासों की भाँति शिवानी का यह उपन्यास भी पाठक को मंत्र-मुग्ध कर देने में समर्थ है।

चल खुसरो घर आपने

अपना सूटकेस हाथ में लटकाए ही वह उतर गई। एक क्षण को, उस बियाबान स्टेशन का सन्नाटा, उसे सहमा गया था। यदि, कोई उसे लेने आया तब ? क्या करेगी वह ? एक लुंगीधारी काला कदर्य व्यक्ति, उसे घूरे जा रहा था। अचानक, अम्मा के सरल घबराए चेहरे की स्मृति, उसे विकल कर उठी ! कितनी बार अम्मा, उसे समझा-बुझाकर हार गई थी: ‘मुझे तेरा उतनी दूर जाना, जरा भी अच्छा नहीं लग रहा है कुमू : चार दिन रूक जाती तो मैं बड़े भैया को बुला लेती, तुझे पहुँचा भी आते और देख भी आते कि कैसे लोग हैं। और फिर, तेरी यहां की नौकरी कौन बुरी है ? अखबारी विज्ञापन का क्या ठिकाना ? अभी कहते हैं इतनी तनख्याह देंगे, जब न दें तू अकेली उस अनजान शहर में क्या कर लेगी ?’

किन्तु, कुमुद को उस शहर का एक-एक पल जैसे काट खाने को दौड़ रहा था। धर्मभीरू अम्मा का, छोटी बहन उमा का, जिसे उसने कुछ ही दिन पहले मार-मार कर बेदम कर दिया था, और छोटे उद्दण्ड भाई लालू का सान्निध्य, अब वह जैसे एक पल भी सह नहीं पा रही थी। उसने यह निश्चय बहुत सोच-विचार कर ही किया था, प्रत्येक संभावना को उसने रात-दिन जागकर अपने विवेक की तुला से तौल कर ही इतनी दूर आने का फैसला किया था। वह कुछ दिन और लखनऊ रह जाती तो निश्चय ही मनासिक संतुलन खो बैठती। उमा ने क्या उसे कहीं मुँह दिखाने लायक रखा था ? उसे लगने लगा था कि भाई, बहन, माँ प्रतिवेशी सब उसके दुश्मन बने – भाला लिये उसकी और दौड़े चले आ रहे थे। सहसा उस बीहड़-से स्टेशन में खड़ी कुमुद का दृदय, एक अज्ञात आशंका से काँप उठा। अम्मा ने ठीक ही कहा था, ऐसे उन अनजान शहर में उसका बिना किसी के कुछ पूछे केवल एक पत्र का सूत्र पकड़ चले आना, बचपना मात्र था। वह एक बार फिर, इधर-उधर देखने लगी, तार तो उसने भेज दिया था, तब भी क्या कोई उसे लेने नहीं आया ?

‘‘मिस साहब !’’ वही लुंगीधारी सहसा उसकी ओर बढ़ आया- ‘‘माफ करें सरकार, आप लखनऊ से तो नहीं आई ?’’
‘‘हाँ क्यों ?’’ कुमुद ने कुछ सहमकर ही उसे सन्दिग्ध दृष्टि से देखा।
‘‘साहब ने हमें लेने भेजा है, खुद आ रहे थे, पर रानी साहिबा की तबीयत खराब हो गई, कहने लगे- नूरबक्श तुम्हीं चले जाओं। लाइए हुजूर, सूटकेस मुझे दीजिए।’’
बड़ी सधी नम्रता से उसने, उसके हाथ से सूटकेस ले लिया और आगे-आगे चलने लगा। अपनी बड़ी-बड़ी सहमी आँखों से इधर-उधर देखती कुमुद, उसके पीछे-पीछे चली जा रही थी। एक-एक पैर, जैसे बीस-बीस सेर का हुआ जा रहा था; यदि यह कोई गुंडा हुआ तब ? यदि, साहब का भेजा गया आदमी था, तो पहले दूर ही खड़ा-खड़ा, उतनी देर से उसे क्यों घूरे जा रहा था ? पहले ही क्यों न लपड़ आया ? इतनी देर तक, वह क्या कोई कुटिल योजना बना रहा था ? उसे पहचानने में उसे इतना समय क्यों लग गया ? उस छोटे से स्टेशन पर, उस ट्रेन से उतरने वाली वही तो एकमात्र सभ्य महिला थी, जो दो-तीन बक्से-बुक्से लेकर उतरी भी थीं, बाकी सब भुच्च देहातिनें थी। खैर, बाहर चलकर देख लेगी, यदि कार आई होगी तो संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता था, यदि गुंडा ही होता तो कैसे जान लेता कि इस ट्रेन से वही उतरेगी ?

स्टेशन का बहिरंग उसे और भी उजड़ा वीरान लगा, एक लाइन में खड़े कुछ मरियल से घोड़े—जुते इक्के, फर्श पर पसरे यात्री, बुर्काधारिणी पच्च-पच्च पान थूकती महिलाएँ, रिरियाते बच्चे। दुर्गन्ध के तीव्र भभके के बीच से, तीर सी निकल बाहर आई तो तो जैसे जान में जान आई।
‘‘आइए सरकार, आप बैठें, मैं सूटकेस पीछे रख दूँ,’’ उसने कार का द्वार खोला, रेशमी लेस लगे पर्दों में सँवरी, उस फिएट को देख, कुमुद आश्वस्त होकर बैठ गई। ‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’ कार नम्बर उसने मन-ही-मन नोट कर लिया था, चालक का नाम भी उसे जान लेना चाहिए, वह बड़ी देर से यही सोचकर भी संकोचवश नाम नहीं पूछ पा रही थी।
‘‘जी, नूरबक्श कहते हैं खादिम को !’’
‘‘नूरबक्श, यहाँ से कितना दूर अभी और आना होगा ?’’

दिन ढल चुका था, उसे उजाड़ कस्बे की वीरानी भी जैसे पुरवैया झोंके के साथ-साथ, उससे लिपटती जा रही थी। उस भयावह चेहरे के चालक के साथ, उसे अकेली जाने में, एक बार फिर अजीब भय की सुरसुरी उसके सर्वांग को सिहरा गई।
‘‘यही कोई दस किलोमीटर होगी साहब की कोठी-बस ये चले और ये पहुँचे !’’
‘‘हे राम, दस किलोमीटर !’’ कोई अजनबी भी उस पल, कुमुद से कार चलने से पूर्व, वहीं उतर लखनऊ चलने का प्रयास रखता तो वह शायद, तत्काल वहीं उतर पड़ती। यह कैसी मूर्खता कर बैठी थी, वह ! क्या आए दिन, अखबारों में वह ऐसी घटनाएँ नहीं पढ़ चुकी थी ?

‘‘चले हुजूर ?’’ सहसा उस रहस्यमय विनम्र चालक ने पूछा तो वह चौंक पड़ी-
‘‘चलो !’’ और कुमुद ने निढाल होकर सीट पर पीठ साध ली। जब ओखली में सर दे ही दिया, तो मूसली से कैसा डर !
पिछले पन्द्रह दिनों के कटु अनुभवों ने उसे बुरी तरह तोड़कर रख दिया था। उद्दण्ड भाई की अबाध्यता, छोटी बहन का निर्लज्ज आचरण, निरीह अम्मा की विवशता- किसी को भी वह क्षमा नहीं कर पा रही थी। यह सब न हुआ होता तो वह शायद लखनऊ कभी न छोड़ती।

उस अन्धकारमयी निर्जन सड़क पर, तेजी से भागी जा रही कार में बैठी कुमुद की आँखें छलछला आईं। उसके बिना अम्मा कितनी असहाय हो उठेगी ! कौन उसका राशन लाकर धरेगा, मकान का किराया, बिजली का बिल, पिती की पेंशन, उसका सब काम कौन करेगा ! अम्मा ने दबी जबान से यह सब उससे कहा भी था- ‘‘कुमुद, मैं जानती हूँ तू हम से रूठ कर जा रही है, पर हमारा क्या होगा, यह भी तूने सोचा है ? मैं जानती हूँ कि अभागों ने तेरी ही थाली में खाकर, उसी में छेद किया है, पर तू यह भी जानती है कि तू चली गई तो वे दोनों मुझे लट्टू-सा नचाएँगे। कोई भी अच्छा लड़का मिलता तो मैं, इस कुलबोरनी को तो विदा कर देती, पर...’’ फिर अम्मा, स्वयं ही अपने अज्ञानवश मुँह से निकल गई, उस अस्वाभाविक कामना के लिए खिसिया कर कहने लगी थी- ‘‘...पर मैं, क्या कभी ऐसा होने दूँगी ! भले ही लाख अच्छे रिश्ते मिलें, वही होगा, जो हमारे कुल में सदा होता आया है। घर की बड़ी लड़की पहले विदा होगी, तब छोटी....’’

‘‘बस भी करो अम्मा !’’ उसने झुँझलाकर कहा था- ‘‘मैंने तुमसे कह दिया है, तुम्हें मेरी चिन्ता नहीं करनी होगी। मैं तुम्हें हर महीने पूरी तनख्याह भेज दिया करूँगी, तुम्हारे छोटे-मोटे काम, मेरे कालेज का चपरासी बनवारी आकर निबटा जाएगा। मैंने समझा दिया है, बीच-बीच में उसके हाथ में दस-बीस रपये रखती रहना। वैसे भी तुम्हें बहुत मानता है। रही उमा और लालू की चिन्ता। दोनों को मैंने कड़ा सबक कंठस्थ करा दिया है। नहीं समझे तो खुद भुगतेंगे। इस बीच तुम मामा से कहकर उमा के लिए अच्छा लड़का ढूढती रहना। इतनी अच्छी तनख्याह मैं नहीं छोड़ सकती, उस पर खाना-पीना, रहना सब कुछ उन्हीं के मत्थे। मैं थोड़ा-बहुत हाथ-खर्च रख, पूरी तनख्याह तुम्हें भेज सकती हूँ।’’

ठीक ही तो कहा था उसने, यहाँ कालेज से उसे मिलते थे कुल पाँच सौ, उसमें से भी कुछ आने-जाने में निकल जाते, कुछ उमा-लालू की फीस में, दो ट्यूशनों से लगभग तीन सौ और कमा लेती थी, तीन सौ बाबूजी की पेंशन के मिलते थे। बड़े कष्ट से ही वह गृहस्थी की गाड़ी खींच रही थी, इसी से बारह सौ के वेतन का चुग्गा, उसे उस अज्ञात कस्बे में, इतनी दूर खींच लाया। अब नित्य यह तो नहीं सुनना होगा कि कुमुद, आज गेहूँ लाना है, चावल भी खत्म है। कालेज से लौटेगी तो चाय का बंडल लेते आना, चीनी आई या नहीं ? आधा महीना बीत गया और अभी तक छटाँक पर चीनी भी नहीं मिली। बाजार से, आठ रुपये किलो चीनी मँगा रही हूँ ! इन सब, एक-सौ बीस अप्रिय आदेशों से तो छुट्टी मिली !
‘‘मिस साहब, लीजिए हम ठीक पन्द्रह मिनट में ही पहुँच गए,’’ कार का द्वार खोल, नूरबक्श ने हाथ की घड़ी देखकर कहा।
कुमुद ने चौंककर देखा, बड़ी-सी हवेली की पोर्टिको में आकर कार रुक भी गई और वह अपने सोच-विचार में ही उलझी रह गई।
‘‘आप आइए, मैं सामान फिर उतार लूँगा।’’

वह उतककर, उसके पीछे-पीछे चलती दीवानखाने में पहुँची। बाहर से जीर्ण दिख रही उन पांडुवर्णी हवेली की अन्तरंग सज्जा, इतनी मनोहरी होगी, उसने कल्पना भी नहीं की थी। बड़े-बड़े झाड़-फानूस, दीवारों पर टँगी निष्प्राण चीते-भालू की खालें, बारहसिंगे के बार्निश से चमकते श्रृंग, काँच की निर्जीव आँखें, पोतल के विराट चमकते नगाड़े-से फूलदान, शीशम की कुर्सियों पर रेशमी गद्दियाँ, चारों ओर पीढ़ियों के आभिजात्य के स्पष्ट हस्ताक्षर, कुमुद को गहनतम हीनता के गह्वर में डुबो गए। यह कहाँ आ गई थी वह ? इस गुदगुदे कालीन की पशमी गहराई में अपनी चप्पलें किस दु:साहस से वह रख पाएगी ! सहसा अपनी गुजीमुजी वायल की साड़ी, उसे काँटे-सी चुभने लगी। कैसी मूर्ख थी वह ? क्या यही साड़ी रह गई थी पहनने को ! अपने सीमित साड़ी कोष से, वह दो-तीन ऐसी साड़ियाँ तो निकाल ही सकती थी, जो इस राजसी परिवेश से मेल खा सकती थीं। किन्तु तब यह क्या जानती थी, कि जिसे गृहस्वामी के सीधे-सादे पत्र की भाषा जितनी सहज थी, उसकी गृह-सज्जा की ज्यामिति, उतनी ही दुरूह होगी।
‘‘आप बैठिए, मैं साबह को खबर कर आऊँ !’’

नूरबक्श ने सूटकेस लाकर एक कोने में धर दिया और सीढ़ियाँ चढ़ता, ऊपर की किसी मंजिल में अदृश्य हो गया।
कुमुद ने पर्स खोल कर, एक बार फिर वह पत्र पढ़ा। पिछले दस दिनों में वह कितनी बार उस पत्र को पढ़ चुकी थी। कहीं समझने में कुछ भूल तो नहीं हो गई थी। पत्र में उसके आह्नान में जो उत्साह मुखरित हुआ था, वह तो उसे अपने स्वागत में लेशमात्र भी दृष्टिगत नहीं हो रहा था। न स्टेशन पर ही गृह का कोई सदस्य उसे लेने आया, न कार की आहट पाकर ही उसका स्वागत करने कोई नीचे उतरा। यह तो नहीं लग रहा था कि हवेली में सब सो गए हैं। असंख्य कोष्ठ-प्रकोष्ठों में से प्रत्येक गवाक्ष, बिजली से जगमगा रहा था, जैसे कोई विराट जहाज, किसी बन्दरगाह पर लंगर डाले पड़ा हो-
नहीं, पत्र का आदेश एकदम स्पष्ट था-

‘‘महोदय
आपका पत्र मिला, आप अविलंब आकर अपना कार्यभार ग्रहण करें। आपको वेतन संबंधी कभी कोई शिकायत नहीं होगी। प्रत्येक माह की पहली तारीख को आपको बारह सौ का चेक प्राप्त हो जाएगा, इसके अतिरिक्त खान-पान-निवास संबंधी आपकी प्रत्येक इच्छा को हम यथासंभव पूर्ण करने की चेष्टा करेंगे। जैसा कि मैंने अपने विज्ञापन में भी स्पष्ट कर दिया था, अपनी रुग्ण पत्नी की देखभाल के लिए मुझे एक सहृदया संगिनी की आवश्यकता है, परिचारिका की नहीं। हम केवल दो प्राणी ही इस गृह में रहते हैं, मैं और मेरी पत्नी। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, मेरे गृह में आपको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा।
भवदीय
राजा राजकमल सिंह’’

सहसा, सीढ़ियों पर क्रमश: नीचे उतर रही पदचाप की आहट पा उसने अचकचा कर चिट्ठी फिर पर्स में डाल दी, पर फिर सीढ़ियों से उतर रहे व्यक्ति को देखने का साहस, उसे नहीं हुआ। जब दीवानखाना ही ऐसे ठाठदार था तो गृहस्वामी भी निश्चय ही ठसकेदार होगा !
‘‘मिस साहब !’’ यह तो गृहस्वामी नहीं, उसके सामने नूरबक्श ही खड़ा था- ‘‘साहब ने कहा है, आप अभी थककर आई हैं, नहा-धोकर थोड़ा सुस्ता लें, चलिए मैं आपको आपका कमरा दिखा दूँ।’’
कुमुद, उसके इस विचित्र संबोधन से बार-बार चिहुँक-सी रही थी, कल उससे स्पष्ट कह देगी, उसे मिस साहब कहकर न पुकारे, उसे लग रहा था जैसे वह किसी मिशन अस्पताल की नर्स हो !
वह सूटकेस उठाकर, पिर उसे एक सुदीर्घ सुरंग-सी गैलरी से ले जाता, जिस कमरे के बाहर खड़ा हुआ, उसके बाहर ही बेंच पर बैठी एक बुढ़िया ऊँघ रही थी।

‘‘लो, सारी कोठी ढूँढ़े आया और ये यहाँ बैठी उँघ रही है ! मैं कहता हूँ बुआ, दरवाजा खोलो, नई मिस साहब आ गई हैं।’’
पर बुढ़िया, अपना निर्विकार चेहरा लिए पूर्ववत् उँघती रही। किसी म्यूजियम में धरी जैसी कोई मिट्टी की सूरत हो। चेहरे पर झुरियों का जाल, बेहद लंबी नाक पर छोटे सूरजमुखी के फूल के आकार के सोने की लौंग, छीटदार लहँगा, मुसलमानी कुर्ती। काले झीने दुपट्टे को कान-सिर पर मफलर-सा लपेटे बुढ़िया न हिली, न डुली।
‘‘अँय, कहीं अल्लाह को प्यारी तो नहीं हो गई बुआ !’’ नूरबक्श ने फिर से हँसकर सूटकेस नीचे धरा और बुढ़िया के दोनों कन्धे पकड़कर झकझोर कर धर दिया। कुमुद लपककर उसे न सँभाल लेती तो बेंच पर ही दोनों पैर साधे, ऊँघती बुढ़िया निश्चय ही जमीन पर औंधी गिरती।

‘‘बस काम ही क्या है इनका खाना और सोना, यह नहीं कि हम टेसन गए हैं तो ऊपर जाकर दो घड़ी मालकिन के पास बैठ जाएँ !’’ बुरी तरह घबराई बुढ़िया दोनों हाथ जोड़कर विनम्र भयभीत मुद्रा में न जाने कितनी बार दुहरी होकर कुमुद के सामने फर्शी लगा गई-
‘‘हुजूर सलाम...’’
‘‘अच्छा बस-बस सलाम ही ठोंके जाओगी या कमरा भी खोलोगी !’’ नूरबक्श ने झुँझलाकर उसे डपट दिया।
लहँगे के नेफे में बँधा चाबी का गुच्छा निकाल बुढ़िया ने द्वार खोल दिए।
‘‘आइए सरकार,’’ नूरबक्श सूटकेस लेकर भीतर गया और उल्टे पैर लौटकर बोला- ‘‘आप बाहर ही खड़ी रहिए मिस साहब, ये हरामखोर बुआ किसी काम की नहीं है। क्यों बुआ, इत्ता भी नहीं हुआ तुमसे, कि लाओ खिड़कियाँ ही खोल दें। लगता है तब ही से बन्द जब से...’’ सहसा वह अपना वाक्य अधूरा ही छोड़, आग्नेय दृष्टि से बुढ़िया को भस्म कर भुनभुना उठा- ‘‘ये बात ठीक नहीं है बुआ, हम साहब से जरूर कहेंगे...सौ बार तुम्हें बचाया है पर, इस बार तुम्हें सजा दिलानी ही पड़ेगी। तुम्हें पता था कि मिस साहब आज आ रही हैं। क्या अब तक कमरे की सफाई भी नहीं हुई तुमसे ?’’

‘‘हम का जानी कि ई कमरा में मिस साहब रहिहैं, इहाँ मरियम मिस साहब फाँसी लगाए चोला छोड़े रहीं, पन्द्रह दिन तो पुलिस केर सील-मुहर रही, अब जान्यो जोने दिन से खुला मुला हम रोज धुलाई करत रहीं, अब कौनो औलिया पीर केर मजार हय जो हम लोबान दिखायं ?’’
‘‘बुआ, जान्यो,’’ दाँत पीसता नूरबक्श बुढ़िया पर खोखिया कर झपटा- ‘‘तुम्हारे जीभ हम खेंच डारब, साहब सुनिहें तो...’’
‘‘सुनिहें तो का होय रे, हम का डरत है साहब से ! जो बात भई रही हम बताय दिहिन- अब तोहार जिऊ में आय, खटिया भीतर डारो चाहे बाहर...’’
‘‘इसके कहने का बुरा मत मानिएगा सरकार, हवेली की सबसे पुरानी मुलाजिम है, इसी से नकचढ़ी के तेवर हमेशा चढ़े रहते हैं।’’

नूरबक्श शायद कुमुद का विवर्ण चेहरा देखकर समझ गया था कि वह बुरी तरह सहम गई है। यही उसके निष्पाप चेहरे का सबसे बड़ा दोष था, उसका क्रोध, विषाद, उल्लास, भय- अनाड़ी हाथों से पुते अंगराग-सा, पूरे चेहरे पर बिखर जाता था, इसी से उस उद्विग्न चिन्तातुर भोले चेहरे को देखते गई थी, वहाँ कदम रखने में वह झिझक रही है।
‘‘यहाँ कोई और कमरा नहीं है क्या ?’’ उसने पूछा तो नूरबक्श ने एक बार फिर उसी उत्साह और फुर्ती से जमीन पर धरा सूटकेस उठा लिया- ‘‘है क्यों नहीं सरकार, हवेली में पच्चीस कमरे हैं, चलिए आपको उस कमरे में ले चलूँ, जहाँ साहब के फिरंगी मेहमान ठहरते हैं।’’

इस बार वह उसे लेकर निचली ही मंजिल के जिस हवादार कमरे में पहुँचा, उसे देखकर ही कुमुद की समस्त क्लान्ति दूर हो गई, हवा के ऐसे फरफराते झोंके, जैसे बीसियों कूलर चल रहे हों : ‘‘आप गुसलकर सुस्ता लें, मैं तब तक चाय लगवा दूँ।’’
उसके जाते ही कुमुद द्वार बन्दकर दुलहन-से सजे उस कमरे को घूम-घूमकर देखने लगी। गुलाबी मसहरी लगा पलंग, नक्काशदारी श्रृंगारमेज, चाँदी के मोमबत्तीदान में सतर खड़ी सफेद दीर्घकाय मोमबत्ती, एक ओर धरा बड़ा चिमनी लगा लैम्प, जिसे शायद हवेली विद्युतोज्ज्वल होने से पूर्व कभी जलाया जाता होगा। खिड़की के अधखुले पट खोल, कुमुद बाहर देखने लगी, खिले गुलाबों की कतार-की-कतार उसे मुग्ध कर गई। नानावर्णी गुलाब हवा में झूम रहे थे। खिड़की से ही हवेली के दोनों भाग आलोक से जगमगाते स्पष्ट दीख रहे थे, जितनी ही झरोखेनुमा खिड़कियाँ थीं उतनी ही प्रकाश से उज्ज्वल। ठीक जैसे लखनऊ के कैसरबाग की बारादरी। पत्र में तो लिखा था, हम दो प्राणी हैं, मैं और मेरी पत्नी, तब इस बुलन्द आलमगीर इमारत का अंग-प्रत्यंग किस-किस की उपस्थिति का आभास देता, ऐसे जगमगा रहा था ? कौन रहता था यहाँ ? और वह बुढ़िया, किस मिस साहब की फाँसी के प्रसंग की ओर इंगित कर रही थी ? वह न जाने कब तक इसी सोच में डूबती-उतरती खिड़की पर ही खड़ी रह गई, तब ही से उसे अचानक याद आया- नूरबक्श उसे लेने बीस मिनट में आएगा- कह गया था और वह अभी तक हाथ-मुँह भी नहीं धो पाई।

हड़बड़ा कर उसने सूटकेस उठाया, यत्न से बिछे उस ऐश्वर्यपूर्ण पर्यंक में उसका जीर्ण सूटकेस पैबन्द-सा ही लग रहा था। कपड़े निकालकर नहाने गई तो गुसलखाने की बत्ती ढूँढ़ने में फिर उलझ गई। सहसा, एक बटन खटखटाते ही एक साथ कई बल्बों का अँगूरी गुच्छा ऐसे जगमगा उठा कि वह सहम गई। विदेशी सज्जा को देख उसे सहसा मकड़ी के जालों से भरे अपने संकीर्ण गुसलखाने की याद हो आई, जहाँ नहाने में, कपड़े धोने में जरा भी चूक हुई तो कुहनियाँ दरदरी, बिना चूने पुती दीवारों से टकराकर छिल जाती थी। उस मकान में सम्मिलित रूप से रहनेवाले किराएदारों का वह एकमात्र संयुक्त गुसलखाना था, सुबह चार बजे उठने पर ही गुसलखाने का एकान्त उसे मिल पाता था और कहीं भूल से कभी नहाने या कपड़े धोने के साबुन की बट्टी वहाँ छूट जाती तो उसके दूसरे नंबर पर नहानेवाली गौरी चाची उसे बाजीगिरी सफाई से आलोप कर देतीं। नहाते-नहाते कुमुद को हँसी भी आ गई थी। एकाएक गौरी चाची उसी ऐतिहासिक कौशल से पार की गई बट्टी को ब्लाउज के भीतर छिपाकर गीले बाल तौलिये में जटाजूट बना बाहर निकली कि गुसलखाने को हथियाने देहरी पर खड़े लालू से टकरा गईं। लालू का कहना था कि उसने उसके ब्लाउज के भीतर उस तीसरे अस्वाभाविक उभार को देख जान-बूझकर हीं उन्हें ढकेल दिया था- गौरी चाची चारों खाने चित गिरीं और फक से गीली बट्टी ब्लाउज के भीतर से निकल जमीन पर फिसलती चली गई।

‘‘यह तो दीदी का साबुन है !’’ उसी मुँहजोर ने चीखकर पूरे घर में गौरी चाची की बदनीयता के पोस्टर चिपका दिए थे-
‘‘चल हट मुँहझौंसे, मेरा साबुन है।’’
‘‘जरूर है, तुम्हारे बाप ने भी नहाया है कभी महारानी सन्दल साबुन से ! तुम तो अपनी कटहल-सी खाल पर हमेशा लाइफबाय रगड़ती हो....’’
‘‘हे राम, आज एकादशी के दिन मुझ राँड़ रंडकुली को इल्जाम लगा है ! मुर्दे- कहाँ हैं तेरी माँ...’’
कुसुद ही हीथ पकड़कर अबाध्य लालू को अपने कमरे में खींच लाई थी।
‘‘साबुन तो तुम्हारा ही है ! चोर, चोट्टी कहीं की !’’ लालू जोर-जोर से चीखने लगा, हाथ जोड़कर ही वह उसे चुप करा पाई थी।
‘‘तुम ही बनो महात्मा गाँधी,’’ लालू कहने लगा था- ‘‘तुम्हारी इसी ऐक्टिंग से मेरे हाड़ जल जाते हैं- कभी बुढ़िया हमारा साबुन पार करती है, कभी मंजन, तुम और अम्मा सब कुछ देखकर भी मक्खी निगलती हो...’’
‘‘चुप कर लालू, क्या कहेंगे सब...’’ ‘‘कहने दो, लालू किसी के बाप से नहीं डरता, एक तो बुढ़िया गुसलखाने में ही गन्दगी करती है, कहती है, संडास में जाने पर छूत लगेगी, धोती बदलनी पड़ेगी, मैं पूछता हूँ चोरी करने में नहीं लगेगी छूत- इन पाखण्डी पहाड़ी बुढ़ियाओं को देख मेरा खून खौल जाता है।’’

काश, लालू-उमा को वह महल-सा सुघड़ स्नानगृह दिखा पाती, बौरा जाते दोनों !
बड़ी देर नहाने पर भी उनका मन नहीं भरा। जब बाहर निकली, तब नूरबख्श ने बड़ी विनम्र खटखट से उसे सूचित किया, ‘‘मिस साहब तैयार हो लें।’’ वह उन्हें साहब से मिलाने द्वार पर प्रतिक्षारत बैठा मिलेगा।
कैसी मूर्ख थी वह, आज सिर धोने की ऐसी जल्दी क्या पड़ी थी उसे ! अब कैसे सुखाएगी इन घने बालों को ? बड़ी निर्ममता से ही भीगे बालों को सुलझा, उसने पीठ पर डाल दिया। चैत के भेंटुणों में माँ की दी गई सफेद आंगाइल पहन वह आईने के सामने खड़ी हुई तो अपने उतरे सूखे चेहरे को देख उसे स्वयं तरस आ गया। वह मन-ही-मन जिस अज्ञात भय से, इस रहस्यमय परिवेश में प्रतिक्षण ठंडी पड़ती जा रही थी, उस भय की एक-एक रेखा उसके कामनीय चेहरे पर उतर आई थी। ‘‘तुम अपनी उम्र से बहुत छोटी लगती हो दीदी, सब हमसे पूछते हैं, तुम बड़ी हो या कुमुद ? हमें अच्छा नहीं लगता, अब तुम जूड़ा बनाया करो, दीदी ?’’ उसी दिन से वह अपनी पृथुल वेणी को जूड़े में लपेटने लगी थी। फिर भी वह छोटी लगती थी, उमा के शरीर की गढ़न, चेहरे की परिपक्वता, उससे कहीं अधिक मँजी-घिसी थी।

बिन बाँहों का ब्लाउज से निकली अपनी दुबली बाँहों को साड़ी के आँचल से ढाँक उसने ललाट पर आईब्राउ पेंसिल से बिन्दी का ठप्पा धरा और बाहर निकल आई। एक क्षण को, नूरबक्श उसे देखता ही रह गया। बत्तियों के जगमगाते प्रकाश में उस दुबली गोरी, एकदम स्कूली लड़की-सी दिख रही कुमुद को देख वह कुछ देर हतप्रभ-सा खड़ा ही रह गया। यह बित्ते भर की लड़की क्या खाक सँभालेगी, उसकी मालकिन को !
‘‘आइए, सरकार !’’
कुमुद, एक बार फिर उसी दीवानखाने में बैठी, गृहस्वामी की प्रतीक्षा करने लगी। एक भुजंग काली प्रौढ़ा, अपने घेरदार लहँगे की मज्जी फहराती चाय की ट्रे धर गई। कितनी नौकरानियाँ थीं यहाँ और प्रत्येक का चेहरा कदर्य-कुत्सित, क्या जानबूझकर ही यहाँ अशोकवाटिका की-सी इन राक्षसियों की नियुक्त की गई थी !



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