भैरवी (सजिल्द) - शिवानी Bhairvi (hard cover) - Hindi book by - Shivani
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भैरवी (सजिल्द)

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :121
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3752
आईएसबीएन :9788183612883

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नारी जीवन पर आधारित उपन्यास

Bhairavi a hindi book by Shivani - भैरवी - शिवानी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

...‘‘कैसा आश्चर्य था कि वही चन्दन, जो कभी सड़क पर निकलती अर्थी की रामनामी सुनकर माँ से चिपट जाती थी, रात-भर भय से थरथराती रहती थी, आज यहाँ श्मशान के बीचोंबीच जा रही सड़क पर निःशंक चली जा रही थी। कहीं पर बुझी चिताओं के घेरे से उसकी भगवा धोती छू जाती, कभी बुझ रही चिता का दुर्गंधमय धुआँ हवा के किसी झोंके के साथ नाक-मुँह में घुस जाता।...’’

जटिल जीवन की परिस्थितियों ने थपेड़े मार-मारकर सुन्दरी चन्दन को पतिगृह से बाहर किया और भैरवी बनने को बाध्य कर दिया। जिस ललाट पर गुरु ने चिता-भस्मी टेक दी हो क्या उस पर सिन्दूर का टीका फिर कभी लग सकता है ?
शिवानी के इस रोमांचकारी उपन्यास में सिद्ध साधकों और विकराल रूपधारिणी भैरवियों की दुनिया में भटक कर चली आई भोली, निष्पाप चन्दन एक ऐसी मुक्त बन्दिनी बन जाती है, जो सांसारिक प्रेम-बन्धनों में लौटकर आने की उत्कट इच्छा के बावजूद अपनी अन्तरात्मा की बेड़ियाँ नहीं त्याग पाती और सोचती रह जाती है-क्या वह जाए ? पर कहाँ ?

भैरवी

आकाश की नीलिमा मानो उस अरण्य को चीरती हुई झपाटे से नीचे उतर आई थी। प्राचीन वट और अश्वत्थ के धूमिल वृक्ष मौन साधकों की तरह अचल खड़े थे। वह खुली खिड़की से, बड़ी देर से इन्हीं वृक्षों को देख रही थी। क्या इन वृक्षों की पत्तियाँ भी, अरण्य की मूल भयावहता से सहमकर हिलना भूल गई थीं ? उसने करवट बदलने की कोशिश की। जरा हिली की रग-रग में दर्द दौड़ गया। वह कराह उठी। उस दिन सिसकी में डूबे हुए करुण निःश्वास को सुनकर, कोठरी के किसी अँधेरे कोने पर लगी खटिया से कूदकर थुलथुले बदनवाली एक प्रौढ़ा उसके चेहरे पर झुक गई थी।

‘जय गुरु, जय गुरु’ की रट लगाते हुए वह प्रौढ़ा अपना चेहरा, उसके इतना निकट ले आई कि जर्दा-किकाम की महक, किसी तेज गन्ध वाली अगर की धूनी की याद ताजा करते हुए, उसकी सुप्त चेतना को झकझोर गई। उसने समहकर आँखें मूँद लीं। बेहोशी का बहाना बनाए लेटी ही रही। प्रौढ़ा संन्यासिनी बड़बड़ाती हुई एक बार अपने अन्धकारपूर्ण कोने में खो गई।

ओफ, कैसी भयावह आकृति थी उस संन्यासिनी की ! ऊँची गेरुआ मर्दाना धोती जिसे उसने घुटनों तक खींचकर कमर की विराट परिधि में ही आँचल से लपेट बाँध लिया था। परतों में झूल रहे, नग्न उदर से लेकर, तुम्बी-से बन्धनहीन लटके स्तनों तक रक्त-चन्दन का प्रगाढ़ लेप, जिसकी रक्तिम आभा उसके रूखे खुरदरे चेहरे को भी ललछौहां बना गई थी। एक तो मेरुदंड की असह्य वेदना, उस पर संन्यासिनी की वह रौद्रमूर्ति। उसने आँख बन्द कर लीं पर कब तक वास्तविकता से ऐसे आँखें मूँदे अचेत पड़ी रहेगी ? क्या जीवन-भर उसे ऐसी ही भयावह भगवा मूर्तियों के बीच अपनी पंगु अवस्था बितानी होगी ? और फिर उस भयानक कालकोठरी की अमानवीय निस्तब्धता ही उसका गला घोंट देने के लिए पर्याप्त थी। देखा जाए तो वह कोठरी थी ही कहाँ, किसी माल गाड़ी के बन्द डिब्बे-सी सँकरी गुफा थी, जिसकी एक दीवार को तोड़-फोड़कर एक नन्हीं-सी टेढ़ी खिड़की बना दी गई थी। खिड़की भी ऐसी कि कभी अपने बंकिम गवाक्ष से मुट्ठी-भर ताजी हवा का झोंका लाती भी, तो दूसरे क्षण उसी तत्परता से, फटाफट अपनी अनाड़ी जर्जर पट मूँदकर, दूसरे झोंके का पथ, स्वयं ही अवरुद्ध भी कर देती। कभी-कभी कोने में जल रही धूनी के धुएँ की कड़वी दुर्गन्ध से उसका दम घुटने लगता, चन्दन के जी में आता कि वह भागकर बाहर चली जाए, पर भागेगी कैसे ?

उस दिन विवशता की सिसकी उस गुहा की नीची, झुक-झुक आती छत से टकराकर, गुरुगर्जना-सी गूँज उठी थी, और वह चंडिका-सी वैष्णवी, उसके कुम्हलाए आँसुओं से भीगे चेहरे पर एक बार फिर झुककर बाहर भाग गई। थोड़ी ही देर में कई कंठों का गुंजन, उसके कानों से टकराने लगा, पर वह दाँत से दाँत मिलाए, आँखें बन्द किए पड़ी रही। बादलों से अध ढके दूज के चाँद का थका-हारा-सा प्रकाश उसके पीले चेहरे पर फैला हुआ था। बड़े-बड़े मुँदे नयनों की कोर पर टपकी आँसुओं की बूँदें गौर से देखने पर नजर आ ही जाती थीं।

‘‘देखा न ? होश में आ गई है, होश में न आई होती तो आँखों में आँसू आते ? दो बार तो मैंने इसे कराहते सुना।’’ वही संन्यासिनी कहे जा रही थी, ‘‘मैं तो कहती हूँ गुसाईं, कहीं भीतर भारी गुम चोट खा गई है, आज आठवाँ दिन है, पानी की एक बूँद भी गले के नीचे नहीं उतारी-किसी की मोटर मँगाकर इसे शहर के बड़े अस्पताल में पहुँचा दो...।’’
‘‘नहीं !’’ नगाड़े पर पड़ती चोट-सा एक कठोर स्वर गूँज उठा, ‘‘यह मरेगी नहीं।’’ ‘‘जय गुरु, जय गुरु !’’ संन्यासिनी कहने लगी, ‘‘गुरु का वचन क्या कभी मिथ्या हो सकता है ? ये लीजिए, चरन नई चिलम भरकर ले आई, आप विश्राम करें। मैं तो इसके पास ही बैठी हूँ, जब आपने कह दिया कि यह नहीं मरेगी तब हमें फिर कोई डर नहीं रहा।’’
‘‘क्यों री चरन, चिलम भरना भूल गई क्या ?’’ गाँजे के दम से अवरुद्ध गुरु का स्वर चरन से बेदम चिलम की कैफियत माँगने लगा।

‘‘अरे भूलेगी कैसे, असल में इस ससुरी की हमने आज खूब पिटाई की है।’’ संन्यासिनी ने अपनी चौड़ी हथेली, खटिया पर टिका दी।
‘‘क्यों, आज क्या इसने फिर हमारी सप्तमी चुरा ली ?’’
‘‘और क्या ! गिनकर पाँच पुड़ियाँ धरी थीं। आज जब आपकी चिलम सजाने को ढूँढ़ने लगी तो देखा तीन ही पुड़ियाँ हैं। हम समझ गईं। आखिर साँप का पैर तो साँप ही चीह्नता है गुसाईं, हमने हरामजादी को उजाले में खींचकर आँखें देखीं तो एकदम लाल जावफूल। बस चोरी पकड़ ली। सत्रह की पूरी नहीं हुई और लगाएगी गाँजे का दम, वह भी गुरु का गाँजा—बस तीन चिमटे दिए कि पीठ पर गुरु का त्रिशूल उभर आया है।’’
‘‘अच्छा, अच्छा अब जो हो गया सो हो गया, हाथ-वाथ चलाना ठीक नहीं है, माया ! चलो सो जाओ अब, हमें राघव ने बुलाया है, बर्दवान से कोई रामदासी कीर्तनिया आया है—हम कल तक लौटेंगे।’’

गुरु का कंठ-स्वर की सप्तमी के रंग में रंग गया था...।
खड़ाऊँ की क्रमशः विलीन होती खटखट से चन्दन आँखें बन्द होने पर भी गुरु के विदा हो चुकने के सम्बन्ध में आश्वस्त हो सकी। वैष्णवी उठी, और उसके उठते ही उसकी देह-गरिमा से एक कोने को झूला-सी बन गई मूँज की खटिया, एक बार फिर अपना सन्तुलन लौटा लाई। अब तक नीचे अतल जल में डूबती हल्की पोटली-सी चन्दन सहसा ऊपर उठ आई। थोड़ी ही देर में, कोने की खटिया से वैष्णवी के नासिका-गर्जन से आश्वस्त होकर उसने आँखें खोल लीं। गगन की धृष्टा चाँदनी, अब पूरे कमरे में रेंगती फैल गई थी। कृपण वातायन से घुस आया हवा का एक उदार झोंका उसे चैतन्य बना गया। पहली बार, अनुसन्धानी दृष्टि फेर-फेरकर उसने पूरे कमरे को ठीक से देखा। कितनी नीची छत थी ! लगता था, हाथ बढ़ाते ही वह छत की बल्लियों को छू सकती है। धुएँ से काली पड़ी हुई काठ की उन मोटी-मोटी बल्लियों के सहारे, कई गेरुआ पोटलियाँ झूल रही थीं, खूँटियों पर टँगी गेरुआ धोतियाँ, दो-तीन बड़े-बड़े दीनों की रुद्राक्ष-कंठियाँ और काले चिकने कमंडलों को देखकर, इतना समझने में उसे विलम्ब न हुआ कि वह वैरागियों की किसी बस्ती में आ गई। अचानक उसकी भटकती दृष्टि कोने में गड़े एक लम्बे सिन्दूर पुते त्रिशूल पर निबद्ध हो गई। निर्वात दीप की शिखा हवा में झूम रही थी, त्रिशूल पर लाल और सफेद चिढ़ों-सी नन्हीं ध्वजाएँ फड़फड़ा रही थीं, और ठीक त्रिशूल के नीचे पड़े थे, स्तूपीकृत नरमुंड। भय से चंदन काँप उठी, बड़ी मुश्किल से काबू में आए हुए उसके होश-हवाश फिर गुम होने लगे। क्या यह किसी कपालिक की गुहा थी या किसी श्मशान-साधक का आश्रम ?

संन्यासी का नासिका-गर्जन और भी ऊँचे अवरोह के सोपान पर हुलसने लगा। ठंडे पसीने से तर-बतर चन्दन, सारी रात दम साधे, सतर लेटी रही। भोर होने से कुछ पहले न जाने कब उसकी आँखें लग गई। आँखें लगी ही थीं कि उसे लगा, किसी ने उसके ललाट का स्पर्श किया है। न चाहने पर भी उसकी आँख खुल गईं। एक हब्सी का-काला चेहरा, उसकी ओर बढ़ रहा था। काले चेहरे पर, अंगारे-सी दहकती दो लाल-लाल आँखें देख, शायद वह जोर से चीख ही पड़ती कि सहसा मोती-से दमकते दाँतों की उज्ज्वल हँसी देखकर आश्वस्त हो गई। यह हँसी तो मैत्री का हाँथ बढ़ा रही थी।
‘‘भूख लगी है क्या ?’’ स्निग्ध हास्योज्ज्वल प्रश्न के उत्तर में, बिस्तर से लगी असहाय देह सिसकियों में टूटकर काँपने लगी।
‘‘छिः—रोओ मत, ऐसे रोने से तबीयत और खराब होगी। रुको, मैंने अभी दूध गरम किया है, जैसे भी हो, थोड़ा-बहुत गुटक लो।’’
थोड़ी ही देर में वह काँसे के चपटे कटोरे में भरकर दूध ले आई। सहारा देकर उसने चन्दन को बिठाया और दूध का कटोरा उसके क्षुधातुर होंठों से लगा दिया। एक ही साँस में वह पूरा कटोरा खाली कर गई। उस काली लड़की ने, बड़े यत्न से उसे एक बार फिर लिटा दिया।

‘‘चुपचाप लेटी रहो, समझीं ?’’ वह हँसकर कहने लगी, ‘‘मैं मंदिर को झाड़-पोछकर अभी आती हूँ, थोड़ा समय लगेगा, मंदिर जरा दूर है न, इसी से।’’ वह अनर्गल बोलती जा रही थी, ‘‘लौटते मैं तुम्हारे लिए प्रसादी के केले भी लेती आऊँगी। बाहर से साँकल चढ़ाए जा रही हूँ। आज कोई है नहीं, गुरुमहाराज बाहर गए हैं और माया दीदी अपने पुराने अखाड़े में गई हैं, कल तक लौटेंगी, भगवान करे उनकी नाव वहीं डूब जाए।’’ फिर वह हँसने लगी।
‘‘क्यों जी, तुम तो कुछ बोलती ही नहीं, गूँगी हो क्या ?’’ इस बार उस काली लड़की ने उसकी ठोढ़ी पकड़ ली। यह चंचल लड़की बस एक पतली-सी भगवा साड़ी पहने थी और उसे भी ऊँचे बाँधे हुए थी। साड़ी की पतली भाँजों से झाँकते हुए पुष्ट यौवन की झलकियाँ देखकर चन्दन नारी होते हुए भी लजाकर रह गई। किन्तु उस वन-कन्या को, लज्जा के लिए अवकाश नहीं था।

‘‘अच्छा जी, नई भैरवी—इतने दिनों तक किया तुम सचमुच दिन-रात बेहोशी में पड़ी रही थीं !’’
चन्दन ने इस बार भी कुछ उत्तर नहीं दिया...।
‘हाय राम, सचमुच ही गूँगी हो क्या ? राम रे राम ! ऐसे गन्धर्व किन्नरियों का-सा रूप दिया और मुँह में एक छटंकी जीभ नहीं दे पाया। वाह रे भगवान, वाह ! इसी दुःख से तुम चलती रेलगाड़ी से कूद पड़ी थीं क्या ?’’
चन्दन असहाय करुणा दृष्टि से अपनी इस विचित्र अपरिचिता सहचरी को देखती रही।
‘‘बाप रे बाप ! हिम्मत तो तुम्हारी कम नहीं जी ! हमारा तो उस कलमुँहे इंजन को देखते ही कलेजा धड़कने लगता है।...और जानती हो, कहाँ गिरी थीं तुम ?’’

सुना है, साँप को देखकर पक्षी मन्त्रमुग्ध हो जाता है। किसी ऐसे ही मन्त्रमुग्ध पक्षी की तरह चन्दन इस बड़ी-बड़ी आँखोंवाली लड़की की लच्छेदार बातों में बँधकर रह गई।
‘‘ठीक जलती चिता से आधे गज दूरी पर। जरा भी और तेजी से गिरी होतीं तो घोषाल बाबू के लड़के के साथ सती हो जातीं।’’ वनकन्या ने अपनी बात पूरी की और जोरदार ठहाका लगाया।

चन्दन को मौन देखकर उसने खुद ही बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया, ‘‘तुम्हारा भाग्य अच्छा था, जो गुरु उस दिन शिवपुकुर के महाश्मशान के वट तले साधना करने चले गए थे। नवेन्दु घोषाल के जवान लड़के की अधजली चिता छोड़कर ही लोग तुम्हें हवा में तैरती लाश समझ ‘भूत-भूत’ कहते भाग गए तो गोसाईं तुम्हें कन्धे पर रखकर आधी रात को द्वार खटखटाने लगे—मैंने ही द्वार खोला। पहले तो घबरा गई। ऐसे मुर्दा घर लाकर तो कभी शव-साधना नहीं करते थे गुरु, फिर आज कन्धे पर मुर्दा कैसे ले आए ? फिर तुम्हें मेरी खटिया पर सुलाकर लगे हाँक लगाने, ‘‘माया ! माया !’’—माया ससुरी एक बार दम लगाकर फिर क्या कभी इस लोक में रहती है ? नहीं उठी तो मुझसे बोले, ‘देख चरन, अमावस के दिन चिता के पास गिरी होती तो आश्रम को अपूर्व तोहफा जुटता। जलती चिता, वह भी अकाल मृत्यु-प्राप्त ब्रह्मचारी तरुण की चिता ! पर फिर भी स्वयं विधाता ने इस नई भैरवी को प्रसादी के रूप में पटका है, बीच श्मशान में, वह शिवपुकुर का महाश्मशान, जहाँ दिन हो या रात एक-न-एक चिता जलती ही रहती है।


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