रंगशाला - सिम्मी हर्षिता Rang Shala - Hindi book by - Simmi Harshita
लोगों की राय

नारी विमर्श >> रंगशाला

रंगशाला

सिम्मी हर्षिता

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :129
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3768
आईएसबीएन :81-214-0333-2

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

167 पाठक हैं

दाम्पत्य संबंधों पर आधारित उपन्यास...

Rangshala

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


सुपरिचित लेखिका सिम्मी हर्षिता का एक और झकझोरने वाला उपन्यास है रंगशाला। मन के अपरिचित कोनों में झांक कर अछूती भावानुभूतियों से साक्षात्कार कराने वाली कृतियों के लिए प्रसिद्ध लेखिका का यह उपन्यास इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। नारी मुक्ति को स्वच्छंद यौन संबंधों तक सीमित करते तथाकथित स्त्री विमर्श के दौर में ‘रंगशाला’ एक नयी लीक रचता है।

‘रंगशाला’ एक ऐसी स्त्री की कहानी, जो दाम्पत्य संबंधों में विश्वास-हनन की पीड़ा को नकार कर स्वयं को धोखा देने के लिए तैयार नहीं है। अपने मूक विद्रोह में वह समूची समाज व्यवस्था से टकरा जाती है। इसी क्रम में यह उपन्यास परिवार और समाज के कितने ही अंतर्विरोधों को उद्घाटित करता चलता है।
‘रंगशाला’ अत्यंत दक्ष भाषा शिल्प के माध्यम से समाज के इतिहास-भूगोल को स्पर्श करते हुए उसके मनोविज्ञान को एक नये कोण से आंकती एक सशक्त औपन्यासिक कृति।
‘रंगशाला’

एक


इस पल चाहती हूँ कि कोई हो ऐसा समझदार सख्य साथ, जिससे सब कुछ कह कर मन हलका हो सके, ठीक ठीक कोई राह-सलाह मिल सके। पर परिचय और मित्रता के विशाल दायरे के बावजूद कहीं कोई नजर नहीं आ रहा, जिसके साथ मैं बांट पाऊं अपना इतना निजी दुःख, रोष, अपनी शंकाएं, अपने प्रश्न। ऐसी घड़ियां कितनी जल्दी बता देती हैं संबंधों का वज़न और सामर्थ्य।

मेरे ध्यान की सुई अंततः अपराजिता पर जा कर ठहर गयी है। बी.ए. के दौरान छात्रावास में हम दोनों का एक ही कमरे का भागीदार होना और एक वर्ष की पहचान का वर्षों की मित्रता में बदल जाना, अपनी अपनी जिंदगी की राहों में डूब-खो जाना और फिर एकाएक एक दूसरे को ढूंढ़ लेना। जो बात मैं किसी और से नहीं कह सकती, वह उससे कह सकती हूं, क्योंकि इसमें बात को कोई खतरा नहीं। पढ़ने के अतिरिक्त उसे आसपास की किसी चहल-पहल या रिश्ते से कोई मतलब ही नहीं था। हम कमरे में साथ होकर भी जैसे साथ नहीं थे। मैंने उसे कभी सोते हुए नहीं देखा था। जब रात होती तो वह पढ़ रही होती, जब सुबह होती तो वह नहा-धो कर पढ़ रही होती। मेरा मन होता कि वह मेरे सामने बैठी रहे और मैं उसे देखती रहूं। और वह मेरी इस प्यार भरी बात का कोई अनुचित अर्थ निकाल कर नाराज़ हो जाती, कमरे में अबोलापन पत्थर की तरह ठहर जाता, जिसे हटाने के लिए मुझे ही कोशिश करनी पड़ती। न सिनेमा देखने जाना, न कहीं खरीदारी करने जाना और न मैस के बेस्वाद भोजन में कोई मीनमेख निकालना।

सेफद वस्त्रों में जीवन के प्रति उसकी ऐसी विचारशील बीतरागता मुझे बांध लेती। संभवतः जीवन की उज्ज्वलता और उठान के प्रति मेरा आकर्षण ही उसा कारण रहा है। बेशक मैं एक बेहद साधारण इंसान हूं, पर जीवन की साधारणता को जीते रहना मुझे असह्य है। अमेरिका चले जाने के बाद हमारा पत्र व्यवहार कम हो गया, पर जब भी मैं उसे सपने में देखती तो उसी दिन सुबह उठते ही पत्र लिखने बैठ जाती और श्यामल बिना पूछे ही जान लेते कि सुबह-सुबह किसे पत्र लिखा जा रहा है। मुझे पक्का विश्वास था कि एक दिन वह भारी विद्वान बनेगी, पर विद्वान होना और रिश्तों की समझ होना दो अलग बाते हैं। वह अविवाहित है। पति-पत्नी के संबंधों का एक खास रंग, रुप, पहलू और शर्तें होती हैं। एक अकेला व्यक्ति दिन-रात आमने-सामने खड़े इस दुरंगी और दुतारा रिश्ते के निभाव और टकराव को भला कैसे समझ सकता है !

सूर्य से विमुख यह मनहूस स्याह रात पता नहीं कब खत्म होगी जो किसी पहाड़ की तरह एकाएक मुझ पर ढह पड़ी है और मैं नहीं समझ पा रही कि उसके नीचे से कैसे बाहर आऊं। यह भी नहीं सूझ रहा कि ठीक-ठीक क्या सोचूं और क्या करूँ ?
क्या किसी ने कभी कोई ऐसी लतर देखी है, जिसके पास सब कुछ हो, पर जड़े न हों ? वह अपने तरुवर को गलबहियां डाले, अपने हिस्से की धरती पर खड़ी वर्षों आकाश की ओर सिर उठाये लहराती-लहलहाती, पवन से खेलती, रवि से आंख मिचौली करती, वर्षा में झूमती रहती है। अपने प्रफुल्लित विकास पर तृप्त मग्न उन हरियाती जड़ों के बल पर ही तो। और यदि कोई उससे उसकी जड़े ही छीन ले तो वह धरती पर ही तो आ पड़ेगी न ?

जोड़ या घटाव में हमेशा दो रक़में होती हैं-एक जिसे ऊपर लिखा जाता है और दूसरी जिसे नीचे लिखते हैं। आज की रात्रि उस दूसरी रक़म की तरह है, जो मेरे कल को घटा कर शेष शून्य में बदल रही है और मैं आड़े-टेढ़े प्रश्नों की शय्या पर लेटी सुनसान पत्थर हुई उसे देख रही हूं। रात और नींद का संग साथ इंसान को कितना निहत्था और निरुपाय कर देता है ! क्या इसीलिए चौरकर्मी और यौनकर्मी का चुनाव करते हैं, अपने मकसद में आसानी से सफल हो सकने के लिए ?

मेरे जीवन की दीवार पर दुःख ने रातोरात चुपचाप कील गाड़ कर अपने को टांग लिया है। वह मेरे सुखको निरंतर कील रहा है और मन को रह रह कर छील रहा है। सुख और दुःख अपने रहने के लिए अलग-अलग जगह नहीं खरीदते। एक ही जमीन पर दोनों साथ-साथ रहते चले जाते हैं। पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे एक दूसरे को बेदखल कर सारी ज़मीन क़ब्ज़ा लेते हैं। सुना है कि साधु-संतों का कोई अतीत नहीं होता, इसलिए वे दुःख-सुख से ऊपर होते हैं। पर हम जैसे साधारण जन का वर्तमान विगत से भला कैसे मुक्त हो सकता है। हम अपने आज के हर अश्रु-हास को आजीवन कल के ही दर्पण में देखते हैं और अपनी व्यथा में चक्रवृद्धि करते रहते हैं। तिस पर यदि अपनी डगर चलते कोई औचक ही पीछे से धकिया दे तो क्या मुड़ कर नहीं देखेंगे और नहीं पूछेंगे, ‘क्यों ?’ आज इस अधंकार में ऐसा ही एक जलता और जलाता हुआ ‘क्यों’ मेरे सामने अड़ कर खड़ा हो गया है और मैं पीछे मुड़ कर उस क़सीदाबाद में आ पहुंचती हूं जो कभी किसी से अल्हड़ स्कूली बच्चे की तरह था।

बी.ए. करने के बाद घर बैठने में मन बिलकुल नहीं लग रहा था। करने को कुछ भी नहीं था और सुनने को एक ही सनातन सत्य कानों में बार बार पड़ रहा था।
उस बात में निहित विदा भाव के कारण माता-पिता एक ओर यह चाहते कि मैं अधिक से अधिक समय उनके साथ बिताऊं और दूसरी तरफ वे पढ़ाई को भी आवश्यक मानते। इसलिए मैंने एम.ए. में दाखिला ले लिया था और फिर दयालबाग के अपने उसी छात्रावास में लौट आयी थी, जिसके गेट के अंदर क़दम बाद में जाते और मस्तिष्क में उथल-पुथल पहले मच जाती। रात को पढ़ते तो कीड़े-मकोड़े तंग करते और दिन में या सुबह पढ़ने की आदत नहीं थी, इसलिए परीक्षा की तैयारी कभी भी ठीक से नहीं हो पाती थी। और फिर आसपास के कमरों का वातावरण भी कुछ इस तरह का रहता जैसे कि वहां पर सब मौज मस्ती करने और गप्पें हांकने के लिए ही आये हैं। पढ़ने की केवल चिंता ही लगी रहती, लेकिन पढ़ना बिलकुल भी नहीं हो पाता था।

आते-जाते रिश्तों की चर्चा सुन सुन कर यही लगता जैसे कि मैं किसी अजनबी स्टेशन पर खड़ी हूं, लापता और बेपता। न जाने कब किस दिशा से कौन सी गाड़ी अचानक आ कर मेरे सामने खड़ी हो जायेगी और बिना किसी सवाल जवाब के उसमें चुपचाप बैठकर किसी अनदेखी अनजानी दिशा की ओर चला जाना पड़ेगा। तब लगता कि विवाह के नाम पर ढूंढ़ा जाने वाला जीवन साथी कोई गणित का सवाल नहीं कि ठीक फार्मूला लगाने पर ठीक उत्तर आ ही जायेगा। यह तो अंधेरे में तीरदाजी है, निशाने पर लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। छत्तीस का रिश्ता भी हिस्से में आ सकता है और तिरसठ का भी।
छात्रावास के उन दिनों में अपराजिता अक्सर ही विवाह की रंजक बातों के बीच अपनी अखबारी तुकबंदी द्वारा रसभंग कर दिया करती :

उस कड़ियल का मन होगा तो मिट्टी के तेल में तुम्हें भूनेगा,
किसी सड़ियल का दिल चाहेगा तो तन्दूरी चिकन बना देगा।
हृदय में हिलोर उठेगी तो मूडी प्यार करेगा,
अड़ियल होगा तो गाली और मार करेगा।
स्वाद नहीं आया तो जाहिल थाली मुँह पर दे मारेगा।
जवान चलायी बराबर की तो उजबक जीभ को काट धरेगा।
पीने का लती हुआ तो मरियल हर सन्ध्या को रात करेगा,
यदि उपदेस दिया तो दढ़ियल डंडे से बात करेगा।
अगर सेहतवादी हुआ तो हवाख़ोरी करेगा,
मगर ऐयाश हुआ तो औरतख़ोरी करेगा।
क्या पता वह मरभुक्खा कड़की का मारा हो,
और तुमसे केवल रोकड़ बही का नाता हो।
कौन जाने उस काईंया ने पहले से ही विवाह रचाया हो,
और अब बासी पति तुम्हारे कुँवारे सपने की खातिर नया दूलहा बन आया हो।
क्या पता वह अहमक़ हक़दारी से दो-तीन निकाह रचाये,
और तुम्हें जवानी में ही बुढ़िया बतलाये।
क्या पता वह जड़मति एड्स का शिकार हो
और शादी से पहले अपने परीक्षण से इनकार हो,
क्योंकि तुम्हारे संग घर गृहस्थी का सुख लेने का उसका अन्तिम ख़्वाब हो।
क्या मालूम उस ऐयार की किडनी ही ख़राब हो।
और तुमसे शादी ही उसका एकमात्र इलाज हो।
तुम्हें तो देनी ही पड़ेगी अपनी फालतू किडनी
बेदाम अपने उस दुलारे हत्यारे सुहाग को।
कौन जाने उस दिलजले को अपने प्रेम से विवाह न होने का ग़म हो,
और उस जलते लावे में भस्म तुम्हारी हर सरगम हो।
क्या पता तुम्हारे हाथ उस पत्ते से पीले हों,
जिसकी मर्दानगी के कलपुर्जें ही ढीले हों,
और छिछोरा तुम्हें छिनाल बताये।
क्या पता अंह का मारा वह ख़ाली लिफ़ाफ़ा
तुम्हारी सूरत और सीरत को सौ में से तैंतीस भी न दे,
और मायक़े के बन्द पते पर रीडायरेक्ट कर दे।
हो सकता है तुम ही किसी भले का जीना हराम किये रहो,
और घर को हाईकोर्ट का इजलास किये रहो।
जब तब तुम्हें आयेगी डिग्रियों की याद,
इसलिए उठो और कर लो किताबों से बात।
विवाह के इस मीना बाज़ार में
कुछ भी सम्भव है और कुछ भी असम्भव नहीं।

यह सब सुन कर भला किसके मन में शादी का रोमांच रह पायेगा ! एक जगह बात तय हो कर टूट चुकी थी। वे लोग विवाह में नकद नारायण चाहते थे और पिता रुपया बिलकुल नहीं, केवल सामान ही देना चाहते थे। स्थान की दूरी और कोई जान-पहचान न होने से यह बात शादी पक्की हो जाने के बाद चली कि लड़का केवल दसवीं पास है, जबकि बी.ए. बताया था। अपने व्यवसाय और आमदनी का भी बस चलता फिरता मामला था।
तलाश करते-करते अंततः मेरा वर्तमान मेरे भविष्य तक जा पहुंचा। श्यामल उन दिनों अमेरिका में अध्ययनरत थे। उनकी अवस्थस्थ मां की भी वही युगों पुरानी इच्छा थी कि उनकी आंखों के सामने छोटे की भी गृहस्थी बस जाये। श्यामल की मां, भाई, बहन तथा भाभी ने ही मुझे देखा था और बड़ों ने जो कह दिया, वह उन्होंने मान लिया बिना किसी सवाल जवाब के। क्योंकि उधर अंतिम और इधर पहला विवाह था, इसलिए दोनों ओर खूब धूमधाम और उत्साह था।
निमंत्रण पत्र छप कर आ गये थे।

श्यामल तय तिथि पर देश लौट आये थे।
तिलक-सगाई आदि झटपट हुए थे और इन रस्मों के बीच ही हमने एक दूसरे को पहली बार देखा था। उनके रंग-रूप के सामने मैंने अपने को कमतर पाया और मन में शंकाओं ने उथल-पुथल मचा दी। ऐसे सुदर्शन युवक के लिए तो बहुत सुंदर युवती होनी चाहिए थी। श्यामल को कितनी निराशा हुई होगी मुझे देख कर। उनके लिए जीवन सहचरी तलाशने वालों ने तुलनात्मक दृष्टि से आखिर मुझमें क्या देखा था ? क्या मेरे बदले मेरे पिता की आर्थिक-सामाजिक स्थित को ? क्या हमारा विवाह बेमेल सिद्ध होगा ? अपने भविष्य के सामने अंतहीन रेगिस्तान बिछता नज़र आया। अनगिनत बार सुनी वह कविता रह-रह कर दस्तक देने लगी।
दूसरे दिन श्यामल बारात ले कर द्वार के बंदनवार तक आ पहुंचे थे।
क्योंकि क़सीदाबाद के नायक की बेटी का विवाह था, इसलिए घर की विशिष्ट साज-सज्जा तथा जयमाल के दृश्य को देखने के लिए सारा क़सीदाबाद ही उमड़ पड़ा था।

सपने की तरह पलक झपकते ही सब कुछ हो गया था। विवाह की रस्मों के बाद श्यामल मुझे पिता के विशाल घर की भव्यता से विदा करा कर अपने घरौंदे में ले आये थे और मैं सोचती ही रह गयी थी कि क्या सच ही मेरा विवाह हो गया है ? कहीं कुछ भी विशिष्ट नजर नहीं आ रहा था। साथ ही किसी प्रवासी के साथ विवाह में छुपे संभावित ख़तरों के प्रति भी मन बहुत आशंकित था।

शादी के बाद हमें केवल तीन सप्ताह का ही समय मिल पाया। उस थोड़े से वक्त में ही लगा कि दोनों का रंग-रूप तथा पारिवारिक स्थितियां चाहे भिन्न हैं, पर स्वभाव ऐसा एकरूप है जैसे कि हमने पहले से ही एक दूसरे को परख लिया हो। श्यामल मुझे किसी भी परिस्थिति के अनुकूल अपने को ढाल लेने वाले लगे और ऐसे इंसान के साथ तो हरेक की प्रकृति  समायोजन सहजतः ही हो जायेगा।

मेरे पास अपना पता और राग-पराग भरी यादें छोड़ कर वह फिर हजारों मील दूर अपने अध्ययन की दुनिया में लौट गये थे। तभी समझ में आया था कि कैसे सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में बंधी धरती अपनी गुरुत्वाकर्षण भूल कर उसकी परिक्रमा करती रहती है। यह बात भी तभी समझ में आयी थी कि लड़की विवाह के बाद एकाएक क्यों बदल जाती है। कैसे गांठ का बंधन दिल का बंधन बन जाता है। कैसे उसका समस्त प्यार और ध्यान संसार की सब चीजों से हट कर एक व्यक्ति पर केंद्रित हो जाता है। पर ऐसा तभी हो सकता है यदि आंखों ने पहले कभी किसी को देखा न हो, मन पर अतीत की खिंची कोई रेखा न हो।


प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book