रक्त कल्याण - गिरीश कारनाड Rakt Kalyan - Hindi book by - Girish Karnad
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रक्त कल्याण

गिरीश कारनाड

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3772
आईएसबीएन :81-7119-171-1

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बसवण्णा के जीवन से जुड़े तमाम लोकविश्वासों व सांस्कृतिक जनांदोलनों पर आधारित नाटक....

Rakt kalyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


सुविख्यात रंगकर्मी और कन्नड़ लेखक गिरीश कार्नाड की यह नाट्यकृति एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। बसवण्णा नाम का एक कवि और समाज-सुधारक इसका केंद्रीय चरित्र है। ईस्वी सन् 1106-1168 के बीच मौजूद बसवण्णा को एक अल्पजीवी ‘वीरशैव सम्प्रदाय’ का जनक माना जाता है।

लेकिन बसवण्णा के जीवन-मूल्यों, कार्यों और उसके द्वारा रचित पदों की जितनी प्रासंगिकता तब रही होगी, उससे कम आज भी नहीं, बल्कि अधिक है, और इसी से गिरीश कार्नाड जैसे सजग लेखक की इतिहास-दृष्टि और उनके लेखन के महत्त्व को समझा जा सकता है। बसवण्णा के जीवन मूल्य हैं-सामाजिक असमानता का विरोध, धर्म-जाति, लिंग-भेद आदि से जुड़ी रूढ़ियों का त्याग और ईश्वर भक्ति के रूप में अपने-अपने ‘कायक’ यानी कर्म का निर्वाह। आकस्मिक नहीं कि उसके जीवनादर्शों में यदि गीता के कर्मवाद की अनुगूँज है तो परवर्ती कबीर भी सुनाई पड़ते हैं। लेकिन राजा का भंडारी और उसके वर्णाश्रम धर्म के पक्ष में खड़ी राजसत्ता की भयावह हिंसा से अपने शरणाओं की रक्षा वह नहीं कर पाता और न उन्हें प्रतिहिंसा से ही रोक पाता है।

लेखक ने समूचे घटनाक्रम को-बसवण्णा के जीवन से जुड़े तमाम अतर्क्य लोकविश्वासों को झटकते हुए-एक सांस्कृतिक जनांदोलन की तरह रचा है। विचार के साथ-साथ एक गहरी सम्वेदनशील छुअन और अनेक दृश्यबंधों में समायोजित सुगठित नाटयशिल्प। जाहिर है कि इस सबका श्रेय जितना लेखक को है, उतना ही अनुवादक को है। अतीत के कुहासे से वर्तमान की तर्कसंगत तलाश और उसकी एक नई भाषिक-सर्जना हिन्दी रंगमंच के लिए ये दोनों ही चीजें समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।

 रामकुमार कृषक

किसका नाम और किसका चेहरा ? किसके
घाव और किसका लहू ? यह तो मेरा ही शव है
....और मैं ही राजा का हत्यारा हूँ ! ......तो संत
अलम्मा के स्वप्न-दर्शन की यही अंतिम कड़ी
है लीला समाप्त हुई...गाजे–बाजे सब बंद
हुए रोशनियाँ बुझ गईं ..... राहे सूनी ....सारी
जगती मौन हुई....ओ संगम नदियों के महादेव !
अब गर्भगृह को लीन कर लो अपनी ज्वाला में
हे पिता ....हे आलोकमय ! ....आलोक में
आलोक .... अनंत आलोक....


नाटककार का वक्तव्य



सन् 1168 ईस्वी से पहले के दो दशकों में कल्याण नगरी में हुई घटनाएँ, कर्नाटक के इतिहास के लिए इस कालखंड में हुए चिंतक एवं द्रष्टा संत बसवण्णा ने कल्याण नगर में कवियों, रहस्यवादियों, दार्शनिकों, कार्मियों को एक सूत्र में ऐसे पिरो लिया, जैसा कभी कहीं एक स्थान पर न तो पहले हो पाया था और न ही इसके बाद कभी हुआ। उन्होंने देवता और आदमी सभी कुछ के बारे में संस्कृत छोड़ सामान्य लोगों की भाषा में बातचीत की। मूर्तिपूजा या मंदिर-निर्माण का बहिष्कार किया। जो भी कुछ स्थावर था, जड़ था उसे छोड़कर मानव जीवन को ही केन्द्र माना। जो भी कुछ गतिवान (जंगम) था, उसी को महत्त्व दिया। उन्होंने कठिन परिश्रम और समर्पित भाव से कार्य (कायक) के सिद्धान्त को स्थापित किया। केवल सिद्धान्त में नहीं-व्यवहार में। इससे परम्परावादियों का भयानक आक्रोश उन पर बरसा और शरण आंदोलन आतंक और रक्तपात में डूब गया। कल्याण नगरी ‘रक्त कल्याण’ हो गई।

इस नाटक में होनेवाली घटनाओं को बीते आठ सौ से भी ज्यादा साल हो चुके हैं, फिर भी हमारी स्मृति इन घटनाओं से अब तक आतंकित हैं। वह युग प्रतिभा, उत्साह मौलिक प्रश्नों के साहस, विजय और दुःख से भरा हुआ है। जैसे जीभ दुखते हुए दाँत की तरफ बार-बार पलटती है; वैसे ही कन्नड़ भाषा के लेखक कवि चितंक बार-बार उस युग की ओर पलटते हैं और बार-बार इस सबकी सार्थकता को अपने युग-प्रसंग में समझने की कोशिश करते हैं।
‘तलेदंड’ शीर्षक से मैंने यह नाटक कन्नड में सन् 1989 में लिखा था, जब मंडल और मंदिर का प्रश्न ज्वलंत था। यह स्पष्ट हो रहा था कि शरणओं द्वारा उठाए गए प्रश्न हमारे समय के लिए कितने सटीक हैं कल्याण में होनेवाली घटनाओं की भयानकता से साबित होता हैं कि ऐसे प्रश्नों के जबाव टालना कितना खतरनाक है।

 मैं श्री रामगोपाल बजाज का आभारी हूँ, जिन्होंने संवेदनशील और सावधानी से मूल नाटक की आत्मा और उसके बारीक भेंदों को अपने अनुवाद में उकेरा हैं। मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल का भी हृदय से आभारी हूँ इसे हिंदी में प्रस्तुत करने के लिए श्री इब्राहिम अल्काज़ी का भी, उनके सुयोग्य निर्देशन के लिए।


अनुवादक की ओर से



 मैं कन्नड़ नहीं जानता, फिर भी यह अनुवाद ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहाँ बहुत सारे अनुवाद रूसी, जर्मन, स्पैनिश, चेक आदि भाषाओं के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर किए जाते हैं, मैंने भी यह अनुवाद अंग्रेजी से ही लिया है। हाँ, अंग्रेजी अनुवाद पर मेरा भरोसा इस प्रसंग में अधिक होने का कारण है कि यह अंग्रेजी अनुवाद स्वयं नाटककार गिरीश कर्नाड ने किया। लेखक के साथ चर्चा के दौरान एवं कन्नड़ के कुछ अंश सुनकर स्पष्ट था कि पात्रों के वर्ण-वर्ग भेद को सम्वाद की भाषा में भी निभाया गया था। चूँकि परिवेश एक खास समय और सांस्कृति क्षेत्र का है, नाम, सम्बोधन आदि उनका ठीक-ठीक परिवर्तन हिन्दी में पात्रों को परिवेश बदले बगैर करना असंगत होता। सांस्कृतिक परिवेश वही का वही रखते हुए भी सम्वादों की भाषा द्वारा पात्रों के पारस्परिक संस्कारों को भेद दिखाने की कोशिश मैंने बोली बदलकर नहीं की, बल्कि शब्द संस्कार एवं वाक्य-रचना की लय में परिवर्तन के द्वारा करने की कोशिश की है। संस्कृति तत्सम शब्दों, ग्राम्य देशज एवं उर्दू शब्दों का बदलता हुआ अनुपात जान-बूझकर रखा है। हिन्दी में ‘आप’ ‘तुम’ और ‘तू’ का भेद जिस तरह है, वह शरणा सम्प्रदाय के पात्रों के साथ ठीक उसी रूप में मेल नहीं खाता. अतः ‘तुम’ और ‘आप’ का मिला-जुला सम्बोधन उस भेद के महत्त्व को कम करने के लिए किया गया है। लोक-भाषा, सामंती भाषा, पंडित-वचन सभी को हिन्दी-संरचना-भेद के द्वारा ही करना संगत लगा।

संत कवि बसवण्णा की उक्तियां गद्य से पद्य की ओर बदलती हैं और फिर भी अलंकार-परिपाटी को तोड़ना बसवण्णा की मूल प्रक्रति है, अतः हिंदी-काव्य के रीति छंदों से भी बचने की कोशिश रही है।
पूर्वाभ्यास के क्रम में सहकर्मियों के योग ने भी भाषा को जहाँ-तहाँ प्रभावित किया है, जो उन सभी का श्रेय है।  
नाटक का शीर्षक कन्नड़ में तलेदंड है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है-शिरश्छेद का दंड। अतएव हिंदी अथवा हिंदुस्तानी में ‘सर क़लम’ शीर्षक का सबसे सटीक भाषांतर होता, किंतु कुछ पाठकों के बाद निर्देशक, लेखक और मेरे बीच चर्चा पर यह तय हुआ कि यह शीर्षक नाटक के मूल बिम्ब के बहुत अनुरूप नहीं हैं, अतः लेखक के सुझाव एवं सम्मति के साथ तथा निर्देशक से चर्चा के आधार पर ‘रक्त कल्याण’ नामकरण पर सहमति हुई। अतः इस नाटक का हिंदी नाम है–रक्त कल्याण।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की प्रस्तुति के बाद फिर से लेखक के साथ पूरे अनुवाद पाठ किया गया  और कतिपय किए गए। दूसरे अंक के पाँचवे दृश्य को लेखक ने फिर से लिखा। इस प्रकार ‘रक्त कल्याण’ अपने परिमार्जित रूप में हिन्दी में प्रकाशित हो रहा है- मुझे इसका संतोष हैं।

-रामगोपाल बजाज



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