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एक प्लेट सैलाब

मन्नू भंडारी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3784
आईएसबीएन :81-7119-707-8

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ कहानी संग्रह

Ek Plate Sailab-1

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नई नौकरी

टाई की नॉट ठीक करते हुए कुन्दन आदेश देता जा रहा था-‘‘सोफ़े का कपड़ा कम पड़ गया है, तुम खुद लाकर दे देना। इनके ज़िम्मे कर दिया तो समझो सब चौपट। दरवाज़े, खिड़कियों का वार्निश आज ज़रूर पूरा हो जाना चाहिए। और देखो, प्लम्बर आएगा तो जहाँ-तहाँ के नल और पाइप खराब हों, सब ठीक करवा लेना।’’
रमा पीछे खड़ी सामने के आईने में पड़ते कुन्दन के प्रतिबिम्ब को देख रही थी। उसे लग रहा था नई नौकरी के साथ कुन्दन की सारी पर्सनेलिटी ही नहीं, बात करने का लहजा तक बदल गया है। कितना आत्मविश्वास आ गया है सारे व्यक्तित्व में ! रौब जैसे टपका पड़ता है।

होंठों के कोनों में चुरुट दबाए, जाने से पहले उसने सारे घर का एक चक्कर लगाया। यह भी रोज़ का एक क्रम हो गया था। पीछे के बरामदे में दर्जी सोफ़े के कवर्स सिलाई कर रहा था। कुछ दूर खड़ा मिस्त्री, छोटे-छोटे टिनों में वार्निश तैयार करते लड़के को कुछ आदेश दे रहा था। कुन्दन को देखकर उसे सलाम ठोका। ‘‘अब्दुल मियाँ, काम आज पूरा हो जाना चाहिए, तुम्हारा काम बहुत स्लो चल रहा है।’’
‘‘काम भी तो देखए सरकार ! समय चाहे दो दिन का ज़्यादा लग जाए, पर आपको शिकायत का मौक़ा नहीं दूँगा। मैं साहब काम की क्वालिटी पर....’’

‘‘अच्छा....अच्छा...’’ कुन्दन लौट आया। ड्राइंग-रूम के पार्टीशन पर नज़र पड़ते ही कहा-‘‘इन्टीरियर-डेकोरेटर्स’ वालों के यहाँ फ़ोन ज़रूर कर देना। यह पार्टीशन बिल्कुल नहीं चलेगा। डिज़ाइन क्या बताया था, बनवा क्या दिया, रबिश।’’
कुन्दन गाड़ी में बैठा। रमा पोर्टिको की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ी थी, उसे लगा, जाने से पहले एक बार वह फिर सारे आदेशों को दोहराएगा, पर नहीं। गाड़ी स्टार्ट करके, खिड़की से ज़रा-सा हाथ निकालकर हल्के से हिलाते हुए कहा-‘अच्छा, बा....बाई’, तो उसे ख़याल आया कि यह तो उसकी आदत थी कि गाड़ी में बैकठकर चलने से पहले नौकर के सामने बताए हुए सारे काम फिर से दोहरा दिया करती थी।
तब कुन्दन हँसता हुआ कहता था-‘‘बस भी करो यार, अब कितनी बार दोहराओगी। तुम इतनी बार कहती हो इसी से वह गड़बड़ा जाता है।’’

गाड़ी लाल बजरी की सड़क पर तैरती हुई फाटक से बाहर निकली और दूर होती हुई अदृश्य हो गई।
रमा को लगा जैसे कुन्दन उसे पीछे छोड़कर आगे निकल गया है....बहुत आगे। जैसे वह अकेली रह गई है। एक महीने पहले वह भी कुन्दन के साथ ही निकला करती थी, कुन्दन उसे कॉलेज छोड़ता हुआ ऑफिस जाया करता था। पर अकेलेपन की यह अनुभूति तभी तक रहती जब तक वह पोर्टिको फर्नीचर शीशों के दरवाजों और खिड़कियों पर झूलते लम्बे-लम्बे परदे मिस्त्रियों की खटपट, नए-नए डिस्टेम्पर और वार्निश की हल्की-सी गन्ध के बीच न जाने कहाँ डूब जाती।
काम की एक लिस्ट उसके पास होती, जिन्हें उसे पूरा करना होता; काम करते मिस्त्रियों को देखना होता; मार्केट के दो एक चक्कर लगाने होते....और यह सब करते-करते ही शाम हो जाती। ट्रिंग-ट्रिंग...ट्रिंग-ट्रिंग...
फ़ोन उठाकर उसने नम्बर बोला, ‘‘कौन मिसेज़ बर्मन ? कहिए-कहिए, क्या ख़बर है ?’’
मिसेज बर्मन शिकायत कर रही थीं, ‘‘कॉलेज छोड़े महीना होने आया, एक बार सूरत तक नहीं दिखाई। आउट ऑफ साइट....’’

‘‘अरे नहीं-नहीं’’, रमा ने बात बीच में ही काट दी। उसने थोड़ा-सा झुककर कोहनी मेज़ पर टिका ली। उलटे हाथ में पैंसिल लेकर वह फ़ोन का सन्देशा लेने के लिए जो पैड रखा था, उस पर यों ही आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने लगी।
‘‘आज लंच के समय आओ न, साथ बैठकर खाएँगे। तुम्हारे चले जाने से हमारा डिपार्टमेंट तो सूना ही हो गया। लंच के समय तो तुम्हें बहुत ही मिस करते हैं। और एक तुम हो कि जाने के बाद ख़बर तक नहीं ली...’’।
‘‘क्या बताऊँ, इस नए घर को ठीक कराने के चक्कर में इतनी व्यस्त रही कि उधर आ ही नहीं सकी। अच्चा यह बताइए सुधा, मालती, जयन्ती सब कैसी हैं ?’’
‘‘कहा न, आज आ जाओ। सबसे मिल भी लेना, खाना भी साथ खाएँगे।’’
‘‘आज ?’’ और एक क्षण को मन के भीतरी-स्तर पर आज के सारे कामों की लिस्ट तैर सी गई-‘‘आज तो सम्भव नहीं होगा मिसेज बर्मन।’’ क्षमायाचना के से स्वर में वह बोली, ‘‘बस एक सप्ताह और ठहर जाइए, फिर अपने इस नए घर की पार्टी दूँगी...देखिए अपनी रमा का कमाल....देखेंगी तो पता लगेगा कि एक महीने तक क्या करती रही।’’ फिर और दो-चार इधर-उधर की बातें और हल्की फुल्की सी मज़ाकें हुईं और रमा ने फ़ोन रख दिया।

फ़ोन रखने के बाद नए सिरे से इस बात का बोध हुआ कि कॉलेज छो़डे उसे अट्ठाईस दिन हो गए। जाना तो दूर, उसे कभी ख़याल भी नहीं आया वहाँ का। आश्चर्य के साथ-साथ उसे थोड़ी सी ग्लानि भी हुई; वह क्यों नहीं गई, कैसे रह सकी बिना गए। आज बर्मन का फ़ोन नहीं आया तो पता नहीं और भी कितने दिनों तक उसे उधर का खयाल ही नहीं आता। क्या सचमुच वह बड़े अफ़सर की बीवी बन गई है ? उसे मज़ाक में कसा हुआ जयन्ती का रिमार्क याद आया।
एकाएक मन हुआ कि अभी चल पड़े। एक बार सबसे मिल ही आए। मना करने के बाद पहुँचकर वह सबको प्लेज़ेंट सरप्राइज़ देगी। उसने रसोई में जाकर दस बारह आलू के पराँठे और चाट तैयार करने को कहा। ये दोनों चीज़ें वहाँ सबको बहुत पसन्द थीं। सारे डिपार्टमेंट में वह और मिसेज़ बर्मन ही विवाहित थीं...बाकी सब कॉलेज हॉस्टल में रहती थीं और अच्छी-अच्छी चीज़ें खाने की उनकी फ़र्माइशें बनी ही रहती थीं।

उसे अपनी फेयरवैल पार्टी की याद आई। साढ़े दस साल की सर्विस थी। प्रिंसिपल ने अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ फूलों के बड़े-बड़े गुलदस्तों के बीच पार्कर पेन का एक सैट रखकर दिया था-‘‘मिसेज चोपड़ा आप इसी पेन से अपनी थीसिस पूरी करिए। जब भी वापस काम करने का मन हो, बिना किसी संकोच के चली आइए, यहाँ आपका हमेशा ही स्वागत है।’’ उसके डिपार्टमेंट की सभी लेक्चरर्स गाड़ी तक छोड़ने आई थीं-भई रमाजी, कॉलेज भले ही छोड़ दीजिए, पर लंच के समय खाना लेकर ज़रूर आ जाया करिए’ तो उसकी नम आँखों में भी हँसी चमक उठी थी। तब उसे कुन्दन की बात याद हो आई थी-‘‘तुम वहाँ पढ़ाने जाती हो या खाने ! फ़ोन पर भी जब तुम लोगों की बातें होती हैं तो खाना ही डिस्कस होता है।’’ उसने केवल उन लोगों से ही नहीं कहा था, बल्कि मन में भी सोचा था कि लंच के समय वह कॉलेज चली ही जाया करेगी। आखिर उसे भी तो अपने को कॉलेज से एकदम काट लेने में काफी कष्ट होगा...इस तरह धीरे-धीरे तो फिर भी....
तो क्या कुन्दन ने ठीक ही कहा था ? कॉलेज छोड़ने का निर्णय लेकर वह चुपचाप रो रही थी और कुन्दन उसे समझा रहा था-मैं कह रहा हूँ, तुम्हें कतई अकेलापन नहीं लगेगा, तुम ज़रा भी कमी महसूस नहीं करोगी; रादर यू बिल फ़ील रिलीव्ड। कितना स्ट्रेन है तुम पर आजकल।

कुन्दन को एकाएक विदेशी कम्पनी में इतनी बड़ी नौकरी मिल जाएगी, इसकी आशा औरों को चाहे रही भी हो, कुन्दन को बिल्कुल नहीं थी। डॉ. फिशर से पिछले आठ-साल से उसके सम्बन्ध थे, विशुद्ध व्यावसायिक सम्बन्ध। उनकी प्रशंसा और सद्व्यवहार को भी वह व्यावसायिक औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं मानता था पर....
दस बारह दिन तक केवल जश्न ही मनाया था रमा और कुन्दन ने। पैसे की उसे इतनी लालसा नहीं थी, पर मारवाड़ी कन्सर्न का काम उसके टेम्परामेंट के बिल्कुल अनुकूल नहीं था। रमा इस नए माहौल से नितान्त अपरिचित नहीं थी-क्लब, डांस, डिनर, कॉक्टेल यह सब वह बचपन से देखती आई थी, पर बस देखती ही आई थी, उसमें अपने को कभी घुला नहीं पाई थी।

डॉ. फिशर ने कुन्दन को नौकरी ही नहीं दी थी, धीरे-धीरे वे उसकी सारी ज़िन्दगी का पैटर्न भी तय कर रहे थे। उसे दो-तीन क्लबों का मेम्बर बनाना पड़ा। आए दिन दूसरी कम्पनियों के बड़े-बड़े अफ़सरों को एंटरटेन करना पड़ता। विदेशियों को हिन्दुस्तानी खाना खिलाने के बहाने उसे घर में भी बड़ी-बड़ी पार्टियाँ करनी पड़तीं और तीन महीने पहले उसे कम्पनी की ओर से यह फ्लैट मिल गया। उसने सोचा, वह अपने इस नए घर को निहायत ही ओरिऐंटल ढंग से सजाएगा, विदेशियों के लिए तो यही नवीनता होगा।
 
पर घर के लिए नया फ़र्नीचर बनवाने, चुन-चुनकर चीज़ें खरीदने के लिए दोनों में से किसी के पास भी समय नहीं था। कुन्दन चाहता था यह काम रमा को ही करना चाहिए; क्योंकि यह काम उसी का था....फिर उसकी सुरुचि और सुघड़ता के तो हल्ले भी ये मित्रों के बीच में पर रमा के पास समय ही नहीं रहता। सबेरे उठकर वह बंटी को तैयार करके स्कूल भेजती। फिर खुद तैयार होती। तैयार होते-होते ही वह नौकर को आदेश देती जाती, सारे दिन का काम समझाती; नाश्ता करते-करते वह अपना लेक्चर तैयार करती, तैयार तो क्या करती बस सूँघ भर लेती। फिर नौ बजे कुन्दन के साथ ही निकल जाती। तीन के करीब वह लौटती...थोड़ा आराम करती और फिर शाम की तैयारी। बाहर नहीं जाना होता था तो घर में किसी को आना रहता था।

रात ग्यारह साढ़े ग्यारह पर वह सोती तो थककर चूर हो जाती। कुन्दन को उस समय हल्की सी खुमारी चढ़ी रहती, कहता-‘‘डोंट बी सिली। पार्टी में कैसे थक जाती हो ? गाड़ी में बैठकर जाती हो...खाना पीना, हँसी मज़ाक इनमें भी कहीं थका जाता है ? गाड़ी में बिठाकर ले आता हूँ।’’
रमा तब केवल सूनी-सूनी आँखों से उसे देखती रहती। मन की भीतरी पर्तों पर हिस्ट्री के वे टॉपिक्स तैरते रहते जो उसे कल पढ़ाने होते, और जिन्हें वह जबरन ही दिमाग से बाहर ठेलने का प्रयास करती रहती। कुन्दन उसे बताता रहता कि डॉ. फिशर उससे कितने खुश हैं, कितना इम्प्रेस कर रखा है उसने; एकाएक ही उसे अपना भविष्य बहुत उज्ज्वल दिखाई देने लगा है। पता नहीं थकान के कारण या किसी और वज़ह से वह उतना उत्साह नहीं दिखा पाती तो कुन्दन बिगड़ पड़ता-क्या बात है, देखता हूँ तुम्हें कोई दिलचस्पी ही नहीं है मेरे राइज में...यू सीम टूबी...’’
‘‘क्या बेकार की बातें करते हो, मुझे नींद आ रही है।’’

कभी कुन्दन फ़ोन पर कह देता कि ठीक सात बजे तैयार होकर रहना और आकर देखता कि वह तैयार हो रही है तो बिगड़ पड़ता-‘‘रमा, तुम्हें टाइम की सेंस कब आएगी...कभी घर पर खाना होता और कोई कसर रह जाती तो रात में बड़े सँभलकर कहता-‘‘मैं यह नहीं कहता कि तुम खाना बनाओ...तीन-तीन नौकर तुम्हारे पास हैं, पर ज़रा-सा देखभर लिया करो।’’ ऐसे मौक़ों पर रमा कुछ नहीं कहती।
उस दिन कॉलेज में रमा को एक पेपर पढ़ना था। उसने खुद ही ऑफ़र किया था। सोचा था, इसी बहाने एक टॉपिक तैयार हो जाएगा, पर बिल्कुल भी तैयार नहीं कर पाई। रात में लेटी तो रोना आ गया।
‘‘मुझसे यह सब निभता नहीं।’’ लौटकर बिना कपड़े बदले ही कटे पेड़ की तरह पलँग पर गिरकर उसने कहा।
‘‘क्या नहीं निभता ?’’

‘‘यह रवैया मेरे बस का नहीं है। कितना गिल्टी फ़ील करती हूँ। बिना तैयार किए पढ़ाना, लगता है जैसे लड़कियों को चीट कर रही हूँ। दो घंटे का समय भी तो मुझे अपने लिए नहीं मिलता।’’
कुन्दन सोच रहा था कि रात में रमा के साथ वह एक एक कमरे को अरेंज करने की योजना बनाएगा। कलर स्कीम के लिए उसने जेन्सन निकलसनवालों से बात की थी। रमा की बात सुनी तो चुप रह गया।
‘बंटी की रिपोर्ट देखी ?’’ हमेशा फर्स्ट आया करता था, इस बार सेकेंड आया था।’’
बगल में लेटकर, रमा को अपनी ओर खींचते हुए कुन्दन ने बहुत प्यार भरे लहजे में कहा-‘‘तो तुम उसे पढ़ाया करो !’’
‘‘कब पढ़ाया करूँ, तुम्हीं बताओ ? शाम को पाँच से सात बजे का जो समय मिलता है, उसमें वह खेलने जाता है।’’
‘‘तो तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ ?’’ बालों में हाथ फेरते हुए कुन्दन ने बहुत ही मुलायम स्वर में पूछा।
‘‘कल मुझे पेपर पढ़ना है। पन्द्रह दिन पहले टॉपिक मिला था। एक लाइन भी नहीं लिखी है...अब कोई झूठा बहाना ही तो बनाना पड़ेगा।’’

कुन्दन की उँगलियाँ बालों पर से उतरकर गालों पर फिसलने लगीं।
‘‘दस साल पूरे हुए...छः, आठ महीने में अपनी थीसिस सबमिट कर देती तो मेरा सिलेक्शन ग्रेड में आना निश्चित ही था, पर ऐसी हालत रही तो।’’
रमा रो पड़ी।
दूर कहीं कुन्दन के कानों में डॉ. फ़िशर के शब्द गूँज रहे थे-जनवरी में जर्मनी से डाइरेक्टर आनेवाले हैं, हमें यहाँ का सारा काम दिखाना होगा। एक नया प्लांट बिठाने की भी योजना है, उसके लिए कुछ रिसपॉन्सिबल लोगों की ज़रूरत होगी....सम स्मार्ट यंग मैन। बिजनेस में सोशल कॉन्टेक्ट्स पे करते हैं। यू विल हैव टुबी वैरी सोशल।’’
कुन्दन को इन बातों में हमेशा अपने लिए कुछ संकेत, कुछ आश्वासन मिलते।
‘‘लकीली योर वाइफ़....’’

‘‘तुम मुझे छोड़े जाया करो। कोई ज़रूरी है कि मैं हर दिन तुम्हारे साथ ही जाया करूँ ?’’
कुन्दन कुछ देर उसे यों ही सहलाता रहा, फिर एकएक उसे बाँहों में भरता-सा बोला-‘‘तुम्हें छोड़कर आज तक मैं कहीं गया हूँ, जा सकता हूँ। ऑफिस के अलावा हमेशा हम साथ जाते हैं। तुम तो जानती हो कि तुम्हारे बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।’’
रमा खुद इस बात को जानती है। उनका आठ साल का विवाहित जीवन दोस्तों के बीच ईर्ष्या और प्रशंसा का विषय रहा है। समझ नहीं पाई क्या कहे ! वह जब तक सो नहीं गई, कुन्दन उसे प्यार से थपथपाता रहा था।
‘‘मेम साहब, पराँठे अभी बनेंगे ?’’
‘‘...ऐं ?’’ चौंकते हुए रमा ने पूछा। फिर बोली-‘‘नहीं-नहीं, साढ़े बारह बजे बनाना है, एक बजे हम कॉलेज जाएँगे आज। जितने में एक चक्कर बाजार का लगा आऊँ और सोफे का कपड़ा लाकर दे दूँ।’’ उसने एक बार भीतर जाकर मिस्त्रियों को याद दिला दिया कि आज पॉलिश हर हालत में ख़त्म कर देनी है।

फिर अपनी डायरी देखी-बाज़ार से और क्या-क्या सामान लाना है। कपड़े बदलने अन्दर गई तो देखा नौकर ने रैक से सारी किताबें निकाल रखी थीं और पोंछकर जमा रहा था।
इनमें से एक किताब भी उसने नहीं पढ़ी है, कुछ पर तो अभी तक अपना नाम भी नहीं लिखा है। कुन्दन ने भी जोश में आकर एक दिन में इतनी ढेर-सी किताबें खरीदकर सामने रख दी थीं।
बात शुरू दूसरे स्तर पर हुई थी। कुन्दन ऑफ़िस से लौटा था तो बिना किसी प्रसंग के रमा ने कहा-‘‘मैं कॉलेज छोड़ दूँगी। इस तरह काम करने से तो नहीं करना ज्यादा अच्छा है।’’ स्वर में न कहीं तल्खी थी न शिकायत, बड़े सहज स्वर में उसने कहा था।
कुन्दन देखता रहा। यही वाक्य था जिसे उसने अनेक तरह से मन-ही-मन में दोहराया था, पर कहने का मौका नहीं मिला था। अब तो उसे यह और भी ज़रूरी लग रहा था। क्योंकि जनवरी तक उसे अपना सारा घर डेकोरेट करना था....ओरिएंटल स्टाइल पर। फिर भी उसने पूछा-‘‘क्या बात हो गई ?’’
‘‘कुछ नहीं।’’

कुन्दन को इस समय और बात खींचना अच्छा नहीं लगा। चाय का प्याला हाथ में लिए ही लॉन में निकल गया। कैक्टस की जितनी वैराइटी ला सकता था, लाकर फाटक के दोनों ओर बड़ी खूबसूरत रॉकरीज़ बनाई थीं। पर लॉन से वह अभी भी सन्तुष्ट नहीं था। चाहता था लॉन पर्शियन कार्पेट में बदल जाए।
रात में फिर वहीं प्रसंग चला। कुन्दन उससे बचना भी चाहता था और जानना भी चाहता था कि रमा ने सचमुच ही यह निर्णय ले लिया है या कि केवल कुन्दन पर अपना आक्रोश प्रकट कर रही है। पर रमा ने केवल इतना ही कहा-‘‘अब निभता नहीं, कल इस्तीफा दें दूँगी।’’
स्वर के भीगेपन ने कुन्दन को भी कहीं से छुआ ज़रूर फिर भी सारी बात को एक हल्के मजाक में बदलने के लहज़े से उसने कहा, ‘छोड़ो भी यार, वैसे भी क्या रखा है एंशिएंट हिस्ट्री पढ़ाने में ! चोल वंश, चेदिवंश के बारे में न भी जानेंगे तो कौन-सी ज़िन्दगी हराम हो जाएगी।’’

रमा चुप !
‘‘इससे तो तुम खूब किताबें पढ़ो, मैगजीन्स पढ़ो...कुछ छुटपुट क्लासेज अटेंड कर लो। बंटी को पढ़ाओ। दुनियाभर के बच्चों को पढ़ाओ और अपना बच्चा निगलेक्ट हो...’’
रमा चुप !
कुन्दन उस चुप्पी पर खीज़ आया, फिर भी अपने स्वर को भरसक संयत बनाकर बोला, ‘‘तुम्हें शायद लग रहा है कि मेरी वजह से, इस नई नौकरी की वजह से तुम्हें अपना काम छोड़ना पड़ रहा है...पर यह तो सोचो, मुझे ही इस नौकरी में क्या दिलचस्पी है ? तुम्हारे लिए, बंटी के लिए...’’

मैंने तो ऐसा नहीं कहा। मैं तो यही सोच रही थी कि आखिर मेरे मन के सन्तोष के लिए क्या होगा ?’’
‘‘मेरा सन्तोष, तुम्हारा सन्तोष नहीं है, मेरी तरक्की, तुम्हारी तरक्की नहीं है ?’’
‘‘है क्यों नहीं ? मेरा यह मतलब नहीं था। दस साल से काम कर रही थी...छोड़ दूँगी तो मेरा मन कैसे लगेगा ?’’
‘‘मैं तो सोचता हूँ, तुम्हें यह सब सोचने का समय ही नहीं मिलेगा।’’ और शाम को उसने तीन बंडल किताबें लाकर उसके सामने रख दी थीं।
और सच उसके बाद उसे यह सब सोचने का समय ही कब मिला। आज भी मिसेज़ बर्मन के टेलीफ़ोन ने ही उसे कॉलेज की याद दिलाई, वरना...

सारे दिन गाड़ी में घूम-घूमकर उसने घर का सामान खरीदा है। पर्दों के लिए उसने लूमवालों से यह तय किया कि चालीस गज कपड़ा बनाकर वह उसे डिजाइन को नष्ट कर देंगे, जिससे उसके जैसे पर्दे और कहीं देखने को भी न मिलें। डिज़ाइन भी उसने खुद पसन्द करके बनवाया था।
राजस्थान की किसी रियासत का बहुत सा सामान नीलाम हुआ था। कितने दिनों तक वह वहाँ जा-जाकर बैठी थी-पुरानी पेंटिग्ज़ झाड़-फ़ानूस और भी सजावट की छोटी-मोटी चीज़ें उसने ख़रीदी थीं।
आज दरवाजों का पॉलिश समाप्त हो जाएगा तो सारा सामान जमाना है। डाइरेक्टर मुम्बई आ गए हैं, अगले सप्ताह तक यहाँ आ जाएँगे, तब तक वह सब जमा लेगी। ‘इंटीरियर डेकोरेटर्स वालों के यहाँ से एक आदमी बराबर आता रहा है। तभी उसे फ़ोन करने का ख़याल आया।
लाइन एंगेज्ड थी।

वह बहार जाने के लिए निकल ही रही थी कि टेलीफोन की घंटी बजी। रमा ने रिसीवर उठाकर अपना नम्बर बोला, ‘‘ओह, मैं सोच रहा था, तुम कहीं मार्केट के लिए नहीं निकल गई होओ।’’
‘‘बस निकल ही रही थी।’’
‘‘सुनो डार्लिंग, लंच पर मेरे साथ एक साहब होंगे, यहीं के हैं, बहुत फॉर्मल होने की ज़रूरत नहीं है, बस ज़रा सा देख लेना। डेकोरेटर को फ़ोन किया ?’’
‘‘किया था पर लाइन नहीं मिली, लौटकर फिर करूँगीं।’’
‘‘ओ.के.।’’ खट !
रसोई में जाकर रमा ने कहा-‘‘थोड़ी सब्जियाँ उबालकर इन उबले हुए आलुओं में मिला दो। पराँठे नहीं बनेंगे, वेजिटेबल बना देना।’’
फिर उसने फ्रिज खोलकर देखा-सबकुछ था। जब वह कॉलेज जाती थी तो कुन्दन का लंच ऑफ़िस जाता था, पर आजकल वह लंच के लिए घर ही आता है।
 

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