पाशमुक्ति - श्रीनिवास वत्स Paashmukti - Hindi book by - Srinivas Vats
लोगों की राय

कहानी संग्रह >> पाशमुक्ति

पाशमुक्ति

श्रीनिवास वत्स

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3791
आईएसबीएन :81-214-0230-1

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

448 पाठक हैं

मानवी संवेदनाओं को चित्रित करती कहानियां....

pashmukti

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


मानवीय संबंध रेशमी धागों जैसे हैं। इन्हीं से बनता है परिवारिक ताना-बाना। अदृश्य रूप से एक का दर्द सहता है दूसरा सदस्य और हर्ष-विषाद सब साझे। आपसी रिश्तों की यह धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। समय के साथ कुछ पुराने सहचर विलुप्त हो जाते हैं तो उनका स्थान लेने आ जाते हैं कुछ नये। लेकिन जीवन में कुछ स्थान ऐसे भी हैं जो किसी के जाने के बाद जीवन पर्यंत रिक्त ही रहते हैं। जैसे अंधेरे में चौखट के पास पड़ी कोई वस्तु आने-जाने वालों के पैरों से टकराती है। ठोकर लगती है पर दिखाई कुछ नहीं देता। एवमेव भावनाओं के संवेग में ये रिक्त स्थान उद्वेलित करते रहते हैं।

‘भावानुभावव्यभिचारसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’ भाव-अनुभावों के इस संयोग से जिस रस की निष्पत्ति हुई उसका आवरण मन-मस्तिष्क को चंदन लेप की भांति शीतलता प्रदान करता है।
मानवीय संवेदनाओं को चित्रित करतीं ये कहानियां भावनाओं के संवेग को गति प्रदान कर उन सुषुप्त भावों को चेतन कर देती हैं जिनके प्रकाश में बूढ़ी मां का आशीर्वाद मुद्रा में उठा झुर्रीदार हाथ, परिजनों के चक्षुओं में अपेक्षाओं की आकाश गंगा, भैया-भगिनी के मध्य अकाट्य स्नेह तथा और भी बहुत कुछ अवलोकित होने लगता है।
संवेदन शून्य होते जा रहे समाज में ह्रासोन्मुख मानवीय मूल्यों को भले ही ‘प्रगति’ नाम दे दें, पर कहीं न कहीं यह प्रगति आत्मघाती सिद्ध होगी।

हिंदी की शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित श्रीनिवास वत्स की इन कहानियों में मानवीय संवेदनाओं का सुंदर चित्रण हुआ है। अवलंबन मानव प्रकृति में है। आश्रय की इस परिपाटी को मिटाया नहीं जा सकता। पारस्परिक अवलंबन का संदेश देती इन कहानियों को पढ़ कर मनुष्य स्वावलंबन की शक्ति का अनुभव करेगा।
अस्तु, पाठक की पारखी नजर के सम्मुख हाथ कंगन को आरसी क्या...

स्वपक्ष


‘एको रसः करुण एव निमित्त भेदात्’, कह कर भवभूति ने करुण रस को रसराज सिद्ध करने का प्रयास किया था। नौ रसों में करुण रस का स्थान क्या है इस संबंध में आचार्यों में मत-मतांतर हो सकते हैं, परंतु करुण रस को जिन्होंने हृदयंगम कर इसके परम आनंद का रसास्वादन किया है, वे सचमुच इसे रसराज ही कहेंगे। अब चाहे वे प्रिय प्रेयसी माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन या फिर भक्त अथवा भगवान ही क्यों न हों।
करुण रस का आधार है प्रेम। प्रेम को संबंधों का सम्राट कहा जाता है। प्रेम में डूबे चक्षुओं से बहती अश्रुधारा जब करुण लय छेड़ती हुई हृदय के तारों को झनझना देती है तो करुण रस स्वतः ही रसाधिपति होने का आभास देने लगता है।
बाल्यकाल किशोर अवस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था, इन सब में सर्वाधिक भावुक काल किशोरावस्था का ही होता है। न जाने क्यों, किशोर अपने आपको अकेला सा अनुभव करता है। इस अवस्था में लाड़-दुलार, फटकार में परिवर्तित हो जाता है।

बच्चे उसे बड़ा मान कर उसके साथ हिल-मिल नहीं पाते। वहीं युवा उसे अभी भी बच्चा समझ दुत्कार देते हैं। ऐसी स्थिति में बेचारा किशोर छटपटाहट लिये कुछ सोचता रहता है। भावनाओं का आवेग हिलोरें मारता है और ऐसे में हृदय के किसी कोने से फूट पड़ती है कोई कविता या कहानी। यही कारण है कि दुनिया के प्रायः सभी लेखकों कवियों में लेखकीय गुणों का अंकुरण किशोरावस्था में ही हुआ है। बाद में उसमें प्रौढ़ता, प्रांजलता भले ही आ जाये पर कल्पना लोक के जो सुनहरे स्वप्न किशोर देखता है, अन्य अवस्थाओं में मनुष्य वहां तक पहुंच भी नहीं पाता।
यहां इन सब बातों का उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूं कि इस संग्रह में संगृहित मेरी अधिकांश रचनाएं इसी अवस्था में लिखी गयी थीं। समय-समय पर मैंने इनमें संशोधन भी किया, क्योंकि बीस साल पहले लिखी रचना बीस वर्ष बाद बचकानी तो लगेगी ही। लेकिन बचपन की तुतलाती बोली का अपना आकर्षण होता है। इसलिए मैं जब कभी इन कहानियों में संशोधन करने बैठता, इस बात का विशेष ध्यान रखता था कि उस अवस्था में मूल भावों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न होने पाये। और आज मुझे इस बात का संतोष है कि इन कहानियों की भाषा या शैली में किंचित् बदलाव लाने के अतिरिक्त इनमें निहित अंतर्भावों को जस का तस रखने में मैं सफल रहा हूँ।

अधिकांश रचनाओं का सृजन काल आठवां दशक है। कुछ कहानियां बाद में भी लिखी गयी हैं। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी, नयी दुनिया, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक ट्रिब्यून, हरिगंधा आदि पत्र पत्रिकाओं ने इन्हें प्रकाशन योग्य समझा और आकर्षक रूप में प्रकाशित कर मेरा उत्साहवर्धन किया। भिन्न-भिन्न वर्षों में तीन कहानियों को हरियाणा साहित्य अकादमी ने प्रथम पुरस्कार दे कर पुरस्कृत भी किया।
इस प्रकार कहानी लेखन, जिसे मैं अपने लेखन की मूल विधा मानता हूँ, से भावनात्मक लगाव होना स्वाभाविक था यद्यपि बाद में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के नियमित स्तंभों के लेखन में व्यस्त होने के कारण कहानी लेखन में व्यवधान आया परंतु मुझे विश्वास है कि भविष्य में मैं कुछ अच्छी कहानियां लिख पाऊंगा। साथ ही उसी अवस्था में लिखी पंद्रह अन्य कहानियों के संग्रह को भी अंतिम रूम देना अभी बाक़ी है।
‘प’ वर्ण कई कारणों से मुझे प्रिय रहा है इसलिए मेरी सभी कहानियों के शीर्षक ‘प’ वर्ण से प्रारंभ होते हैं।
इस कथा संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। इत्यलम्।

-श्रीनिवास वत्स


पिंजरा



पिताजी जब भी बाहर से आते, घर में अजीब तरह की चुप्पी छा जाती थी। किसी की क्या मजाल जो चूं भी कर दे। उनकी आँखों के गांभीर्य का ही प्रभाव था कि हम तीनों भाई-बहन पहले भले ही फूट-फुटव्वल हो लें, पर उनकी पदचाप सुनते ही तुरंत समझौता करना पड़ता था, क्योंकि किसी की इतनी हिम्मत कहां कि पिताजी के सामने दूसरे की शिकायत कर सके।
जब कभी मैं अपने मित्र के घर जाता तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता। वहां छोटे बच्चे अपने पिता के कंधों पर चढ़ कर लुढ़क रहे होते थे। एक सुखद सी अनुभूति होती। परंतु हमारे यहां बा अदब, बा मुलाहिज़ा होशियार पिता जी पधार रहे हैं।
खैर, अब तो ऐसे वातावरण में रहने की आदत सी बन गयी है। हम भाई-बहनों में छोटी बहन नम्रता ने पिता जी के सामने जुबान खोलने का थोड़ा अधिकार पा लिया था। वह है भी तो चालाक। उनके मूड को भांप लेती है और जैसी परिस्थितियों हो तदनुकूल व्यवहार वार्तालाप करके स्वार्थपूर्ति कर लेती है।

पिता जी घर में अनुशासन की मूर्ति समझे जाते हैं। क्या मजाल उनके कमरे से कोई चीज इधर-उधर हो जाये। सारा घर सिर पर उठा लेते, ‘खूंटी पर बनियान टंगा था, कहां गया ? यहां चाकू रखा था।’ हमारी मां दौड़ी-दौड़ी आतीं और तुरंत उनकी वांछित वस्तु ढूंढ़ कर उन्हें सौंपती। इतने तक पिता जी ग़ुस्से से बड़बड़ाते रहते।
जब पिता जी दफ़्तर चले जाते तो हमें कुछ शांति सी मिलती। चलो, अब कुछ घंटे आराम से मौज मस्ती करेंगे। वे पांच बजे आयेंगे और हम स्कूल की छुट्टी होने से ले कर उनके आने तक स्वतंत्र। पेड़ पर चढ़े गुल्ली डंडा खेलें या गली में दौड़े।
समय के साथ साथ हमें नम्रता से भी डर लगने लगा। वह पिता जी की मुंहबोली बिटिया जो थी। उसे अपने वर्चस्व का पता था। इसी कारण धौंस दिखायी रहती।

पिता जी की एक विशिष्ट छवि हमारे मस्तिष्क में बन गयी थी और जैसे जैसे समय गुज़रता गया हम उसके आदी होते चले गये। उम्र के साथ पिता जी का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था। हमारी मां के साथ तो उनकी बहुत कम बनती थी। प्रायः किसी न किसी बात पर तू तू–मैं मैं होती रहती। कई कई दिन बोलचाल बंद फिर स्वतः ही मान जाते।
न जाने उनका पारस्परिक संबंध कैसा था ? मां के थोड़ी देर पहले किये जीवन भर न बोलने के दावे आंखों के आंसुओं के साथ लोप होते जाते। उन्होंने रसोई को कोप भवन बना रखा था।
हम सोचते, अब पिता जी को खाने को कौन कहेगा ? पर यह क्या ? वे ख़ुद ही रसोई में चले आ रहे हैं। दो चार और खरी खोटी सुना दीं ताकि मैया उनसे बोल पड़े। कहते थे, ‘जैसे जहर जहर को मारता है वैसे ही गुस्से को गुस्सा खत्म करता है। क्रोध के गुबार को पूरा निकाल दो, नहीं तो यह फिर तंग करेगा।’’
मां पिता जी को खाना खिलाये बिना अन्य जल ग्रहण नहीं करती थीं। बचपन में हो सोचते यह भी क्या ? एक तो झगड़ते रहते हैं, ऊपर से उन्हें खिलाये बिना खायेंगी नहीं। उन्हें आने में जरा सी देर हो जाती तो कई बार खिड़की से बाहर झांकतीं।

समय के साथ हम भी बड़े हो गये। नम्रता की शादी कर दी। मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी करने लगा।
 
जिस दिन पिता जी दफ़्तर से रिटायर हुए हमें लगा, घर में कुछ भारीपन सा हो गया। अब वे दिन भर घर पर रहेंगे। ऐसे में घर का वातावरण और अशांत हो जायेगा पर मैंने देखा, मां को कुछ अच्छा सा लगा था। कहते सुना, ‘‘चलो घर पर रहेंगे तो दौड़ धूप से बचे रहेंगे। बहुत कमा लिया, अब कुछ विश्राम भी कर लेंगे।’’
मैंने मन में सोचा, हमें क्या ? झगड़ना इन दोनों को ही है। हम तो दिन भर घर से बाहर रहेंगे।
पिता जी कुछ देर लायब्रेरी चले जाते। पर आते ही अगर उनकी चाय को जरा सा विलंब हो गया तो बच्चों की तरह घर सिर पर उठा लेते। कभी दाल में नमक कम बताते तो कभी सब्जी में मिर्च ज़्यादा। माता जी नितांत श्रद्धा से पति सेवा का पुण्य अर्जित कर रही थीं। कई बार बातों बातों में हमसे कह देतीं, ‘‘तुम्हारे पिता जी देवता हैं। ऐसे आदमी सौभाग्य से मिलते हैं।’’
मैंने पूछा, ‘‘देवता हैं तो बात बात में आप आंसू क्यों बहाती हैं ?’’
कहने लगीं, ‘‘कुछ दिन में तुम्हारी शादी हो जायेगी। आखिर हो तो तुम इन्हीं की संतान। अपनी पत्नी से झगड़ोगे ज़रूर। फिर पूछूंगी वह तुम्हें देवता कहे या कुछ और।’’
‘‘अरे ! मैं पिता जी की तरह बिना वजह नहीं झगड़ूंगा,’’ मैं पूरी बात कहता इससे पहले ही देखा पिता जी मेरे पीछे खड़े थे। मैं खिसिया गया। वे मंद मंद मुस्करा रहे थे।
मुझे नौकरी करते तीन साल हो गये। शादी के लिए लड़की कैसी हो, इस विषय में मेरी अपनी कोई मान्यता नहीं। शक्ल-सूरत से अच्छी हो बाक़ी स्वभाव का पता तो बाद में ही चलेगा।

जो भी हो, मैं इस विषय में सौभाग्यशाली रहा। मेरे और मेरी पत्नी सविता के विचारों में काफी साम्य है।
बहू आने पर घर के काम से मां को छुटकारा मिल गया। अब वे अक्सर पिता जी के कमरे में ही बैठी रहतीं। दोनों न जाने कहां कहां के पूर्व संदर्भ ले बैठते। बातों बातों में हंसने लगते तो कभी बच्चों की भांति झगड़ पड़ते। झगड़े की इति तब होती जब मां उनके कमरे से उठ बाहर आ जातीं।

पर उन्हें चैन कहां ? आधा घंटे बाद ही चिल्ला पड़ते, ‘‘अरे, कोई पानी पिलाने वाला भी नहीं रहा क्या ?’’ इसका परोक्ष भाव मां खूब जानती थीं। मज़े लेने के लिए कई बार पानी ले कर बहू को कष्ट दे रही है, ख़ुद नहीं दे सकती।’’
मुझे अच्छी तरह याद है, वे पानी तब तक नहीं पीते जब तक मां उनके कमरे में न पहुंच जातीं।
सविता अक्सर मुझसे पूछती, ‘‘मां-बाबू जी में अजीब स्नेह है। झगड़ते भी हैं और एक दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते।’’
मैं चुप ही रहता। भला क्या जवाब दूं ? जो बात मैं तीस साल में न समझ सका उसे यह दो साल में कैसे जान पायेगी ?
पिता जी के बिस्तर से चादर बदलना, उनके कपड़ों की धुलाई, कमरे की सफाई मां स्वयं करती थीं। पिता जी को कब, कौन सा कपड़ा पहनना है, यह उनकी खूंटी पर पहले टंगा मिलता।

सर्दियों में बहुधा मां को खांसी हो जाया करती। पर इस वर्ष उनका स्वास्थ्य कुछ ज़्यादा ही ख़राब हो गया। सांस लेने में तकलीफ़ होती थी फिर भी पिता जी की सेवा में उन्होंने कमी नहीं आने दी।
मैंने उन्हें डॉक्टर को दिखाया। दवा दिलायी। डॉक्टर ने बताया, ‘‘दमे के कारण फेफड़े कमज़ोर हो गये हैं। इन्हें कई दिन पूरे विश्राम की आवश्यकता है।’’
ठिठुरती सर्दी में भी मां ने पिता जी के कपड़े स्वयं धोये। हमने बहुतेरा समझाया कि जब ठीक हो आओ तो जो जी में आये करना। वे कह देतीं, ‘‘मैं ठीक हूं।’’
एक दिन वही हुआ जिसकी आशंका थी। अचानक सांस उखड़ गयी। लंबी खांसी ने उनकी जान ले ली। चौखट के सहारे लुढ़क गयीं। अस्पताल पहुंचाना व्यर्थ सिद्ध हुआ।
मां के चले जाने पर घर में गहन सन्नाटा छा गया था। सविता तो किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गयी। मुझे भी कुछ नहीं सूझ रहा था। पिता जी को कब क्या चाहिए, यह समझने में कई दिन लगेंगे। मैं चिंतित था कि पिता जी का गुस्सा, जिसे मां ही सहन कर रही थीं, भला सविता कैसे सह पायेगी ? इसमें इतनी सहनशक्ति भी नहीं है। कभी कुछ बुरा भला मुंह से निकल गया तो सब किया मिट्टी में मिल जायेगा। मैंने सविता को प्यार से समझाया, ‘‘तुम पिता जी का पूरा ध्यान रखना। उन्हें मां की कमी खलने न पाये।’

सविता ने अपनी ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया था। मैं दफ़्तर जाते समय और वापस आते ही पिता जी से मिलता था।
कई दिन से मुझे लग रहा था पिता जी काफी परिवर्तित हो गये हैं। न पहले वाला गुस्सा रहा, न उतावलापन। कोई चाय दे जाये तो पी लेते हैं, पर अपनी ओर से कभी नहीं कहते।
मैंने सविता से कहा, ‘पिता जी को खाने में जो चीज़ पसंद हो, बना दिया करो।’’
वह बोली, ‘‘कहते हैं, जो बन जायेगा, खा लूंगा।’’
मां के बाद मैंने उन्हें कभी कोई शिकायत करते नहीं सुना। उनके कमरे में गहन सन्नाटा था। वही पिता जी, जिन्हें बच्चों का शोर कतई पसंद नहीं था, अब नम्रता की बेटी गरिमा महीने भर से उनके कमरे में धमा चौकड़ी मचा रही है। वे किसी को कुछ नहीं कहते। खाने में मिर्ज की अधिकता अथवा नमक की कमी से कोई उत्तेजना नहीं आती।
लगा, मां की मृत्यु ने पिता जी को अंदर से अपाहिज व जीवन के प्रति उदासीन बना दिया है। सविता बता रही थी, ‘‘बाबू जी तकिये के नीचे मां की तस्वीर रखते मैं। मैंने कल बिस्तर ठीक करते समय देखी थी।’’
आज मुझे मां की वह बात ध्यान आयी जब उन्होंने कहा था, ‘‘तुम्हारे पिता जी देवता हैं।’’ वास्तव में मुझे अब पिता जी में देवत्व नज़र आने लगा था।

रविवार छुट्टी का दिन था। दोपहर को गरिमा ने गली में पक्षियों के पिंजरे वाले एक बहेलिये को देखा। उसके पास रंग बिरंगी दो चटकाएं थीं। गरिमा कहने लगीं, मामा, एक पिंजरा ले लो।’’ दुर्लभ चिड़िया के सुंदर रंग रूप ने मेरा मन मोह लिया था।
मैंने बहेलिये से बात की। उसने बताया, ‘‘इसमें एक नर और एक मादा है। एक ही घोंसले से पकड़ा था इन्हें। एक चिड़िया की कीमत सत्तर रुपये है। दोनों लोगे तो सवा सौ रुपये लेगेंगे।’’
मुझे दो का क्या करना था। मैंने कहा, ‘‘एक पिंजरे में एक चिडिया दे दो।’’
उसने पिंजरे से एक चिड़िया निकाल कर दूसरे में डाल दी और पिंजरा मुझे थमा दिया।
मैंने देखा, जब तक वे पक्षी एक पिंजरे में थे, चुपचाप बैठे थे। अलग होते ही उन्होंने चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया। बहेलिया बोला, ‘‘एक दो दिन बाद सब भूल जायेगी।’’
मैंने पिंजरा घर के आंगन में जामुन के पेड़ पर टांग दिया। गरिमा ख़ुश थी। परंतु चिड़िया के शोर ने घर में कुहराम मचा दिया। पिता जी ने पूछा तो मैंने बताया कि हमने एक चटका ली है। दूसरी बहेलिये के पास है इसी कारण यह शोर मचा रही है।

पिता जी चुप हो कर अपने कमरे में चले गये। मैं, गरिमा और सविता चटका से बातें कर रहे थे। मैंने उसके पिंजरे में चने की दाल तथा पानी रख दिया, पर उसने कुछ नहीं खाया।
अचानक थोड़ी देर बाद मैंने देखा, पिता जी एक पिंजरा और लिये आ रहे थे। उसमें वह दूसरी चटका थी। उन्होंने दोनों को एक पिंजरे में बंद कर दिया। लगातार शोर कर रही चिड़िया अचानक चुप हो गयी। एक दूसरे के डैनो को गुदगुदाने लगीं।
मैंने पूछा, ‘‘यह क्यों ले आये ?’’ बोले ! ‘‘बेटा ! पक्षी हैं तो क्या हुआ। वियोग की पीड़ा इन्हें भी उतना ही कष्ट पहुंचाती है जितना मुझे।’’
इतना कह कर वे अपने कमरे में चले गये। थोड़ी देर बाद जब मैं पिता जी के कमरे की तरफ़ गया तो मैंने देखा वियोग की मर्मांतक पीड़ा उनकी आंखों से झलक रही थी। लगा, यह कमरा साक्षात उस पिंजरे जैसा हो गया है जिसमें एक पखेरू बंद हो।


परिणति



कोने में सुबकती ज़ुबैदा ने निर्णय कर लिया, वह घर छोड़ कर चली जायेगी। रोज पिटाई, कलह और कटाक्षों ने उसे तन और मन दोनों तरह से घायल कर दिया था। आज तो हद ही हो गयी। दुहाई दी तो शब्बीर ने उसे ही पीटा।
मुआ कह देता है, कल से नहीं पीयेगा लेकिन जब घर आता है तो पूरी चढ़ी होती है। अब्बा ने निकाह के समय बहुत बड़ाई की थी। कहते थे, ‘‘शौहर नहीं कोई हीरा है’ पर एक भी बात सच नहीं निकली। फंसा लिया उन्होंने अब्बा को। तीनों भाई एक जैसे हैं। उसके मस्तिष्क में साबिया की तस्वीर उभर आयी। आठ साल में एक के बाद एक पांच बच्चों को जन्म देकर बेचारी बिलकुल पीली पड़ गयी थी। उठती तो चक्कर आते। हकीम जी कहते थे, ‘‘पेट में पानी भर गया है।’ लगता भी था पेट के अनुपात में हाथ-पैर, गर्दन आदि पतले पतले तिनके से उगे थे।

औलाद को सब ख़ुदा की नियामत मानते हैं। छठे बच्चे के जन्म के समय जुबैदा ख़ुद हाज़िर थी। घर में पांच बच्चे तो उसके आने से पहले ही पैदा हो चुके थे। लेकिन इस बार ज़ुबैदा गवाह थी। तड़पती साबिया को देख उसने सोचा ना बाबा ना ! मैं तो एक दो बच्चों से अधिक कभी न चाहूं।
छठे बच्चे को जन्म देते ही साबिया का इंतक़ाल हो गया। तीन घंटे बाद बच्चा भी चल बसा।
ज़ुबैदा पिछले से पिछले साल दुलहन बन कर आयी थी। घर में साबिया से उसकी अच्छी निभ रही थी। सास तो थी नहीं। दोनों देवरानी-जेठानी मिल-जुल कर घर का काम संभाल लेतीं।

ज़ुबैदा का भेजा घूम गया। घर में साबिया के पांचों बच्चे अब उसे पालने होंगे। तोबा ! तोबा ! एक से बढ़ कर एक शैतान। न कोई स्कूल मदरसे जाता है और न ही काम धंधा करता है। गली में कबूतरों के पीछे भागने अथवा डंडी-कांटा ले कर जोहड़ी में मछली पकड़ने के अतिरिक्त उन्हें कोई शौक नहीं।
महीना भर मातम छाया रहा। इस दौरान सभी रिश्तेदारियों से मेहमान आये।
आगरा वाली बुआ आयी तो लंबा-चौड़ा भाषण दे गयी, ‘‘जुबैदा बेटी अब तो तू ही उनकी अम्मी है। इन्हें कलेजे से लगा कर रखना। खुदा तुम्हें भी जल्दी औलाद बख्शेगा। उम्र से बड़ी ज़िम्मेदारी निभानी है तुम्हें।’’
ज़ुबैदा सोचने लगी निकाह को डेढ़ साल हुआ है। इन्हें अभी से औलाद न होने की कमी खलने लगी। उसके शौहर को तो औलाद के बारे में सोचने की फ़ुरसत तक नहीं है।

टूल बाज़ार में ऑटों स्पेयर पार्ट्स की एक छोटी सी दुकान थी उनकी। दो भाई उसे संभालते थे। तीसरा कॉलेज जाता था लेकिन लगता था अंततः वह भी इसी धंधे में आ जायेगा।
उस मार्केट के नब्बे प्रतिशत व्यापारी और मिस्त्री शाम को शराब पीते थे। वे लोग घर जाकर क्या करते हैं, ज़ुबैदा नहीं जानती लेकिन शब्बीर के व्यवहार को देख उसकी रूह कांप उठती है। शादी के तीन-चार माह तो ठीक गुज़रे लेकिन इसके बाद शब्बीर का असली चेहरा सामने आने लगा। रोज़ाना गाली-गलौज मारपीट। गली मुहल्ले में उसने क्या-क्या गुल खिलाये थे, इनकी भनक भी ज़ुबैदा के कानों तक पड़ने लगी।
ज़ुबैदा के पिता किशनपुर में रहते थे। किशनपुर में ज़्यादातर घर हिंदुओं के ही थे। मुसलमानों के सिर्फ़ तीन घर थे। वे भी इसलिए कि मियांजान दर्ज़ी का काम करते थे। उस मोहल्ले में दर्ज़ी की कोई दुकान नहीं थी तो उन्होंने वहां दुकान खोल ली। फिर वहीं मकान भी ले लिया। उनकी दुकान पर काम करने वाले कारीगर हनीफ़ ने भी पचास गज़ का एक प्लॉट ले लिया था। बाद में कमरा, रसोई बना कर रहने लगा।
शब्बीर दिन में अधिकतर घर से बाहर ही रहता। कई बार काम-धंधे के सिलसिले में दो दो, तीन तीन दिन टूर पर भी जाना पड़ता था।

उसका बड़ा भाई आसिफ़ काउंटर संभालता। थोड़ा रसिक मिज़ाज था। जब तक साबिया जीती रही। आसिफ़ जुबैदा से सीधे बात नहीं कर सकता था। कोई काम कहना होता तो साबिया या छोटी लड़की सुरैया को संबोधित कर कहता। जुबैदा समझ जाती।
शुरू से ही जुबैदा को लगा कि आसिफ़ की नज़र ठीक नहीं है, इसलिए बुर्के से झांकती उसकी आंखें जहां तक हो सका, आसिफ़ की नज़रों से बचती रहीं।

आसिफ़ भी दारू पीता था पर फिर भी होशोहवाश में रहता था। शब्बीर इस मामले में ज़्यादा कमज़ोर था। दारू दिखते ही उसका मन डोलने लगता। शराब के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता था। उनकी दुकान पर काम धंधा इतना तो था ही कि दाल रोटी चैन से खा सकें। जहां तक बचत का सवाल है वह तो शराब की भेंट चढ़ जाती थी।
ज़ुबैदा की बचपन की कई समायु सखियां थीं। सुनीता और मधु का घर तो उसके घर से सटा हुआ था इसलिए मौक़ा मिलते ही वे एक-दूसरे के घर आती जाती रहतीं। सुनीता के पिता स्कूल मास्टर थे और किराये के मकान में रहते थे। उनका तबादला हो गया तो उन्होंने मकान छोड़ दिया और वे दूसरे शहर में चले गये। लेकिन ज़ुबैदा की शादी में सुनीता आयी थी। हां मधु, अभी भी वहीं रहती है। बी.एस-सी. कर रही हैं। अंतिम वर्ष है। ज़ुबैदा भी उसके साथ ही पढ़ती थी पर इंटर करते ही ज़ुबैदा की शादी हो गयी। मधु के पिता जी शादी की बजाय पढ़ाई को ज़्यादा ज़रूरी समझते थे इसलिए उन्होंने पढ़ाई पर ही ज़ोर दिया।



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book