प्रतीक्षा - श्रवण कुमार गोस्वामी Pratiksha - Hindi book by - Shravan Kumar Goswami
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प्रतीक्षा

श्रवण कुमार गोस्वामी

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3807
आईएसबीएन :81-214-0095-3

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एक नूतन अनुभव-संसार के कपाट खोलती कहानियां...

Pratiksha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


मनुष्य का जीवन अनेक जटिलताओं से भरा होता है। उन जटिलताओं की भी अनेक परतें हुआ करती हैं। सामान्यतः प्रत्येक कथाकार अपने लिए किसी एक परत का चुनाव कर लेता है और उसी परत से बराबर कोई कथा सूत्र प्राप्त करने का प्रयास करता चलता है।
प्रस्तुत कृति के लेखक श्रवणकुमार गोस्वामी ऐसे किसी बंधन को न अपने उपन्यासों के लिए स्वीकार करते हैं और न अपनी कहानियों के लिए। उनकी तलस्पर्शी दृष्टि किसी भी परत पर पहुंच कर अपने लिए सहज ही कथा सूत्र प्राप्त कर सकने में समर्थ है। इस वैशिष्टय के कारण इनकी कहानियों में विषय तथा संवेदना का जो विस्मयकारी वैविध्य दिखाई देता है, वह उन्हें अन्य कहानीकारों से अलग भी करता है और उन्हें एक विशेष मुकाम का अधिकारी भी बना देता है।
प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत सभी कहानियां बिना कोई शब्दजाल बुने अपने पाठकों के समक्ष क्रमशः एक नूतन अनुभव-संसार के कपाट खोलती चलती हैं, जहां पहुंचकर पाठक अपने को पहले से कहीं ज्यादा अनुभूति तथा संवेदना की संपदा से संपन्न पाता है।

प्रतीक्षा


ट्रेन अब तक नहीं आयी थी, यह जान कर गोपाल बाबू की घबराहट कुछ कम हो गयी। मालूम हुआ कि ट्रेन आधा घंटा लेट है। आरक्षण सूची देखने पर पता चला कि उन्हें कूपे में जगह मिली है। कूपे में केवल दो ही व्यक्तियों के लिए स्थान होता है। उनके मन में यह बात उठी कि यह भी देख लिया जाये कि उनका सहयात्री कौन है। सूची देखने पर जानकारी मिली कि उनके साथ किसी मिस कामना को यात्रा करनी है। यह नाम पढ़ते ही गोपाल बाबू के शरीर में बिजली की एक धारा सी दौड़ गयी। उन्होंने अपने साथ आये कुमुद को देख कर यह ताड़ना चाहा कि उसने इस बात पर ध्यान दिया है या नहीं। कुमुद उनका भतीजा है। वह आरक्षण सूची ही देख रहा था। उसने कहा, ‘‘चाचा जी, आपको कूपे में लोअर बर्थ मिली है।’’
कुमुद के मुंह से यह सुन कर गोपाल बाबू को कुछ अच्छा नहीं लगा। अब उनके भीतर एक हलचल सी मच गयी। यह अच्छा नहीं हुआ कि कुमुद को भी यह मालूम हो गया कि उनके कूपे में किसी लड़की को जगह मिली है। पता नहीं अपने मन में क्या क्या सोच बैठे ! हो सकता है कि वह घर पहुंच कर इस बात की चर्चा सबसे कर बैठे और पुन: मिलने पर लोग गोपाल बाबू का मजाक उड़ाना शुरू कर दें ! यह कुछ ठीक नहीं हुआ कि उन्हें कूपे में जगह मिल गयी। साठ साल की उम्र में कूपे में बंद हो कर किसी युवती के साथ यात्रा करना क्या उन्हें शोभा देगा ?

‘‘चाचा जी, मैं जाऊं ? ट्रेन आने में अभी पच्चीस मिनट की देर है। मुझे क्लास पहुंचने में देर हो जायेगी,’’ कुमुद ने पूछा।
‘‘हाँ बेटा जाओ, गोपाल बाबू ने कहा।
कुमुद ने झुक कर अपने चाचा जी के पैर छूने का स्वांग किया। गोपाल बाबू ने उसे झुकने के पहले ही उठा कर अपने सीने से लगा लिया और कहा, ‘‘ठीक है, अब तुम जाओ। माया दीदी के ब्याह में ज़रूर आना।’’
कुमुद की ओर गोपाल बाबू ने दस रुपये का एक नोट बढ़ा दिया। नोट को जेब से हवाले करते हुए कुमुद ने उत्तर दिया, ‘ज़रूर आऊंगा, चाचा जी !’’
कुमुद के जाने से गोपाल बाबू को राहत मिली। यह अच्छा ही हुआ कि कुमुद चला गया। यदि उसके रहते ही ट्रेन आ जाती तो वह उन्हें कूपे तक छोड़ने ज़रूर जाता और वहां वह कूपे में मिस कामना को देखता तो पता नहीं उसके मन में कैसे कैसे बेतुके सवाल उठने लगते। यह भी एक विचित्र संयोग है कि कूपे में उन्हें इस बार जगह भी मिली तो किसी कुमारी के साथ। अब इसमें परिवर्तन भी संभव नहीं। बहुत मुश्किल से यह जगह मिल सकी है, वह भी वी.आई.पी. कोटा से। आजकल प्रथम श्रेणी में अचानक जगह मिलती कहां है !

गोपाल बाबू अपनी अटैची ले कर जरा एक किनारे खड़े हो गये। वह आरक्षण सूची देखने वालों को ध्यान से निहारने लग गये। यहां खड़ा रहते हुए उन्हें यह ज़रूर पता चल जायेगा कि मिस कामना कौन है। वह अपना नाम देखने के लिए यहां ज़रूर आयेगी। सूची देखने वाले आ-जा रहे थे। एक युवती भी आयी। लगभग पच्चीस-छब्बीस की रही होगी। उसके आते ही आसपास सेंट की खुशबू फैल गयी। वह प्रथम श्रेणी की सूची देखने लगी। गोपाल बाबू के भीतर एक सुरसुरी सी शुरू हो गयी। वह सोचने लगे, लगता है यही है मिस कामना। कितनी सुंदर है ! रंग सांवला ही है, पर क़द-काठी, नाक-नक्श, आंख-कान, पहनावा सब कुछ कितना मोहक है ! निश्चित रूप से इस युवती को ही मिस कामना होना चाहिए। जैसा नाम वैसा ही रूप दिया है विधाता ने इसे।
लेकिन...
गोपाल बाबू के भीतर एक ‘लेकिन’ कहीं से आ कर अटक गया। इस लेकिन ने उन्हें मथना शुरू कर दिया। वह फिर सोच में पड़ गये। यदि वास्तव में यही है मिस कामना तो वह यह यात्रा इसके साथ कूपे में कैसे गुजार पायेंगे ? आज की रात ट्रेन में ही गुजरेगी। लगभग बाईस घंटों की इस यात्रा को किसी अनजान युवती के साथ बिताना उनके लिए पहाड़ बन जायेगा। उन्हें बहुत सावधान रहना होगा। दिन तो किसी प्रकार कट जायेगा पर रात कैसे कटेगी ? दिन को तो कूपे का दरवाज़ा खुला भी रखा जा सकता है, लेकिन रात को तो दरवाज़ा बंद करना ही पड़ेगा। सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा करना बहुत जरूरी है, परंतु सवाल यह है कि दरवाज़ा बंद कौन करेगा ? वह तो अपने हाथ से दरवाज़ा नहीं ही बंद करेंगे। ऐसा करने पर यदि मिस कामना आपत्ति कर बैठी, तो ? उन्हें बहुत बुरा लगेगा। ठीक है, उन्हें दरवाज़ा बंद करने में पहल नहीं ही करनी चाहिए। मिस कामना अगर दरवाज़ा बंद कर दे तो ठीक रहेगा, लेकिन यदि मिस कामना दरवाज़ा बंद करने को आगे बढ़ेगी तो उन्हें कैसा लगेगा ? क्या गोपाल बाबू को यह अच्छा लगेगा ?

गोपाल बाबू असहज हो उठेंगे उस हालत में और लगेगा कि उन्हें कोई बलात् काजल की कोठरी में ढकेल रहा है। नहीं, वह मिस कामना को कूपे का दरवाज़ा कभी नहीं बंद करने देंगे। वह साफ बोल देंगे मिस कामना से कि रात को भी कूपे का दरवाज़ा खुला छोड़ दिया जाये। परंतु उनकी अटैची में माया बिटिया के लिए जो कीमती गहने और कपड़े हैं, वो ? नहीं, नहीं, रात में कूपे का दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ा जा सकता। इस अटैची में लगभग डेढ़ लाख रुपये के सामान हैं।
अचानक गोपाल बाबू के सामने एक भिखारी आ कर खड़ा हो गया। उसकी नाक कटी हुई थी। देखने में वह बड़ा घिनौना लग रहा था। गोपाल बाबू ने चुपचाप जेब से एक चवन्नी निकाल कर भिखारी की तरफ फेंक दी। उनसे भिखारी की तरफ देखा भी नहीं जा रहा था।

गोपाल बाबू ने मुड़ कर देखा, इस बीच वह युवती जा चुकी थी। मगर सेंट की सुगंध अब भी हवा में तैर रही थी।
अब गोपाल बाबू नाक के बारे में सोचने लगे। यह नाक भी कमाल की चीज है ! इस भिखारी की नाक कटी हुई है तो यह कितना भद्दा लग रहा है ! शायद इसीलिए ‘नाक कटना’ या ‘नाक काटना’ मुहावरा चलता है। उन्होंने अपनी नाक छू कर देखी। उन्हें अपनी नाक यथास्थान मौजूद मिली तो उन्हें बड़ा संतोष मिला। इसी बीच गोपाल बाबू के मन में एक विचित्र बात उठ खड़ी हुई। उन्हें यह लगा कि रेल विभाग आज उनकी नाक कटवाने पर तुल गया है। यदि ऐसी बात नहीं होती तो क्यों उनके कूपे में मिस कामना को जगह दे दी गयी ? उनके लिए तो यह सफर तलवार की धार पर चलने के समान हो गया है। अगर उनसे जरा सी भी कोई चूक हो गयी तो उनकी नाक इस बुढ़ापे में अवश्य कट कर रहेगी।

अब गोपाल बाबू पच्चीस-तीस साल पीछे पहुंच गये और अपने बीते दिनों को याद करने लगे। उन दिनों वे कितने ख़ूबसूरत लगते थे ! तब आँखों पर चश्मा भी नहीं चढ़ा था और उनके सिर के बाल बिलकुल काले थे। उनका रंग रूप देख कर दोस्त अकसर कहा करते थे, ‘गोपाल भाई, आपको तो फिल्मों में हीरो होना चाहिए था। आप कहां आ कर फंस गये इस नौकरी में !’ उन दिनों भी गोपाल बाबू सरकारी काम से प्रथम श्रेणी में ही यात्रा किया करते थे, किंतु उन्हें कभी भी कूपे में जगह नहीं मिली थी। आज उन्हें पहली बार कूपे में जगह मिली है, जब उनकी उम्र साठ से ऊपर हो गयी है। काश, यह अवसर उन्हें उन दिनों मिला होता जब वह जवान थे तो कितना सुहाना होता यह सफर मिस कामना के साथ !
अचानक स्टेशन का लाउडस्पीकर कुछ बोलने लगा। प्लेटफार्म पर अकसर इतना हल्ला-गुल्ला होता है कि लाउडस्पीकर की कोई भी बात ठीक से सुनायी नहीं पड़ती। शायद स्टेशन के लाउडस्पीकर भी कुछ विशेष ढंग के बने होते हैं, जिनसे निकली आवाज प्राय: अस्पष्ट और फटी फटी जैसी होती है।

प्लेटफार्म पर अचानक आयी हलचल से यह स्पष्ट हो गया कि ट्रेन आ रही है। लोग इधर-उधर भागदौड़ करने लगे। पर गोपाल बाबू अपनी जगह पर पूर्ववत खड़े रहे। उन्होंने सोचा कि उनके पास तो प्रथम श्रेणी का टिकट है, वह क्यों भीड़ में घुस कर धक्के खायें ? यहां ट्रेन पंद्रह मिनट रुकती है। जल्दी क्या है ! वह आराम से ट्रेन पर सवार हो लेंगे।
गोपाल बाबू अपने कूपे में आ गये। कूपे में घुसते ही उन्हें लगा कि कूपे बिलकुल एक छोटी सी कोठरी ही होती है। उन्हें यह बड़ा अच्छा लगा। ऊपर की बर्थ अभी भी खाली पड़ी थी। मिस कामना अब तक  नहीं आ सकी थी। अब गोपाल बाबू बड़ी व्यग्रता के साथ मिस कामना की प्रतीक्षा करने लगे। किसी के आने-जाने से जो पग-ध्वनि पड़ती तो उन्हें लगता कि मिस कामना ही आ रही है।
गोपाल बाबू ने अपनी घड़ी देखी। इसी समय गार्ड की सीटी सुनायी पड़ी। इंजन का हॉर्न बजा और ट्रेन आगे की ओर सरकने लगी। गोपाल बाबू बेचैन हो कर इधर-उधर ताकने लगे, जैसे उनका अपना ही कोई ट्रेन पर सवार होने से रह गया हो !

ट्रेन बढ़ती ही जा रही थी। गोपाल बाबू के कूपे में किसी का भी आगमन नहीं हुआ। अब उन पर एक नयी चिंता सवार हो गयी। क्या मिस कामना समय पर स्टेशन नहीं पहुंच सकी ? क्या मिस कामना ने अपनी यात्रा स्थगित कर दी ? नहीं, ऐसी कोई बात नहीं हो सकती। यह कूपे वी.आई.पी. कोटा का है। इसमें आज ही तो उसे जगह मिली होगी, फिर आज ही यात्रा स्थगित करने का क्या औचित्य हो सकता है ? अचानक गोपाल बाबू के दिमाग में एक बात आयी और उनके चेहरे पर हरियाली छा गयी। उन्होंने सोचा, ‘हो सकता है कि मिस कामना अगले स्टेशन पर सवार हो ! केवल बीस मिनट ही तो लगते हैं अगले स्टेशन तक पहुंचने में।’

गोपाल बाबू ने एक बार ऊपर की शायिका की तरफ देखा और फिर कुछ सोचने लगे। ऊपर चढ़ने-उतरने में युवती को तकलीफ हो सकती है। उन्हें भी ऊपर चढ़ने-उतरने में कष्ट होता है। फिर भी यदि मिस कामना ने एक बार भी कहा तो वह अपनी निचली शायिका छोड़ देंगे। किसी महिला या युवती के लिए इतना तो किया ही जा सकता है। प्रत्येक मर्द को इतना तो करना ही चाहिए।
इस कूपे में केवल दो ही यात्री होंगे-गोपाल बाबू और मिस कामना। दोनों आख़िर चुप चुप कब तक बैठे रह सकेंगे ? किसी न किसी को तो बातचीत शुरू करनी ही पड़ेगी। यदि उन्हें ही बातचीत करने के लिए पहल करनी पड़ी तो वह किस विषय पर बात करेंगे ? क्या फ़िल्म पर ? नहीं, मिस कामना पर इसका प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकता है। वह गोपाल बाबू के बारे में ग़लत धारणा भी बना सकती है। फिर किस विषय पर बातचीत शुरू करेंगे वह ?

बातचीत शुरू करने के लिए चाय की सहायता ली जा सकती है। यों भी गोपाल बाबू को चाय पीने की आदत है। चाय चाहे जैसी भी हो। यात्रा में तो वह हर स्टेशन पर चाय लेकर पीते हैं। हां, ठीक है स्टेशन के आते ही वह मिस कामना से चाय के लिए पूछेंगे और इसी बहाने बातचीत का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा। आजकल सभी तो चाय पीते हैं। मिस कामना भी चाय पीती होगी। इतना तो वह भी समझती होगी कि अपने सहयात्री से बातचीत किए बगैर रास्ता काटना बहुत मिश्किल होता है। मगर ऐसी भी हो सकता है कि मिस कामना नकचढ़ी हो ! न तो वह किसी से बातचीत करना पसंद करती हो और न किसी से कोई संपर्क रखना ! हो सकता है कि वह काफ़ी संकोची स्वाभाव की हो ! नाम मिस कामना और संकोची ! ऐसा तो हो ही नहीं सकता। यदि वह संकोची होती तो कूपे में बर्थ लेने से साफ़ इनकार कर जाती। वह संकोची कभी नहीं हो सकती। वह साहसी लगती है। यह अच्छा ही हुआ कि इस कूपे में जगह मिल गयी। यदि इस कूपे में किसी पुरुष को जगह मिलती तो उसके भरोसे अटैची छोड़कर जाने में गोपाल बाबू को बराबर आशंका सताती ही रहती।
गोपाल बाबू ने अटैची पर नज़र डाली। स्टेशन आने में अभी दस मिनट की देर थी। व स्वयं पूछने लगे, ‘मैं मिस कामना के प्रति इतना संवेदनशील क्यों हो उठा हूँ ? मैंने तो मिस कामना को आज से पहले कभी देखा भी नहीं है। देखा तो अभी भी नहीं है। वह कौन है ? वह कैसी है ? उसकी उम्र कितनी है ? उसके बारे में मैं कुछ भी तो नहीं जानता। मिस कामना मेरे लिए तो अभी भी केवल एक नाम ही है। इस नाम ने मुझे इतना विचलित कर दिया है ? क्यों मैं बेसब्री से मिस कामना के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ ?’

अकस्मात् गोपाल बाबू को एक पढ़ी हुई कहानी याद आ गयी। कहानी की याद आते ही वह अनायास भीतर से एक बार कांप उठे। उस कहानी में सेना का एक अधिकारी इसी प्रकार एक कूपे में यात्रा कर रहा था। कूपे में एक अनजान युवती भी यात्रा कर रही थी। एक स्टेशन आने वाला था। युवती सेना के अधिकारी के सामने आ कर अचानक खड़ी हो गयी। उसने सेना के एक अधिकारी से एक भारी रक़म की मांग की। उसने यह धमकी भी दी कि यदि उसे रुपये नहीं दिये गये तो वह चीख़-चिल्ला कर लोगों को जमा कर लेगी और कहेगी कि सेना के इस अधिकारी ने उसके साथ बलात्कार किया। रुपये नहीं मिलने पर वह सचमुच चीख़ने-चिल्लाने लगी और उसने ख़ुद अपने कपड़े जहां-तहां से फाड़ दिये ताकि लगे कि उसके साथ जबर्दस्ती की गयी है। बग़ल के यात्री कूपे  के सामने जमा हो गये। इस बीच स्टेशन आ गया। मामला पुलिस तक पहुंचा।

पुलिस ने युवती को पहले नीचे उतार लिया। अब सेना के अधिकारी को नीचे उतरने को कहा गया। वह दरवाज़े तक आ कर रुक गया। उसने एक व्यक्ति से कहा, ‘कृपया मेरा ओवर कोट उतार दीजिए ताकि मैं नीचे उतरने की कोशिश कर सकूं।’ उस व्यक्ति ने ओवरकोट उतार दिया। लोग यह देख स्तब्ध रह गये कि उस अधिकारी के दोनों हाथ कटे हुए थे। लोगों के सामने यह स्पष्ट हो गया कि वह अधिकारी निर्दोष है। पूछताछ करने पर पता चला कि वह युवती इसी प्रकार यात्रियों को लूटने का काम करती थी।
गोपाल बाबू अब चिंता में पड़ गये। कहीं यह मिस कामना इसी प्रकार की कोई युवती तो नहीं ? हो सकता है कोई व्यक्ति बाज़ार से ही उनका पीछा कर रहा हो। उसने जान लिया हो कि इस अटैची में सोने के गहने और कीमती बनारसी साड़ियां हैं ! संभव है कि उसी ने मिस कामना को इस कूपे में भेजा हो ताकि....
यह सोचते ही गोपाल बाबू एक बार नीचे से ऊपर तक कांप उठे। उनका शरीर पसीने से तर हो गया। उन्होंने हथेली से अपने ललाट को छुआ तो हथेली पूरी तरह गीली हो गयी थी। वह घबराहट से बुदबुदा उठे, ‘नहीं, इस कूपे में अब मैं यात्रा नहीं कर सकता।’ इतना बोल कर वह गलियारे में आ गये। वह कंडक्टर को खोजने लगे। कंटक्टर अपनी जगह पर नहीं था। वह कहीं दिखायी नहीं पड़ सका। ट्रेन की गति धीमी होने लगी। कुछ ही मिनटों के बाद गाड़ी स्टेशन पर आ पहुंची।
गोपाल बाबू अपने कूपे में आ गये। स्टेशन पर जब गाड़ी खड़ी हो जाती है तब वह सामान छोड़ कर कहीं नहीं जाते। यह उनकी पुरानी आदत है।

गोपाल बाबू के अंदर अभी भी चिंतन चल रहा है। उन्होंने मन ही मन यह तय कर लिया कि अब वह भविष्य में कभी भी प्रथम श्रेणी में यात्रा नहीं करेंगे। वह तो द्वितीय श्रेणी का ही टिकट ले रहे थे, परंतु छोटे भाई ने कहा, ‘भैया आपके पास क़ीमती सामान है। द्वितीय श्रेणी में जाना ठीक नहीं।’ उसी ने बर्थ का भी प्रबंध कर दिया। यहां के सांसद से उसकी अच्छी पटती है। इसलिए वी-आई.पी. कोटा से कूपे में यह बर्थ मिल भी गयी।

गोपाल बाबू का भयभीत मन उन्हें और कमज़ोर बनाने लगा। उसने उनसे कहा, ‘‘जब से तुम इस कूपे में आये हो, अकेले हो। मान लो, चलती ट्रेन में कोई डाकू तुम्हारे कूप में घुस आये और दरवाज़ा बन्द कर तुम्हारा गला दबा दे, तो ? वह तो तुम्हें मार कर तुम्हारी अटैची मज़े से ले जा सकता है। तुम चीख़ भी नहीं पाओगे। अगर चिल्लाओगे भी तो तुम्हारी आवाज़ ट्रेन की घड़घड़ाहट में दब कर रह जायेगी। गोपाल बाबू अपनी जगह से उठकर बेचैनी के साथ कूपे में ही इधर-उधर होने लगे। पता नहीं उनके मन में क्या आया कि उन्होंने कूप का दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। अब वह धीरे-धीरे बोलने लगे, ‘‘मैं कहां आकर फंस गया ! इससे तो अच्छा था कि मुझे बग़ल के कंपार्टमेंट में जगह मिल जाती। वहां कम से कम चार आदमी तो हैं न। यहां तो मैं किसी से बात करने को भी तरस गया हूं। सबसे अच्छी यात्रा द्वितीय श्रेणी की होती है। वहां तरह-तरह के लोग मिलते हैं—जवान, बूढ़े, बच्चे, अमीर, ग़रीब, औरत, मर्द, सभी तरह के लोग होते हैं वहां। वहां तरह तरह की बातचीत सुनने को मिलती है। लोग आपस में तकरार भी करते हैं, लड़ते भी हैं फिर मिल कर आपस में एक दूसरे का दिया खाना भी खाते हैं। उतनी अच्छी जगह छोड़ कर मैं यहां आ गया इस काल कोठरी में ?’’
सामने से एक चाय वाला जा रहा था। उसे रोक कर गोपाल बाबू ने चाय ली। अब वह चाय सुड़कने लगा। उसके जेहन में मिस कामना फिर नाचने लगी। उन्हें आरक्षण की सूची ज़रा ठीक से देख लेनी चाहिए थी। यदि उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया होता तो उन्हें उसी तरह मालूम हो गया होता कि मिस कामना की उम्र कितनी है और वह किस स्टेशन पर ट्रेन पर सवार होने वाली है।

खिड़की के सामने एक जवान आ कर खड़ा हो गया। बड़ी बड़ी डरावनी आंखें। कड़ियल मूंछें। देखने में भी वह भयंकर लग रहा था। उसने एक बार कूपे के भीतर फ़र्श की ओर देखा। जब उसे वहां कुछ दिखाई न पड़ा तो उसने उसकी शायिका की तरफ़ देखा। अटैची देखते ही उसने अपना माथा ज़रा हिला दिया। गोपाल बाबू यह सब देख कर काठ होते जा रहे थे। उन्हें पूरा पूरा यह विश्वास हो गया कि अब वह अपने घर नहीं पहुंच पायेंगे। इसी समय गार्ड की सीटी सुनायी पड़ी। इसके बाद इंजन की गुर्राहट सुनाई पड़ी और इसके साथ ही ट्रेन रेंगने लगी। गोपाल बाबू ने झांक कर देखा। वह डरावना आदमी अभी भी प्लेटफार्म पर खड़ा था। उसे खड़ा देख कर गोपाल बाबू को लगा कि अब ख़तरा टल गया है।
गोपाल बाबू ने तय कर लिया कि अब वह इस कूपे में नहीं रहेंगे। वह कंडक्टर से मिलने के लिए उठे। वह कूपे से निकल रहे थे कि कंडक्टर स्वयं उनके कूपे के सामने नज़र आ गया। उसने गोपाल बाबू को देखते ही कहा, ‘‘सर, क्या आप इस बर्थ को छोड़कर ऊपरी बर्थ पर जाना चाहेंगे ? यहां मिस कामना को मैं एडजस्ट करना चाहता हूं।’’
मिस कामना का नाम सुनते ही गोपाल बाबू अचानक खिल उठे। वह पिछली सभी बातों को भूल से गये। उन्हें देख कर यह कोई अनुमान भी नहीं लगा पाता कि गोपाल बाबू कुछ देर पहले किस कद़र परेशान थे। उन्होंने हंसते हुए कंडक्टर को जवाब दिया, ‘‘इसमें पूछने की क्या बात है ! लोअर बर्थ तो महिलाओं को मिलनी ही चाहिए। कहां हैं मिस कामना ?’’
‘‘मिस कामना दरवाज़े के पास खड़ी हैं। मैं उन्हें बुला लेता हूँ।’’ यह बोल कर कंडक्टर ने अपनी गर्दन कूपे के बाहर निकाली। मिस कामना स्वयं कूपे की ओर चली आ रही थी।

‘‘आइए मिस कामना, मिस्टर गोपाल ने आपके लिए बर्थ छोड़ दी है। अब आपको कोई कष्ट नहीं होना चाहिए।’’
मिस कामना ने कंडक्टर को जवाब नहीं दिया। केवल उनकी आंखों को ही देख कर यह जाना जा सकता था कि वह कृतज्ञता के बोझ से अपने को दबा हुआ अनुभव कर रही थीं।
मिस कामना को चलने में असुविधा हो रही थी, क्योंकि उसके दोनों हाथ बैसाखी पर थे। कंडक्टर ने सहारा देकर मिस कामना को बर्थ पर बिठा दिया।
मिस कामना को देखते ही गोपाल बाबू के हृदय पर एक वज्रपात सा हुआ। गोपाल बाबू को ऐसा प्रतीत हुआ कि कल्पना के जिस बिगड़ैल घोड़े पर वह सवार थे, उसने उन्हें पीठ से अचानक एक पथरीली ढलान पर पटक दिया है और अब उनका लहूलुहान शरीर तेज़ी से नीचे की ओर लुढ़कता चला जा रहा है।



कल्लो रानी



कल्लू के भी बड़े अजीब अजीब शौक़ हैं। इस बार वह मेला गया तो वहां से एक बंदरिया ख़रीद कर ले आया। बंदरिया के गले में एक पतली सी रस्सी बंधी थी, जिसे कल्लू ने अपने दाहिने हाथ में थाम रखा था। बंदरिया कल्लू के कंधे पर निश्चंत हो कर बैठी थी।
घर में घुसते ही बच्चों ने शोर मचाना शुरू कर दिया, ‘‘चाचा बंदरिया लेकर आए हैं...’’
शोर सुनते ही अम्मा जी अपनी कोठरी से निकल कर आंगन में आ गयीं। बंदरिया को देखते ही वह बड़बड़ाने लगीं, ‘‘अरे कल्लू ! तू फिर एक मुसीबत ले कर आ गया है ! आख़िर कब समझेगा तू ! कब अक्ल आयेगी तुझे ? हे राम ! इस कल्लू को मैं कैसे समझाऊं ?’’

कल्लू अम्मा जी की बातें सुनकर मुस्कराता हुआ खड़ा रहा। बच्चे बंदरिया को तंग करने लग गये। सभी मिल कर अपने मुंह से ‘खों खों’ की आवाज़ निकालने लग गये। बंदरिया खिसियाकर इधर-उधर उछल-कूद करने लग गयी। कभी कभी कल्लू जानबूझकर बंदरिया की रस्सी को ढील देता और बंदरिया तेजी से बंच्चों की तरफ़ लपकती। जैसे वह बच्चों के समीप पहुंचने को होती, कल्लू झट से रस्सी अपनी तरफ़ खींच लेता। अपनी तरफ बंदरिया को बढ़ता देख बच्चे गिरते गिरते भागने लग जाते। यह तमाशा काफी देर तक चलता रहा। बच्चों को इस नये खेल में बड़ा मज़ा आ रहा था।
‘‘क्यों रे कल्लू ! क्या तू ज़िंदगी भर यही सब करता रहेगा ? जा, निकल जा इस घर से इसी समय और इस बंदरिया को छोड़ आ जहां से इसे लेकर आया है,’’ अम्मा जी बड़बड़ाने लग गयीं।

‘‘अम्मा, क्यों नाराज़ होती हो ? इसे भी यहीं रहने दो न ! इसके यहां रहने से क्या फ़र्क़ पड़ जयेगा ? यहां इतने सारे बंदर-बंदरिया हैं वहां एक और सही,’’ कल्लू ने अपने भतीजे-भतीजियों की ओर देखते हुए कहा।
‘‘कलमुहां, तू मेरे पोते-पोतियों को बंदर-बंदरिया कहता है ! ठहर, मैं तुम दोनों को अभी बताती हूं,’’ अम्मा जी दनदनाती हुई अपनी कोठरी में घुस गयीं।

वह कोठरी से निकली तो उनके हाथ में एक कैंची थी।
‘खच् !’ एक आवाज़ हुई। अम्मा जी ने बंदरिया की रस्सी काट डाली। उन्होंने यही सोचा था कि रस्सी के कटते ही बंदरिया ज़रूर भाग जायेगी। लेकिन वह भागी नहीं। रस्सी के कटते ही वह उछल कर कल्लू के कंधे पर जा बैठी। शायद अब तक उसे आभास हो गया था कि इस घर में कल्लू ही उसका अपना है।
अम्मा जी खिसियाकर अपनी कोठरी की तरफ़ चली गयीं। जाते जाते वह कल्लू को धमका भी गयीं, ‘‘जब तक तू इसे यहां से भगा नहीं देता, तेरा दाना पानी बंद रहेगा इस घर में।’’

यह सुनकर बंदरिया एक बार खोंखियाकर अम्मा जी की तरफ़ लपकी। कल्लू ने तुरंत उसे पकड़ लिया। बंदरिया के इस व्यवहार से अम्मा जी और भी बड़बड़ाने लग गयीं और बच्चे तालियां बजा बजा कर अपनी दादी को लुलुवाने लग गये।
कल्लू के ऊपर अम्मा जी की इस बात का कोई असर नहीं पड़ा। वह अपनी बंदरिया के साथ बीच आंगन में बैठा रहा। उसने अपनी भतीजी कंतो से कहा, ‘‘कंतो, इस बंदरिया का नाम भी कंतो ही है। अब इस घर में आज से दो दो बंदरिया रहेंगी।’’
कंतो मचल उठी। उसने अपनी दादी का डण्डा उठा कर अपने चाचा को धमकाना चाहा। यह देखकर बंदरिया खोंखियाने लग गयी। कंतो डर के मारे पीछे हट गयी।
कल्लू हो हो कर हंसने लग गया।

‘‘कंतो...अच्छा, तू ही बता कि इसका नाम क्या रखना चाहिए ?’’
कल्लू ने पूछा ।
कंतो ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘चाचा, इसका नाम कल्लो रख दो-कल्लो रानी।’’
कल्लू को लगा कि कंतो ने जानबूझकर शैतानी की है और उसके नाम से मिलते-जुलते नाम का ही प्रस्ताव कर दिया। इसलिए वह कंतो को पकड़ने के लिए लपका। कंतो तो वहां से फुर्र हो गयी, मगर बाकी बचे बच्चे नाच नाच कर तालियां बजाकर गाने लग गये, ‘‘इस घर में आयी एक बंदरिया, बन कर कल्लू चाचा की दुलहनिया।’’
यह सुनते ही अम्मा जी फिर कोठरी के बाहर निकल आयीं। उन्होंने बच्चों को डांट कर भगा देना चाहा, पर बच्चों की यह तुकबंदी सुनकर वह भी रस लेने लग गयीं। परिवार के अन्य सदस्य भी आंगन में जमा हो गये और बच्चों के इस सामूहिक गान का आनंद उठाने लग गये। कल्लू ख़ुद भी इस गीत को सुनकर ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा।

        

 

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