मैं और मैं - मृदुला गर्ग Main Aur Main - Hindi book by - Mridula Garg
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उपन्यास >> मैं और मैं

मैं और मैं

मृदुला गर्ग

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3809
आईएसबीएन :8121404630

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मृदुला गर्ग का एक अद्भुत,मौलिक व कलात्मक उपन्यास...

Main aur main

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

प्रस्तुत उपन्यास में लेखिका ने दो अपूर्व कलात्मक चरित्रों का निर्माण किया है-कौशल कुमार और माधवी। कौशल कुमार एकदम मौलिक मनुष्य है। वह जो कुछ करता है, इस विश्वास के साथ, कि समाज ने जो उसके साथ किया है, उसके चलते, उसका कुछ भी कर जाना जायज है। माधवी जानती है कि सब तरफ, बहुत कुछ गलत हो रहा है, और उसके लिए, खुद को जिम्मेवार पाती है। पर कौशल कुमार के संसर्ग में आने के बाद, वह भी मानने लगती है कि सृजन के लिए सब-कुछ जायज है। मानवीय रिश्तों का बेहिस्स इस्तेमाल भी। कौशल कुमार उसका प्रेरक भी है और शत्रु भी।

माधवी जानती है, एक शत्रु उसके सामने बैठा है, दूसरा भीतर है। दोनों से निपटना है और अपने पर नैतिक नजर भी रखनी है। बड़ा जोखिम का काम है और लेखिका ने इसे बड़ी बेमुरव्वती से किया है। कौशल और माधवी के घात-प्रतिघात का अंत वही होता है जो हर युद्ध का होता है। दोनों, अपनी प्रतिभा को दाव पर लगाते हैं, और उसे सान पर चढ़ाने के चक्कर में, सर्जक ही नहीं रह पाते।

सत्य से साक्षात्कार करें तो भीतर अपराधबोध पनपता है और झूठ में शरण लेने की लालसा। निजी जीवन में किये अपराध के लिए समाज को दोषी ठहरा भी लें तो समाज के अपराधों में भागीदारी से अछूते कैसे रहेंगे ? अपराध-बोध और अहम् की निरंतर चोट से आहत होकर क्या करें-कलात्मक सृजन ! सब कुछ होम करके सृजन करने का उन्माद, मानवीय संबंधों का क्रूर उपयोग करने को प्रेरित नहीं करता ? और अंततः वह सृजनशीलता को ही कुंठित नहीं कर डालता ? अंतर की समग्रता खोने पर सच और झूठ दोनों का आधार छूट नहीं जाता ? तब बचा क्या रहता है, बस आधे सच का खंडित अवलंब।

ऐसे अनेक प्रश्नों से उद्वेलित मानस को खोलकर रख देने वाला अपूर्व प्रमाणिक उपन्यास ‘मैं और मैं’ पाठक को भावात्मक और वैचारिक दोनों धरातलों पर झिझोड़ता है और तमाम संबंधों पर दुबारा सोचने के लिए मजबूर करता है।

 

एक

 

तेज कदमों से चलती माधवी अपने प्रकाशक के दफ्तर से निकलकर स्कूटर की तरफ बढ़ी। डेढ़ बजे से पहले घर पहुँचना है। बच्चों के स्कूल से वापस आने के पहले। दो घंटे बहस में कब निकल गये, पता नहीं चला। उसके प्रकाशक का कमरा क्या है, लेखकों का अड्डा। आये दिन महफिल और बहस-मुबाहसा। आज बातचीत का विषय उसका अपना इकलौता सद्य-प्रकाशित उपन्यास था। अपने लेखन पर बहस हो और लेखक बीच-बीच में छोड़कर उठ जाये, तपस्वी की-सी संकल्पशक्ति चाहिए। माधवी को अपने पर गर्व है, बच्चों की उपेक्षा नहीं की, समय रहते उठ गयी।

स्कूटर में बैठने लगी तो कौशल कुमार ने कहा, ‘‘मैं आपके साथ घर चलूं।’’ पूछा नहीं, कहा।
माधवी ने चौंककर उसकी तरफ देखा। हां, दफ्तर से साथ बाहर निकला था, लेखक है, बहस में शरीक था, सबसे मुखर। पर....
उसने घड़ी पर नजर डाली। बारह बजकर पैंतीस मिनट।
‘‘मेरे घर ? इस वक्त....’’ उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया। अकलमंद को इशारा काफी है। वह समझ जायेगा।
पर शायद समझ का बुद्धि से कोई ताल्लुक नहीं है।
‘‘क्यों, दोपहर के भोजन का वक्त है क्या ?’’ कौशल कुमार ने पूछा।

माधव पानी-पानी हो गयी। बात ठीक थी। वह यही सोच रही थी। बच्चे आते ही खाना मांगते हैं, वह उनके साथ मेज पर बैठकर खाती है। आदत है। कौशल को खाने के लिए कहना पड़ेगा और एक अजनबी की उपस्थिति उस समय बच्चों को खलेगी। पर बात को इस तरह स्पष्ट कहकर कौशल ने उसे बगलें झांकने पर मजबूर कर दिया।
‘‘दरअसल डेढ़ बजे बच्चे स्कूल से आ जाते हैं....उसने कहा तो कौशल बात काटकर बोला, ‘‘उनके आने से पहले उठ जाऊंगा। सिर्फ आधा घण्टा बैठूंगा। कल जो आपने मेरी कहानी के बारे में कहा था उसे लेकर मन में कुछ शंका थी। बच्चों को पता भी नहीं चलेगा, कोई आया था।।’’

माधवी को लगा, आखिरी वाक्य उसने कुछ फुसफुसाकर कहा है। उसकी त्योरी चढ़ गयी। लगता हैं, बात का कुछ और मतलब लगा लिया है इसने। बच्चे आ जाते हैं नहीं; आते हैं, कहना चाहिए था।
‘‘बच्चों को पता चलने का सवाल नहीं है,’’ उसने कहा, ‘‘उनके आने के बाद मुझे अपना समय उन्हें देना होता है।’’
‘‘वही तो,’’ कौशल ने भोलेपन से कहा, ‘‘मैं उनके आने से पहले उठ जाऊंगा।’’
एक बार फिर माधवी शर्मिंदा हो गयी और मैं उसी शर्मिंदगी में कौशल के ‘तो चलूं’ कहने पर ‘हां’ कर बैठी। फिर तो कूदकर कौशल स्कूटर में सवार हो गया। खुद बैठने में उसे वक्त लगा।
स्कूटर चल पड़ा। पहियों की जबरदस्त खड़खड़ के ऊपर कौशल के शब्द टूटकर गिरने लगे। बिना रुके वह बोल रहा था। पर माधवी तक नहीं के बराबर पहुंच रहा था। वह बेहद परेशान थी।
‘‘आप क्या सोचती हैं ?’’ दो बार कौशल की चिल्लाहट कान में पड़ी तो उसे चिल्लाकर कहना पड़ा, ‘‘मैंने सुना नहीं, आप क्या कह रहे थे।’’

‘‘क्या ?‘‘
‘‘मैंने सुना नहीं, आप क्या कह रहे थे,’’ उसने आवाज को खींचकर जबरदस्ती ऊपर उठाया तो खांसी से बेहाल हो गयी।
स्कूटर की रफ्तार और तेज हुई। कौशल के शब्द टूटकर भी कानों में पड़ने बन्द हो गये पर उसका खुलता-बंद होता मुंह सामने रहा। स्कूटर के शोर, उसकी खांसी, दूसरे तक पहुंच न पाने की मजबूरी, सबसे बेखबर, कौशल बोले चला जा रहा है।
अपने कोने में सिमटते हुए माधवी ने महसूस किया, यह आदमी किस कदर बदशक्ल है। कुदरत की बख्शी बदसूरती से इत्मीनान नहीं हुआ, अपनी तरफ से काफी मदद की है। पान इतने खाता है कि जबान और दांतों का रंग कीचड़ जैसा हो गया है। बात करते हुए, कील मुहासों से भरे उसके काले-लंबूतरे चेहरे के बीच मुंह के अन्दर घूमती कत्थई-लाल जबान कीड़ों पर झपटती छिपकली की याद दिलाती है। वह बिलकुल बेफ्रिक है। मुंह में पान है, इसकी परवाह किये बगैर धाराप्रवाह बोल रहा है और छिपकली.... उफ ! माधवी की देह ने सिहरन महसूस की तो बुद्धि ने फौरन फटकार बतलायी। बदसूरत होने से क्या होता है, मालूम है न, कितना बढ़िया लेखक है ! चार दिन पहले उसकी जो कहानियां पढ़ी हैं, उनके प्रभाव से मुक्त हो पायी है ? नहीं, नहीं हो पायी। कहानियां वाकई दहला देनेवाली थीं। पढ़कर लगा, सब-कुछ अपने केन्द्र-बिन्दु से छितर गया है। वह, जिसे यथार्थ की संज्ञा दी जाती है, सच नहीं है और अगर है तो गलत है। तमाम रिश्ते, मूल्य, धारणाएं झूठी हैं। हम सब मरे हुए लोग हैं। लाशें, जिन्हें कठपुतली वाले ने डोर में बांध रखा है और इधर-उधर नचा रहा है। उसके इशारों पर नाचने को जिंदगी का नाम भले दें, है वह मौत का हिस्सा। वैसे भी आदमी जिन्दगी का इस्तेमाल दूसरों को मारने के लिए करता है। अजीब जद्दोजहद है। लाशें एक-दूसरे को मार रही हैं। पर किसलिए ? सब बेकार है, फिजूल है, ढोंग है, जीने का स्वांग है, सच कुछ है तो मौत। जीवन निरर्थक है तो शरीर का क्या महत्व ? कोई कितना भी कुरूप हो या रूपवान......
.
‘‘मैं बहुत बदसूरत हूं, नहीं ?’’ सहसा कौशल ने कहा।
चैराहे की लाल बत्ती ने स्कूटर की रफ्तार पर रोक लगा दी थी, इसलिए शब्द स्पष्ट कानों में पड़े।
माधवी का खून जम गया। उसका सोचा, इसने कैसे सुन लिया। शायद उसके कोने में सिमट जाने से समझ गया हो। वाह, क्या सूक्ष्म भावानुभूति है !
प्रतिवाद करने के सिवाय चारा न था। ‘‘नहीं, नहीं, बिलकुल नहीं,’’ उसने अतिरिक्त उत्साह के साथ कहा। मन में चोर जो था।
‘‘मैं आपके मन में घृणा नहीं जगाता ?’’
‘‘नहीं, नहीं, बिलकुल नहीं,’’ उसने उसी गर्मजोशी के साथ कहा।
‘‘आपको नहीं लगता, तो मैं बदसूरत हो ही नहीं सकता।’’ उसने गहरे इत्मीनान के साथ कहा और एक भीगी-सी मुस्कराहट उसके चेहरे पर चिपक गयी, जिसने उसके लिजलिजे होंठों को और भौंड़ा बना दिया।

उसकी तरफ देखा तो मन में आया कि किसी के होंठ कुदरती तौर पर इतने काले नहीं हो सकते। जरूर एक के बाद एक सिगरेट का धुआं उगलते रहने के कारण हो गये हैं। इसकी तमाम आदतें ऐसी क्यों हैं जो बद से बदतर सूरत बख़्शें ? उसने देखा, उसके चेहरे पर वही रूमानी मुस्कराहट चिपकी हुई है। उसे अपनी तरफ देखता पाकर उसकी लिजलिजाहट और बढ़ गयी। माधवी की परेशानी भी। लगता है, इसने मेरी बात पर पूरा यकीन कर लिया है ! यह समझता क्यों नहीं, कुछ बातें हैं जो औपचारिकता के नाते कही जाती हैं पर उनका कोई मतलब नहीं होता। अब किसी आदमी से यह तो कहा नहीं जा सकता-आप बेपनाह बदसूरत हैं, आपकी सूरत देखकर मैं वितृष्णा से सिहर उठती हूं। कौशल कुमार के रचना-संसार में बसनेवाले जीव कह सकते हों, तो हों, वह नहीं कह सकती। मगर उसकी गलतफहमी दूर करने के लिए कुछ तो कहना होगा।

‘‘मुझे क्या लगता है, उसका कोई महत्त्व नहीं है,’’ उसने कहा।
चौराहे की बत्ती हरी हो गयी। स्कूटर खड़खड़ाकर आगे दौड़ गया।
‘‘मुझे किसी पुरुष की शक्ल-सूरत में दिलचस्पी नहीं है,’’ माधवी ने कहा पर यह वाक्य शोर से दब गया और पहले वाक्य के जवाब में कौशल चिल्ला उठा, ‘‘महत्त्व है ! मेरे लिए बहुत महत्त्व है !’’
सीलन-भरी मुस्कराहट की छटा एक बार फिर देखने को मिली और माधवी ने तीखी आवाज में कहा, ‘‘नहीं होना चाहिए।’’

मुस्कराहट कायम रही। माधवी अपने को दोहराती पर देखा, घर जानेवाली गली सामने है और दरुरी है कि स्कूटर चालक को दायें-बायें की हिदायतें दी जायें।  फिर घर सामने था, किराया अदा करना था, बगल में कौशल कुमार खड़ा था। बिलकुल न चाहते हुए वह इसे साथ कैसे ले आयी, सोचती हुई भीतर घुसी, कौशल कुमार के साथ।
कमरे में पहुंचकर घड़ी देखी। बारह बजकर पचास मिनट। नौकर ने मेज पर थालियां लगा रखी हैं। खाना भी तैयार होगा। बस, खीर उसे बनानी है। छोटे बेटे समीर से सुबह वादा किया था। यह चला जाये तो....
‘‘चाय नहीं पिलायेंगी ?’’ कौशल कुमार ने आरामकुर्सी में धंसते हुए कहा।
रसोईघर में जाकर वह नौकर को दो प्याले चाय बनाने की हिदायत दे आयी, लौटकर पूछा, ‘‘क्या बात थी ?’’
‘‘किसमें ?’’

‘‘आप कह रहे था न, कुछ जरूरी बात करनी है।’’
‘‘हां, कहानी के बारे में। खोलकर बतलाइए, पढ़कर क्या लगा आपको ?’’
‘‘बतलाया तो था, कहानी बहुत उद्विग्न करती है,’’ उसने घड़ी पर नज़र डालकर संक्षिप्त उत्तर दिया।
‘‘क्या उद्विग्न करता है, समाज में होने वाला शोषण या पात्र के मानसिक ह्नास की स्थिति ?’’
‘‘दोनों।’’

‘‘कैसे ? मेरी कहानी में सामाजिक शोषण तो दिखलाया नहीं गया। लगता है, आप मेरी कहानी समझीं नहीं।’’
‘‘समझी कैसे नहीं,’’ माधवी के अंदर बुद्धिजीवी चोट खा गया। ‘‘सामाजिक शोषण दिखलाया नहीं गया, ठीक है, पर पात्र की मानसिकता बनी उसी से है,’’ उसने कहा, ‘‘वह मरना चाहता है पर इतना निष्क्रिय हो चुका है कि कर कुछ नहीं सकता। आत्महत्या के लिए मन में लालच है पर आत्महत्या करने की ताब नहीं। यही तो है जो उद्विग्न करता है। आत्महत्या मेरे अंदर संवेदना को जन्म देती है, विक्षोभ को नहीं। क्योंकि उसमें आदमी सक्रिय होता है, आवेश-आवेग को महसूस कर सकता है। आत्महत्या जीवित व्यक्ति की बात कहती है, इसलिए सह्य होती है। पर आपकी कहानी का नायक ! वह तो कब का मर चुका। फिर भी जिये जा रहा है.....’’

कहानी उस पर हावी हो गयी। कब आकर हरिचरण चाय रख गया, कौशल कुमार ने लंबे-लंबे घूंट भरकर अपना प्याला खाली कर दिया, माधवी का प्याला पड़ा पपड़ी जमाता रहा, उसे ठीक तरह से मालूम नहीं हुआ।
‘‘आप मेरी बात कितनी अच्छी तरह समझी हैं,’’ कौशल कुमार ने आगे झुककर कहा, ‘‘शाय इसलिए क्योंकि आपकी रचनाओं में भी वही अनर्थकता की भावना है जो मेरी कहानी में। एक बात और कहूं, आपका उपन्यास पढ़ा तो लगा, लेखिका का कोई वर्ग नहीं है, इंसान इसके लिए बस इंसान है। दुर्लभ गुण है।’’
माधवी का चेहरा खिल गया। ‘‘सचमुच ऐसा लगा आपको ?’’ उसने गद्गद स्वर में कहा, ‘‘सच कहती हूं, मुझे पाखंड और आडंबर से सख्त नफरत है।’’

‘‘जानता हूँ। एक प्याला चाय और पिलायेंगी ?’’ कौशल ने एक ही सांस में दोनों बातें कहीं।
माधवी बुद्धि के छज्जे से वास्तविकता की पथरीली धरती पर गिरी। आडंबर से नफरत है तो कह दे, अब आप जाइए, डेढ़ बजने वाला है और चाय नहीं बन  सकती। फिर होंठ खुलकर बन्द क्यों हो गये ? बार-बार घड़ी देखकर रह गयी, जबान खुली क्यों नहीं ?

‘‘आज सुबह बिना चाय पिये ही घर से निकल पड़ा था,’’ कौशल ने कहा, ‘‘शक्कर नहीं थी।’’
‘‘अभी बनवाती हूं,’’ हकलाकर माधवी ने कहा और रसोईघर की तरफ चल दी।
बाहर दरवाजे की घंटी घनघना उठी। एक-दो-तीन बार। बच्चे इसी अंदाज में घंटी बजाते हैं। वह बाहर भागी। दरवाजा खुलते ही आलोक और समीर तेजी से बैठक में आये और सोफे पर बस्ते पटक दिये। अजनबी पर नज़र पड़ी तो उसी तेजी से बाहर निकलकर बोले, ‘‘कौन है ?’’
‘‘एक लेखक है,’’ उसने कहा।
‘‘इस वक्त क्यों आये हैं ?’’ आलोक बोला। वह दस बरस का है और बेहद मुंहफट।
‘‘बस, जा रहे हैं।’’
‘‘खीर नहीं बनी ?’’ समीर ने रोनी आवाज़ में पूछा।

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