रेतगार - संतोष गोयल Retgaar - Hindi book by - Santosh Goel
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रेतगार

संतोष गोयल

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3816
आईएसबीएन: 81-214-0324-3

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मानव की गहराइयों में झांकता,समाज के यथार्थ को चित्रित करता उपन्यास....

Retgar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


नारी कौन है ? नारी क्या है ? मात्र एक तरल पदार्थ, जिसे दूसरे के अनुसार ख़ुद को ढाल लेना है या फिर उसमें जज़्ब हो जाना है- अपने को, अपने अस्तित्व को भूल कर। पर...यदि वह अपने को पहचानना चाहे, अपनी पहचान बनाना चाहे, अपने पैरों खड़ा होना चाहे, पुरुष सत्तात्मक इस समाज में शिक्षा, पद तथा अर्थ की शक्ति पा लेना चाहे तो उसकी नियत क्या एक महायुद्ध है ? एक ऐसा महायुद्ध, जिसमें एक ओर खड़ा है-पूरा समाज, समस्त संबंधी, मित्र, यहां तक कि माता-पिता-पति भी और दूसरी ओर खड़ी हो वह-अकेली तन्हा। ऐसे में क्या करे वह ?

रिशम एक पदार्थ, एक वस्तु न बनकर जीवित इंसान बनना भर ही तो चाहती थी। पढ़ लिखकर अपने पैरों से चलना चाहती थी। कुछ बन जाने का सपना भी तो उसके मन में बाबा ने बोया था, क्योंकि वे शायद ‘एक बेटे की तमन्ना मन में लिये उसमें अपना बेटा खड़ा कर रहे थे...’ पर बेटियां भी कभी बेटा बन सकती हैं ?
अम्मां के द्वारा उसके सारे पंख कतर देने की सभी कोशिशों के बावजूद ‘रिशम’ शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता तथा ऊंचा पद पा कर भी मात्र ‘इस्तेमाल की वस्तु’ बना दी जाती है। तब उसे समझ आता है कि गांव हो या शहर, अम्मा-बाबा के साये तले हो या कि उच्च शिक्षा तथा ऊंचे पद के हथियारों से लैस, वह है तो अकेली ही। उसकी नियति, उच्च शिक्षा, अधिक अर्थ तथा ऊंचा पद, कुछ भी तो बदल नहीं सकता।

समस्त कथा का केंद्र बिंदु ‘रिशम’ है। किंतु उपन्यास मानवीय संबंधों के आंतरिक व माइक्रो सूत्रों को पकड़ता व जूझता चलता है।

मानव की गहराइयों में झांकता, समाज के यथार्थ को चित्रित करता तथा समय का पूरा परिप्रेक्ष्य सामने रखता यह उपन्यास अपनी सहज अभिव्यक्ति के कारण निस्संदेह सार्थक और महत्त्वपूर्ण है।

रेतग़ार


बाहर ढेर सा कोहरा छाया था। चौक का नल तक नहीं दीख रहा था। दांत मांजने के लिए बाहर निकली तो कोहरा नाक में चला गया। कितनी सोंधी लगती है कोहरे की गंध...बिलकुल पहली बारिश का पानी पड़ी मिट्टी की सी। पर मेरा मन...मन पर भी तो कोहरा पड़ा था, जिसमें कोई ख़ुशबू न थी..न सोंधी, न कोई और। अम्मां के चेहरे पर तनाव सुबह भी बच रहा था। वे गहरे सोच में दीख रही थीं। बाबा का मुंह भी यूं निश्चित तो नहीं था, पर अम्मां जैसा नहीं। अम्मां का चेहरा हवा चल लेने के बाद का रेगिस्तान बना था। ढेर सी लकींरें।

‘इतनी लाइनें तो नहीं होतीं अम्मां के चेहरे पर,’ मैंने सोचा भी था।
‘‘रिम्मू...रिम्मू...रिम्मू...ला, चाय ला बिट्टू।’’
बाबा की पुकार थी। बाबा को ‘ऊ’ की मात्रा से ख़ास लगाव था, शायद तभी तो ‘रिशम’ का ‘रिम्मू’ बिटिया का ‘बिट्टू’ हो जाता था।
‘‘लायी बाबा....आ...आ।’’

मैं चाय की प्याली ले बाबा के सामने आ खड़ी हुई थी। एक अजब सा गुनाह का भाव चेहरे पर था, हालांकि गुनहगार मैं थी तो नहीं। यह तो मैंने बहुत बाद में जाना कि लड़की बन जाना ही वह गुनाह था जो मुझे तमाम ज़िंदगी ढोना पड़ा था।

हाथ के इशारे से बाबा ने पास बिठाया। मैं सिर झुकाये बैठी रही थी। बाबा का हाथ कंधे पर आया तो मानो दबाव मात्र से बंद टूटी खुल गयी। आँसू भरभरा कर गिर आये और धीरे-धीरे हिचकी में बदल गये। बाबा थपथपाते रहे, बस। थोड़ा सा रो चुकने पर ही बोल पायी थी, ‘‘बाबा ! मेरा क्या कसूर अगर मेरा मन पढ़ने को करता है...मैंने तो नहीं कहा था मैं लड़की बन जाऊं...?’’

हिचकियों में आगे के शब्द डूब गये थे। शब्दों की ताकत ही शायद चुक गयी थी। तभी तो...तभी तो बाबा स्पर्श की ताकत आजमा रहे थे और मैं सिर झुकाये आंसुओं को बहा कर भीतरी ताकत जुटाने में जुटी थी। बहुत गुस्से और मजबूरी की स्थिति में यह होता है। आवाज साथ ही नहीं देती। न बाबा बोल रहे थे, न मैं।
‘‘अरी ओ...ओ...रिम्मी !..कहां हैगी चाय ठंडी हो री हैगी।’’
अम्मां की आवाज़ थी। वह ग़ुस्से में ज्यादा बोलती जाती थीं, यहां तक कि उनकी रुलाई बड़बड़ाहट में बदल जाती थी। किसी के न होने पर भी वह रसोई में बैठी या तो बरतनों के रखने पटखने की आवाज़ करती रहतीं या फिर बोलती रहतीं...

‘‘ख़ुद तो स्कूल चल्ला जावै हैगा (बाबा हालांकि इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे।) घर से बाहर का कुछ पत्ता ना हैगा...पास-पड़ोस मैंने खावै हैंगे..इत्ता पढ़ा-लिखा लैया, इब कै अफसरनी बनावैगा..ख़ुद बैठ जागा और बैट्टी की कमायी खावैगा...तन्नै के पत्ता...पर...कान हौवें तो सुनैगा ना...।’’
धीरे धीरे आवाज़ चुपा जाती या फिर बाबा-बेटी बाहर चले जाते, इसलिए सुनायी न पड़ती।
पर...आज अम्मां चुप थी। मैं रसोई में आ कर अम्मां के सामने बैठ गयी। कुछ बोली तो नहीं....पर बोलना चाह रही थी। कनखियों से मां की ओर देखती रही थी। बात का सिरा कहाँ से पकड़ूं, सोचती जा रही थी और चाय भी पी रही थी।
‘अम्मां तो बड़ी हैं। वही क्यों नहीं बात करने का कोई तरीका ढूंढ़ निकालती हैं...।’ मैं सोचती रही, पर अम्मां न हिलीं, न डुलीं।
 
चाय ख़त्म हो गयी। बात कुछ न हुई। फिर मैं उठी। सामने की चौहद्दी में लगे नल के पास रखे बरतन साफ़ करने लगी..अपने ही पंखों के बीच बुचकी चिड़िया सी।
चिड़िया ही तो...सिर्फ पंख फड़फड़ा सकती थी और फिर दुबक कर अपने डर को भगाने की कोशिश में कुछ कुछ काम करने लगती...कभी बरतन-कपड़े, कभी सिलाई-बुनाई-कढ़ाई...घर की साज-संभाल और जाने क्या-क्या ? मानो घर कोटर है, उसके तिनके-तिनके को संभाल कर ही मुझे सुरक्षा मिलेगी।

अम्मां...अम्मां भी क्या करें ? वह तो पैदा हुई तो पंखहीन चिड़िया ही थी। उनके तो पंख काट ही दिए गये थे....फड़फड़ाने की इजाजत तक नहीं थी। अक्सर अम्मां कहती, ‘जान्ने कै सूझी थी लाल्ला नै। पढ़ान लाग्या था। छोरियां भी कब्बी स्कूली पढ़ायी जावै हैंगी। छोरियां पढ़-लिख के मैम बन गयीं तो हो गये घर-गृहस्थी के काम-धाम...पर कोई समझैगा तब ना।’

अम्मां अपनी भड़ास तरह-तरह से निकालती रही थीं, फिर भी गांव के स्कूल से मैंने इंटर कर लिया था..वह शायद इसलिए संभव हो पाया था। कि अभी चौदह की ही हुई थी। गांवों के स्कूल में जरा सा होशियार बच्चा खटाखट दो क्लास आगे कर दिया जाता था यानि ‘डबल प्रमोशन’ का रिवाज़ था। उसी का नतीजा था जो मैं पढ़ पायी थी।
अम्मां ठीक ही कहती थीं। ज़रा सी हवा मिले तो आदमी और का तलबगार हो जाता है। आखिर अम्मां ने बाल धूप में सफेद नहीं किये थे..पर बाबा वह शायद एक बेटे की तमन्ना मन में दबाये मुझमें अपना बेटा बड़ा कर रहे थे। परिणामतः मैं पढ़ रही थी...अम्मां की मेरे पंख कुतर देने की तमाम कोशिश को नकारती हुई।

गांव का नाम कुछ भी हो, सभी गांवों का भूगोल इतिहास तथा समाजशास्त्र एक सा ही होता है। ऐसा ही गांव था-तिनसिया। इसे गोट कहा जाता था। कोई पंच-सात सौ घर, छोटे-छोटे बीस-पच्चीस घरों के मुहल्लों में बंटे, बसे थे। बेतरतीब से फैले ये मुहल्ले इधर-उधर फेंक दी गयी ईंटों से लगते। किसी ने घर उत्तर में फैलाया, किसी ने पश्चिम में जगह पायी तो वहीं पसर लिये। जहां जगह मिली, एक पत्थर डाला और नहाने की जगह निश्चित कर ली। लगा पाये तो एक मुहल्ले के बीस घरों में तीन चार नल लग गये...एक ही लगा तो बीचों-बीच कोई जगह जुटा ली। यही नल वाली जगह औरतों का स्नानघर हो जाती और चर्चा-कुचर्चा का स्थल भी। हर मुहल्ले में एकाध घर ही ऐसा था जो अपनी चारदीवारी बना पाता और उसी दीवार के पीछे कोने में चौहद्दी बना कर एक नल, (व्यक्तिगत) मुहय्या कर लेता, हालांकि वह नल सांझा ही रहता। पास-पड़ोसी तो उस पर अपना अधिकार समझते ही।

मेरा घर ऐसी सुविधा वाले कुछ घरों में ही था। गांवों में पढ़े-लिखे मिलते ही कहां हैं ? एकाध जो थे वे अंधों में काने की भांति राजा माने जाते...उन्हीं में बाबा का भी स्थान था। बाबा सिर्फ पड़े-लिखे ही नहीं, कॉलेज में पढ़ाते थे यानी गांव वालों की भाषा में मास्टर थे। मास्टर के लिए उनके मन में असीम, अगाध अप्रश्नीय आदर भाव था।


उस दिन अम्मां साईंनी जी के यहां हमेशा की तरह सलाम झुकाने गयी थीं। यह गांव का रिवाज़ था। साईं उस गांव के पिता और पति दोनों थे, अतः गांव भर की जिम्मेदारी थी कि वे साईं और साईंनी का काम करें। सभी औरतें प्रायः साईंनी के यहां हाजिरी बजातीं, काम करवातीं और सलाम झुका कर चल देतीं। ‘सलाम झुकाने’ मतलब ही ‘साईनी के पैर छूना और उनके कुछ काम-धाम कर देना था। कामों में साईंनी के हाथ पैरों पर असली घी मल देना भी शामिल था। साईंनी का असली घी से मालिश करवाना सदा ही कांटे सा चुभता रहा था। गांव में हम जैसों के घरों में सरसों तेल इस्लेतमाल होता था, अधिकतर लोगों को वह भी नसीब न होता, सिर्फ़ मिट्टी का तेल, वह भी राशनिंग करके ढिबरी जलाने के लिए, मिल पाता था, वहां साईंनी द्वारा असली घी की मालिश करवाना मेरे बालमन को खुरपी से चीरता भीतर तक धंसा पड़ा था।

उस दिन...तब मैं इंटर में थी..उम्र शायद तेरह की...(मैं सीधी दूसरी कक्षा में दाखिल हुई थी..फिर छटे के बाद आठवां और नवां छोड़ कर सीधा दसवीं का इम्तिहान अतः उम्र और कक्षा में कोई ताल मेल था ही नहीं)....अम्मां साईंनी के यहां गयी हुई थीं....बाबा कॉलेज। इम्तिहान क़रीब थे। मैं पढ़ाई में मग्न थी...दरवाजे पर आवाज़ हुई। खोला छोटे मामा थे। बड़ी खुशी हुई, लेकिन थोड़ा सा खल भी गया। इम्तिहान क़रीब हैं और अम्मां मामा की खुसर-फुसर का ना खत्म होने वाला सिलसिला शुरू हो जायेगा। सारे घर का ढर्रा असामान्य फैला सब समय-असमय हो जायेगा...बस....हो ली पढ़ाई।

मन की उलझन-सुलझन, ग़ुस्सा-आक्रोश, दुःख-तनाव सभी को भीतर रख कर ऊपर से मुस्कराते रहने की ट्रेनिंग कोई देता नहीं है, ख़ासतौर पर हम लड़कियों को। वह तो हमें मां के खून से ही विरासत में मिलती है। मैं अनोखी तो न थी। उसी विरासत से मिली अभिनय कला में मैंने कहा, ‘‘नमस्ते मामा। आओ। कैसे हैं सब।’’
मामा को सबसे छोटा होने के कारण ही ‘जी’ का पुंछल्ला लगाये बिना पुकार सकती थी, वरना अम्मां के अनुसार तो एक साल बड़े को भी ‘जी’ लगा कर पुकारा जाना चाहिए। अम्मां के इसी नियम के अनुसार मैं एक मात्र सहेली सरो को कभी चिढ़ाने के लिए ‘सर्वत जी’ पुकार देती थी।
मामा ने कंधे पर ज़ोर का हाथ मारा, बोले, ‘‘ठीक है, भांजी। तू बता, तेरा क्या हाल है ? कितनी किताबें पढ़-पढ़ कर पार लगायीं ?’’

मेरे कंधे पर पड़ा थाप का हाथ ज़रा ज़ोर का था। अपने कंधे को सहलाती, मन के गुस्से को दबाती मैं बाहर चौक तक चली आयी। गर्मी का मौसम, मैं अकेली, फिर मामा के साथ कमरे में बैठना पता नहीं किस भाव से मैं चौंक में आ बैठी यह कोई पहली बार न था कि मैं और मामा घर में अकेले थे, पर पिछली दो तीन बार से मुझे मामा की निगाह में आये भाव असामान्य लगने लगे थे...अक्सर उन्हें झटका दे भी देती है..ख़ुद का वहम मान कर भुलाती भी थी।
मामा के साथ बाहर चौक में आयी। बरामदे में रखी आरामकुर्सी बिछा दी। मामा बैठ गये। इधर-उधर देखा। अम्मां न दीखीं। इशारे से पूछा।
‘‘अम्मां ज़रा साईं के यहां गयी हैं।’’
चाहती तो न थी, पर कहना पड़ा। चाहती थी कुछ न कहूं...या फिर कह दूं जरा पड़ोस में गयी हैं...अभी आती हैं...कोई भी बहाना लगा कर बुलाने चली जाऊं पर तीर तो कमान से निकल चुका था।

कोई बात नहीं तू तो है भांजी वह भी पढ़ी-लिखी हमारे घर में तो भई पहली लड़की है जिसने बोर्ड का इम्तिहान दिया है और आगे भी देगी...फ़ख़्र की बात है भई।’’
मामा के शब्दों में ‘फ़ख़्र’ चाहे थे, पर उनकी आँखें मेरे भीतर तक भिद रही थीं...मानो आंखों में एक्सरे फिट हो जो भीतर तक का जायजा ले लेगा।
मैं जल्दी से उठी। पानी लेने चली गयी। पानी का गिलास लेते हुए मामा जिस तिरछी निगाह से मुस्कराये, वह कोई सामान्य दृष्टि न लगी। पता नहीं, मुझमें परिवर्तन हुआ था..या मैं पुराने परिचित, जानी पहचानी स्थितियों को नये नजरिये से देखने लगी थी।
‘‘चाय बनाऊं या शरबत ?’’

‘‘जो तू चाहे...।’ मामा की निगाहों में शरारत भरी थी.....उनका हाथ फिर धौल-धप्पे के लिए उठा। मैं उनके हाथ के नीचे से झुकती हुई निकल कर स्टोर में घुस गयी।
शरबतेगुलाब की शीशी स्टोर में ही रखी थी। मैं स्टोर मैं घुस कर शरबत की बोतल उठा रही थी कि किसी अहसास से पांव कांप उठे। सामने दरवाजे पर मामा खड़े थे। मामा का कद उम्र और रिश्ता तीनों मुझ पर हावी थे..परिणाम एक अजब डर मन में समा गया था...हाथ पांव की मानों जान निकल गयी थी...सब सुन्न हो गया। प्रतिरोध-विरोध की ताकत ही न बच रही थी। मेरा चेहरा नीचे झुका था...बस इतनी ताकत भर बची थी कि मैं बोतल थामें रही थी। मामा मेरे सामने आ गये। एक झटका हुआ-मामा ने मेरा मुंह पकड़ा...अपने होंठ मेरे होठों पर रख दिए...बस..ज़मीन-आसमान डोल गया। एक भयानक आँधी, एक टहनी जिसकी लपट में मेरा जो हिस्सा आया, टूट-फूट गया। मन के भीतर क्या टूटा, क्या गिरा यह तो नहीं पता पर शरबतेगुलाब की बोलत के गिर कर चूर-चूर होने की आवाज़ के साथ दरवाज़े पर की ठक्-ठक् दोनों साथ-साथ हुईं तो मैं चौंक कर, कांप कर, हड़बड़ा गयी।


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