चोट्टि मुण्डा और उसका तीर (सजिल्द) - महाश्वेता देवी Chotti Munda Aur Uska Teer (Hard Cover) - Hindi book by - Mahashweta Devi
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चोट्टि मुण्डा और उसका तीर (सजिल्द)

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :318
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3824
आईएसबीएन :9788183611527

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संघर्षमय जीवन के माध्यम से मुंडा जाति के शोषण, उत्पीड़न और उसके खिलाफ उसके तेजस्व और वीरत्वपूर्ण संघर्ष की कहानी...

Chotti Munda Aur Uska Teer

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारत के आदिवासी समाज और उसके जीवन पर महाश्वेता देवी ने प्रभूत और उत्कृष्ट कथा साहित्य का निर्माण किया है।
चोट्टि मुंडा और उसका तीर इसी श्रृंखली की एक कड़ी है, जो इस उपन्यास के नायक चोट्टि मुंडा (चोट्टि एक नदी का नाम भी है) के संघर्षमय जीवन के माध्यम से मुंडा जाति के शोषण, उत्पीड़न और उसके खिलाफ उसके तेजस्वी और वीरत्वपूर्ण संघर्ष की कहानी कहती है।

मुंडा जाति ने अंग्रेजों के शासन काल में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में गौरवशाली विद्रोह किया था, जिसे अंततः दबा दिया गया। शोषण, उत्पीड़न बदस्तूर जारी रहा जो आजादी के बाद भी बरकरार रहा। आदिवासी कल्याण की परिकल्पनाएँ कितनी थोथी और पाखंडपूर्ण हैं यह भी इस उपन्यास में पूरी तरह स्पष्ट होता है।
चोट्टि मुंडा की कहानी मुंडारी जाति और दूसरी अस्पृश्य हिंदू जातियों के विद्रोह की अपूर्व तथा शौर्यमय गाथा है, जो हमारे देश के वर्तमान सच को उजागर करती है।

अपने पिता
मनीश घटक को—
जो आजीवन संघर्षशील
मानव के प्रति आस्था में
अविचल रहे

 

एक

 

आदमी का नाम था चोट्टि मुंडा। चोट्टि एक नदी का नाम भी है। नदी के नाम पर उसका नाम होने की एक कहानी है। उसको लेकर हमेशा क़िस्सेचलते रहते हैं। उसका पुरखा पूर्ति मुंडा जहाँ जाता, वहीं मिट्टी से या तो अबरक निकलती, या कोयला। इसके परिणामस्वरूप उसे लेकर भी उसी तरह बातें चलती। पूर्ति अपनी पत्नी-लड़के-लड़की को चाईबासा से पलामू ज़िला ले आया। वहाँ ज़ंगल साफ कर रहने का प्रबन्ध किया। इस बार उसके खेत की मिट्टी के नीचे से निकले पत्थर के औज़ार। उसे लेकर बातें चलीं और अचानक एक दिन अंग्रेज़-बंगाली-बिहारी—तरह-तरह के लोगों ने आकर उसे उसके ठिकाने से हटा दिया। जब प्रस्तर युग के औज़ार मिले हैं, तो उस क्षेत्र पर पुरातत्व विभाग का अधिकार है।
उसका मन टूट गया। उसके मिट्टी खोदने पर कोयला या अबरक क्यों निकलता है और साथ-ही-साथ आ पहुँचते हैं अंग्रेज़-बंगाली-बिहारी लोग। इसका कारण क्या है ? उसे कहीं शान्ति से रहने को क्यों नहीं मिलता ? वह कैसी ही निर्जन जगह क्यों न जाये, वहाँ की मिट्टी के नीचे से कुछ-न-कुछ जरूर निकलता और वहाँ अच्छी-खासी बस्ती बन जाती। उसकी मुंडा धरती और भी छोटी हो जाएगी। उसे तो कुछ नहीं चाहिए। बस, एक छोटा-सा गाँव हो, जहाँ सब वाशिन्दे आदिवासी हों—हरदम देवता की पूजा करने वाले। पहान के अनुगत।

उसकी पत्नी ने भी वही बात कही। बोली, ‘‘तुम जहाँ जाते हो, वहाँ मिट्टी के नीचे से इधर-उधर की चीज़ें क्यों निकल पड़ती हैं ?’’
‘‘चलो, कहीं और चलें।’’
उन्होंने चोट्टि नदी के किनारे घर बनाया। नदी का पाड़ पहाड़ की तरह था, वहाँ घर। साँझ को वह नदी में से मछली पकड़ता। एक दिन झुटपुटे में मछली पकड़ने जाने पर वह अचम्भे में पड़ गया—उसके जाल में जो बालू आयी थी, उसमें सोने के कण थे !
वह रेत पर बैठ गया। कोयला और अबरक देखकर अँग्रेज़ और बिहारी जिस लालच में भरकर आ जाते, क्षण-भर में आदिवासियों की जगह को घनी ईंटों और मकीनों से भोंड़ी बस्ती बना देते—यह उसे याद था। सोना देखकर पता नहीं वे लोग क्या करें ! यह पहाड़-जंगल-नदी सब बरबाद हो जायेंगे। बड़े टूटे दिल से उसने फिर अँजुली भरकर रेत उठायी। उसमें भी सोना था। अब उसने अपने मन को स्थिर किया।

हिन्दू सदान संन्यासी, ईसाई मिशनरी और चाय बागान के कुलियों के ठेकेदार—तीनों ही उसे लेना चाहते हैं। पूर्ति मुंडा कुलियों के ठेकेदार की तलाश में चला। पत्नी-बेटा-बेटी तो जिन्दा रहे। जाने के पहले पत्नी से कह गया, ‘तेरे पेट में बच्चा है। लड़का हो तो उसका नाम चोट्टि रखना।’
पूर्ति मुंडा बड़ा अभागा था। ठेकेदार की तलाश में चलते-चलते एक भरे पूरे हिन्दू गाँव में जाकर वह आम के पेड़ के नीचे सो गया। उसके नीचे से जमींदार के चोरी गये बर्तन निकले। परिणामस्वरूप वह पकड़ा गया और जेल गया। जेल से निकलते ही ठेकेदार के पास और फिर मॉरीशस। उसके बाद पता नहीं उसका क्या हुआ। लेकिन उसके वंश के लड़कों के नामकरण में नदी के नाम आते हैं। इसीलिए पूर्ति मुंडा के पर-पोतों के दोनों नाम नदी के नाम पर थे—चोट्टि मुंडा और कोयेल मुंडा। चोट्टि नदी के किनारे ही उनका मकान था। आज भी है। लेकिन पूर्ति मुंडा की आशा पूरी नहीं हुई। सोने की तलाश में बाहर से आकर लोग उलट-पलट कर डालेंगे, इसी डर से वह भागा था। अब उस जगह से तीन मील दूर होकर साउथ ईस्टर्न रेलवे चली गयी है। चोट्टि नाम से एक स्टेशन है। स्टेशन उस जनपद के कारण बना है जिस जनपद में बिहारी, बंगाली, पंजाबी रहते हैं। आदिवासी लोग दूर-दूर पर गाँव में रहते हैं।

बरस में एक बार चोट्टि स्थान आदिवासियों से भर जाता है—विजयादशमी के दिन चोट्टि मेला में। उस दिन पच्चीस-तीस गाँवों के आदिवासी उस मेले में आते। बाँस के बनाये आकारों पर काग़ज़ लगाकर वे लोग बड़े-बड़े बाघ, हाथी, घोड़े बनाते। उनको उठाकर नचाते। लड़कियाँ भी नाचतीं। महुआ की शराब पीते। उस मेले में नाच के आस-पास ग़ैर-आदिवासी मर्दों के जाने का निषेध था। जाने पर बिहारी लोग आदिवासी लड़कियों के साथ असभ्यता कर सकते थे और सूखी घास में आग लगाना सरकार को पसन्द न था। उस तरह की कोई वारदात न हो जाये, इसलिए तोहरी थाने से पुलिस आती। वह नाच सवेरे के ग्यारह बजे से तीन बजे तक चलता। उसके बाद चोट्टि मेला का असली आनन्द शुरू होता। मेला एक लम्बे-चौड़े मैदान में लगता। उसी मैदान में आदिवासियों की तीर चलाने की प्रतियोगिता होती। टार्गेट क्रमशः पीछे हटा दिया जाता था। अन्त में जो आखिरी निशाना लगाना होता, वह बहुत ही मुश्किल होता। एक-पर-एक दो बाँसों में लोहे के छल्ले बाँधे जाते। इस तरह के तीन छल्ले रहते। उनके पीछे आँख बना बोर्ड रहता। छल्लों में से होकर उस आँख का निशाना लगाना होता था।

यह तीरन्दाजी की बहुत कठिन परीक्षा होती। पुरस्कार होता—आदिवासियों की ओर से एक सुअर। लेकिन इधर कई सालों से थाने के दारोगा पाँच रुपये देते थे। तीरथनाथ लाला पाँच रुपये देते थे, ईंटों के भट्टे के मालिक हरबंस चड्ढा पाँच रुपये देते थे, फलों के व्यापारी अनवर पाँच रुपये देते। हर बरस इस परीक्षा को जीतने के लिए बड़ी प्रतिद्वंद्विता होती। दारोगा हर बरस सोचते, कहीं दंगा न हो जाए। किन्तु हर बरस ही इस प्रतियोगिता के सुअर के साथ और भी दो-चार सुअरों को मारकर सारे प्रतिद्वंद्वी मांस, भात खाकर और मद पीकर रात बिताते। जो लोग जीतते या जो हारते, उनमें झगड़ा न होते देखकर दारोगा को हर बार ताज्जुब होता।
चोट्टि मुंडा कहता, ‘‘झगड़ा क्यों होगा ? एक-एक बार एक गाँव जीतता है। यह तो खेल है। इसमें झगड़ा क्यों होगा ?’’
अठारह बरस पहले तक चोट्टि मुंडा ने हर बरस यह प्रतियोगिता जीती। लेकिन अंतिम बार जब वह जीता तो उस बार उसके वंश के डोनका मुंडा ने फ़ैसला करने वालों से कहा, ‘‘यह ठीक नहीं है।’’
‘‘क्या ठीक नहीं है ?’’
‘‘चोट्टि मुंडा को मैदान में उतारना।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘सब जानते हैं कि उसके तीर मंतर-पढ़े रहते हैं। वह अगर आँख बंद करके भी छोड़े, तो भी तीर निशाना वेध देंगे।’’
‘‘चोट्टि क्या यह सच है ?’’

‘‘चोट्टि ने कहा था, ‘‘हाँ।’’
उसके बाद सबको अचम्भे में डालकर उसने निशान से किसी का तीर उठा लिया। डोनका बोला अपना धनुष तो दे।’’
डोनका के धनुष पर तीर चढ़ा, चिल्ला खींच उसने तीर से कहा था, ‘‘बच्चा, अगर निशाना न वेध सका तो तेरी बदनामी होगी, जा तो बेटा, निशानी छेद आ।’’
बात कहते-कहते ही उसने तीर छोड़ा और निशाना वेध दिया।
डोनका ने घुटना छूकर सम्मान प्रदर्शित किया था। चोट्टि ने कहा था, ‘‘जितने लोग न कर सकें, उतने लोगों के धनुक लेकर दिखा दूँगा ! मंतर पढ़ा तो है। लेकिन देखो, मंतर-पढ़ा तीर नहीं चला रहा हूँ। जिस तीर से निशाना लगाया है, वह मेरे नाती का तीर है। यह बात भी सच है कि मन्तर पढ़ा हुआ तीर पास रहते मैं निशाना नहीं चूकूँगा।’’

किसी ने कहा, ‘‘तब तो तुम्हारा तीर का खेलना ठीक नहीं है। साठ
बरस की उमर हुई, तुम फ़ैसला करने वाले क्यों नहीं बन जाते ? एक आदमी तो तुम्हारे समाज से रहता ही है।’’
‘‘वही बनूँगा।’’
‘‘तभी से चोट्टि मुंडा इस तीरों के खेल में निर्णायक बनता है। दारोगा ने कहा था, ‘‘तेरा ऐसा हाथ है। अगर कहीं बंदूक चलाता होता तो !’’
चोट्टि ने जवाब दिया था, ‘‘तीर छोड़ते हैं मरद। गोली चलाते हैं नामरद।
बात चोट्टि ने कही थी, इसीलिए दारोगा पी गया। चोट्टि की बात क्यों पी ली, उसका एक क़िस्सा है। चोट्टि मुंडा के जीवन में तरह-तरह के कारणों से तमाम किस्से हैं।

 

दो

 

 

जिस साल चोट्टि का जन्म हुआ, उस साल चोट्टि नदी में असाधारण बाढ़ आयी हुई थी। बाढ़ के बहाव से पत्थर बह जाते थे। चोट्टि के पैदा होने के साथ ही बाढ़ का जोर कम हुआ। उस समय ब्राह्मण स्टेशन मास्टर ने कहा कि यह लड़का सामान्य नहीं है।
यह हुई शुरू की कहानी। स्टेशन-मास्टर को पता भी न था कि चोट्टि पैदा हुआ है। मालूम होने पर भी वे उस बात को न कहते। कहने पर भी कोई समझता नहीं, क्योंकि स्टेशन मास्टर की जीभ थुलथुली थी। बात अटक जाती। वे इशारों से ही काम चलाते थे। ये सब बातें बताना बेकार है। क़िस्सा बहुत दिनों से चला आ रहा है। बाढ़ के क़ायदे से बाढ़ उतर गयी थी। यह बात भी किसी को याद नहीं है।

चोट्टि बचपन से ही जिद्दी था। तीन-धनुक में कोयेल का हाथ बहुत पक्का था। लेकिन चोट्टि की हठ थी कि पक्का धानुकी बनेगा, चोट्टि के मेले में लक्ष्य-वेध करेगा। वह जब किशोर था, तब अपनी बहन की ससुराल गया। वहाँ उसने बहन के ददियाससुर धानी मुंडा को देखा। उसने जब देखा, तब धानी की उम्र निश्चय ही अस्सी-नब्बे की होगी। धानी के पास उसकी उम्र का हिसाब इस तरह था—उसके बचपन से अब तक जंगलों में दो-बार साल गाछ, सागौन के पेड़ पूरी उम्र के और पक्के हो गये थे।
धानी मुंडा बुड्ढा था लेकिन उस पर बुढ़ापा अभी छाया न था। उसने आँखें मटका कर चोट्टि से कहा, ‘‘मेरे पास एक मंतर पढ़ा हुआ तीर है। आकाश में अगर दस चिड़िय़ाँ उड़ी जा रही हों, और मैं तीर से कहूँ कि तीसरी चिड़िया ला दे तो वह ला देगा।’’
‘‘सच बात है ?’’
‘‘सच है या झूठ, यह अपनी उस परमी दीदी से पूछ ले।’’

बहन के साथ बकरी दुहाने जाते हुए चोट्टि ने पूछा, ‘‘दीदी, उसने जो कुछ कहा वह क्या सच है ?’’
‘‘परमी बोली, ‘‘कोई नहीं जानता। लेकिन वह तीर चलाना जरूर जानता है। पर वह अगर तीर छोड़ेगा तो उसे पकड़कर थाने ले जायेंगे।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘सो मुझे नहीं पता।’’
चोट्टि बहुत जोश में आ गया। उस समय उसकी उम्र चौदह बरस की थी। सूखा पड़ रहा था। चोट्टि का अंचल जल गया था। परमी का ससुर भला आदमी था। चोट्टि की माँ से बोला था, ‘‘तुम लोगों के मैदान में घास नहीं है, नदी के कलेजे की बालू धूप की तपन से हवा में मिलकर उड़ती है। बड़े लड़के को भेज दो। गायें चरायेगा। इस ओर आजकल सूखा नहीं है।’’
कोयेल बोला था, ‘‘मैं भी जाऊँगा।’’
बहन के ससुर ने कहा था, ‘‘दोनों को नहीं रख सकूँगा।’’

इसी कारण चोट्टि परमी की ससुराल गया। बड़ा गाँव था। रहना राह के किनारे था। थाना मिशन-पुरोहित के आश्रम के पास था। गाँव में कभी यही लोग रहते थे, यह समझने का कोई साधन न था। गाँव में बिहार की दूसरी जातियों की प्रमुखता थी। उच्च वर्ण के ग़रीब और धनी लोग थे। मुंडा लोग दूर रहते थे। उनकी बस्ती भी बड़ी थी। इस गाँव में मुंडा लोग हिन्दुओं के खेत-खलिहान में मेहनत-मजूरी करते। चोट्टि की बहन की सास बकरी का दूध बेचती। यहाँ पर वैसा प्रचंड सूखा नहीं था। चोट्टि बरस-भर रह गया। खूब मेहनत किया करता था। फ़सल होने पर जब परमी का ससुर, उसका पति, देवर, सास—सभी बेगारी देने जाते, उस समय वह अकेले गाय-बकरी दुहता, दूध बाँटता, गाय-बकरियों को चराता। परमी के सास-ससुर उसका बहुत ध्यान रखते। अफ़सोस की बात है कि उनके कोई अविवाहित लड़की नहीं है। होती तो लड़के को जमाई बना लिया जाता। लेकिन उन दोनों ने चोट्टि से एक बात कही, ‘‘धानी मुंडा के पास मत जाना।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘यह मत पूछो। और कभी उससे तीर-धनुक लेने को मत कहना। धानी मुंडा हमारे परदादे का भाई है। फिर भी कहते हैं, उसके हाथों में जब धनुक उठेगा तो मुंडा समाज, मुंडा परिवार पर आ जायेगी।’’
ये बातें सुनकर चोट्टि के मन में धानी के प्रति आकर्षण बहुत अधिक बढ़ गया। धानी ने क्या किया है ? क्यों उसके बारे में सबके मन में यह भय-मिश्रित सम्मान है ?
वह धानी को छिप-छिपकर देखता। धानी दिन-भर कुछ न करता। बलोया-फरसा सभी मुंडा लोगों के पास रहता है। धानी का बलोया बहुत ही पैना था और बलोया की लकड़ी के हत्थे पर कुछ अजीब किचिर-मिचिर लिखा हुआ था। दिन-भर लकड़ी काट-काटकर धानी मुंडा बच्चों को सुन्दर खिलौने बनाकर देता। किसी से बोलता न था। अपना भात खुद राँध लेता। वह घाटो नहीं खाता था। गाँव के लुहार दाव, साग-मछली काटने की वैरी, छुरी-बलोया-हँसिया-दराँती-कुदाल-खुरपी बनाते। लुहारखाने के सामने बैठकर धानी सबके लकड़ी के हत्थे और मुट्ठे बना देता। उसने यह बढ़ई का काम कहाँ से सीखा था ?

परमी कहती, ‘‘किसी को पता नहीं।’’
धानी बहुत ही गण्यमान्य व्यक्ति था। लुहारखाने के सामने के शिरीष के पेड़ की छाया में उसे न देखकर धानी की खोज में थाने से कांस्टेबल चला आता। जो पुलिस हाट में पैसा लेती, मालिक-महाजन के घर होली-दीवाली पहुँचती, वही सर्वशक्तिमान पुलिस धानी के पास आकर बड़े कोमल स्वर में कहती, ‘‘क्यों रे धानी, कई दिन से दिखायी क्यों नहीं पड़ा ?’’
‘‘मन दुख रहा था।’’
‘‘धानी ! जानता तो है सब-कुछ। कहीं जाना मत, बाबा ! मेरी नौकरी चली जायेगी। बूढ़ा गया है। थोड़ समझकर चल।’’
‘‘तेरी नौकरी तू जाने।’’
‘‘दुहाई तेरी।’’
‘‘जिस दिन तबीयत होगी, मंतर के बल से गायब होकर चला जाऊँगा।’’
‘‘जाना मत, धानी !’’
‘‘हाट में मुंडा लोगों पर जुलुम पर पैसे क्यों लेता है ?’’
‘‘किसने कहा ?’’

‘‘मैंने कहा। दारोगा से कहना होगा। तुलाई के पैसे उठाकर मुंडा लोगों को खफा करने पर फिर....। समझा ? तब दारोगा को भी जवाब देना पड़ेगा। हाँ, मैं मुंडा लोगों को नाराज नहीं करूँगा। लेकिन गौरमेन भी चाहती है कि नये जुलुम हों और मुंडा लोग बिगड़ जायें।’’
नये ज़ुल्म नहीं, पुराने ज़ुल्म ही होते रहते। कौन-सा ज़ुल्म नया और कौन-सा पुराना था, इसे चोट्टि नहीं समझता था। समझता कि परमी के ससुर सभी फ़सलों में महाजन के यहाँ बेगार देने जाते।
‘‘कहाँ जा रहा है ?’’ धानी गरज उठा, ‘‘बेगार देने ?’’
‘‘हाँ, दादा !’’
‘‘बेगार देने जा रहे हो ? तुमको मालूम नहीं—वह जिन तमाम जुलुमों के लिए लड़ा था, उनमें बेगारी भी एक था।’’
‘‘वह नहीं, दादा ! उसका नाम तुम भूले जा रहे हो।’’
‘‘हाय बीरसा ! अभी पन्द्रह बरस भी नहीं बीते हैं। जुलुम के डर से मुंडा उसी तरह काँपते हैं।’’
धानी घर से निकल गया। दीदी ने दोपहर में चोट्टि से कहा था, ‘‘घर के लोगों के बुलाने से वह नहीं आयेगा। तू बुला ला।’’
‘‘कहाँ गया है ?’’

‘‘जंगल में।’’
‘‘तू मुझे उसकी बातें क्यों नहीं बताती ? कहाँ खोजूँ ? बुला लाऊँगा, तब खायेगा ?’’
‘‘हम लोगों का खाना नहीं खाता है।’’
‘‘तो देखूँ।’’
‘‘चोट्टि धानी की तलाश में निकला। उसे तलाशने जाने के मामले ने उसे एक नये और महत्वपूर्ण क़िस्से के साथ बाँध दिया।
चोट्टि मुंडा के जीवन में सारा कुछ एक-एक क़िस्सा था। मुंडा जीवन की और कहानियों की तरह यह कहानी भी महाकाव्य-सी थी। पृथ्वी किस तरह बनी, वह पृथ्वी सेंगेल दा की आग में किस तरह जल गयी थी, दो नर-नारी किस तरह बच गये, किस प्रकार नयी पृथ्वी की सृष्टि हुई—मुंडा जीवन में यह चिरकाल से चली आती कहानी थी। मुंडा जीवन का महाकाव्य बीस बरस पहले हुआ था; यह चोट्टि को नहीं पता था।
धानी ने उसे बताया। धानी के साथ उसका जो सम्बन्ध बन गया, उसके परिणामस्वरूप चोट्टि भी महाकाव्य के नायकों की तरह विशाल और संभावनापूर्ण था।
यह 1915 के साल की कहानी है। तब चोट्टि की उम्र पंद्रह थी। खोजते-खोजते उसने धानी को घने जंगल में पाया था। एक गढ़ैया के किनारे पत्थर पर बैठा था। चोट्टि को देखकर उसने नज़र उठायी।
चोट्टि ने उसके पैर पकड़ लिये।
‘‘पैर क्यों पकड़ता है ?’’
‘‘मुझे तीर चलाना सिखा दो।’’
‘‘मैं ?’’

‘‘हाँ, तुम तीरन्दाजी के हरमदेउ हो।’’
‘‘क्यों सीखना चाहता है ? तीर तो सारे मुंडा चलाते हैं। मैं तुझे कौन-सी नयी विद्या सिखाऊँगा ?’’
‘‘मैं चोट्टि मेला में जीतना चाहता हूँ।’’
‘‘ओहो, इसलिए ?’’
‘‘तो क्या यह बेकार की बात है ?’’
‘‘चोट्टि का दमकता चेहरा देखकर धानी सहसा हँस था। बोला था, ‘‘कैसे सिखाऊँ ? तीर उठाने पर पुलिस फिर मुझे जेहल में डाल देगी !’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘ये सब बड़ी बातें हैं। बातें बताना चाहता हूँ लेकिन सुनने वाला आदमी नहीं है। यहां के मुंडा लोगों की तो कमर टूट गयी है, दिकू लोगों की दया पर रहते हैं। मुझे चाईबासा में रहने न देंगे। वहाँ मेरी बातें सुनने वाले आदमी अभी हैं लेकिन वहाँ रहने नहीं देंगे।’’
‘‘कौन नहीं रहने देगा ?’’
‘‘गौरमेन।’’
‘‘क्यों ?’’  

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