मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियां - इजैन बी. Mulla Nasruddeen Ki Kahaniyan - Hindi book by - Ijain B.
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मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियां

इजैन बी.

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :40
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3939
आईएसबीएन :00000

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हंसी-हंसी में हमेशा नया सबक सिखाने वाले मजेदार किस्से...

Mulla nasaruddin ki kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

खुशबू और खनक

एक दुकान से मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने लिए 2 तथा गधे के लिए 10 नान खरीदे, साथ ही भेड़ का भुना हुआ लज्जतदार गोश्त भी लिया।
दरी में बैठकर नसरुद्दीन खाना खाने लगा। पास ही खड़ा उसका गधा भी नानों पर हाथ साफ करने में जुटा था।
नसरुद्दीन ने उसी स्थान पर रात बिताने की सोच रखी थी। वह खुले में बैठै था तो धनी व्यापारी तथा यात्री तंबू गाड़कर भीतर बैठे मौज कर रहे थे।
तभी नसरुद्दीन के कानों में कुछ तेज-तेज आवाज़ें पड़ी, जैसे कोई झगड़ रहा हो। जिस दुकान से उसने नान तथा गोश्त खरीदा था, वहीं कुछ हलचल सी दिख रही थी।
नसरुद्दीन अपनी उत्सुकता दबा न सका और उसी ओर बढ़ चला।

उसने देखा कि दुकान का मालिक एक गरीब से दिखने वाले आदमी से झगड़ रहा था।
वह कह रहा था, ‘‘तुम्हें पैसे देने ही होंगे। तुम जानबूझ कर उस ओर लेटे थे, जिस ओर मेरी दुकान से गोश्त की खुशबू उठकर जा रही थी। सारी शाम तुम बढ़िया खाने की खुशबू का आनंद लेते रहे। मैंने देखा भी था- तुम बार-बार होंठों पर जीभ फिरा कर चटखारे ले रहे थे। मैं कोई दान-खाता खोलकर नहीं बैठा-जल्दी से पैसे चुकाओ।’’
बेचारा गरीब आदमी बेहद असहाय दिख रहा था। शायद, नसरुद्दीन की तरह उसके पास भी फालतू पैसे नहीं थे।
लालची दुकानदार की बातें सुनकर नसरुद्दीन को गुस्सा आने लगा था।

तभी दुकानदार अचानक नसरुद्दीन की तरफ मुड़ता हुआ बोला, ‘‘भाई साहब, अभी आप एक शरीफ आदमी की तरह मुझसे नान-गोश्त खरीद ले गए थे। लेकिन इस मक्कार को देखो- मुफ्त में स्वाद लेना चाहता है। क्या इसे दाम नहीं चुकाना चाहिए ?’’
नसरुद्दीन उस आदमी से मुखाबित होता बोला, ‘‘भाई, तुमने ललीज खाने की खुशबू का आनंद लिया है, तुम्हें कीमत चुकानी होगी। लाओ, जितने पैसे हैं तुम्हारे पास मुझे दे दो।’’
सुनकर दुकानदार का चेहरा खिल उठा।
गरीब आदमी ने अंटी में से कुछ सिक्के निकालकर नसरुद्दीन की हथेली पर रख दिए।
नसरुद्दीन ने उन सिक्कों को दोनों हथेलियों के बीच रखा और दुकानदार से बोला, ‘‘लाओ, अपना कान इधर लाओ और ध्यान से सुनो।’’
दुकानदार के कुछ समझ में ही नहीं आया।
नसरुद्दीन बोला, ‘‘तुमने सुनी सिक्कों की खनक ?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, लाओ पैसे मुझे दे दो।’’ दुकानदार बोला।
लेकिन नसरुद्दीन ने सिक्के गरीब आदमी को लौटा दिए और दुकानदार से बोला, ‘‘हिसाब बराबर हो गया। इसने तुम्हारे खाने की खुशबू ली और तुमने बदले में सिक्कों की खनक सुन ली।’’
दुकानदार का चेहरा फक्क पड़ गया।
वहां खड़े लोगों ने भी नसरुद्दीन की बात का समर्थन किया।
उस गरीब आदमी ने नसरुद्दीन का शुक्रिया अदा किया।
जब नसरुद्दीन वापस गधे के पास पहुंचा तो वह उसे देख खुशी से मिट्टी में लोटने लगा।

पेशगी थप्पड़


एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ने घर का काम-काज करने के लिए नौकर रखा। उसका मानना था कि तालाब से पानी भरकर लाना उस जैसे इज्जतदार आदमी के लिए अच्छा नहीं।
एक-दो बार ऐसा भी हो चुका था कि पानी लेकर लौटते समय नसरुद्दीन की मुलाकात किसी पहचान वाले से हो जाती। वह आदाब करता तो नसरुद्दीन को भी झुककर जवाब देना पड़ता और नसरुद्दीन के कंधे पर घड़े में रखा सारा पानी सामने वाले पर जा गिरता। किसी से कुछ कहते न बनता था।
उसके नौकर का नाम था अब्दुल।
एक दिन नसरुद्दीन ने उसे मिट्टी का घड़ा देते हुए कहा, ‘‘यह घड़ा लो, तुम्हें रोज 12 घड़े पानी तालाब से भरकर लाना है।’’

अब्दुल ने रजामंदी में सिर हिलाया।
जैसे ही वह जाने को तैयार हुआ कि नसरुद्दीन बोला, ‘‘सुनो ! सावधानी बरतना, घड़ा टूटना नहीं चाहिए।’’
अब्दुल मुड़कर जाने लगा तो नसरुद्दीन फिर बोला, ‘‘चौकस रहना, यदि तुमने घड़ा तोड़ दिया तो थप्पड़ खाना पड़ेगा....याद रखना।’’
अभी अब्दुल दरवाजे तक पहुँचा ही था कि नसरुद्दीन ने चिल्ला कर हाथ से इशारा करते हुए वापस बुलाया।
हैरान-परेशान नौकर वापस नसरुद्दीन के सामने जा खड़ा हुआ।
नसरुद्दीन ने एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया। ‘पटाक्’ की आवाज हुई, अब्दुल के हाथ से घड़ा छूटते-छूटते बचा।

अब्दुल बोला, ‘‘मालिक आपने मुझे मारा क्यों ? मैंने तो घड़ा भी नहीं तोड़ा।’’
नसरुद्दीन बोला, ‘‘देखो भाई, अगर मैं तुम्हें घड़ा टूटने के बाद थप्पड़ मारता तो भी घड़ा जुड़ तो नहीं जाता। जुड़ता क्या ?’’
‘‘नहीं।’’ अब्दुल बोला।
‘‘इसीलिए मैंने तुम्हें पेशगी थप्पड़ मारा है ताकि तुम याद रखो कि घड़ा टूटने पर कैसा थप्पड़ पड़ेगा। तुम भविष्य में चौकस रहोगे।’’
नौकर बेचारा नसरुद्दीन को खुले मुंह ताकता रह गया।


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